भाकपा(माले) का 12वां बिहार राज्य सम्मेलन 16 से 18 मई 2026 तक दरभंगा के लहेरियासराय स्थित पोलो मैदान सभागार में आयोजित हुआ. तीन दिनों तक चले इस सम्मेलन में बिहार के विभिन्न जिलों से आए प्रतिनिधियों – किसान-मजदूर आंदोलनों, छात्र-नौजवान संगठनों, महिला आंदोलनों, सांस्कृतिक मोर्चों और जनसंगठनों से जुड़े कार्यकर्ताओं – ने हिस्सा लिया. सम्मेलन राजनीतिक बहस, संगठनात्मक समीक्षा और भविष्य की संघर्ष दिशा तय करने का महत्वपूर्ण मंच बना.
सम्मेलन का केंद्रीय राजनीतिक स्वर भाजपा और उसके सहयोगियों की बुलडोजर राजनीति, लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ते हमलों, चुनावी प्रक्रिया पर उठते सवालों, गरीबों और वंचित तबकों पर बढ़ते दमन तथा संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के सवालों पर केंद्रित रहा. तीन दिनों तक चली चर्चाओं में बार-बार यह बात सामने आई कि देश एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की अवधारणा पर गंभीर खतरे मंडरा रहे हैं.
शहीदों को श्रद्धांजलि के साथ सम्मेलन की शुरुआत
सम्मेलन की शुरुआत एलएमएनयू विश्वविद्यालय परिसर स्थित विभिन्न महापुरुषों और जननायकों की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण तथा श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ हुई. भाकपा(माले) महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य, राज्य सचिव कुणाल, काराकाट सांसद राजाराम सिंह, ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी, विधान पार्षद शशि यादव, मिथिलांचल प्रभारी धीरेंद्र झा, इंसाफ मंच के नेता नेयाज अहमद और अन्य ने जनकवि नागार्जुन, डाॅ. भीमराव अंबेडकर, चंद्रशेखर आजाद, महात्मा गांधी, डाॅ. राम मनोहर लोहिया सहित कई महापुरुषों और क्रांतिकारी हस्तियों को श्रद्धांजलि दी.
लहेरियासराय स्टेशन से सम्मेलन स्थल तक एक जुलूस निकाला गया. सम्मेलन स्थल पर शहीद वेदी पर पहुंचकर सभी शहीदों को सामूहिक श्रद्धांजलि अर्पित की गई. पूरे परिसर में लाल झंडों, जनसंघर्षों के पोस्टरों और लोकतंत्र बचाने के नारों से संघर्षशील माहौल बना हुआ था.
सम्मेलन परिसर के विभिन्न हिस्सों का नामकरण भी जनआंदोलनों, साहित्य और सामाजिक न्याय की विरासत से जुड़े नेताओं और सांस्कृतिक हस्तियों के नाम पर किया गया था. नगर का नामकरण सीमांचल के प्रख्यात कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु और नागार्जुन के नाम पर किया गया था. मंच को मधु मिश्रा, दमयंती सिन्हा और शहीदा खातून के नाम समर्पित किया गया, जबकि सभागार का. राजाराम, रामदेव वर्मा और लक्ष्मी पासवान जैसे जननेताओं और आंदोलनकारी साथियों के नाम पर था. सम्मेलन परिसर में पार्टी के दिवंगत नेताओं – का. रामजतन शर्मा, पवन शर्मा, विशेश्वर यादव, मनोज यादव, इनामुल हक और विष्णुदेव यादव – के नाम पर प्रवेश द्वार बनाए गए. इसके साथ ही रामशरण शर्मा, डी.एन. झा और राधाकृष्ण चौधरी जैसे इतिहासकारों को भी याद किया गया, जिन्होंने तार्किकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
उद्घाटन सत्र: बुलडोजर राज के खिलाफ लोकतंत्र की आवाज
सम्मेलन के खुले सत्र में ‘बुलडोजर राज के खिलाफ लोकतंत्र का सवाल’ विषय पर संगोष्ठी हुई जिसमें का. दीपंकर भट्टाचार्य के साथ-साथ राजद के प्रदेश अध्यक्ष मंगनीलाल मंडल, कांग्रेस के मदन मोहन झा, सीपीआइ के रामनरेश पांडेय, सीपीएम के ललन चौधरी, विधायक आइपी गुप्ता, वीआइपी के नेता बालगोविंद बिंद, काराकाट से सांसद राजाराम सिंह, आरा सांसद सुदामा प्रसाद, ऐपवा महासचिव मीना तिवारी, विधान पार्षद शशि यादव और अन्य नेताओं ने संबोधित किया.
का. दीपंकर भट्टाचार्य का संबोधन: आजादी की दूसरी लड़ाई का घोषणापत्र
भाकपा(माले) महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने इस मौके पर कहा कि देश एक नए और खतरनाक दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां लोकतांत्रिक संस्थाओं, संविधान और गरीब जनता के अधिकारों पर लगातार हमले हो रहे हैं. उन्होंने कहा कि बिहार में कभी ‘सुशासन’, सामाजिक न्याय और सांप्रदायिकता विरोध की राजनीति की बात की जाती थी, लेकिन आज खुलकर बुलडोजर राजनीति को शासन का माॅडल बनाया जा रहा है. गरीबों की बस्तियों को उजाड़ा जा रहा है, आंदोलनों को कुचला जा रहा है और असहमति की आवाजों को राष्ट्रविरोधी करार देकर दबाने की कोशिश हो रही है. न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि संस्थाओं की स्वायत्तता कमजोर होती जा रही है और सत्ता का केंद्रीकरण लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है.
आज देश के सामने दूसरी आजादी की लड़ाई का सवाल खड़ा है. यह लड़ाई सिर्फ चुनावी सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि संविधान, लोकतांत्रिक अधिकारों, सामाजिक न्याय और भाईचारे की रक्षा की लड़ाई है. उन्होंने बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा निर्मित संविधान का उल्लेख करते हुए कहा कि न्याय, बराबरी और बंधुत्व पर आधारित उस संवैधानिक व्यवस्था को बचाना आज लोकतांत्रिक शक्तियों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी है.
उन्होंने मजदूरों, किसानों, छात्रों, महिलाओं और नौजवानों के आंदोलनों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में जनप्रतिरोध की नई धारा इन्हीं संघर्षों से निकल रही है. सीएए विरोधी आंदोलन, किसान आंदोलन, छात्रा आंदोलनों और मजदूर संघर्षों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इंडिया गठबंधन भी इन्हीं सामाजिक-राजनीतिक संघर्षों की पृष्ठभूमि में विकसित हुआ है. उन्होंने लोकतांत्रिक और प्रगतिशील शक्तियों से व्यापक एकजुटता की अपील की.
उन्होंने कहा कि जनता के बीच झूठ और नफरत की राजनीति फैलाकर लोकतांत्रिक सवालों से ध्यान हटाने की कोशिश की जा रही है. ऐसे समय में सच, साहस और जनसंघर्ष की राजनीति को और मजबूत करना होगा. उन्होंने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिशों के बावजूद जनता की लड़ाई जारी रहेगी. हम चुनाव हारे हैं, लेकिन हिम्मत नहीं हारे हैं.
उन्होंने भगत सिंह के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में इंकलाब लाने के साथ-साथ साम्राज्यवादी ताकतों और उनके देशी सहयोगियों के खिलाफ संघर्ष का जुड़वां कार्यभार भी लोकतांत्रिक शक्तियों के सामने मौजूद है. उन्होंने कहा कि इंडिया गठबंधन की विभिन्न पार्टियों को अपनी राजनीतिक विविधता बनाए रखते हुए भी लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के साझा कार्यभार को मिलकर आगे बढ़ाना होगा.
विपक्षी दलों और लोकतांत्रिक शक्तियों की भागीदारी
सम्मेलन के खुले सत्रा में विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं व और लोकतांत्रिक सगठनों के प्रतिनिधियों हिस्सा लिया. राजद प्रदेश अध्यक्ष मंगनीलाल मंडल ने बिहार में बढ़ती गरीबी, बेरोजगारी, महिलाओं पर हिंसा और केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना की. उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान खुलेआम पैसे बांटे गए, लेकिन प्रशासन और चुनाव आयोग ने कोई कार्रवाई नहीं की. लोकतंत्र बचाने के लिए सड़कों पर संघर्ष जरूरी है.
कांग्रेस नेता मदन मोहन झा ने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं का दुरुपयोग और चुनावी धांधली हो रही है. लोकतंत्र, पत्रकारिता और असहमति रखने वालों पर लगातार हमले हो रहे हैं. देश को फिर से लोकतांत्रिक मूल्यों की ओर ले जाने के लिए संगठित संघर्ष जरूरी है. इसके बावजूद भाकपा(माले) व अन्य विपक्षी ताकतें संघर्ष कर रही हैं.
काराकाट सांसद राजाराम सिंह ने राज्यों के चुनावों से लोकतंत्र और संविधान पर मंडराते खतरों की ओर संकेत करते हुए परिसीमन और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए लोकतांत्रिक अधिाकारों की रक्षा के लिए व्यापक जनएकता का आह्वान किया.
प्रतिनिधि सत्र: संगठन, संघर्ष और दिशा पर बहस
सम्मेलन के प्रतिनिधि सत्र में पार्टी के कामकाज की रिपोर्ट पर विस्तृत चर्चा हुई. विभिन्न जिलों से आए प्रतिनिधिायों ने संगठन विस्तार, जनआंदोलनों की स्थिति, राजनीतिक चुनौतियों और आगामी संघर्षों पर अपने सुझाव रखे.
सम्मेलन में गरीबों के घरों पर बुलडोजर चलाने, एनकाउंटर राज कायम करने, भूमि अधिग्रहण, काॅरपोरेट नीतियां और किसानों के सवाल, महिला हिंसा, शिक्षा का संकट व युवाओं का सवाल, नीट पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में बढ़ते भ्रष्टाचार, प्रतियोगी परीक्षाओं के पूरे तंत्र अपराधीकरण और राजनीतिक संरक्षण, मजदूर आंदोलन पर दमन, मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी, बकाया भुगतान, माॅब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं पर खुलकर चर्चा हुई. 674 प्रतिनिधियों में से कुल 94 प्रतिनिधियों, खासकर महिलाओं ने, बहस में खुलकर हिस्सा लिया.
संस्कृति, साहित्य और आंदोलन की विरासत
सम्मेलन के पहले दिन सुरेन्द्र प्रसाद समग्र, खंड-1 और दूसरे दिन प्रसिद्ध जनवादी कथाकार और जनगीतकार विजेंद्र अनिल के तीसरे कहानी संग्रह ‘फर्ज’ का लोकार्पण किया गया. वक्ताओं ने कहा कि यह संग्रह भोजपुर के क्रांतिकारी किसान आंदोलन और भाकपा(माले) के संघर्षों का महत्वपूर्ण दस्तावेज है. लोकार्पण कार्यक्रम में का. दीपंकर भट्टाचार्य, संतोष सहर, जीतेन्द्र कुमार, सुधीर सुमन, सुरेंद्र प्रसाद सुमन, राजाराम सिंह, मीना तिवारी, मंजू प्रकाश आदि मौजूद रहे.
नई राज्य कमिटी का गठन
सम्मेलन के अंतिम दिन 107 सदस्यीय नई राज्य कमिटी का चुनाव संपन्न हुआ. नई कमिटी ने सर्वसम्मति से का. कुणाल को एक बार फिर से राज्य सचिव चुना. नई कमिटी में महिलाओं, युवाओं और आंदोलनकारी साथियों को विशेष महत्व दिया गया. 27 नए चेहरों को राज्य कमिटी में शामिल किया गया तथा 13 साथियों को आमंत्रित सदस्य बनाया गया. पार्टी नेतृत्व ने इसे संगठन विस्तार और नई पीढ़ी को नेतृत्व में आगे लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया.
सम्मेलन में 17 सूत्री कार्यभार तय किए हैं. इनमें महिला आरक्षण कानून लागू करने, जाति आधारित जनगणना कराने, समता आंदोलन का विस्तार करने तथा बुलडोजर राजनीति के खिलाफ व्यापक आंदोलन खड़ा के कार्यभार शामिल हैं.
संघर्ष और लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प
तीन दिनों तक चले इस सम्मेलन ने स्पष्ट संकेत दिया कि भाकपा(माले) आने वाले दौर में लोकतंत्र, संविधान, सामाजिक न्याय और जनाधिकारों के सवालों पर संघर्ष को और तेज करने की तैयारी में है. सम्मेलन में बार-बार यह बात सामने आई कि लोकतंत्र की रक्षा केवल चुनावी राजनीति से नहीं, बल्कि व्यापक जनआंदोलनों, सामाजिक एकजुटता और राजनीतिक प्रतिरोध से संभव होगी.सम्मेलन का समापन इंकलाबी नारों, लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के संकल्प तथा गांव-गांव तक संघर्ष को ले जाने के आह्वान के साथ हुआ. इस उममीद के साथ कि सम्मेलन बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय साबित होगा.