वर्ष 35 / अंक - 42 / अमित शाह, जनरल डायर: तिरंगा फहराने वालों को अपराधी...

अमित शाह, जनरल डायर: तिरंगा फहराने वालों को अपराधी करार देने की साजिश – प्रशांत भूषण

अमित शाह, जनरल डायर: तिरंगा फहराने वालों को अपराधी करार देने की साजिश – प्रशांत भूषण

(देश के जाने-माने वकील और एसआइआर के खिलाफ चल रहे आंदोलन में अहम भूमिका निभा रहे प्रशांत भूषण से आरफा खानम शेरवानी की बातचीत के संपादित अंश)

आरफा खानम शेरवानी: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर भारत को ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ कहा है. लेकिन दूसरी ओर, जंतर-मंतर पर अपनी बात रखने और तिरंगा फहराने के आरोप में काॅकरोच जनता पार्टी के दो शीर्ष नेताओं को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है. उनके खिलाफ दर्ज मुकदमों और इस हिरासत को आप कितना जायज मानते हैं? क्या उन्होंने वाकई कोई कानून तोड़ा है?

प्रशांत भूषण: नहीं, मेरी राय में उन्होंने कोई कानून नहीं तोड़ा है. जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में डीनोटिफाई कर देने का यह मतलब नहीं कि वह प्रतिबंधित क्षेत्र बन गया है. पुलिस उसे अधिकृत प्रदर्शन स्थल नहीं मानती, लेकिन वहां लोगों के आने-जाने पर कोई रोक नहीं है. और भारत का झंडा फहराना तो बिल्कुल प्रतिबंधित नहीं है. हर नागरिक को तिरंगा फहराने का हक है, एक तरह से यह कर्तव्य भी कहा जा सकता है. हाई कोर्ट ने बहुत साल पहले जिंदल के मामले में यही कहा था.

इसके अलावा, वहां झंडा फहराने के लिए सिर्फ तीन-चार लोग पहुंचे थे. इसमें किसी तरह का उल्लंघन नहीं है. और अगर वे प्रदर्शन भी कर रहे थे, तो पांच या उससे कम लोगों का प्रदर्शन कोई अपराध नहीं है. यानी किसी तरह का कोई अपराध नहीं है.

वैसे भी यह तकनीकी बात है. सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि प्रदर्शन करना मौलिक अधिकार है और प्रदर्शन कहीं भी किया जा सकता है. इसके लिए किसी निर्धारित या गैर-निर्धारित स्थल की जरूरत नहीं है. सड़कों पर भी प्रदर्शन हो सकते हैं, पार्कों में भी. यह धारणा कि सड़कें सिर्फ यातायात के लिए हैं और प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल नहीं हो सकतीं, गलत है. लंदन और न्यूयाॅर्क जैसे शहरों में लाखों लोगों के प्रदर्शन मार्च सड़कों पर होते हैं. पुलिस का काम यातायात को नियंत्रित करके मार्च को सुगम बनाना होता है.

एकत्र होकर प्रदर्शन करना लोकतंत्र का सबसे बड़ा और अहम अधिकार है. लेकिन पुलिस यह सोचने लगी है कि सड़क पर यात्रा करने या पार्क में जाने का अधिकार प्रदर्शन के अधिकार से ऊपर है. यह बिल्कुल गलत धारणा है.

आरफा खानम शेरवानी: पुलिस के लाउडस्पीकर से धाराएं लागू होने और जमा होने पर हिरासत की चेतावनी को आप कैसे देखते हैं? क्या कश्मीर या गुजरात जैसा “डिस्टर्ब्ड एरिया” वाला माॅडल धीरे-धीरे देश के बाकी हिस्सों पर भी लागू किया जा रहा है? साथ ही, पुलिस की इस दलील में कितना दम है कि इन नेताओं ने शांति बनाए रखने का बाॅन्ड भरा था और अब झंडा फहराकर शांति भंग की है?

प्रशांत भूषण: पहली बात तो यह है कि शांति भंग कैसे हुई? अगर पांच-छह लोग वहां गए और झंडा फहरा दिया, तो उससे शांति भंग कैसे हो रही है? बिल्कुल शांति भंग नहीं हो रही थी. इसलिए, चाहे उन्होंने यह वचन दिया हो कि वे शांति भंग नहीं करेंगे, शांति भंग करने की कोई साजिश नहीं थी. पुलिस की यह दलील बिल्कुल गलत है.

आरफा खानम शेरवानी: सार्वजनिक शांति के नाम पर पूरे नई दिल्ली इलाके में धाराएं थोपकर लोगों और विपक्षी दलों के एकत्र होने को गैर-कानूनी बताना कहां तक उचित है?

प्रशांत भूषण: तकनीकी रूप से, अगर धारा 163 – जो पहले धारा 144 थी – लगाई गई है, तो कहा जा सकता है कि पांच से ज्यादा लोग एक साथ इकट्टा होकर मार्च करें तो उनके खिलाफ आपराधिक मामला बन सकता है. लेकिन सवाल यह है कि आप पूरे नई दिल्ली जिले में धारा 163 कैसे लगा देंगे? किस आधार पर? पूरे जिले में पांच से ज्यादा लोगों के जमावड़े की इजाजत न देना ही गैर-कानूनी है.

बड़ी बात यह है कि अगर मान भी लें कि लोगों ने कानून तोड़ा है, तो ज्यादा से ज्यादा उन्हें हिरासत में लिया या गिरफ्तार किया जा सकता है. लेकिन यहां हिरासत में लेने के बाद कई लोगों को पीटा गया. कई युवा कार्यकर्ताओं को पीटा गया. पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया और उन्हें भी पीटा गया. ये सब गैर-कानूनी हैं और पुलिस की ओर से बेहद संगीन अपराध हैं. पुलिस की बर्बरता के सैकड़ों वीडियो आ चुके हैं. पत्रकारों को हिरासत में लेना अपने आप में अपराध है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ है. फिर भी पुलिस यह सब करती जा रही है.

उन्हें ऐसा लगता है कि उनकी कोई जवाबदेही नहीं है और उन्हें कानून मानने की जरूरत नहीं है. बस ‘जनरल डायर’ जो आदेश दें, अमित शाह जो आदेश दें, या डीसीपी और पुलिस आयुक्त जो आदेश दें, वही पालन करना है. जबकि पुलिस का काम सिर्फ ऊपर से आए आदेशों का पालन करना नहीं, बल्कि कानून की हिफाजत करना है. जब पुलिस को साफ पता है कि हिरासत में लोगों को पीटना और पत्रकारों को उठाकर हिरासत में लेना गैर-कानूनी है, फिर भी वे यह करते जा रहे हैं.

आरफा खानम शेरवानी: इन नेताओं की गिरफ्तारी और पांच दिन की न्यायिक हिरासत के पीछे क्या राजनीति है? क्या सरकार को लगता है कि वह इस तरह प्रदर्शनों को कुचल देगी?

प्रशांत भूषण: उन्हें जाहिर तौर पर लगता है कि वे इन प्रदर्शनों को कुचल सकते हैं और कुचल देंगे. लेकिन वे यह नहीं देख रहे कि जितनी ज्यादा कुचलने की कोशिश होगी और जितनी ज्यादा बर्बरता होगी, उतना ही लोगों का गुस्सा बढ़ेगा और उतने ही ज्यादा लोग सड़क पर निकलेंगे.

इन सब बर्बरताओं के बाद इंडिया एलायंस की रैली में कितने लोग निकले, आपने देखा. उस वक्त सरकार या पुलिस की हिम्मत नहीं हुई कि वे उन्हें रोकें या उन पर बर्बरता करें. और वे डंडे लेकर कन्नाॅट प्लेस में घूम रहे भाजपा के गुंडे, जिन्हें पुलिस ने खुद छोड़ दिया था. जितनी ज्यादा बर्बरता होगी, लोगों का गुस्सा उतना ही भड़केगा.

ये लोग चाहते हैं कि हालात अराजक हो जाएं और प्रदर्शनकारियों की ओर से हिंसा हो जाए. वे हिंसा भड़काना चाहते हैं. अभी तक प्रदर्शनकारी भड़के नहीं हैं और उन्होंने कोई हिंसा नहीं की है, जबकि पुलिस और गुंडे उन पर हिंसा कर रहे हैं. अगर प्रदर्शनकारियों की ओर से हिंसा हो जाए, तो सरकार को बहाना मिल जाएगा कि और सख्ती करो – अभी डंडे चलाए, अब बंदूकें और पेलेट गन भी चला दो. सरकार यही कोशिश कर रही है कि प्रदर्शनकारियों को अराजक बनाकर बहाना हासिल करे. लेकिन जितना ज्यादा ये सब करेंगे, लोगों का गुस्सा उतना ही फैलेगा और जगह-जगह प्रदर्शन होंगे.

आरफा खानम शेरवानी: सीजेपी नेताओं की इस गिरफ्तारी का उनके आंदोलन पर क्या असर पड़ेगा? इससे उनका प्रभाव घटेगा या और बढ़ेगा?

प्रशांत भूषण: मेरी राय में इनका प्रभाव और बढ़ेगा. गिरफ्तारी के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस की ओर से कहा कि यह गिरफ्तारी बिल्कुल गैर-कानूनी है. इसके जवाब में उनके नेता अभिजीत दीपके ने राहुल गांधी को धन्यवाद दिया. अभी तक काॅकरोच जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच जो थोड़ी-सी दरार दिख रही थी, वह अब खत्म होती दिख रही है.

आज सिविल सोसाइटी की समन्वय समिति की बैठक हुई, जिसमें तय हुआ कि युवा संगठन, दलीय संगठन, नागरिक समाज के संगठन, किसान संगठन और मजदूर संगठन सब मिलकर, समन्वय में प्रदर्शन को आगे बढ़ाएंगे. इसलिए इस तरह की कार्रवाई से न इनका कद छोटा होगा, न प्रभाव घटेगा; बल्कि उनका प्रभाव और बढ़ेगा.

आरफा खानम शेरवानी: क्या यह आंदोलन और प्रोटेस्ट मार्चों का सिलसिला आगे भी जारी रहेगा?

प्रशांत भूषण: मेरा आकलन है कि यह अब इतना बड़ा और देशव्यापी मुद्दा बन गया है कि यह सिलसिला तब तक चलता रहेगा, जब तक सरकार झुकती नहीं. इनकी तीन मांगें हैं: पहली, ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा, दूसरी, एसआइआर रद्द हो और पुराने चुनावी नियमों के आधार पर काम हो, और तीसरी, चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए एक स्वतंत्र समिति बने.

जब तक ये मांगें मानी नहीं जातीं, प्रदर्शन चलेंगे और बढ़ेंगे. साफ दिख रहा है कि सरकार भी घबराई हुई है और उन संस्थाओं को भी डर लगने लगा है जो अभी तक सरकार के कब्जे में रही हैं. एक तरफ जनता का दबाव है, दूसरी तरफ सरकार का डर. इसलिए वे अपनी रणनीति और कदम सुधारने लगते हैं. हम देख रहे हैं कि चुनाव आयोग कई जगह पीछे हट रहा है और अदालतों का रवैया भी थोड़ा बदला है.

आरफा खानम शेरवानी: अदालतों से आपको क्या उम्मीद है? क्या सुप्रीम कोर्ट कोई निर्णायक भूमिका निभा सकता है?

प्रशांत भूषण: निर्णायक भूमिका की बात तो अभी नहीं कह सकते, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का रवैया बदल रहा है. रविवार को असाधारण सुनवाई करते हुए उन्होंने कई आदेश दिए कि पुलिस वकीलों और पत्रकारों को नहीं रोक सकती, इंटरनेट बंद नहीं कर सकती, ट्रेनें नहीं रोक सकती और सड़कें इस तरह बंद नहीं कर सकती.

एसआइआर के मामले में भी, दिल्ली की याचिका दायर होते ही नोटिस जारी हुआ. फाॅर्म 6 के मुद्दे पर भी मुख्य न्यायाधीश ने कहा है कि 28 को सुनवाई होगी और इसका प्रभावी समाधान निकाला जाएगा. यानी 47 लाख लोगों के नाम काटकर उन्हें “स्थानांतरित” कहा जा रहा है और दोबारा नाम जुड़वाने के लिए फाॅर्म 6 भरने को कहा जा रहा है, जिसमें घोषणा करनी पड़ती है कि व्यक्ति ने पहले कभी वोट नहीं दिया.

जब जनता का दबाव पड़ता है, तो अदालतों और संस्थाओं का रवैया बदलने लगता है. सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि जनता का दबाव बना रहे, ताकि बाकी संस्थाएं अपनी कार्यप्रणाली सुधार सकें.

आरफा खानम शेरवानी: अमित शाह का बयान आया है कि मोदी जी अभी भी बेहद लोकप्रिय हैं और वे 2029 में विपक्ष को फिर हराएंगे ?

प्रशांत भूषण: यह हास्यास्पद बयान है. वे यही कहेंगे; इनके पास कहने को और क्या बचा है? यही बात हो गई कि हमने सारी बेईमानी कर ली, आपके मतदाता सूची से काट दिए, फर्जी मतदाता जोड़ दिए, ईवीएम पर कब्जा कर लिया और उसमें छेड़छाड़ कर लेंगे – अब आप चुनाव लड़िए.

यह वैसा ही है जैसे कोई कहे कि हमने आपके हाथ पीछे बांध दिए हैं, अब आप हमारे साथ हाॅकी का मुकाबला खेलिए. जब पूरी लड़ाई इस बात की है कि चुनाव बेईमानी से जीते जा रहे हैं, तो यह कहना कि आप चुनाव लड़कर दिखाइए, हारे हुए आदमी का बयान है.

(साभारः द वायर. पुनर्प्रकाशन का अधिकार द वायर को है. हिंदी अनुवाद: मनमोहन)

https://youtu.be/soXwMDQLcsY?si=Qi-ZDb7T2i_-xHrk


17 October, 2026