-- वी. शंकर
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव नतीजों का साफ और मजबूत संदेश यह है कि जनता ने भाजपा और उसके सहयोगियों को पूरी तरह से नकार दिया है. 2021 के चुनावों में भाजपा को मिली चार सीटें घटकर 2026 में सिर्फ एक रह गई हैं. कुल मतदान प्रतिशत बढ़ने के बावजूद, केरल के उलट तमिलनाडु में 2026 के चुनावों में भाजपा का वोट प्रतिशत घटा है. उत्तरी तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक (AIADMK) की उल्लेखनीय जीत का कारण एनडीए गठबंधन में शामिल पीएमके (PMK) के वोटों का अपेक्षाकृत बेहतर हस्तांतरण रहा. लेकिन पश्चिमी तमिलनाडु (कोंगु क्षेत्र), जिसे अन्नाद्रमुक का तथाकथित गढ़ माना जाता रहा है, वहां उसका प्रदर्शन कमजोर पड़ा है.
डीएमके के नेतृत्व वाले धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील गठबंधन एसपीए को करारी हार का सामना करना पड़ा, उसे सिर्फ 70 सीटें मिलीं. लेकिन विजयी टीवीके (तमिलगा वेट्रि कळगम – तमिलनाडु विजय पार्टी) की तुलना में उसके वोट प्रतिशत का अंतर केवल 3.5 प्रतिशत रहा. डीएमके सरकार के पांच साल के शासन के खिलाफ पैदा हुआ जन-आक्रोश अन्नाद्रमुक के बजाय टीवीके की ओर गया. डीएमके से लगभग 14 प्रतिशत, अन्नाद्रमुक से 15 प्रतिशत, एनटीके (सीमान के नेतृत्व वाली नाम तमिलर कच्ची) से 4 प्रतिशत और बाकी अन्य दलों से वोट हासिल कर टीवीके लगभग 35 प्रतिशत वोटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, हालांकि उसे अपने दम पर स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है.
चुनाव केवल वोट प्रतिशत और आंकड़ों का मामला नहीं होते, बल्कि वे जनता की वास्तविकताओं, उम्मीदों, बेचैनियों, आकांक्षाओं और जनभावनाओं को भी सामने लाते हैं. डीएमके के पांच साल के शासन के दौरान राज्य की अर्थव्यवस्था दोहरे अंकों की दर से बढ़ी, काॅरपोरेट घरानों की संपत्ति में इजाफा हुआ, लेकिन इसके साथ-साथ बेरोजगारी, शिक्षा के बढ़ते खर्च और युवाओं के भीतर आक्रोश भी बढ़ता गया. दलितों पर जातिवादी हमले और तथाकथित ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाएं अभूतपूर्व स्तर तक पहुंचीं. इसी दौर में स्थायी नौकरी और वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर सफाईकर्मियों, योजना कर्मियों, अंशकालिक शिक्षकों और दिव्यांग लोगों सहित अनेक तबकों के लगातार आंदोलन भी देखने को मिले. पुरानी पेंशन योजना बहाल करने का वादा भी पूरा नहीं किया गया. आम धारणा यह बनी कि राज्य के मामलों पर मुख्यमंत्री से अधिक अधिकारियों का नियंत्रण है, जिससे सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों के बीच असंतोष और बढ़ा. मोदी सरकार के चार मजदूर-विरोधी श्रम कोडों के खिलाफ डीएमके सरकार विधानसभा में प्रस्ताव पारित करने को भी तैयार नहीं हुई. इसी पृष्ठभूमि में सत्ता-विरोधी माहौल, बदलाव की जनता की लंबे समय से चली आ रही चाहत, और राज्य सरकार की कमियों व नाकामियों ने मिलकर चुनाव में डीएमके गठबंधन की हार की जमीन तैयार की.
आरएसएस समर्थक और दक्षिणपंथी ताकतें, जैसे ऑडिटर गुरुमूर्ति और अन्य, इस बात पर बेहद उत्साहित हैं कि विजय और टीवीके के उभार से राज्य में द्रविड़ आंदोलन का अंत हो गया है, जो सच्चाई और हकीकत से कोसों दूर है. विजय के उदय को अपने-आप में द्रविड़ आंदोलन का अंत मानना बुनियादी तौर पर गलत है, क्योंकि न तो विजय की सीमित चुनावी सफलता और न ही डीएमके तथा अन्नाद्रमुक के वोट प्रतिशत इस तरह की व्याख्या का समर्थन करते हैं. यह तथ्य कि विजय पेरियार और अंबेडकर को अपने वैचारिक प्रेरणास्रोत के रूप में सामने रख रहे हैं, और राज्य की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताएं भी इस बात की पुष्टि नहीं करतीं कि तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन का अंत हो गया है.
कुछ लोग इसे राज्य की राजनीति में ‘उत्तर-द्रविड़ युग’ (पोस्ट-द्रविड़ एरा) की शुरुआत बता रहे हैं और साथ ही यह भी कहते हैं कि उत्तर-द्रविड़ का मतलब जरूरी नहीं कि द्रविड़-विरोधी हो, लेकिन इस कथित नए दौर के विभिन्न पहलुओं और आयामों पर ज्यादा चर्चा नहीं की जा रही है. तथाकथित द्रविड़ पार्टियों के वोट प्रतिशत और टीवीके के घोषित चरित्र को देखते हुए भी ऐसा विश्लेषण सही नहीं ठहरता. इसके अलावा, जब दक्षिणपंथी ताकतें विजय और उनकी पार्टी टीवीके के उभार पर जश्न मना रही हैं, तब हमें ऐसे लेबल लगाने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कम्युनिस्ट आंदोलन और अंबेडकरवादी आंदोलन की जड़ें भी आत्मसम्मान, सामाजिक न्याय और समानता के आंदोलन की विरासत में मौजूद हैं.
राज्य की जनता द्रविड़ पहचान वाली पार्टियों को बारी-बारी से वोट देते रहने से एक तरह की थकान महसूस कर रही है. बदलाव की चाहत कोई बिल्कुल नई बात नहीं है. विजय के आने से केवल एक व्यवहारिक विकल्प सामने आया और जनता की इस लंबे समय से चली आ रही तलाश को एक रास्ता मिला.
बदलाव के इसी माहौल को भांपते हुए विजयकांत, कमल हासन और सीमन सहित कई ताकतों ने अलग-अलग दौर में और अलग-अलग तरीकों से इसका फायदा उठाने की कोशिश की है. सीमन ने अभी भी अपनी कोशिशें नहीं छोड़ी हैं. कम्युनिस्ट पार्टियां भी एक विकल्प के रूप में उभरने की पूरी कोशिश कर रही हैं. वहीं भाजपा राज्य की राजनीतिक दिशा और उसकी वैचारिक बुनियाद को बदलने के लिए जोरदार कोशिशों में लगी हुई है.
बदलाव की मौजूदा तलाश वास्तव में किसी वैकल्पिक राजनीति की तलाश का संकेत नहीं देती, बल्कि यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन या शासन बदलने के स्तर तक सीमित है. इसे वाम या दक्षिण दिशा में किसी बुनियादी बदलाव की तलाश के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए. तकनीकी प्रगति के दौर में आर्थिक विकास के साथ बेरोजगारी और उससे जुड़ी दूसरी समस्याएं भी बढ़ती हैं. लोग हमेशा किसी ऐसे नायक या व्यक्ति की तलाश में रहते हैं जो उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए कुछ कर सके. विजय मुख्यतः इसी पृष्ठभूमि में उभरकर सामने आए हैं. विभिन्न अध्ययनों और सर्वेक्षणों से पता चलता है कि 40 साल से कम उम्र के 70 प्रतिशत युवाओं और महिलाओं तथा 40 साल से अधिक उम्र के 30 प्रतिशत लोगों ने विजय को प्राथमिकता दी. टीवीके ने राज्य भर के शहरी इलाकों, चेन्नई जैसे महानगरों से लगे जिलों और कुछ दक्षिणी जिलों में बड़ी सफलता हासिल की है. टीवीके न केवल शहरी अभिजात और मध्यवर्ग का बल्कि राज्य भर के दलितों और गरीबों का भी समर्थन जुटाने में सफल रही है.
विजय की जीत का मजाक उड़ाना – जिसे तमिल में लोकप्रिय गाली ‘थर्कुरी’ (अशिक्षित) कहकर संबोधित किया जा रहा है – और इसे गैर-राजनीतिक युवाओं की जीत बताना पूरी तरह अनुचित है. नवउदारवादी नीतियों के आक्रामकता से लागू होने और सोशल मीडिया की सर्वव्यापी दुनिया के उभार ने युवाओं और समाज के एक ऐसे हिस्से को जन्म दिया है जिसकी मूल्य-प्रणाली पारंपरिक धारणाओं से अलग है और जिसकी जरूरतें तथा अपेक्षाएं स्थापित मानदंडों में नहीं समातीं. इसे आरक्षण से आगे बढ़कर सामाजिक न्याय की बदलती अपेक्षाओं, कामकाजी महिलाओं की बढ़ती संख्या के साथ महिला सुरक्षा के बदलते सवालों, और हर जगह फैले भ्रष्टाचार के सामान्यीकरण के खिलाफ पैदा हो रहे असंतोष के संदर्भ में समझा जाना चाहिए. इसे बदलती परिस्थितियों में पारंपरिक मूल्यों से आगे बढ़कर नए राजनीतिक मूल्यों की तलाश के रूप में समझने की जरूरत है. बदलाव की इसी तलाश ने नई परिस्थितियों में भ्रष्टाचार-विरोध, नशा-विरोध और महिला सुरक्षा की राजनीति का रूप लिया है. यह बिजली दरों में बढ़ोतरी के खिलाफ भी सामने आया है, जो निजीकरण का नतीजा है. मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद विजय ने सबसे पहले दो महीनों में 200 यूनिट मुफ्त बिजली, महिला सुरक्षा के लिए ‘लायनेस फोर्स’ और एंटी-नारकोटिक्स फोर्स के आदेशों पर हस्ताक्षर किए.
यह एक बेहद अहम और जरूरी सवाल है कि क्या विजय इन तमाम समस्याओं का सचमुच कोई समाधान बन सकते हैं. इस सवाल का जवाब केवल समय ही दे सकता है. विजय राज्य में एक और द्रविड़ पार्टी के रूप में अपनी दावेदारी पेश करते हुए द्रमुक की जगह टीवीके को स्थापित करना चाहते हैं. मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद पेरियार स्मारक पर श्रद्धांजलि देने के लिए उनकी पहली यात्रा भी इसी राजनीतिक संदेश की ओर इशारा करती है.
भाजपा का सबसे बड़ा लक्ष्य और उसकी सोची-समझी राजनीतिक रणनीति राज्य की प्रगतिशील परंपराओं और मूल्यों को कमजोर करना है, ताकि दक्षिणपंथी राजनीति के विस्तार के लिए जमीन तैयार की जा सके. भाजपा राज्य की सभी जनाधार वाली राजनीतिक ताकतों – विजय की टीवीके से लेकर द्रमुक और अन्नाद्रमुक तक – को अपने राजनीतिक मकसदों के लिए इस्तेमाल करने की कोशिशों से पीछे नहीं हटेगी. चुनाव बाद सरकार गठन की प्रक्रिया में राज्यपाल की भूमिका भाजपा की मंशा को साफ तौर पर सामने लाती है. यहां तक कि विजय के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए द्रमुक द्वारा अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी अन्नाद्रमुक की सरकार को समर्थन देने की तथाकथित अफवाहें भी इसी ओर इशारा करती हैं. आने वाले दिनों में विजय और टीवीके की राजनीतिक यात्रा किस दिशा में जाएगी, इसका कोई निर्णायक आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी.
टीवीके की राजनीति अभी पूरी तरह स्पष्ट और परिपक्व रूप नहीं ले पाई है. अगर हम उसके चुनावी वादों पर नजर डालें, तो वह कल्याणकारी नीतियों को जारी रखने की इच्छुक दिखती है और राज्य में भाजपा सहित अन्य सभी दलों की तरह प्रतिस्पर्धी लोकलुभावन राजनीति में शामिल है. लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में विजय के पहले भाषण – जिसमें उन्होंने खाली खजाने, राज्य की वित्तीय स्थिति पर श्वेत पत्र जारी करने और चुनावी वादों को पूरा करने के लिए समय मांगने की बात कही – ने कई सवाल और शंकाएं पैदा की हैं. वे कहते हैं, ‘वास्तविक धर्मनिरपेक्ष सामाजिक न्याय का दौर अब शुरू होता है.’ लेकिन कुछ अहम सवाल अब भी जवाब की प्रतीक्षा कर रहे हैं: क्या विजय भाजपा-विरोधी ताकत के रूप में उभरेंगे या इसके उलट कोई दूसरी दिशा चुनेंगे? क्या टीवीके भाजपा-विरोधी, फासीवाद-विरोधी पार्टी के रूप में उभरेगी या सिर्फ एक गैर-भाजपा पार्टी बनकर रह जाएगी? क्या टीवीके तमिल हितों, तमिल गौरव और संघवाद की रक्षा के अपने दावों पर बिना समझौते के संघर्ष करेगी या कोई अलग रास्ता चुनेगी? टीवीके निश्चित रूप से आर्थिक और औद्योगिक विकास के लिए काम करेगी, लेकिन मजदूरों के हितों और उनके अधिकारों के प्रति उसका रुख क्या होगा, यह अभी देखना बाकी है. कुल मिलाकर, टीवीके एक संक्रमण के दौर से गुजरती पार्टी है.
इन सवालों के जवाब जो भी हों, विजय और टीवीके अब सत्ता में हैं. विपक्ष की – जिसमें हम भी शामिल हैं – जिम्मेदारी है कि वह लोकतांत्रिक दायित्व के तहत मौजूदा सरकार की गलतियों को सामने लाए, उनकी आलोचना करे और उनके खिलाफ संघर्ष करे. हमने द्रमुक के खिलाफ भी तब संघर्ष किया था जब वह सत्ता में थी, जबकि वह इंडिया गठबंधन का हिस्सा थी.
बदली हुई राजनीतिक परिस्थिति में हम राज्य में विभिन्न दलों की बदलती राजनीतिक स्थिति और उनके नए समीकरणों पर गहरी नजर रखते हुए अपने उचित फैसले लेंगे. हमारे फैसले फासीवाद-विरोधी, भाजपा-विरोधी प्रतिरोध की हमारी रणनीति और शासकों की जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ हमारे निरंतर संघर्ष के मुताबिक होंगे.
हम यह उम्मीद करते हैं कि टीवीके नफरत और सांप्रदायिकता की राजनीति के खिलाफ, काॅर्पाेरेट घरानों और अन्यायी ताकतों द्वारा मेहनतकश अवाम के अधिकारों को कुचले जाने के खिलाफ, और जातिवादी भेदभाव व वर्चस्ववाद के खिलाफ अपनी बुलंद आवाज उठाएगी. साथ ही, राज्यों के अधिकारों, सच्चे संघवाद, सामाजिक न्याय और बराबरी के हक में मुस्तैदी से खड़ी होगी. लेकिन, अगर जनता की ये उम्मीदें टूटती हैं, तो वामपंथी, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील ताकतों को साथ लेकर एक निर्णायक संघर्ष का बिगुल फूंकने में भाकपा(माले) सबसे आगे खड़ी मिलेगी.