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‘दिमागी नक्सल’: भारत के बागी नौजवानों से डरा-सहमा तानाशाह

‘दिमागी नक्सल’: भारत के बागी नौजवानों से डरा-सहमा तानाशाह

नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से एक और स्वतंत्रता दिवस भाषण दिया है – यह 15 अगस्त का उनका लगातार तेरहवां भाषण था. 2014 में सत्ता में आने के बाद के शुरूआती कुछ वर्षों में उनके भाषणों में कुछ तात्कालिक घरेलू और वैश्विक संदर्भ होते थे, और भारत की आजादी की 75वीं वर्षगांठ को अगला मील का पत्थर बताया जाता था. 2022 के बाद लक्ष्य को सीधे 2047 तक बढ़ा दिया गया और अब वे उन चिंताओं पर पूरी तरह चुप रहते हैं जो लोगों के मन में सबसे ऊपर हैं और जिन्हें उनकी सरकार भी अब नजरअंदाज नहीं कर सकती. उदाहरण के लिए, जंतर-मंतर पर हुए उन अभूतपूर्व विरोध-प्रदर्शनों का उनके 80 मिनट के भाषण में कोई जिक्र नहीं था जिसके चलते उनकी सरकार को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को हटाने के लिए मजबूर होना पड़ा था, जबकि सरकार पहले अहंकार के साथ घोषणा करती थी कि मंत्रियों के इस्तीफे का विचार बीजेपी की संस्कृति का हिस्सा नहीं है.

बहरहाल, जंतर-मंतर का हौवा उनके पूरे भाषण पर छाया रहा. ‘जेन जी’ शब्द का इस्तेमाल किए बिना – जो आजकल पूरे भारत में सार्वजनिक विमर्श में छाया हुआ है – मोदी ने युवाओं का 52 बार जिक्र किया. लेकिन वे चरमराती शिक्षा और परीक्षा प्रणाली पर पूरी तरह मौन रहे, जिसने अब ‘जेन अल्फा’ को भी आंदोलनों के लिए उद्वेलित कर दिया है; युवाओं के लिए उनका एकमात्र वादा वही पुराना अस्पष्ट वादा था – ‘एआई’ ट्रेनिंग देकर हर साल एक करोड़ नौकरियां पैदा करना – जबकि असलियत यह है कि कई क्षेत्रों में नौकरियां खत्म हो रही हैं और नौकरियों के इस चिंताजनक नुकसान के लिए एआई के असर को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. उन्होंने मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग की बात की, जबकि ‘नीति’ आयोग बताता है कि हर दिन औसतन 25 सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं. उन्होंने एसआइआर और स्पेलिंग की गलतियों या जानकारी मेल न खाने जैसे मामूली कारणों से लाखों वोटरों के मताधिकार छिन जाने के बारे में कुछ नहीं कहा, उन्होंने जाति जनगणना के बारे में भी कुछ नहीं कहा जिसका वादा उनकी सरकार ने बिहार चुनावों से ठीक पहले किया था, लेकिन उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे परिवार का डेटा अपडेट और अपलोड करके जनगणना के काम में सरकार की मदद करें.

मोदी ने जेन-जी और जंतर-मंतर के बारे में तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उन्होंने संघ ब्रिगेड की नफरत फैलाने वाली और विभाजनकारी शब्दावली में ‘आंतरिक दुश्मनों’ के लिए एक नया शब्द जरूर जोड़ा: टुकड़े-टुकड़े गैंग, अर्बन नक्सल, आंदोलनजीवी और राष्ट्र-विरोधी के बाद अब ‘दिमागी नक्सल’ का नया शुमार हुआ है. बाद में सफाई देते हुए किरन रिजिजू ने ‘दिमागी नक्सल’ का ठप्पा सिर्फ माओवादी समर्थकों और धारा 370 का समर्थन करने वालों तक ही सीमित रखने की कोशिश की. लेकिन अपने भाषण में मोदी ने ‘दिमागी नक्सल’ वाले इस ठप्पे का इस्तेमाल पुराने समय के संदर्भ में भी किया, और इसे उन बुद्धिजीवियों पर भी लागू किया जिन्होंने यूपीए शासन-साल में सरकारी नीतियों पर सलाह दी थी. साफ है कि वे यूपीए के समय संसद में वामपंथी गुट की ताकत और नेशनल एडवाइजरी काउंसिल (राष्ट्रीय सलाहकार परिषद) की भूमिका का जिक्र कर रहे थे. इस परिषद ने लोक कल्याण, नागरिक अधिकार और उनके सशक्तीकरण से संबंधित कई कानून बनवाए थे, जैसे कि नरेगा, वन अधिकार अधिनियम, आरटीआई, खाद्य सुरक्षा अधिनियम और जमीन अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थपना में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम.

मोदी को उन सभी कानूनों से दिक्कत है जो नागरिकों के अधिकार बढ़ाते हैं और उन्हें नीति-निर्माण और शासन-प्रशासन में अपनी बात रखने का मौका देते हैं. 2014 में ही उन्होंने 2013 के भूमि अधिग्रहण ऐक्ट को नाकाम करने की कोशिश की थी जिसे औपनिवेशिक दौर के कानून (1894) की जगह प्रतिस्थापित किया गया था जिसमें सामाजिक और पर्यावरणीय ऑडिट, सहमति लेना, मुआवजा देना और पुनर्वास व पुनर्स्थापना की व्यवस्था करना अनिवार्य बनाया गया था. पिछले कुछ सालों में आरटीआई को सुनियोजित तरीके से कमजोर किया गया है, वनाधिकार कानून को जानबूझकर ठंडे बस्ते में डालने और उसका उल्लंघन करने का प्रयास किया गया है और अब ‘मनरेगा’ की जगह पूरी तरह से एक नया कानून ले आया गया है जिसने रोजगार गारंटी कानून की सभी बुनियादी विशेषताओं को ही उलट दिया है.

ऐसे समय में जब हिमालयी इलाके में भू-स्खलन और मौसम से जुड़ी आपदाएं बढ़ रही हैं, ऐन राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है, और जंगलों की कटाई और भारत के नाजुक तटीय पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर हमलों के खिलाफ जन प्रतिवाद बढ़ रहे हैं, मोदी ने अपनी सरकार द्वारा पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं की खुलेआम अनदेखी करने पर गर्व जताया. उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने भारत के 99% तटीय इलाके को ‘नो-गो जोन’ (जाने की मनाही वाले क्षेत्र) से ‘गो-अहेड जोन’ (जाओ और काम करो क्षेत्र) में बदल दिया है. बेशक, उन्होंने यह साफ-साफ नहीं बताया कि अब यह तटीय इलाका मुख्य रूप से अडानी समूह को सौंपा जा रहा है ताकि भारत के बुनियादी ढांचे और बंदरगाहों पर उनकी पकड़ मजबूत हो सके.

‘दिमागी नक्सल’ शब्द सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मामलों में दिमाग या बुद्धि और बुद्धिजीवियों की अहम भूमिका की ओर इशारा करता है – एक ऐसी चीज जिससे मोदी सरकार बहुत घबराती है और जिसे वह हर तरह से रोकना चाहती है. इस शब्द के इस्तेमाल से पहले ही हमने नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पनसारे, एमएम कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसे लेखकों की हत्या और भारत के जाने-माने बुद्धिजीवियों, सांस्कृतिक हस्तियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को लंबे समय तक जेल में रखने और उन्हें प्रणालीगत ढंग से परेशान करने तथा सताने की घटनाएं देखी हैं.

मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में दिमागी नक्सलियों की पहचान करने और उन्हें अलग-थलग करने की बात सरकार और संघ ब्रिगेड के गुंडा गिरोहों, दोनों के लिए एक खतरनाक इशारा है ताकि वे हर तरह के विरोध की आवाजों और असहमत कार्यकर्ताओं को निशाना बना सकें. ‘नागरिक सुरक्षा का मजबूत नेटवर्क’ बनाने पर मोदी का जोर शायद लोगों पर और ज्यादा दमनकारी ताकत आजमाने तथा लोगों के विरोध-प्रदर्शनों और आंदोलनों से निपटने के लिए रिटायर्ड ‘अग्निवीरों’ का इस्तेमाल करके और संघ ब्रिगेड के गुंडा गिरोहों को कानूनी मान्यता देकर एक नई मिलिशिया (अर्धसैनिक बल जैसा समूह) बनाने और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप बढ़ाने की चेतावनी है. लोगों के दिमाग पर नजर रखने का बेतुका विचार लोगों के मन को नियंत्रित करने, उनकी भावनाओं के साथ खेलने और उनकी अभिव्यक्ति को एक सांचे में ढालने के संघ ब्रिगेड के आचार-व्यवहार से ही निकला है. यह बहुत हद तक जाॅर्ज ऑरवेल के मशहूर उपन्यास ‘नाइनटीन एटी-फोर’ में दिखाए गए तानाशाह समाज की ‘थाॅट पुलिस’ (सोच पर नजर रखने वाली पुलिस) जैसा ही लगता है.

पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले में शेख मोहम्मद हाफिज पर भाजपाई गुंडों का हमला और उनके पिता मोहम्मद माफिक की हत्या, जिन्होंने अपने गांव के प्राइमरी स्कूल की बदहाल स्थिति को उजागर किया था, महज एक संकेत है कि संघ-भाजपा तंत्र किस तरह की हिंसा और दहशत फैलाना चाहता है. वे जंतर-मंतर वाली उस हिम्मत, बगावत और प्रतिरोध की भावना को कुचलना चाहते हैं जो आज पूरे भारत के युवाओं को प्रेरित कर रही है. लेकिन जिस पीढ़ी ने ‘काॅकरोच’ जैसे अपमानजनक और इंसानियत का मखौल उड़ाने वाले शब्द को गर्व-भरी पहचान और विरोध का जरिया बना लिया है, वह मोदी के खतरनाक ‘दिमागी नक्सल’ वाले जुमले से न तो डरेगी और न ही पीछे हटेगी.

फासीवादी ताकतें हमेशा अंदरूनी दुश्मनों की तलाश में रहती हैं, और दुश्मन की पहचान के लिए नए शब्द गढ़ने की जरूरत यह मान लेने जैसा है कि पुरानी शब्दावली अब काम नहीं कर रही है. नक्सलवाद असल में कम्युनिज्म का ही भारतीय नाम है. ‘दिमाग’ को नक्सलवाद से जोड़कर मोदी ने एक तरह से यह मान लिया है कि फासीवादी आक्रामकता, असफल शासन और काॅरपोरेट लूट के मौजूदा माहौल में कम्युनिस्ट विचारों का असर और लोकप्रियता बढ़ रही है. कट्टरता और अंधभक्ति पर बुद्धि और विवेक की जीत हो. मन सचमुच भयमुक्त हो.

22 August, 2026