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फासीवाद, अवैध युद्ध, और जनसंहार: 2026 वर्ल्ड कप किसका उत्सव है?

फासीवाद, अवैध युद्ध, और जनसंहार: 2026 वर्ल्ड कप किसका उत्सव है?

-- मनमोहन

‘फुटबाॅल ऐसा खेल है जो लोगों को एक साथ लाता है. इसमें यह मायने नहीं रखता कि आप अमीर हैं या गरीब, काले हैं या गोरे. फुटबाॅल सबको एक कौम की तरह जोड़ता है. यही इसकी खूबसूरती है.’ – पेले

11 जून से 19 जुलाई 2026 तक अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको की संयुक्त मेजबानी में हो रहा फीफा वर्ल्ड कप टूर्नामेंट, खेल के उत्सव से ज्यादा अमेरिका के फासीवादी शासन की छवि चमकाने की एक विशाल स्पोर्ट्सवाॅशिंग मुहिम और काॅरपोरेट पूंजी तथा फीफा-प्रायोजित उपभोक्तावाद के मेले में बदलता दिखाई दे रहा है. 48 टीमों तक विस्तारित इस टूर्नामेंट को इतिहास का सबसे बड़ा वर्ल्ड कप बताया जा रहा है, लेकिन इसकी चमक के पीछे कई गंभीर सवाल छिपे हुए हैं. दुनिया भर की दर्जनों राष्ट्रीय टीमें वर्ल्ड कप में शिरकत के लिए अमेरिका पहुंच रही हैं, पर टूर्नामेंट शुरू होते ही खिलाड़ियों के साथ अमेरिकी हवाई अड्डों पर दुर्व्यवहार, अधिकारियों से लंबी पूछताछ, और महासंघों के कर्मचारियों, विदेशी पत्रकारों तथा प्रशंसकों को वीजा देने से इनकार जैसी घटनाएं सामने आने लगी हैं. आसमान छूती टिकट कीमतें, यात्रा पर सख्त पाबंदियां, और सुरक्षा के नाम पर लगातार बढ़ती दमनकारी नीतियां इस आयोजन पर भारी पड़ रही हैं.

आज हालत यह है कि लाखों फुटबाॅल प्रेमियों के लिए खेल का नतीजा मैदान में नहीं, बल्कि हवाई अड्डों और इमिग्रेशन काउंटरों पर तय होता दिखाई दे रहा है. मानवाधिकारों की अनदेखी, नस्ली और राष्ट्रीय भेदभाव, और कड़ी आव्रजन नीतियां यह खतरा पैदा कर रही हैं कि मैच शुरू होने से पहले ही बहुत से लोगों को इस वैश्विक उत्सव से बाहर कर दिया जाए.

ईरान की राष्ट्रीय टीम का मामला इस पूरे विरोधाभास की सबसे साफ मिसाल है. तमाम राजनीतिक तनावों के बावजूद विश्व कप के लिए क्वालिफाई करने वाली ईरानी टीम को अमेरिका में दाखिले की इजाजत बेहद अपमानजनक और प्रतिबंधात्मक शर्तों के साथ दी गई. मेक्सिको में ईरान के राजदूत अबोलफजल पसंदीदेह के मुताबिक खिलाड़ियों को केवल मैच के दिन अमेरिका में दाखिल होने और मैच खत्म होते ही वापस लौट जाने की इजाजत दी गई. इसी वजह से ईरान को अपना प्रशिक्षण शिविर अमेरिका के एरिजोना राज्य के टक्सन शहर की जगह मेक्सिको के तिजुआना में लगाना पड़ा. टीम के कई अधिकारियों और सहयोगी कर्मचारियों के वीजा अब तक लटके हुए हैं या उन्हें सीधे खारिज कर दिया गया है. यह दरअसल एक तरह की ‘अघोषित सजा’ है, जो किसी टीम को उसकी खेल क्षमता के आधार पर नहीं बल्कि राजनीतिक दुश्मनी के आधार पर दी जा रही है. इससे साफ होता है कि वर्ल्ड कप का तथाकथित ‘समान अवसर’ वाला मैदान अब देशों के बीच राजनीतिक रिश्तों के हिसाब से बांटा जा रहा है.

सिर्फ ईरान ही नहीं, कई दूसरे देशों के खिलाड़ी और प्रतिनिधिमंडल भी इसी तरह की बेइज्जती और उत्पीड़न का शिकार हुए हैं. इराकी स्ट्राइकर आयमन हुसैन को शिकागो पहुंचने पर सात घंटे तक पूछताछ का सामना करना पड़ा. टीम की आधिकारिक फोटोग्राफर तला सलाह को दस घंटे की जांच-पड़ताल के बाद दाखिले से वंचित कर दिया गया. सेनेगल की टीम को हवाई पट्टी पर ही अपमानजनक सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ा, जहां खिलाड़ियों से जूते तक उतरवाए गए. उज्बेकिस्तान के प्रतिनिधिमंडल को मेटल डिटेक्टर, व्यक्तिगत तलाशी और स्निफर कुत्तों की जांच से गुजारा गया. मोरक्को के दर्जनों प्रशंसकों के वीजा आवेदन ठुकरा दिए गए.

लेकिन शायद सबसे शर्मनाक मामला सोमालिया के रेफरी उमर अब्दुलकादिर आर्तान का है. अफ्रीका के सर्वश्रेष्ठ रेफरी के रूप में सम्मानित और फीफा द्वारा चयनित इस अधिकारी के पास वैध वीजा और राजनयिक पासपोर्ट था, फिर भी मियामी हवाई अड्डा पर ग्यारह घंटे तक पूछताछ के बाद उन्हें वापस लौटा दिया गया. यह सिर्फ एक व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं था, बल्कि सोमालिया और सोमाली मूल के लोगों के खिलाफ लंबे समय से चले आ रहे नस्ली पूर्वाग्रह का एक और प्रकटीकरण था. फीफा की प्रतिक्रिया उतनी ही निराशाजनक रही – उसने बस इतना कहकर पल्ला झाड़ लिया कि आव्रजन संबंधी फैसले मेजबान देश के अधिकार क्षेत्र में आते हैं.

अमेरिकी अधिकारियों ने स्विट्जरलैंड और मोरक्को की राष्ट्रीय टीमों के कुछ खिलाड़ियों के वीजा बिना कोई कारण बताए रद्द कर दिए या देने से इनकार कर दिया. इंटरनेशनल स्पोर्ट्स प्रेस एसोसिएशन ने ईरानी और अफ्रीकी पत्रकारों को वीजा न दिए जाने के खिलाफ विरोध दर्ज कराया है – ये पत्रकार अपने-अपने देशों के मीडिया संस्थानों के लिए टूर्नामेंट की रिपोर्टिंग करने आ रहे थे. अमेरिका द्वारा ‘ब्लैकलिस्ट’ किए गए देशों – जैसे ईरान और हैती – के प्रशंसकों को अपनी टीमों के मैच देखने के लिए अमेरिका आने पर लगभग पूर्ण प्रतिबंध का सामना करना पड़ रहा है. वहीं स्काॅटलैंड, मोरक्को और अन्य अरब, मुस्लिम और अफ्रीकी देशों से आने वाले प्रशंसकों को विशेष रूप से संदेह की नजर से देखा जा रहा है और उन्हें अतिरिक्त जांच-पड़ताल तथा प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है. टिकटों की बेतहाशा ऊंची कीमतों ने आम फुटबाॅल प्रेमियों को पहले ही इस उत्सव से बाहर कर दिया है, जबकि सख्त होती सरहदी नीतियां और अमेरिका का अस्थिर राजनीतिक माहौल दुनिया भर के लोगों को वहां जाने से हतोत्साहित कर रहा है. जिस आयोजन को ‘इतिहास का सबसे बड़ा वर्ल्ड कप’ बताया जा रहा है, वह तेजी से अमीरों के विशेषाधिकार और आम लोगों के बहिष्कार का प्रतीक बनता जा रहा है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल समेत अनेक मानवाधिकार संगठनों ने फीफा की तीखी आलोचना की है कि उसने भेदभावपूर्ण आव्रजन नीतियों, नस्ली प्रोफाइलिंग, निगरानी, पुलिस हिंसा और मनमानी गिरफ्रतारियों से लोगों की हिफाजत के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए. जबकि 2026 वर्ल्ड कप की मेजबानी तय करते समय मानवाधिकारों को सबसे अहम मानदंडों में शामिल करने का दावा किया गया था, आज वह वादा पूरी तरह खोखला साबित होता दिखाई दे रहा है.

ट्रम्प का अमेरिका आज कई मोर्चों पर युद्ध अपराधों में लिप्त है और खेल, राजनीति और सत्ता के रिश्ते पर गंभीर सवाल खड़े करता है. पिछले तीन वर्षों से अमेरिका गजा में चल रहे उस जनसंहार का साझेदार रहा है, जिसे अब अधिकांश विद्वानों, विशेषज्ञों और मानवाधिकार पर्यवेक्षकों ने जनसंहार के रूप में स्वीकार किया है. अमेरिकी हथियारों, धन और राजनीतिक समर्थन से फिलिस्तीन में जो कत्लेआम हो रहा है, उसमें एक हजार से अधिक फिलिस्तीनी खिलाड़ियों और खेलकर्मियों की जानें गई हैं – इनमें हानी अल-मसदर जैसे मशहूर पूर्व फुटबाॅलर भी शामिल थे. विडंबना यह है कि जिन खेल सुविधाओं के पुनर्निर्माण का श्रेय फीफा अपने खाते में दर्ज करना चाहता है, उनमें गजा का अल-यारमूक स्टेडियम भी शामिल है – वही स्टेडियम जिसे इस्राइली फौज ने एक हिरासत शिविर में बदल दिया था, जहां फिलिस्तीनी कैदियों को भूखा रखा गया, प्रताड़ित किया गया और अमानवीय यातनाएं दी गईं.

अभी पिछले हफ्ते ही इस्राइली बलों ने पश्चिमी तट में फुटबाॅल की फिलिस्तीनी महिला राष्ट्रीय टीम की मौजूदा खिलाड़ी रंद हलावानी और पूर्व खिलाड़ी नताली अबू दियेह को अगवा कर बिना किसी आरोप के जेल में डाल दिया. दुखद सच्चाई यह है कि ऐसी घटनाएं अब इतनी आम हो चुकी हैं कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शायद ही कोई आक्रोश पैदा करती हैं, और खेल की सर्वाेच्च संस्था फीफा तो मानो इन्हें देखने-सुनने से ही इनकार कर चुकी है. लेकिन फीफा की इस चुप्पी के बावजूद, फुटबाॅल आज फिलिस्तीन के लिए इंसाफ की वैश्विक लड़ाई का एक अहम मोर्चा बन चुका है.

2022 के कतर वर्ल्ड कप के दौरान दोहा की सड़कों से लेकर स्टेडियमों तक, दुनिया भर के फुटबाॅल प्रशंसकों ने इस मौके का इस्तेमाल फिलिस्तीन के समर्थन और इस्राइली कब्जे तथा नस्ली सफाए की नीतियों को उजागर करने के लिए किया. अक्टूबर 2023 में शुरू हुए जनसंहार के बाद यह एकजुटता और भी व्यापक और मुखर हो गई है. आज दुनिया के अनेक शहरों के फुटबाॅल मैदानों में फिलिस्तीनी झंडे, विशाल बैनर, पोस्टर और एकजुटता के नारे एक स्थायी दृश्य बन चुके हैं. लाखों प्रशंसक अपनी आवाज फिलिस्तीन के साथ जोड़ रहे हैं और यह संदेश दे रहे हैं कि जनसंहार को सामान्य नहीं माना जा सकता.

इस जनसंहार ने पूरी एक पीढ़ी की सियासी चेतना को प्रभावित किया है. इसने लोगों को समझाया है कि फिलिस्तीन में जारी तबाही और उन वैश्विक संस्थाओं के बीच गहरा रिश्ता है, जो दुनिया की सबसे मकबूल सांस्कृतिक और खेल परंपराओं पर काबिज हैं. वर्ल्ड कप भी इससे अछूता नहीं है. आज जब करोड़ों फुटबाॅल प्रेमी हमारे दौर की इस सबसे बड़ी नैतिक परीक्षा पर अपनी सामूहिक आवाज बुलंद कर रहे हैं, खेल जगत की अनेक बड़ी हस्तियां भी खामोश रहने से इनकार कर रही हैं.

लेकिन फीफा और ट्रम्प प्रशासन की साझेदारी केवल विवादों से घिरे इस वर्ल्ड कप तक सीमित नहीं है. यह साझेदारी फिलिस्तीन के सवाल पर अमेरिकी नीतियों के प्रति फीफा की चुप्पी और मिलीभगत तक फैली हुई है. पिछले वर्ष जब ट्रम्प के तथाकथित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की घोषणा एक भव्य समारोह में की गई, तब फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फैन्टिनो भी वहां मौजूद थे. दुनिया के कई राष्ट्राध्यक्षों के साथ उन्होंने ऐसी योजना का समर्थन किया, जिसे आलोचकों ने गजा में जारी इस्राइली जनसंहार को ‘युद्धविराम’ और ‘पुनर्निर्माण’ की भाषा में वैधता देने की कोशिश बताया. फीफा ने गजा के फुटबाॅल ढांचे के पुनर्निर्माण में हिस्सेदारी का वादा करके इस पूरी परियोजना में अपनी जगह पक्की करने की कोशिश की – लेकिन उसने कभी यह पूछने की जरूरत नहीं समझी कि गजा में 265 से अधिक खेल सुविधाओं, स्टेडियमों और खेल केंद्रों को किसने तबाह किया.

पेप गार्डियोला से लेकर बार्सिलोना के युवा सितारे लामिन यामाल तक, और वर्ल्ड कप सेमीफाइनल तक पहुंचने वाली मोरक्को की राष्ट्रीय टीम से लेकर दुनिया भर के लाखों प्रशंसकों तक – फिलिस्तीन के साथ एकजुटता फुटबाॅल जगत की सबसे सशक्त नैतिक आवाज बनकर उभरी है. ऐसे दौर में जब खेल को लगातार बाजार और काॅरपोरेट हितों की जागीर में बदला जा रहा है, फिलिस्तीन का मुद्दा इंसाफ, गरिमा और इंसानियत की याद दिलाता है. इसीलिए जब भी फिलिस्तीन का सवाल उठता है, दुनिया की सबसे सियासी खेल संस्थाओं में से एक फीफा अचानक ‘राजनीतिक तटस्थता’ का पर्दा ओढ़ लेती है.

यह तथ्य अपने आप में बहुत कुछ कह देता है कि जिस समय अमेरिका बड़े पैमाने पर प्रवासियों की धर-पकड़ और हिरासत जारी रखे हुए है, ईरान के खिलाफ युद्ध चला रहा है, फिलिस्तीन में इस्राइली जनसंहार और लेबनान में जारी नस्ली सफाए का शरीक है, और दुनिया के विभिन्न समुद्री इलाकों में सैन्य कार्रवाइयों से तबाही फैला रहा है – उसी समय उसे वर्ल्ड कप की मेजबानी का सम्मान दिया जा रहा है. यह विश्व कप इतिहास का शायद पहला ऐसा संस्करण है जिसमें मेजबान देश खुद टूर्नामेंट में हिस्सा लेने वाले एक देश के खिलाफ सीधी सैन्य आक्रामकता में शामिल है.

सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की मनमानी और कानून-विरोधी नीतियां ही उसे वर्ल्ड कप की मेजबानी के नाकाबिल नहीं बनातीं, बल्कि अपने ही मुल्क के भीतर गैर-श्वेत समुदायों के साथ उसका बर्ताव भी साबित करता है कि यह न तो इस आयोजन के लिए मुनासिब जगह है और न ही महफूज. आज, जब अमेरिका के भीतर नस्ली भेदभाव पर आधारित एक बहिष्कारी आव्रजन व्यवस्था लागू है और दुनिया भर में उसके युद्धों तथा हस्तक्षेपों ने अनगिनत लोगों की जिंदगियां तबाह की हैं, यह सवाल पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो जाता है कि क्या ऐसा देश वाकई दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित खेल आयोजन की मेजबानी के काबिल है?

‘स्पोर्ट्सवाॅशिंग’ की अवधारणा उस प्रक्रिया को समझाने के लिए गढ़ी गई थी जिसमें हुकूमतें बड़े खेल आयोजनों का इस्तेमाल अपनी धूमिल अंतरराष्ट्रीय छवि चमकाने के लिए करती हैं. आमतौर पर यह शब्द पश्चिमी उदारवादी हलकों में अरब देशों के संदर्भ में इस्तेमाल होता रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि खेलों का सियासी इस्तेमाल न तो किसी एक खित्ते तक सीमित है और न ही किसी एक तरह की हुकूमत तक. उदार लोकतंत्रों से लेकर तानाशाहियों तक, सभी ने खेलों को अपनी सियासी छवि गढ़ने के औजार के रूप में इस्तेमाल किया है – यह परंपरा खुद अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं जितनी ही पुरानी है.

यह वर्ल्ड कप अमेरिका की छवि को साफ करने का जरिया ही नहीं बन रहा, बल्कि दुनिया के प्रति उसके आक्रामक रवैये का विस्तार बनता जा रहा है. इसे सिर्फ ‘स्पोर्ट्सवाॅशिंग’ कहना भी शायद काफी नहीं. इसे ‘स्पोर्ट्समैक्सिंग’ कहना ज्यादा सटीक होगा – यानी दुनिया के सबसे मकबूल और प्रिय सांस्कृतिक आयोजन का इस्तेमाल अपनी कथित राष्ट्रीय ताकत का मुजाहरा करने और जहरीली सियासी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए.

ऐसे में सवाल सिर्फ फुटबाॅल का नहीं रह जाता. सवाल यह है कि क्या दुनिया का सबसे बड़ा खेल आयोजन अब भी लोगों को जोड़ने का जरिया है, या फिर यह साम्राज्यवादी ताकतों, काॅरपोरेट हितों और भू-राजनीतिक वर्चस्व की परियोजनाओं का एक और मंच बन चुका है. हर संकेत यही बताता है कि फीफा तमाशबीन बना खड़ा रहा, जबकि ट्रम्प प्रशासन ने मेजबान देश की अपनी हैसियत का इस्तेमाल ईरानी फुटबाॅल महासंघ के लिए मुश्किलें खड़ी करने में किया. यह अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं की निष्पक्षता और समान अवसर के हर उसूल का खुला उल्लंघन था – लेकिन फीफा ने न तो कोई आपत्ति दर्ज की और न ही कोई कार्रवाई की.

अमेरिका में इस गिरावट की गंभीरता को समझने के लिए इतिहास की एक घटना काफी है. 1936 के बर्लिन ओलंपिक में चार स्वर्ण पदक जीतने वाले अश्वेत अमेरिकी एथलीट जेसी ओवेन्स ने बाद में लिखा था कि उन्हें नाजी जर्मनी में उतनी दुश्मनी का सामना नहीं करना पड़ा, जितना अपने ही मुल्क में करना पड़ा था. हिटलर ने कम से कम दूर से ही उनकी जीत को कबूल किया, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रूजवेल्ट ने उन्हें बधाई का एक तार तक नहीं भेजा. ओवेन्स ने यह भी याद किया कि जर्मनी में उन्हें श्वेत खिलाड़ियों के साथ रहने की इजाजत थी, जबकि न्यूयाॅर्क में उनके सम्मान में आयोजित परेड के होटल ने उन्हें मुख्य दरवाजे से दाखिल तक नहीं होने दिया. आज अगर 2026 का अमेरिका गैर-श्वेत लोगों के लिए 1936 के नाजी जर्मनी से भी कम खैरमकदम करने वाला दिखाई दे रहा है, तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं – बल्कि उस संस्थागत भेदभाव और नस्ली नाबराबरी की हकीकत की तरफ इशारा है जिसे लाखों लोग रोज झेल रहे हैं.

इतिहास में खेल प्रतियोगिताओं का इस्तेमाल सत्तावादी हुकूमतें अपने प्रचार के औजार के रूप में करती रही हैं. 1934 का वर्ल्ड कप मुसोलिनी के फासीवादी इटली में हुआ था, जहां विजेता खिलाड़ियों से फासीवादी सलामी दिलवाई गई थी. 1978 का वर्ल्ड कप अर्जेंटीना की फौजी तानाशाही के दौरान हुआ, जब स्टेडियमों के आसपास ही सियासी कैदियों पर जुल्म ढाए जा रहे थे. 2026 का वर्ल्ड कप भी कई मायनों में उन्हीं अंधेरे अध्यायों की याद दिलाता है. इसके बावजूद फीफा पर कोई असर नहीं पड़ता – उसके लिए तमाशा जारी रहना ही सबसे अहम है.

सबसे अहम बात यह है कि फीफा के लिए इंसाफ, बराबरी और खेल भावना से ऊपर मुनाफा है. संस्था की चार वर्षीय आय लगभग 13 अरब डाॅलर तक पहुंचने का अनुमान है, जिसमें से अकेले इस वर्ल्ड कप से करीब 9 अरब डाॅलर आने की उम्मीद है. यह रकम मुख्य रूप से प्रायोजकों और व्यावसायिक समझौतों से आएगी, जबकि आयोजन का खर्च मेजबान शहरों और करदाताओं की जेब से निकलेगा. फीफा धीरे-धीरे एक ऐसी परजीवी काॅरपोरेट संस्था में बदल चुकी है जो विशेष सहूलियतों, वीआईपी प्रबंधों, ट्रेडमार्क पाबंदियों और बाजार-आधारित कीमतों के जरिए पूरे आयोजन पर अपना कब्जा जमाती है. पानी की बोतलों से लेकर वुवुजेला जैसे मामूली सामान तक पर पाबंदियां लगाई जाती हैं, जबकि टिकटों की कीमतें इस तरह तय की जाती हैं कि आम लोग अपने ही खेल से बेदखल कर दिए जाएं.

नतीजतन वर्ल्ड कप अब अवाम का उत्सव नहीं रहा. यह अमीरों का टूर्नामेंट बनता जा रहा है, जिसकी पूरी इमारत गरीबों, मेहनतकशों और साधारण फुटबाॅल प्रेमियों की कीमत पर खड़ी की गई है. फीफा ने अवाम के खेल को मुनाफे की मशीन में बदल दिया है. जिस फुटबाॅल ने कभी बस्तियों, कारखानों, खेतों और गलियों में जन्म लिया था, वह आज काॅरपोरेट पूंजी, विज्ञापन कंपनियों और बहुराष्ट्रीय ब्रांडों के शिकंजे में कैद है. उरुग्वे के महान लेखक और फुटबाॅल के आशिक एडुआर्डाे गालेआनो ने 1998 वर्ल्ड कप के बाद तंज करते हुए लिखा था: ‘फाइनल में फ्रांस ने ब्राजील को हराया, लेकिन असली जीत एडिडास की नाइकी पर हुई थी.’

गालेआनो अच्छी तरह समझते थे कि कैसे खेल की रूह को बाजार के हवाले किया जा रहा है और खिलाड़ियों को माल तथा प्रशंसकों को उपभोक्ता में बदला जा रहा है.

फिर भी गालेआनो को यकीन था कि फुटबाॅल पूरी तरह बिकाऊ नहीं बन सकता. काॅरपोरेट ताकतें उसे काबू करने की जितनी कोशिश करती हैं, खेल की असली रूह उतनी ही बार उनके हाथों से फिसल जाती है. इतिहास बार-बार दिखाता है कि जब सत्ता, कौमपरस्ती और मुनाफाखोरी खेल पर हावी हो जाते हैं, तो स्टेडियम खेल के मैदान कम और सियासी नुमाइशगाह ज्यादा बन जाते हैं. इसी वजह से दुनिया भर में विरोध की आवाजें तेज हो रही हैं. अनेक मानवाधिकार संगठनों, समाजी तहरीकों और फुटबाॅल प्रेमियों ने 2026 वर्ल्ड कप के बहिष्कार की अपील की है. उनका कहना है कि खेल को जंग, नस्लवाद, फासीवाद, साम्राज्यवादी वर्चस्व, दमनकारी आव्रजन नीतियों और काॅरपोरेट हवस की ढाल नहीं बनने दिया जा सकता.

इसी संदर्भ में ब्लैक एलायंस फाॅर पीस की नाॅर्थ-साउथ प्रोजेक्ट फाॅर पीपल्स-सेंटर्ड ह्यूमन राइट्स ने बाकायदा 2026 वर्ल्ड कप के बहिष्कार की अपील की है – वही मांग जिस पर पहले जर्मनी से लेकर स्काॅटलैंड तक अनेक सांसदों, समाजी संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की तरफ से चर्चा हो चुकी थी. बयान में कहा गया कि अमेरिका वैश्विक वर्चस्व की अपनी परियोजना के तहत दुनिया भर के देशों की संप्रभुता और इंसानियत पर लगातार हमले कर रहा है – और क्यूबा, ईरान, वेनेजुएला तथा गजा के संदर्भ में उसका रवैया इस बात का सबूत है कि वह वर्ल्ड कप के लिए न तो जायज और न ही सुरक्षित मेजबान है.

महान फुटबाॅलर पेले का यकीन था कि फुटबाॅल खूबसूरत इसलिए है क्योंकि यह सबका खेल है – सिर्फ अमीरों, विशेषाधिकार प्राप्त तबकों या सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों का नहीं. और निश्चित रूप से यह उन ताकतों का खेल नहीं हो सकता जो नस्ली श्रेष्ठता, साम्राज्यवादी वर्चस्व और इंसानों के बीच भेदभाव की विचारधाराओं को बढ़ावा देती हैं. 2026 का वर्ल्ड कप फुटबाॅल के इतिहास की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक को सामने ला रहा है. अगर फुटबाॅल की रूह को बचाना है, अगर अवाम-केंद्रित मानवाधिकारों की हिफाजत करनी है, और अगर दुनिया को और ज्यादा जुल्म तथा दमन की तरफ धकेले जाने से रोकना है, तो जरूरी है कि फीफा, अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान और हर तरह के उत्पीड़न, वर्चस्व तथा अधीनता थोपने वाली ताकतों को साफ और बेलाग लाल कार्ड दिखाया जाए. क्योंकि आखिरकार फुटबाॅल की असली खूबसूरती ट्राॅफियों, विज्ञापनों या अरबों डाॅलर के सौदों में नहीं, बल्कि लोगों को जोड़ने और नाइंसाफी के खिलाफ खड़े होने की उसकी ताकत में है.

13 June, 2026