वर्ष 35 / अंक - 21 / लैंगिक न्याय, स्त्री की हां-ना और संबंधों में सहमत...

लैंगिक न्याय, स्त्री की हां-ना और संबंधों में सहमति का सवाल

लैंगिक न्याय, स्त्री की हां-ना और संबंधों में सहमति का सवाल

-- सबा आफरीन

राजनीति या अर्थव्यवस्था की तरह जेंडर भी एक सामाजिक संरचना है. यानी यह कोई प्राकृतिक या स्थायी चीज नहीं, बल्कि समाज द्वारा बनाई और लगातार दोहराई जाने वाली व्यवस्था है. फिर भी इसका असर इतना गहरा होता है कि यह हमें स्वाभाविक लगने लगता है.

जेंडर हमारे जीवन के हर हिस्से को प्रभावित करता है. हम कौन-सा काम करेंगे, घर और बाहर हमारी क्या भूमिका होगी, हमें कितनी आजादी मिलेगी, और हमारे शरीर पर हमारा कितना अधिकार होगा. यह केवल सोच या संस्कृति का सवाल नहीं है, बल्कि रोजमर्रा के जीवन, काम और संसाधनों से भी जुड़ा हुआ है.

समाज में लंबे समय से ऐसा ढांचा बना हुआ है, जिसमें स्त्रियों का काम, खासकर घर के भीतर किया जाने वाला काम अक्सर अदृश्य और बिना मूल्य का माना जाता है, जबकि वही काम समाज और अर्थव्यवस्था को चलाने में अहम भूमिका निभाता है. इसी तरह लैंगिक आधार पर काम का बंटवारा और असमानता लगातार बनी रहती है.

हाल के वर्षों में जेंडर पर चर्चा बढ़ी है और इसमें नए-नए पहलू जुड़े हैं. अब यह केवल स्त्री-पुरुष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अलग-अलग लैंगिक पहचानों और अनुभवों को भी शामिल कर रहा है. फिर भी यह चर्चा अभी तक हमारे रोजमर्रा के व्यवहार और सामाजिक रिश्तों का सामान्य हिस्सा नहीं बन पाई है.

आज हम जिस तरह जेंडर या स्त्री विमर्श की बात करते हैं, वह भी अचानक पैदा हुई समझदारी नहीं है, बल्कि लंबे सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक बदलावों का परिणाम है.

इस विकासक्रम को समझने के लिए फ्रेडरिक एंगेल्स का विश्लेषण एक अहम शुरुआती बिंदु देता है. अपनी पुस्तक, ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ में एंगल्स बताते हैं कि निजी संपत्ति के उदय के साथ ही परिवार और लैंगिक संबंधों का स्वरूप बदला, और महिलाओं के शरीर तथा उनकी  सेक्सुअलीटी पर नियंत्रण स्थापित हुआ. यह केवल नैतिकता का सवाल नहीं था, बल्कि वंश, संपत्ति और श्रम के पुनरुत्पादन से जुड़ा हुआ था. एक ऐसा ऐतिहासिक मोड़ जहां से लैंगिक असमानता संस्थागत रूप लेने लगी.

समय के साथ यह नियंत्रण राज्य और कानून के दायरे में भी आया, जहां ‘कंसेंट’ को परिभाषित करने और उसकी सीमाएं तय करने की कोशिश हुई. यह एक महत्वपूर्ण प्रगति है, लेकिन कानून हमेशा सामाजिक संबंधों और सत्ता असंतुलन की जटिलता को पूरी तरह नहीं पकड़ पाता. इसी के समानांतर, पूंजीवाद ने जेंडर और सेक्सुअलिटी को नए तरीकों से गढ़ा जहां शरीर, आकर्षण और अंतरंगता भी बाजार का हिस्सा बनते गए, और “चॉइस” की भाषा के भीतर पुराने पितृसत्तात्मक ढांचे नए रूपों में काम करते रहे.

इसी व्यापक संदर्भ में जेंडर डिस्कोर्स उभरता है. लेकिन इसे समझने के लिए यह भी देखना होगा कि सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बावजूद, उनके लिए बराबरी की जमीन अब भी पूरी तरह तैयार नहीं हुई है. राजनीति, शिक्षा, मीडिया या सामाजिक आंदोलनों में महिलाएं आगे तो आ रही हैं, नेतृत्व भी कर रही हैं, अपनी पहचान तक बना रही हैं, फिर भी उनकी उपलब्धियों को अक्सर उनके अपने श्रम और क्षमता के बजाय किसी “प्रभाव” या “इशारे” से जोड़कर देखा जाता है. तो असल में कितनी औरतें आग मूत रहीं हैं?

सार्वजनिक स्पेस में उनकी मौजूदगी कई बार प्रतीकात्मक बना दी जाती है, उनकी बात काट दी जाती है, सुझावों को हल्के में लिया जाता है, और निर्णय प्रक्रिया से दूर रखा जाता है. जब वे इन सीमाओं को चुनौती देती हैं, तो उनके खिलाफ सबसे आसान हथियार इस्तेमाल होता है – चरित्र हनन. निजी जीवन पर टिप्पणी, अफवाहें, गाॅसिप और डिजिटल ट्रोलिंग, ये सब केवल व्यक्तिगत हमले नहीं, बल्कि महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से हतोत्साहित करने की एक सामाजिक रणनीति का हिस्सा हैं.

यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें जेंडर डिस्कोर्स को केवल एक नारी मुक्ति का सवाल मानना पर्याप्त नहीं है. यह हर सेक्सुअल आइडेंटिटी की बराबरी, गरिमा और एजेंसी से जुड़ा हुआ एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न है. इसलिए इसकी समझ भी उतनी ही गहरी और संवेदनशील होनी चाहिए. इसी जगह ‘कंसेंट’ यानी सहमति का सवाल सामने आता है. जेंडर और उसकी राजनीति को गहराई से समझने के लिए आज जिस क्षेत्र की पड़ताल की जानी चाहिए, वह है – कंसेंट.

इस संदर्भ में, कंसेंट का अर्थ है यौन गतिविधि में शामिल होने के लिए दो या अधिक व्यक्तियों के बीच एक स्पष्ट, आपसी सहमति. यह सहमति हमेशा साफ, स्वेच्छिक और बिना किसी दबाव, हेरफेर या भय के व्यक्त की जानी चाहिए. कंसेंट को केवल एक बार पूछ लेने या मान लेने की चीज समझना एक गंभीर भूल है. यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, एक संवाद है जो हर बार, हर प्रकार की गतिविधि के लिए दोहराया जाना जरूरी है.

किसी व्यक्ति ने अत पहले “हां” कहा था, इसका यह अर्थ नहीं है कि वह वर्तमान में भी “हां” कह रहा/रही है. इसी तरह, यदि किसी ने किसी एक गतिविधि के लिए सहमति दी है, तो यह मान लेना कि वह हर प्रकार की गतिविधि के लिए तैयार है, कंसेंट की अवधारणा को गलत तरीके से समझना है. कंसेंट हमेशा विशिष्ट होता है, समय, परिस्थिति और गतिविधि के अनुसार.

कुछ बुनियादी और स्थापित तथ्य हैं जिन्हें कंसेंट के संदर्भ में स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है. यदि कोई व्यक्ति नाबालिग है, सो रहा है, या नशे की स्थिति में है, तो वह वैध रूप से कंसेंट देने में सक्षम नहीं होता. इसी तरह, हर व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह किसी भी समय यहां तक कि किसी गतिविधि के बीच में भी अपनी सहमति वापस ले सकता है. कंसेंट का होना या न होना एक स्थायी स्थिति नहीं है; यह बदल सकता है, और इस बदलाव का सम्मान करना हर साझेदार की जिम्मेदारी है.

यदि किसी पल कुछ असहज या गलत महसूस होता है, तो व्यक्ति को अपनी असहमति व्यक्त करने का पूरा अधिकार है. यह अभिव्यक्ति केवल शब्दों तक सीमित नहीं है, कई बार शरीर भी संकेत देता है जैसे अचानक चुप हो जाना, पीछे हटना, या शरीर का सख्त हो जाना. इन गैर-शाब्दिक संकेतों को समझना और उनका सम्मान करना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी स्पष्ट “ना” को सुनना. किसी भी प्रकार की अनिश्चितता की स्थिति में, यह आवश्यक है कि गतिविधि को तुरंत रोका जाए.

“एन्थूजियास्टिक कंसेंट” की अवधारणा इस बात पर जोर देती है कि कंसेंट केवल “ना” की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि एक स्पष्ट, सकारात्मक “हां” की उपस्थिति है. इसका अर्थ है कि सभी सहभागी सक्रिय रूप से, उत्साहपूर्वक और स्वेच्छा से उस अनुभव में शामिल हो रहे हों. यह माॅडल निरंतर संवाद, आपसी समझ और संवेदनशीलता से बनता है और इसी को बढ़ावा देता है, जिससे किसी भी प्रकार के भ्रम या दबाव की संभावना कम हो जाती है.

एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शरीर की जैविक प्रतिक्रियाओं को कंसेंट के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए. उत्तेजना, स्नेहन (लुब्रिकेशन) या चरमसुख (ऑर्गैज्म) जैसी प्रतिक्रियाएं कई बार स्वतःस्फूर्त होती हैं और व्यक्ति के नियंत्रण में नहीं होतीं. यदि किसी अवांछित या गैर-सहमति वाली स्थिति में शरीर इस तरह प्रतिक्रिया करता है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि जो हुआ वह स्वीकार्य या सही था. शरीर की प्रतिक्रिया को सहमति का प्रमाण मानना न केवल वैज्ञानिक रूप से गलत है, बल्कि यह पीड़ित को दोषी ठहराने वाली सोच को भी बढ़ावा देता है.

इस पूरे विमर्श का सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि यौन हिंसा कभी भी पीड़ित की गलती नहीं होती. कंसेंट की अनुपस्थिति में होने वाली कोई भी गतिविधि हिंसा है, और इसकी जिम्मेदारी केवल उस व्यक्ति पर होती है जिसने बिना सहमति के यह कृत्य किया. इसलिए, कंसेंट को समझना केवल व्यक्तिगत व्यवहार का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी भी है. हर व्यक्ति को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके व्यवहार में दूसरे की स्वायत्तता, गरिमा और इच्छा का पूरा सम्मान हो.

जब हम जेंडर और कन्सेंट की इस बुनियादी समझ को अपने सामाजिक और राजनीतिक अनुभवों के साथ जोड़ते हैं, तब यह साफ दिखने लगता है कि कन्सेंट सिर्फ दो लोगों के बीच का निजी मामला नहीं है, बल्कि यह सत्ता, समाज और संरचनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ सवाल है. खासकर उन जगहों पर जहां साफ पावर डायनैमिक्स मौजूद होते हैं, जैसे राजनीतिक संगठनों, छात्र आंदोलनों या किसी भी तरह के संगठित समूहों में. यहां कन्सेंट को और ज्यादा बारीकी से समझने की जरूरत होती है. यहां “हां” और “ना” के बीच की रेखा अक्सर सीधी नहीं होती, बल्कि रिश्तों, पद, अनुभव, और सामाजिक स्थिति के दबावों से प्रभावित होती है. हमें यह देखना पड़ता है कि कोई व्यक्ति, खासकर जेंडर माइनाॅरिटी से आने वाला, किन परिस्थितियों और प्रक्रियाओं के तहत किसी अंतरंग या यौन संबंध में जाता है.

प्रगतिशील–लिबरल तबके में एक वाक्य अक्सर सुनने को मिलता है “कैडर्स की डीलिंग”. समकालीन प्रगतिशील-लिबरल तबके से जुड़ने के लिए आपको कोई महान विचारक होने की जरूरत नहीं है. अगर आप सही को ‘सही’ और गलत को ‘गलत’ कहते हैं, तो इस फासीवादी समाज में भी आप अपना प्रगतिशील कुनबा खोज लेते हैं. हमारी सबसे अहम भूमिका ऐसे लोगों को संवेदनशीलता के साथ संगठित करने की है. कैडर किस जाति, जेंडर, धार्मिक या सामुदायिक परिप्रेक्ष्य से आ रहे हैं, इसके प्रति संवेदनशील रहते हुए और निस्वार्थ भाव से उन्हें संगठन विस्तार के काम में लगाना जरूरी है. बाहर से देखने पर ऐसे स्पेसेज को एक आदर्श, बराबरी वाली जगह के रूप में रोमांटिसाइज किया जाता है जहां जाकत, जेंडर, प्रीविलेज और कंसेंट की गहरी समझ की उम्मीद होती है. यह काफी हद तक सही भी होता है, रूढ़िवाद और दुराग्रह से ग्रसित समाज के बरक्स यह स्पेस एक नवोन्मेषी, अनुकूलनशील तथा गतिमान विकल्प पेश करता है. हालांकि प्रगतिशील-लिबरल तबके में भी जेंडर डिस्कोर्स और कंसेंट की समझ और बारीक हो सकती है. प्रैक्टिस हमेशा नई चीजें सीखने और और पुरानी चीजें भुला देने की एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है. किसी व्यक्ति की समझ उसकी प्रैक्टिस को प्रभावित करती है और उसकी प्रैक्टिस उसकी समझ को. जब “डीलिंग” और व्यवहार उन पावर अरेंजमेंट्स के भीतर बनते हैं जहां पुरुषों का एक नेटवर्क तय करता है कि कौन शामिल होगा और कैसे, तब जेंडर और कन्सेंट की उनकी असल समझ सामने आ जाती है. कई बार महिलाओं को इन स्पेसेज से या तो व्यवस्थित तरीके से बाहर रखा जाता है, या फिर चुनिंदा तौर पर अंदर आने दिया जाता है और यह चयन भी अक्सर उसी नजर से होता है जो उन्हें बराबरी का साथी नहीं, बल्कि एक संसाधन की तरह देखती है. पूंजीवाद उस ही को बचाता  है जिससे कुछ ले सके. यहां पूंजीवाद, पितृसत्ता के जरिए महिलाओं और उनके बदन को नियंत्रित करता है.

यहां कन्सेंट अक्सर “टैसिट” यानी अनकहे, मान लिए गए कन्सेंट में बदल जाता है. अगर कोई महिला खुलकर बात करती है, या पुरुष साथियों के साथ सहज है, या उससे भी बुरा – सिगरेट पीती है! तो उसे “खुली” या “आसानी से उपलब्ध” के तौर पर चिन्हित कर दिया जाता है. यह एक नया रूप है उस नजर का, जो “आजादी” सिर्फ इसलिए देती है क्योंकि उसे उपभोग करना है. जब वह महिला अपनी सीमा तय करती है या कन्सेंट से इंकार करती है, तो उसे यह कहकर गैसलाइट किया जाता है कि वह इतनी “प्रगतिशील” या इतनी “समझदार” नहीं है कि ‘फ्री सेक्स’ की जटिलताओं को समझ सके. इस तरह कन्सेंट को एक असली, स्पष्ट संवाद के बजाय एक सामाजिक दबाव में बदल दिया जाता है.

पूंजीवाद और पितृसत्ता का रिश्ता इस पूरी प्रक्रिया को और जटिल बना देता है. माइकल टाॅसिग ने महिला शरीर को वैश्विक पूंजीवाद में “उपभोग का चमकता हुआ केंद्र” बताया है. एंगल्स, ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ में लिखते हैं  कि निजी संपत्ति के उदय के साथ महिलाओं के शरीर पर नियंत्रण जरूरी बना, ताकि वंश और संपत्ति का हस्तांतरण सुनिश्चित किया जा सके. उन्होंने इसे “महिलाओं की विश्व-ऐतिहासिक हार” कहा था. आज का ‘‘कैजुअल सेक्स कल्चर’’ उसी तर्क का एक नया रूप है. यहां आजादी के नाम पर एक ऐसा बाजार तैयार किया गया है जहां शरीर, आकर्षण और अंतरंगता सब कुछ पण्य वस्तु बन जाते हैं.

पूंजीवाद लगातार बेहतर विकल्प की खोज पर टिका हुआ है. डेटिंग ऐप्स और कैजुअल सेक्स कल्चर और बेहतर विकल्प पाने की एक ऐसी मानसिकता बनाते हैं जिसमें इंसानी रिश्ते भी एक असेम्बली लाइन की तरह लगने लगते हैं. यहां “सेक्सुअल पूंजी” एक करेंसी की तरह काम करती है. पुरुषों के लिए यह अक्सर अपने “अधिकारों” के विस्तार जैसा होता है जहां वे बिना किसी भावनात्मक या सामाजिक जिम्मेदारी के कई शरीरों तक पहुंच बना सकते हैं. लेकिन महिलाओं के लिए यही स्पेस एक अलग तरह का दबाव पैदा करता है, जहां उन्हें अपनी राजनीतिक समझ, अपनी ‘आधुनिकता’ और अपना “जागरण” साबित करने के लिए इस, तरह का सेक्सुअल लेबर करना पड़ता है.

भारत के संदर्भ में यह पूरी प्रक्रिया जाति और वर्ग के साथ और भी गहराई से जुड़ जाती है. शहरों में “प्रोग्रेसिव” रिश्ते भी अक्सर ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को ढक कर रखते हैं.

यूनिफार्म सिविल कोड (उत्तराखंड) या तथाकथित “लव जिहाद” कानून इस बात के उदाहरण हैं कि कैसे राज्य प्रेम और रिश्तों को नियंत्रित करने की कोशिश करता है. लिव-इन रिश्तों के रजिस्ट्रेशन जैसी शर्तें राज्य को एक “महा-कुलपिता” की भूमिका में ले आती हैं, जहां वह सुरक्षा के नाम पर महिलाओं की अभिकर्तृत्व की निगरानी करता है. हाशिए के जाति और वर्ग की महिलाओं का इस व्यवस्था में अलग तरह से वस्तुकरण किया जाता है. उन्हें या तो हाइपर-सेक्सुअलाइज किया जाता है या फिर रूढ़िबद्ध धारणा के दायरे में कैद कर दिया जाता है.

इन सबके बीच एक और खतरनाक प्रवृत्ति उभरती है, जहां सत्ता संरचनाएं लोगों की सहमति को इस तरह गढ़ती हैं कि वह स्वाभाविक लगे. कैजुअल सेक्स कल्चर में भी कुछ ऐसा ही होता है, जहां संबंध के लिए राजी होने को “बौद्धिक सजगता” से जोड़ दिया जाता है. एक खास तरह का  तथाकथित जागरूक पुरुष स्त्री विमर्श का इस्तेमाल एक मुखौटा बनाने के लिए करता है. ऐसे लोग चलते-फिरते कम बोलेंगे और सोशल मीडिया पर ज्यादा. ये स्त्री विमर्श पर महिलाओं की बात को ऊंचे स्वर में काट कर अपनी समझदारी पेश करेंगे. ये नारीवादी विचारकों के नाम लेकर खुद को सहयोगी के रूप में पेश करेंगे, लेकिन उसकी समझ चयनात्मक और सतही होती है.

इस “प्रगतिशील पुरुष” की राजनीति में एक अजीब सा पदसोपान या श्रेणीबद्धता होती है, जहां “समझदारी” का पैमाना यह हो जाता है कि एक महिला कितनी आसानी से तैयार दिखती है. अगर आप अपनी सीमाएं व्यक्त करते हैं, तो आपको “बुर्जुआ” या “प्रतिगामी” कहकर खारिज कर दिया जाता है. यहां नारीवाद को ही एक हथियार बना दिया जाता है आपके अभिकर्तृत्व को कमजोर करने के लिए. यह एक मानसिक जाल है जहां ‘ना’ करने  को कमतर और ‘हां’ को बुद्धिमत्ता के रूप में पेश किया जाता है.

जब कोई महिला चालाकी से प्रभावित करने की इस प्रवृत्ति को पहचान लेती है और आवाज उठाती है, तो नैरेटिव  तुरंत पलट दिया जाता है. उस पर आरोप लगाया जाता है कि वह तवज्जो चाहती है या ‘राजनीतिक माइलेज’ ले रही है. इस तरह उसके अनुभव को अवैध बना दिया जाता है. यह उसी ‘मेल-गेज’ का विस्तार है, जहां महिलाओं के दर्द को भी उसकी उपयोगिता के हिसाब से आंका जाता है.

इस पूरे परिदृश्य में असली चुनौती यह है कि हम कन्सेंट को सिर्फ एक व्यक्तिगत नैतिकता के रूप में नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सामाजिक सवाल के रूप में समझें. हमें “टैसिट कंसेंट” के इस खतरनाक ढांचे को तोड़ना होगा और स्पष्ट, सूचित और बिना किसी दबाव या हेरफेर वाले कंसेंट की ओर बढ़ना होगा. इसका मतलब है कि हम हर अंतःक्रिया में मौजूदा सत्ता असंतुलन को पहचानें और उन्हें चुनौती दें. एक ऐसे पूंजीवादी समाज का नाश हो जहां महिलाओं की स्वतंत्रता का लाभ पितृसत्ता और अवसरवादी पुरुष उठाते हों. एंगेल्स के शब्दों में, एक ऐसे समाज का गठन हो जहां महिलाएं स्वेच्छा से, बिना किसी आर्थिक या राजनीतिक दबाव के, संबंध स्थापित कर सकें.

सच्ची आजादी का मतलब यह नहीं है कि हम उसी सिस्टम के भीतर आजादी के भ्रम में जीते रहें, बल्कि यह है कि हम उन संरचनाओं को बदलें जो हमारे रिश्तों और इच्छाओं को बनाया करती हैं. जब तक सामुदायिक सरोकार, जवाबदेही और बराबरी हमारे सामाजिक और राजनीतिक स्पेसेज का हिस्सा नहीं बनते, तब तक आजादी का यह माॅडल सिर्फ नियंत्रण का एक नया तरीका बनकर रह रह जाएगा जहां महिलाएं अब भी अपने शरीर और भावनाओं का श्रम देती हैं, बस इस बार सशक्तिकरण के नाम पर.


23 May, 2026