वर्ष 35 / अंक - 21 / अंबानी को तोहफा, जनता से त्याग: बहुत नाइंसाफी है

अंबानी को तोहफा, जनता से त्याग: बहुत नाइंसाफी है

अंबानी को तोहफा, जनता से त्याग: बहुत नाइंसाफी है

मई 2026 की तपती गर्मी के बीच, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर देश की जनता से ‘राष्ट्रीय जिम्मेदारी’ निभाने का आह्वान किया है. हैदराबाद के परेड ग्राउंड से लेकर अपनी हालिया रैलियों तक, प्रधानमंत्री अब ‘किफायती उपभोग’ (Low Consumption) की बात कर रहे हैं. वे नागरिकों को निजी वाहनों के बजाय मेट्रो और बसों का उपयोग करने, विदेशी यात्राओं से बचने, और यहां तक कि वर्क-फ्रॉम-होम अपनाने की सलाह दे रहे हैं ताकि विदेशी मुद्रा बचाई जा सके. सरकार ने खुद अपनी गाड़ियों के काफिले (Convoy) छोटे कर लिए हैं ताकि एक संदेश दिया जा सके.

लेकिन आज जब ईरान-इजराइल संकट और पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण तेल की कीमतें 110 डाॅलर प्रति बैरल को पार कर गई हैं, तो जनता का सवाल सीधा है: जब अवसर (Opportunity) था, तब उसका लाभ हमें क्यों नहीं मिला?

प्रधानमंत्री की आज की ‘त्याग’ की अपील उस 2022 की कहानी को कुरेदती है, जहां भारत के पास इतिहास का सबसे बड़ा ऊर्जा जैकपाॅट था, जिसे मोदी सरकार ने जनता के कल्याण के बजाय काॅरपोरेट बैलेंस शीट और सरकारी खजाने की भेंट चढ़ा दिया.

2022 का वह ऐतिहासिक अवसर: एक रणनीतिक जैकपाॅट

फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक अभूतपूर्व दरार पैदा की. पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों ने रूस को अपने कच्चे तेल के लिए नए बाजार तलाशने पर मजबूर कर दिया. भारत, जो अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत तेल आयात करता है, के सामने इतिहास ने एक दुर्लभ मौका पेश किया था. रूस ने भारत को ‘डिस्काउंटेड’ यानी भारी छूट पर तेल देने का प्रस्ताव रखा.

आंकड़ों के अनुसार, रूसी ‘यूराल’ क्रूड अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क (ब्रेंट) से औसतन 25 डाॅलर से 35 डाॅलर प्रति बैरल सस्ता मिल रहा था. एक लोक-कल्याणकारी अर्थव्यवस्था में इस भारी बचत का सीधा लाभ पेट्रोल पंपों पर दिखना चाहिए था. यदि सरकार चाहती, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 15 रुपये से 20 रुपये प्रति लीटर तक की स्थायी कटौती कर सकती थी. लेकिन मोदी सरकार ने कीमतों को 100 रुपये के पार ही बनाए रखा. जनता को राहत देने के बजाय, इस छूट को सरकारी टैक्स और काॅरपोरेट मुनाफे में बदल दिया गया. इस दौरान मोदी सरकार और अम्बानी – दोनों ने अपनी तिजोरियां भरीं.

‘लाभ’ का निजीकरण: काॅरपोरेट विंडफाॅल का कड़वा सच

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चौंकाने वाला पहलू ‘निजी रिफाइनरियों’ का अप्रत्याशित मुनाफा है. रिलायंस इंडस्ट्रीज (अंबानी) और नायरा एनर्जी जैसी दिग्गज कंपनियों ने इस अवसर को एक ‘काॅरपोरेट विंडफाॅल’ में बदल दिया. इन कंपनियों ने भारी मात्रा में सस्ता रूसी तेल आयात किया.

इस तेल को रिफाइन करने के बाद, इसे घरेलू बाजार में सस्ता बेचने के बजाय, ऊंचे अंतरराष्ट्रीय दामों पर यूरोप और अमेरिका को निर्यात किया गया.

रिपोर्टों के अनुसार, 2022 से 2025 के बीच भारतीय निजी रिफाइनरियों ने लगभग 16 बिलियन डाॅलर (करीब 1.35 लाख करोड़ रुपये) का अतिरिक्त लाभ कमाया.

यह सीधे तौर पर राष्ट्रीय संसाधनों का काॅरपोरेट हित में किया गया ‘अपहरण’ था. जब जनता महंगाई से त्रस्त थी, तब ये कंपनियां इतिहास का सबसे बड़ा मुनाफा दर्ज कर रही थीं. यह ‘अंबानी को तोहफा’ था, जो मोदी सत्ता की कीमत के रूप में चुका रहे थे.

रणनीतिक चूक: खाली पड़े भंडार और असुरक्षित भारत

मोदी सरकार अक्सर ‘राष्ट्रवाद’ और ‘सुरक्षा’ की बात करती है, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर उसने एक अक्षम्य भूल की है. दुनिया के अन्य दूरदर्शी देशों (जैसे चीन) ने सस्ते तेल के दौर में अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) को रिकाॅर्ड स्तर पर भर लिया.

भारत की स्थिति इसके उलट रही. 2026 में, जब पश्चिम एशिया संकट के कारण वैश्विक तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, भारत के पास केवल 9.5 दिनों का आपातकालीन भंडार है. हमने सस्ते तेल को भविष्य के लिए सुरक्षित रखने के बजाय, उसे तत्कालीन टैक्स वसूलने और काॅरपोरेट निर्यात को बढ़ावा देने में झोंक दिया. यह भविष्य की पीढ़ियों की सुरक्षा के साथ किया गया एक गंभीर समझौता है.

सरकारी खजाना: टैक्स का ‘चुनावी हथियार’ और मध्यम वर्ग की तबाही

सरकार ने तेल की गिरती कीमतों का फायदा जनता को देने के बजाय ‘एक्साइज ड्यूटी’ के ऊंचे स्तर को बनाए रखा. यह राजस्व सरकार के लिए एक ‘राजनीतिक हथियार’ बन गया. आरबीआइ (RBI) के आंकड़े गवाह हैं कि 2026 तक भारतीय परिवारों की शुद्ध वित्तीय बचत कई दशकों के निचले स्तर पर पहुंच गई है. जब आम आदमी अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा महंगे ईंधन और उससे पैदा हुई खाद्य महंगाई में खर्च कर देता है, तो उसकी बचत खत्म हो जाती है. सरकार ने अपनी राजकोषीय छवि चमकाने के लिए देश के मध्यम वर्ग की रीढ़ तोड़ दी.

लाभ तुम्हारा, त्याग हमारा?

आज जब वैश्विक परिस्थितियां फिर से प्रतिकूल हैं, तो सरकार का वही पुराना ‘त्याग’ वाला मंत्र शुरू हो गया है. प्रधानमंत्री की आज की अपील कि ‘जनता तेल बचाए’, ‘कारपूलिंग करे’ और ‘उपभोग कम करे’, मोदी माॅडल के सबसे बड़े विरोधाभास को उजागर करती है:

जब अवसर (सस्ता तेल) आया, तो उसका लाभ काॅरपोरेट्स ने उठाया और सरकार ने अपनी तिजोरी भरी. लेकिन आज जब संकट (महंगा तेल) आया है, तो उसका पूरा बोझ जनता के कंधों पर डाल दिया गया है. यह ‘नाइंसाफी’ नहीं तो और क्या है?

निष्कर्ष: एक नीतिगत और नैतिक विश्वासघात

2022-2026 का यह दौर भारत की तेल कूटनीति के एक ऐसे काले अध्याय के रूप में याद किया जाएगा, जहां एक ‘राष्ट्रीय अवसर’ को चंद काॅरपोरेट घरानों की बैलेंस शीट और सरकारी राजस्व के अहंकार की वेदी पर कुर्बान कर दिया गया. यह आर्थिक माॅडल ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे के ठीक विपरीत है. आज का तेल संकट कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक ‘नीतिगत विफलता’ है. यदि सरकार ने राष्ट्र और उसकी जनता के बारे में सोचा होता, तो आज भारत एक ऊर्जा शक्ति के रूप में खड़ा होता, न कि एक बेबस देश के रूप में जहां प्रधानमंत्री को जनता से अपनी जीवनशैली बदलने की विनती करनी पड़ रही है. सच्चाई यह है कि भारत आज संकट में नहीं होता, यदि दिल्ली की सत्ता ने ‘देश’ को ‘मित्रों’ से ऊपर रखा होता.


23 May, 2026