[ दिमागी नक्सल के बहाने डर का माहौल बनाने, असहमति पर बढ़ते हमलों और जंतर-मंतर के युवा आंदोलन पर भाकपा(माले) महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य से प्रसून आचार्य की बातचीत. मूल बातचीत बंगला में थी, और स्पष्टता के लिए हिंदी अनुवाद को संपादित किया गया है.]
प्रसून आचार्य : नमस्कार, मैं प्रसून आचार्य, आप देख रहे हैं मेरा चैनल. दोस्तो, आज हम एक बेहद अहम मुद्दे पर बात करेंगे. आप जानते हैं, लाल किले से 15 अगस्त के अपने भाषण में नरेंद्र मोदी ने एक नया शब्द इस्तेमाल किया, “दिमागी नक्सल”, यानी वह नक्सल सोच जो दिमाग के अंदर रहती है. उन्होंने कहा कि हथियारबंद नक्सल तो खत्म हो गए, लेकिन दिमागी नक्सल मौके की तलाश में हैं.
और सिर्फ यही नहीं, उनका बड़ा इल्जाम यह भी था कि पहले की जो सरकारें रही हैं, उनमें नक्सलवादी सोच के, माओवादी सोच के लोग शामिल थे, सरकार के सलाहकार तक बने बैठे थे और उन्होंने सरकारी कामकाज को प्रभावित किया. उन्होंने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ में जो ऑपरेशन कुछ महीने पहले, करीब एक साल से चलाया गया और मार्च 2026 तक छत्तीसगढ़ को नक्सल-मुक्त, माओवाद-मुक्त करने की बात अमित शाह ने कही थी, वह पूरी हो गई. लेकिन अब दिमागी नक्सलों को भी निपटाना है.
इससे पहले “अर्बन नक्सल” की बात होती थी, अब वहां से आ गया “दिमागी नक्सल” का नैरेटिव. इस पर देश भर में विरोध हो रहा है. कांग्रेस ने भी विरोध जताया है और खुद चिदंबरम ने कहा है, जो यूपीए के दौर में ऑपरेशन ग्रीन हंट के वक्त गृह मंत्री थे, कि “अगर मुझे दिमागी नक्सल कहा जाए तो मुझे गर्व होगा”. इस मसले पर बात करने के लिए हमें बिल्कुल सटीक शख्स मिल गए हैं, भाकपा(माले) लिबरेशन के जनरल सेक्रेटरी दीपंकर भट्टाचार्य.
दीपंकर दा, आपका बहुत स्वागत है. आपसे एकदम सीधा सवाल, इतने दिनों से “टुकड़े-टुकड़े गैंग”, “अर्बन नक्सल” और “आंदोलनजीवी” वगैरह के बाद अचानक “दिमागी नक्सल” कहां से आ गया? दिल्ली के जंतर-मंतर के विरोध ने जो असर डाला, उसमें आपकी पार्टी की नेहा बोरा भी दिखीं, और भी बहुत लोग दिखे, लेफ्ट के लोग भी थे. अचानक नरेंद्र मोदी दिमागी नक्सल के पीछे क्यों पड़ गए, जिस पर इतनी बहस छिड़ गई है?
दीपंकर भट्टाचार्य : बिल्कुल सटीक नस पकड़ी है आपने. असल बात यह है कि जंतर-मंतर पर जो इतना बड़ा युवाओं का आंदोलन हुआ, जिसका कोई जवाब सरकार के पास नहीं था. इससे पहले हुकूमत ने आंदोलन को दबाने के जितने तरीके अपनाए जा सकते थे, आंदोलन के खिलाफ जहर उगलना, लोगों को भ्रमित करना, बांटना, वह सब आजमा कर नाकाम होने के बाद आखिरकार 25 तारीख को धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा. उसके बाद से मैं देख रहा हूं कि सरकार की इतनी बड़ी हार को वे पचा नहीं पा रहे.
इसलिए अब कोशिश यह है कि किसी तरह इस आंदोलन को कमजोर किया जाए, इसे घेरा जाए, जनता को इसके खिलाफ भड़काया जाए. मुझे लगता है यह उन्हीं कोशिशों का ताजा नतीजा है, यह अचानक आया नया शब्द ‘दिमागी नक्सल’. एक दिलचस्प बात मैंने देखी कि प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर, प्रेस इन्फाॅर्मेशन ब्यूरो की वेबसाइट पर जो हिंदी या अंग्रेजी टेक्स्ट मौजूद है, उसमें ‘दिमागी नक्सल’ शब्द है ही नहीं. यानी जो वीडियो में सबने देखा और जो बात देश भर में फैल गई, वह ऑफिशियल रिकाॅर्ड में नहीं है.
इसकी वजह भी समझनी जरूरी है. लेकिन मुझे लगता है, जिन्होंने यह बात कही है, यह साफ है कि यह उन नक्सलपंथी आंदोलनों को सोचकर नहीं कही गई, जिन्हें ऐतिहासिक तौर पर नक्सलपंथी माना जाता रहा है. पिछले दस सालों में हमने देखा है कि “अर्बन नक्सल” हो या “टुकड़े-टुकड़े गैंग”, इन शब्दों का दायरा इतना बढ़ गया है कि जो भी सच बोले, सरकार से नागवार सवाल पूछे, वह उनकी नजर में नक्सल है.
मुझे याद है, कोविड के बाद जब गंगा में ढेर लाशें बहती जा रही थीं, तब सिर्फ दैनिक भास्कर अखबार में कुछ रिपोर्ट छपी थीं. तभी गुजरात की एक सम्मानित महिला कवि, जो शायद मोदी की मुरीद ही थीं, कोई वामपंथी कवि नहीं, नाम इस वक्त याद नहीं आ रहा, शायद पारुल खक्कर, उन्होंने एक कविता लिखी, “शववाहिनी गंगे”, “नमामि गंगे” को तंज में बदलकर. तब उन्हें भी “लिटरेरी नक्सल” कह बुलाया जाने लगा.
यानी साहित्य की दुनिया हो, पत्रकारिता की दुनिया हो, कहीं भी कोई अगर ऐसी बात कहे जो हुकूमत को नागवार गुजरे, तो उसे नक्सल का ठप्पा लगा दिया जाता है. उसी धारावाहिकता में अब आया “दिमागी नक्सल”. मोदी ने कहा है कि दिमागी नक्सलों को चिन्हित करना है, आइडेंटिफाई करना है, अलग-थलग करना है, लेकिन कैसे पहचानेंगे, कैसे पहचान करेंगे, यह कोई नहीं जानता. कौन दिमागी नक्सल है, यह भी किसी को समझ नहीं आ रहा, लेकिन सब अंदाजा ठीक ही लगा पा रहे हैं कि माजरा क्या है.
पूरे देश में, सुकांत की जबान में कहें तो, “अठारह” उतर आया है (सुकांत की कविता ‘अठारह बोचोर बयाॅश’). यह अठारह, जो जंतर-मंतर पर उतरा और जिसके सामने हुकूमत को पीछे हटना पड़ा, यहीं से “दिमागी नक्सल” शब्द की पैदाइश हुई है.
मुझे लगता है, जिस स्वाधीनता दिवस पर गणतंत्र और स्वाधीनता की बात होनी चाहिए थी, स्वाधीनता से हमारा मतलब सिर्फ देश की आजादी नहीं, बल्कि इंसान की आजादी, नागरिकों की आजादी भी है, जो हमारा संविधान हमें देता है, अभिव्यक्ति की आजादी, आंदोलन की आजादी, बोलने की आजादी, जुलूस निकालने की आजादी, उस आजादी की बजाय एक हौवा खड़ा कर दिया गया, डर दिखाया गया, लोगों को बांटा गया. हुकूमत को हमेशा एक “आंतरिक दुश्मन” की दरकार है, कोई रहस्यमय दुश्मन की दरकार है, जिसे दिखाकर जनता को गुमराह किया जा सके. यहीं से यह बात निकली है.
“कॉकरोच जनता पार्टी” ने भी यह बात कही है. वे भी समझ गए हैं कि जिन्हें पहले “अर्बन नक्सल” कहा जाता था, अब उन्हीं को “दिमागी नक्सल” कहा जा रहा है, फर्क कुछ नहीं है. इस पूरी जेन-जी को, इस पूरी पीढ़ी को इसी तरह निशाना बनाया जा रहा है.
कल यादवपुर की मीटिंग में मैंने यही कहा था कि यह किसी खास नक्सलपंथी को, किसी खास वामपंथी को, फलां को या ढिकां को नहीं कहा जा रहा, यह तो एक ब्लैंकेट (सामूहिक) टर्म है, एक नया शब्द है शब्दकोश का, जो सबके लिए लागू होगा. मैंने तो पहला दिमागी नक्सल का ठप्पा राहुल गांधी पर देखा, मानो राहुल गांधी अब दिमागी नक्सल हैं. और आपने कहा कि पहले यूपीए जमाने में सारे दिमागी नक्सल सरकार में थे.
प्रसून आचार्य : हां, इसीलिए मैं एक मिनट रोक रहा हूं आपको. बात ये है कि ये ऐसे दिमाग में बिठा दिया जा रहा है कि विरोध करने वाला कोई भी हो, उस पर ये लेबल लगेगा.
मैं एक और पहलू पर आता हूं. नक्सल आंदोलन, उसकी विचारधारा, उसकी अलग-अलग धाराएं, ये अलग बात है. माओवादी कहां गए, आप कहां हो, ये मुद्दा नहीं है. लेकिन अगर चुनावी गठबंधन और ताकत की बात करें, तो सीपीएम, सीपीआइ(एमएल) लिबरेशन या बाकी लेफ्ट पार्टियां काफी सिमट गई हैं. लेकिन उनकी विचारधारा और बयानों का असर शायद समाज में कहीं न कहीं दिखता है.
तो क्या वे लोग, जो भाजपा की दक्षिणपंथी, हिटलरी, फासीवादी नीतियों, क्रोनी कैपिटल (अडानी-अंबानी) के खिलाफ मुखर हैं, उसी की वजह से निशाने पर हैं? जबकि तृणमूल, आरजेडी, मुलायम, यानी इंडिया ब्लाॅक की दूसरी पार्टियां, उनके बयान क्रोनी कैपिटल या दूसरे मुद्दों पर इतने साफ नहीं हैं, जितने आपके या राहुल गांधी के हैं. वे पहले भी आसानी से ‘एंटी-नेशनल’ कहकर टैग कर देते थे, तो अब कोशिश है कि हमारे विचार के खिलाफ जो कुछ भी हो, उसे ‘नक्सल विचारधारा’ करार दें?
दीपंकर भट्टाचार्य : ‘अर्बन नक्सल’ किसको उन्होंने नहीं कहा. इस शब्द का तो उन्होंने बहुत बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया. छत्तीसगढ़ में हिमांशु कुमार को भी यह कहा गया, जबकि वे खुद गांधीवादी हैं. जब उनका काम आता है तो सोनम वांगचुक अच्छे थे. जब उन्होंने अनुच्छेद 370 हटाने का समर्थन किया, तब सोनम वांगचुक बहुत अच्छे थे. लेकिन जब वांगचुक को समझ आया कि इससे लद्दाख की स्वायत्तता खत्म हो गई और उन्होंने अलग राज्य के दर्जे की मांग शुरू की, तो वांगचुक बुरे हो गए, चीन के दलाल हो गए, एंटी-नेशनल हो गए. यानी यह सुविधा के मुताबिक इस्तेमाल होगा. जिसकी बात से भी नागवारी हो, उसके लिए एक नया शब्द निकाल दिया जाएगा. इसका मतलब यह नहीं कि पुराने शब्द खत्म हो गए, बस शब्दकोश में एक नया इजाफा हुआ है, ‘दिमागी नक्सल’.
लेकिन इससे एक बात साफ निकलकर आती है. कबीर सुमन का एक गीत था, ‘मगजे कारफ्यू’, मतलब जिनके दिमाग में कार्फ्यू नहीं है, जिन्हें ब्रेनवाॅश नहीं किया जा सकता, जो अपने दिमाग को इस्तेमाल करना जानते हैं, जो अपनी अक्ल को धार देते हैं, अपने जमीर को धार देते हैं, उनसे वे बहुत घबराए हुए हैं.
इसे रोकना है, यही बात ‘दिमागी नक्सल’ कहकर की जा रही है. सिर्फ यही नहीं, पूरे देश में शिक्षा पर जो हमला हो रहा है, हर रोज सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं, लोगों को जितना हो सके शिक्षा से दूर रखा जा रहा है, यूनिवर्सिटियों में आरएसएस के लोग थोपे जा रहे हैं, वहां जो क्रिटिकल थिंकिंग है, जो रिसर्च है, उसे बंद किया जा रहा है. मुझे लगता है, यह दिमाग को नियंत्रित करने की कोशिश सिर्फ बातों तक सीमित नहीं है, यह जड़ से खत्म करने की कोशिश है, शिक्षा, रिसर्च, पत्रकारिता, लेखन, सिनेमा, हर जगह, ताकि कोई आजाद ख्याल, कोई भी मुक्त सोच, कोई असहमति की आवाज न बचे.
जाॅर्ज ऑरवेल के ‘1984’ में ‘थाॅट पुलिस’ का जिक्र है, जो आपके सोचने से पहले ही यह भांपने की कोशिश करती है कि आप क्या सोच रहे हैं. यह इंसान की सोच, उसके जमीर को निशाना बनाने का मामला है.
साथ ही, यह देखना जरूरी है कि जंतर-मंतर का जो आंदोलन हुआ, उसे उन्होंने पहले बलपूर्वक कुचलने की कोशिश की, पेलेट गन, एके-47, वाटर कैनन, आंसू गैस – यह सब बेतहाशा इस्तेमाल हुआ, दिल्ली में भी, पटना में भी, हर जगह. लोगों को जेल में डालने की कोशिश हुई, फिर मजबूरन एक ‘एमनेस्टी’ घोषित करनी पड़ी. दमन की पुरानी कोशिश नाकाम रही.
इसके बाद मोदी ने रात को यह कहा कि ‘लड़कियां मुझे गालियां दे रही हैं’. इससे वे यह जताना चाहते थे कि हिंदुस्तानी समाज टूट रहा है, संस्कार टूट रहे हैं, परिवार टूट रहे हैं. यह पितृसत्ता को, समाज की तमाम रूढ़िवादी सोच को उकसाने की कोशिश है, ‘अपने लड़कों को संभालो’, और उससे भी बड़ी बात, ‘अपनी लड़कियों को संभालो’. उन्हें लगा कि जेन-जी की सबसे कमजोर कड़ी शायद वे लड़कियां हैं जो आंदोलन में शामिल हुई हैं. अगर इसे निशाना बनाया जाए, इससे उनके मां-बाप को डराया जाए, बजरंग दल को उकसाया जाए, तो वे घर जाकर उस पंद्रह साल की लड़की को, उसकी मां को इतना परेशान करेंगे कि उन्हें घर छोड़ना पड़े, सोशल मीडिया पर वीडियो बनाकर माफी मांगनी पड़े. लड़कियों को निशाना बनाना, ट्रोल आर्मी को उकसाना, यह एक कदम था, और ‘दिमागी नक्सल’ उसी रणनीति का वैचारिक विस्तार है, ताकि जाहिर तौर पर जनता के बीच डर फैलाया जाए. लेकिन मुझे लगता है, खुद वे डर में हैं और अपने डर की वजह से ही सबको डराने की कोशिश कर रहे हैं.
उनके डर की वजह, मुझे लगता है, यह है. जंतर-मंतर से पहले जो अन्ना हजारे आंदोलन हुआ था, बहुत से लोग इस बार के आंदोलन को उसी का अगला हिस्सा मानते हैं, लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता. अन्ना आंदोलन में सिर्फ गांधी की तस्वीर थी. अन्ना को नए गांधी के तौर पर पेश करने की कोशिश हो रही थी. इस बार, चौदह साल बाद, जो आंदोलन हुआ, उसमें हर हाथ में भगत सिंह की तस्वीर थी, अंबेडकर की तस्वीर थी और जो नारे सुनाई दिए, पहली बार साथ-साथ ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘जय भीम’. अंबेडकर को वे अपने ढंग से इस्तेमाल करना चाहते हैं. अंबेडकर सिर्फ एक दलित थे, उन्होंने आरक्षण की व्यवस्था की, बस इतना ही याद रखा जाए. लेकिन आज अंबेडकर को लेकर, संविधान को लेकर लोग सड़कों पर उतर रहे हैं. वे भगत सिंह को सिर्फ एक आम देशभक्त की तरह पेश करना चाहते थे. लेकिन भगत सिंह वामपंथी थे, कम्युनिस्ट थे, उन्होंने समाजवाद की बात की, साम्राज्यवाद के खात्मे की बात की. यह सब वे भुला देना चाहते हैं.
जब वे किसी को इस्तेमाल नहीं कर पाते, जैसे नेताजी सुभाष, उनके सवा सौ साल पूरे होने पर उनके जन्मदिन को ‘पराक्रम दिवस’ कहकर सुभाष को एक फौजी हीरो के तौर पर पेश करने की कोशिश की गई. लेकिन जब उन्हें दिखा कि सुभाष सिर्फ फौजी हीरो के दायरे में नहीं समाते, उनका धर्मनिरपेक्षतावाद, उनका वामपंथी झुकाव, हिंदू महासभा के खिलाफ उनका मजबूत रुख लोगों को पता चलने लगा, तो सुभाष बोस की जगह श्यामाप्रसाद को आगे लाने की कोशिश शुरू हुई. यह इतिहास के साथ की गई राजनीति है और मुझे लगता है, यह उनका डर ही जाहिर करता है.
नई पीढ़ी से भी उन्हें यही डर है. बाबा नागार्जुन बहुत उम्दा जनकवि थे, नक्सलवाद से भी पहले के कम्युनिस्ट आंदोलन के. उनकी एक शानदार पंक्ति है, ‘रोजी-रोटी, हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा, कोई भी हो, निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा’. आज इसका एक नया शब्द है. उसे ‘अर्बन’ कहा जाएगा, ‘दिमागी नक्सल’ कहा जाएगा. कम्युनिस्ट का यही नया पर्यायवाची शब्द है, नक्सल, चाहे दिमागी हो, चाहे अर्बन हो.
प्रसून आचार्य : एक दुखद खबर भी बताता हूं. इस “अर्बन नक्सल”, “दिमागी नक्सल” जैसे मुहावरे गढ़ने का नतीजा यह हुआ है कि बांकुड़ा के बरजोड़ा के शेख अब्दुल हफीज, जो जंतर-मंतर के विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने गए थे, लौटकर जब बांकुड़ा के इंदास में एक स्कूल के बाथरूम और बाकी दुर्दशा का वीडियो बना रहे थे, तो भाजपा के कुछ लड़कों ने, आठ-दस लोगों ने मिलकर उन्हें बुरी तरह पीटा. उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया और बेहद अफसोस की बात है कि शनिवार देर रात उनकी मौत हो गई. आज शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया है. सीजेपी के अभिजीत दीपके और प्रवक्ता सौरभ दास ने भी इस हत्या पर प्रतिवाद दर्ज किया है, लेकिन भाजपा की तरफ से यह भी कहा गया कि वह असल में एक “झूठा प्रोपेगैंडा” फैला रहा था. यानी नैरेटिव यह है कि जो मोदी या भाजपा कहना चाहते हैं, वह काम कर रहा है.
फिर आज रविवार को, जब हम यह बातचीत कर रहे हैं, तो यादवपुर में लेनिन की मूर्ति तोड़ने के लिए “हिंदू सुरक्षा वाहिनी” के कुछ लोग पहुंचे हैं और वे कह रहे हैं कि लेनिन से ही नक्सलवाद निकला है और लेनिन असल में हिंदुस्तान के बंटवारे के जिम्मेदार थे. यह बेहद सोची-समझी हरकत है. एक तरफ अब्दुल हफीज को इसलिए मार डाला गया कि वे स्कूल की बदहाली का वीडियो बना रहे थे, दूसरी तरफ लेनिन की मूर्ति पर हंगामा हो रहा है. पिछले अड़तालीस घंटों में पश्चिम बंगाल में हमें अजीब मंजर देखने को मिल रहे हैं. तो क्या नरेंद्र मोदी ने बहुत सोच-समझकर यह मामला उठाया है?
दीपंकर भट्टाचार्य : अवश्य ही, लेकिन मुझे लगता है इसका दायरा उनके उस कट्टरपंथी तबके तक है, चाहे बजरंग दल हो या हिंदू सुरक्षा वाहिनी वगैरह. यह छोटा सा हिस्सा है और सरकारी शह से सड़कों पर गुंडागर्दी कर रहा है, हमले कर रहा है. उन्हें एक बहाना देना, उन्हें भड़काना, यही हुकूमत का काम है. मैंने आपको “दिमागी नक्सल” वाली बात भी बताई. वे मौखिक तौर पर तो बोल देंगे, लेकिन बाद में अगर कोई रिकाॅर्ड खोजेगा तो पाएगा कि टेक्स्ट में वह शब्द है ही नहीं, सिर्फ वीडियो में है. काम यही है कि बातें फैला दो. लेकिन मुझे नहीं लगता कि आम जनता, खासकर नई पीढ़ी, इससे भड़केगी. बजरंग दल और संघ परिवार की गुंडा फौजों को कोई कमी नहीं है. उन्हें कोई भी बहाना मिले, वे हमेशा सड़क पर मारपीट, तोड़फोड़ के लिए तैयार रहते हैं. यही उनका काम है.
मोदी जो कह रहे हैं, उनका मकसद यह है कि उनकी जो गुंडा फौजें हैं, उन्हें सक्रिय कर दिया जाए, ताकि सरकारी दमन के तमाम काले कानूनों के साथ-साथ यह एक पूरक चीज चलती रहे. यह सब मिलकर जिसे मैं अक्सर “पीपीपी माॅडल” कहता हूं, पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप माॅडल. स्टेट अपना काम करेगा और उसके साथ-साथ “प्राइवेट वायलेंस”. आज हिंसा का निजीकरण हो रहा है और यह जो निजी हिंसा हम सड़कों पर देख रहे हैं, इन दोनों की जुगलबंदी ही फासीवाद की खास पहचान है. राज्य तो अलग-अलग वक्त पर दमन करता ही है. यह किसी फासीवाद की खास निशानी नहीं, यह कोई भी राज्य करता है. लेकिन राज्य के साथ-साथ यह गुंडा फौज, दोनों मिलकर जब एक साथ दहशत बरपा करते हैं, वही फासीवाद की सबसे खास निशानी है और यही वे कर रहे हैं.
“कॉकरोच जनता पार्टी” के लोग भी यह समझ गए हैं कि जिस आंदोलन को वे कुचल नहीं सके, उसे अब घेरने के लिए, उसके खिलाफ नफरत फैलाने के लिए यह प्रोपेगैंडा किया जा रहा है. लेकिन मुझे नहीं लगता कि आम जनता, खासकर नई पीढ़ी, इससे गुमराह होगी. वे यही कहेंगे, “मैं अपने स्कूल की मरम्मत की बात कर रहा हूं, अगर इस पर मुझे नक्सल कहा जाएगा, तो कह दो, मुझे कोई एतराज नहीं.” जैसे “कॉकरोच” शब्द को इस पीढ़ी ने अपना लिया. तुम अपमान के लिए “कॉकरोच” कहोगे, तो हम कहेंगे ठीक है, हम काॅकरोच हैं, चलो हम सब मिलकर “कॉकरोच जनता पार्टी” बनाते हैं. यह उल्टा पड़ेगा.
“दिमागी नक्सल” पर भी मैं कल से सोशल मीडिया पर देख रहा हूं. लोग कह रहे हैं, “दिमाग है तो नक्सल ही होंगे”, “हमारे दिमाग में कार्फ्यू नहीं है, हम अपनी अक्ल इस्तेमाल करते हैं”. मुझे लगता है यह उल्टा पड़ेगा. लेकिन जो आपने कहा, बांकुड़ा में या कहीं और गुंडागर्दी, कहीं हत्या, यह वे करेंगे. जबानी बात के साथ-साथ फिजिकल, डिजिटल, हर तरह की हिंसा वे करेंगे, करना शुरू भी कर चुके हैं.
प्रसून आचार्य : मेरा एक ही सवाल है. पहले हमने देखा है जी.एन. साईबाबा का मामला. जो दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे, उन्हें 2017 में भीमा कोरेगांव से जुड़े केस में फंसाया गया. वे 2024 तक जेल में रहे, इतने बीमार हो गए कि आखिरकार उनकी मौत हो गई. कभी साबित नहीं हुआ कि उन्होंने स्टेट के खिलाफ कोई हिंसा की. स्टेन स्वामी जैसे इंसान, जो झारखंड में आदिवासियों को शिक्षा देने में लगे थे, उन्हें भी उसी तरह नक्सलियों से जोड़ा गया और जेल में उनकी मौत हो गई. उमर खालिद का मामला अब तक चल ही रहा है, सुनवाई तक नहीं हो रही. तो आज के दौर में क्या हालात में वाकई कोई बुनियादी तब्दीली आई है?
दीपंकर भट्टाचार्य : जंतर-मंतर से जो संदेश गया है, वह यह है कि एक मंत्री को पद छोड़ना पड़ा, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि लोग डर से बाहर आए हैं. उनके नैरेटिव, डर और खामोशी को लोग तोड़कर बाहर निकले हैं. उस डर को फिर से पैदा करने के लिए एक नई बात आई, “दिमागी नक्सल”.
चाहे वे यह कहें या न कहें, वे किसी को भी, कभी भी जेल में डाल सकते हैं, एक साल, दो साल, पांच-छह साल तक रख सकते हैं. यह तो साबित है, यह इस वक्त हिंदुस्तान में एक तय बात है. यह कोई नई बात नहीं है. लेकिन मेरे ख्याल से नई बात यह है कि इतना सब करके भी लोगों को चुप नहीं किया जा सकता, इतना डरा कर भी लोगों को घरों में नहीं बिठाया जा सकता.
गोरख पांडे की वह छोटी कविता है, “उनका डर”. उनका डर इसी बात का है कि इतनी पुलिस, इतनी फौज, इतनी दौलत होने के बावजूद एक दिन वे बेहद गरीब, निहत्थे लोग उनसे डरना छोड़ देंगे. जो सत्ता में है, उसे यही डर सता रहा है कि डर पैदा करने के इतने सारे जरिए होते हुए भी एक दिन वह काम करना बंद कर देंगे और लोग हिम्मत के साथ आगे आएंगे. मुझे लगता है हम उस मुकाम पर पहुँच रहे हैं जहां लोग नहीं डर रहे.
और इस “दिमागी नक्सल” वाली बात से भी मुझे नहीं लगता कि लोग डरेंगे. मैं सोशल मीडिया पर जो रिस्पाॅन्स देख रहा हूं, जेन-जी का रिस्पाॅन्स, अलग-अलग पार्टियों का, काॅकरोच जनता पार्टी का, किसी को डर नहीं है.
प्रसून आचार्य : मेरा आखिरी सवाल. एक वक्त था जब कांग्रेस के चिदंबरम, गृह मंत्री रहते हुए, ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाते थे, माओवादियों पर बम गिराने की बात करते थे. नक्सल-दमन को लेकर कांग्रेस का रवैया भाजपा की सोच से बहुत अलग नहीं था. लेकिन आज अचानक चिदंबरम कहते हैं कि “अगर मैं दिमागी नक्सल होता तो मुझे गर्व होता” और कांग्रेस इस पर प्रतिक्रिया दे रही है. आप लंबे समय तक राहुल गांधी के साथ कई आंदोलनों में भी जुड़े रहे, चुनाव अभियान में भी रहे. क्या सचमुच उनके “नक्सल/माओवादी” वाली जबान में कोई परिवर्तन आया है?
दीपंकर भट्टाचार्य : मुझे नहीं मालूम पार्टीगत तौर पर कोई परिवर्तन है या नहीं. लेकिन यह तो हकीकत है कि कांग्रेस को भी वे नहीं बख्शेंगे. उस वक्त की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल, जिससे मनरेगा बना, राइट टू इन्फाॅर्मेशन बना, वन अधिकार कानून बना, खाद्य सुरक्षा कानून, भूमि अधिग्रहण कानून बना, इन सारे कानूनों के पीछे भी नक्सल सोच होने की बात कही जाती है.
जनता की भलाई के लिए, लोकतंत्र के हक में जो भी हो, उसे वे नक्सलपंथी कहकर निशाना बनाएंगे, वामपंथी कहें या कम्युनिस्ट कहें. संसद के एक सत्र में तो अमित शाह द्वारा यह भी कहा गया था कि कम्युनिज्म एक विदेशी विचारधारा है. लेकिन यह फासीवाद भी तो हिंदुस्तान से पैदा नहीं हुआ, इसकी पैदाइश जर्मनी और इटली से हुई है. इसे यहां लाकर, हिंदुस्तान की मनुस्मृति और जाति व्यवस्था, अंग्रेजों के छोड़े औपनिवेशिक तंत्र के साथ मिलाकर, एक हिंदुस्तानी किस्म का फासीवाद वे तैयार कर रहे हैं.
चिदंबरम ने क्यों कहा, मुझे नहीं मालूम, इस पर मैं कुछ नहीं कहूंगा. हो सकता है वे पुराने अतीत को भुलाने या प्रायश्चित करने की कोशिश कर रहे हों. लेकिन हालात में बहुत बड़ी तब्दीली आई है. संसद में, जहां हमने पहले कभी नहीं देखा कि कश्मीर में इतनी पेलेट गन चली हो, हमने संसद में उस पर बहस नहीं सुनी. दिल्ली में दस बार पेलेट गन इस्तेमाल हुई, आज इस पर संसद में बहस हो रही है, अमित शाह को जवाब देना पड़ रहा है. जिन लोगों को गिरफ्तार किया जा रहा है, उन पर भी बात उठ रही है.
मुझे लगता है ये राजनैतिक, राज्य-प्रायोजित आतंक, दमन, उत्पीड़न के मसले पहले शायद एजेंडा नहीं बनते थे, अब बनेंगे, क्योंकि यह अब सबके खिलाफ इस्तेमाल हो रहा है, सिर्फ आंदोलनकारियों के खिलाफ नहीं, जो भी विरोध करे उसके खिलाफ. मानहानि अधिनियम के तहत राहुल गांधी की सांसदी छीनी जा रही है, जो सांसद बिकने से इनकार करेंगे, वे निशाने पर हैं. महुआ मोइत्र के साथ जैसा हुआ, उन्हें सर्किट हाउस में किस तरह परेशान किया गया.
मुझे लगता है ये नए हालात हर उस इंसान को मजबूर करेंगे, जो लोकतंत्र में यकीन रखता है. उसे आज सबको जवाब देना होगा. वो दिन चला गया जब “नक्सल” कह देने से कोई पीछे हट जाए या ये साबित करने में लग जाए कि “मैं नक्सल नहीं हूं”. वह दिन जा चुका है. सब जानते हैं यह चुप कराने के लिए, डराने के लिए कही जा रही बात है. अब हम डरेंगे नहीं, चुप नहीं रहेंगे, अपनी बात कहेंगे.
प्रसून आचार्य : जैसे अमेरिका में बर्नी सैंडर्स या जोहरान ममदानी कुछ भी कहें, तो डोनाल्ड ट्रंप उन्हें कम्युनिस्ट करार देते हैं, अगर वे आम जनता, गरीबों या अल्पसंख्यकों की बात करें. तो क्या यहां भी वही फाॅर्मूला अपनाया जा रहा है?
दीपंकर भट्टाचार्य : बिलकुल. वहां मैकार्थी के जमाने से ही वामपंथ, समाजवाद, कम्युनिज्म को एक तरह का जुर्म मानकर देखा जाता रहा है. हिंदुस्तान में तो और भी ज्यादा हो रहा है. सिर्फ नक्सलपंथी कहने भर की बात नहीं, “आजादी” के नारे को भी यह कहकर पेश किया जा रहा है कि जो “आजादी” कहेगा, उसे जेल में डाल दिया जाएगा. एक आजाद देश में लोग आजादी की बात न करें तो क्या गुलामी का जश्न मनाएं?
यह “आजादी” वाली बात, मेरा मानना है, “दिमागी नक्सल” से भी कहीं ज्यादा खतरनाक मामला है. “दिमागी” वाला दायरा फिर भी मान लें कि कुछ हद तक वामपंथियों तक सीमित है, लेकिन “आजादी”? हिंदुस्तान की आजादी की इतनी बड़ी विरासत है. जो भी आजादी की बात करे, उन सबको वे “देशद्रोही” कह रहे हैं. यह डराना, यह हौव्वा दिखाना एक बहुत बड़ा उद्योग बन चुका है. अमेरिका से भी बड़े स्तर पर हिंदुस्तान में ये हो रहा है.
और वे इसे “यह हिंदुस्तानी है, वह हिंदुस्तानी नहीं है” के तराजू पर तोलते हैं. एक ऐसा समीकरण बना दिया गया है, जिसमें मोदी को हिंदुत्व और हिंदुत्व को ही हिंदुस्तानियत के बराबर रख दिया गया है. इन्हें मिलाकर, सरकार का विरोध करते ही आप हिंदू-विरोधी, हिंदुस्तान-विरोधी बन जाते हैं. विरोध करते ही किसी न किसी तरह ठप्पा लग जाएगा, चाहे “नक्सल” कहकर, या बिना नक्सल कहे भी यूएपीए में, एनएसए में जेल भेज दिया जाएगा. बात एक ही है.
प्रसून आचार्य : बहुत वक्त दिया आपने, बहुत-बहुत शुक्रिया!