-- क्रिस हेजेज
( पश्चिमी मीडिया दोहरे मापदंड अपनाकर, सच को दबाकर, झूठी भाषा बोलकर, इजराइल के झूठ को बढ़ावा देकर और फिलिस्तीनियों को इंसान से कमतर दिखाकर गजा में जारी जनसंहार को आसान बनाता है.)
पश्चिमी मीडिया जनसंहार के लिए लोगों को रजामंद करता है. यह इजराइल के दशकों पुराने सैन्य कब्जे और रंगभेदी व्यवस्था को सामान्य और जायज बना देता है. यह अंतरराष्ट्रीय कानून के खुले उल्लंघन को नजरअंदाज कर देता है. यह लगातार इजराइल को पीड़ित बताने वाले झूठ को जिंदा रखता है. यह गजा में काम कर रहे फिलिस्तीनी पत्रकारों को बदनाम करता है और उनके काम को नकारता है, जबकि अक्टूबर 2023 से अगस्त 2025 के बीच इजराइल इनमें से कम से कम 220 पत्रकारों को मार चुका है. यह इजराइल की सख्त सेंसरशिप को चुपचाप मान लेता है. यह विदेशी पत्रकारों को गजा में घुसने न देने पर सिर्फ हल्की-सी नाराजगी जताता है, जबकि यह पाबंदी इजराइल के युद्ध-अपराधें को छिपाने का एक तरीका है. यह इजराइल के झूठों को हवा देता है, चाहे वो कटे सिर वाले बच्चों की कहानी हो या 7 अक्टूबर को इजराइली महिलाओं के साथ बड़े पैमाने पर यौन हिंसा का दावा, ताकि सच्चाई पर पर्दा पड़ा रहे.
गजा पर लिखते समय इस मीडिया की भाषा पर भी गौर कीजिए. क्रियाओं का इस्तेमाल अक्सर कर्मवाच्य में होता है. यानी वाक्य में कोई कर्ता ही नहीं होता. किसने किया, कोई जवाबदेह नहीं होता. ऐसा लगता है जैसे जनसंहार कोई इंसानी काम नहीं, बल्कि किसी ऊपर वाले की मर्जी से हुई कोई आपदा हो. मसलन भूकंप या सुनामी. ‘हिंसा का चक्र’ या ‘झड़प’ जैसे घिसे-पिटे जुमले और धुंधली, अस्पष्ट भाषा असलियत को तोड़-मरोड़कर पेश करती है और झूठ को सच का रूप देती है.
जाॅर्ज ऑरवेल ने चेतावनी दी थी, ‘अगर सोच भाषा को भ्रष्ट करती है, तो भाषा भी सोच को भ्रष्ट कर सकती है.’
फिलिस्तीनियों के बारे में मीडिया रिपोर्टों से ‘जनसंहार’, ‘जुल्म’, ‘जातीय सफाया’ और ‘कब्जे वाले इलाके’ जैसे शब्द मानो जादू से गायब हो जाते हैं. इसके उलट, फिलिस्तीनी प्रतिरोध को अक्सर ‘जंगली’ और ‘बर्बर’ बताया जाता है. न्यूयाॅर्क टाइम्स के पत्रकारों को संपादकों की ओर से निर्देश दिए जाते हैं कि फिलिस्तीनियों का जिक्र करते समय ‘फिलिस्तीन’, ‘जनसंहार’, ‘कत्लेआम’, ‘शरणार्थी शिविर’, ‘मार-काट’ और ‘सामूहिक हत्या’ जैसे शब्दों से बचें.
मीडिया इजराइल जो कुछ उसे परोसता है, उसे बिना सवाल किए दोहरा देता है. लगातार बड़े पैमाने की बमबारी से पूरा इलाका तबाह करना ‘सर्जिकल एयर स्ट्राइक’ बन जाता है. इजराइल द्वारा भूख को हथियार बनाने को ‘खाने की कमी’ बताया जाता है. निहत्थे नागरिकों, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं, की हत्या को ‘झड़प’ कह दिया जाता है. पहाड़ियों पर बने यहूदी उपनिवेशवादियों के किले जैसे ठिकानों को ‘मुहल्ले’ कहा जाता है. किसी पत्रकार या डाॅक्टर की खुलेआम हत्या को ‘मौत हो गई’ कहकर टाल दिया जाता है.
जनसंहार को ‘इजराइल-हमास जंग’ कहकर पेश करते हुए उसे ‘आत्मरक्षा’ के नाम पर जायज ठहराया जाता है, यह कहते हुए कि इजराइल को ‘अपनी हिफाजत का अधिकार’ है. जब स्कूल, अस्पताल, क्लीनिक, एंबुलेंस, मस्जिदें, चर्च और दूसरे नागरिक ठिकाने पूरी तरह तबाह कर दिए जाते हैं, तो उन्हें ‘हमास के कमांड सेंटर’ बता दिया जाता है. जबकि इजराइल खुद ऐसा लगातार करता रहा है. उसकी सेना हिरासत में लिए गए फिलिस्तीनियों को बांधकर ऐसे घरों और सुरंगों में सबसे आगे भेजती रही है, जिनमें विस्फोटक लगाए जाने की आशंका होती है. यानी फिलिस्तीनी नागरिकों को अपनी सेना के लिए इंसानी ढाल बनाया जाता है.
जब हमास के कब्जे में इजराइली लोग होते हैं, तो उन्हें ‘बंधक’ कहा जाता है, भले ही वे इजराइली सेना में काम कर रहे हों. लेकिन जब फिलिस्तीनियों को, यहां तक कि बच्चों को भी, बिना किसी आरोप या मुकदमे के हिरासत में लिया जाता है और इजराइली हिरासत केंद्रों में गायब कर दिया जाता है, जहां यातना ‘व्यापक’ और ‘व्यवस्थित’ है, तो उन्हें ‘कैदी’ कहा जाता है.
तंबुओं में बने शरणार्थी शिविरों या अस्पतालों पर मिसाइल हमलों का दोष फिलिस्तीनी लड़ाकों के ‘भटके हुए राॅकेट’ पर मढ़ दिया जाता है. अगर इजराइल कभी-कभार, बहुत कम, यह मान भी लेता है कि हमला उसी ने किया, तो उसे ‘दुखद गलती’ कहा जाता है.
गजा की नागरिक संस्थाओं को ‘हमास द्वारा संचालित’ बताकर उनके द्वारा दी गई सूचनाओं की विश्वसनीयता पर शक पैदा किया जाता है. न्यूयाॅर्क टाइम्स अक्सर गजा के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के साथ यह जोड़ देता है कि वह ‘नागरिकों और लड़ाकों में फर्क नहीं करता.’ इस तरह हजारों-हजार नागरिकों के कत्लेआम की असल तस्वीर धुंधली कर दी जाती है.
इसका नतीजा पत्रकारिता के इतिहास की सबसे उलझी हुई और बेतुकी भाषा में सामने आता है. इसका एक उदाहरण 5 नवंबर 2023 को न्यूयाॅर्क टाइम्स की वह हेडलाइन है: ‘गजावासियों के मुताबिक हवाई हमले से हुए धमाकों में घनी आबादी वाले इलाके में कई लोग हताहत.’ यानी किसने हमला किया, यह बताने वाला कोई कर्ता ही नहीं है. बस धमाके हुए’ और लोग मारे गए.
मैंने अपने लेख ‘द बिट्रेयल ऑफ फिलिस्तीनियन जर्नलिस्ट्स’ में पूछा था, “जब ‘मिडिल ईस्ट आई’ के पत्रकार मोहम्मद सलामा और अहमद अबू अजीज, राॅयटर्स के फोटो-पत्रकार हुसाम अल-मसरी और फ्रीलांसर मोआज अबू ताहा व मरियम दग्गा, जिन्होंने ‘एसोसिएटेड प्रेस’ समेत कई मीडिया संस्थानों के साथ काम किया था, नासिर मेडिकल काॅम्प्लेक्स पर हुए ‘डबल टैप’ हमले में मारे गए, जिसका मकसद पहले हमले में घायलों को बचाने आए लोगों को भी मार डालना होता है, तो पश्चिमी न्यूज एजेंसियों ने इस पर क्या कहा?”
एसोसिएटेड प्रेस ने रिपोर्ट किया, “इजराइली फौज का कहना है कि गजा के अस्पताल पर हमला हमास के कैमरे को निशाना बनाकर किया गया था.”
सीएनएन ने लिखा, “आईडीएफ का दावा, अस्पताल पर हमला हमास के कैमरे को निशाना बनाकर किया गया.”
जबकि वह कैमरा राॅयटर्स का था, और राॅयटर्स ने साफ कहा कि इजराइल को ‘पूरी तरह पता था’ कि उसकी न्यूज एजेंसी वहीं से फिल्मांकन कर रही थी.
मैंने आगे पूछा, ‘जब अल जजीरा के पत्रकार अनस अल-शरीफ और तीन अन्य पत्रकार 10 अगस्त को अल शिफा अस्पताल के पास अपने मीडिया टेंट में मारे गए, तो पश्चिमी मीडिया ने इसे कैसे दिखाया?’
राॅयटर्स ने अपनी स्टोरी का टाइटल दिया, ‘इजराइल ने अल जजीरा के उस जर्नलिस्ट को मार डाला जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वह हमास लीडर था,’ जबकि अल-शरीफ 2024 का पुलित्जर प्राइज जीतने वाली राॅयटर्स टीम का हिस्सा था.
जर्मन अखबार बिल्ड ने अपने फ्रंट पेज पर हेडलाइन दीः ‘पत्रकार के भेस में आतंकवादी गजा में मारा गया.’
असल राद अपनी किताब ‘डोंट से पैलेस्टाइन: हाउ द मीडिया मैन्युफैक्चर्ड कंसेंट फाॅर जेनोसाइड’ में लिखती हैं, ‘मीडिया ने शब्दों के साथ इतनी बाजीगरी की कि आखिरकार शब्दों के मायने ही बदल दिए और वे अर्थहीन हो गए. मुख्यधारा के मीडिया ने इजराइल द्वारा बार-बार जंगबंदी तोड़े जाने को ‘उल्लंघन’ की भाषा में पेश करने से परहेज किया. इसके बजाय, खबरों का वही पुराना ढर्रा जारी रहा, जिसमें इजराइल के हमलों को जायज ठहराया जाता है और अपने कदमों को सही साबित करने के लिए इजराइल के दावों को बिना किसी सवाल के दोहराया जाता है. जब ‘जंगबंदी’ के दौरान भी फिलिस्तीनी मारे जाते रहे और राहत सामग्री जरूरत के मुताबिक या जितनी देने पर सहमति बनी थी, उतनी नहीं पहुंची, फिर भी पश्चिमी मीडिया ने इन खुले उल्लंघनों को ‘नाजुक जंगबंदी’ पर आई ‘चुनौतियों’ या ‘परीक्षा’ की तरह पेश किया. जब एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे प्रमुख मानवाधिकार संगठनों ने चेतावनी दी कि असल में जनसंहार खत्म नहीं हुआ है, तब भी पुराने और बड़े मीडिया संस्थान इसे ‘नाजुक जंगबंदी’ के साथ चल रहे जंग के रूप में ही पेश करते रहे.
शब्द मायने रखते हैं. शब्द ही कार्रवाइयों को जायज ठहराते हैं. अगर यह जनसंहार नहीं, सिर्फ आत्मरक्षा में लड़ा जा रहा युद्ध है, तो अमेरिका और उसके यूरोपीय साथियों को इजराइल को अरबों डाॅलर की सैन्य मदद देने का अधिकार बन जाता है. अगर यह मान लिया जाए कि युद्ध 7 अक्टूबर को हमास ने शुरू किया, तो गजा की बर्बादी और इजराइल के हाथों बड़े पैमाने पर हुए कत्लेआम पर अफसोस तो जताया जा सकता है, पर उसे हमास के हमले का ‘अफसोसजनक नतीजा’ कहकर बरी भी किया जा सकता है.
भाषा को इस तरह बिगाड़ने का मकसद वही है जिसकी ओर ऑरवेल ने इशारा किया था: जिसका बचाव किया ही नहीं जा सकता, उसका बचाव करना. ऑरवेल ने लिखा था:
“भारत में ब्रिटिश शासन जारी रखने, रूस में की गई सफाया अभियान और बड़े पैमाने पर निर्वासन, जापान पर परमाणु बम गिराने जैसी चीजों का बचाव किया जा सकता है. लेकिन ऐसा सिर्फ उन दलीलों के जरिए किया जा सकता है जो ज्यादातर लोगों के लिए इतनी क्रूर हैं कि उनका सामना करना मुश्किल है और जो राजनीतिक दलों के दावों से मेल भी नहीं खातीं. इसलिए राजनीतिक भाषा का बड़ा हिस्सा घुमा-फिराकर कहने, सवाल को ही जवाब की तरह पेश करने और जान-बूझकर अस्पष्ट भाषा से बनता है. निहत्थे गांवों पर हवाई बमबारी की जाती है, वहां के लोगों को गांवों से निकालकर खुले इलाकों में भगा दिया जाता है, मवेशियों को मशीनगनों से भून दिया जाता है और झोंपड़ियों को आग लगाने वाली गोलियों से जला दिया जाता है. इसे कहा जाता है ‘शांति कायम करना’. लाखों किसानों को उनकी जमीन और खेतों से लूट लिया जाता है और सड़कों पर इस तरह पैदल चलने को मजबूर किया जाता है कि वे उतना ही सामान साथ ले जा सकें, जितना अपने हाथों में उठा सकते हैं. इसे कहा जाता है ‘आबादी का स्थानांतरण’ या ‘सरहदों में सुधार’. लोगों को बिना मुकदमे के वर्षों तक जेल में रखा जाता है, या उनकी गर्दन के पीछे गोली मार दी जाती है, या उन्हें आर्कटिक के बर्फीले इलाकों में लकड़ी काटने वाले शिविरों में स्कर्वी की बीमारी से मरने के लिए भेज दिया जाता है. इसे कहा जाता है ‘अविश्वसनीय तत्वों का सफाया’.”
एडम जाॅनसन अपनी किताब ‘हाउ टू सेल अ जेनोसाइड: द मीडियाज कंप्लिसिटी इन द डिस्ट्रक्शन ऑफ गजा’ में न्यूयाॅर्क टाइम्स, वाॅशिंगटन पोस्ट, सीएनएन डाॅट काॅम, पाॅलिटिको, एक्सियोस, यूएसए टुडे और एपी के 12,000 से ज्यादा लेखों तथा सीएनएन व एमएसएनबीसी के 5,000 टीवी कार्यक्रमों का बारीकी से अध्ययन करते हैं. उनकी यह मेहनत से लिखी किताब ‘उदारवादी’ मीडिया के जनसंहार को जायज ठहराने के खेल को बेनकाब करती है.
सीएनएन और न्यूयाॅर्क टाइम्स ने अपने संपादकों और पत्रकारों को निर्देश दिया कि किसी हमले के लिए इजराइल को तभी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जब इजराइली सेना यानी आईडीएफ इसकी पुष्टि करे और हमले की जीपीएस लोकेशन भी उपलब्ध हो.
जाॅनसन सीएनएन के एक सूत्र का हवाला देते हुए लिखते हैं, “चाहे न्यूजरूम हो या घटनास्थल, किसी भी घटना को हम इजराइल पर तब तक मढ़ नहीं सकते थे जब तक हम उसे ‘धमाका’ कहने जैसी नामुमकिन शर्त पूरा न कर लें, यानी धमाके की जगह की जियोलोकेशन कर के उसके निर्देशांक इजराइल को भेजकर उनसे जवाब न मांग लें.” जाॅनसन से उनकी किताब पर ‘द इलेक्ट्राॅनिक इंतिफादा’ में हुई बातचीत भी देखी जा सकती है.
सीएनएन के पत्रकारों को इजराइल-फिलिस्तीन पर लिखी किसी भी रिपोर्ट को प्रसारण से पहले सीएनएन के जेरूसलम दफ्तर से मंजूरी लेनी पड़ती है. यह दफ्तर, इजराइल के बाकी सभी न्यूज दफ्तरों की तरह, इजराइली सैन्य सेंसरों की पाबंदियां मानने को मजबूर है.
सीएनएन और दूसरे बड़े पुराने मीडिया संस्थानों में दिखाई देने वाले गिने-चुने फिलिस्तीनियों से आम तौर पर, यहां तक कि उन्हें टीवी पर आने की इजाजत देने से पहले ही, पूछा जाता है कि क्या वे ‘हमास की निंदा’ करते हैं. जो मेहमान इजराइल की जरा-सी भी आलोचना करते हैं, उनसे पूछा जाता है कि क्या ‘इजराइल को अस्तित्व में रहने का अधिकार है.’
लेकिन किसी से कभी यह नहीं पूछा जाता कि क्या वे जायोनीवाद, रंगभेद, जातीय सफाए, जनसंहार या फिलिस्तीन के खिलाफ इजराइल के 100 साल पुराने युद्ध की निंदा करते हैं. न ही उनसे यह पूछा जाता है कि क्या फिलिस्तीनियों को अपनी रक्षा करने का अधिकार है, जबकि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उन्हें अपनी रक्षा करने का अधिकार है, जिसमें हथियारबंद प्रतिरोध भी शामिल है.
राॅबर्ट फिस्क ने ठीक कहा था कि हमारे पालतू बना दिए गए पत्रकार और न्यूज संस्थाएं ‘सत्ता की भाषा के कैदी’ हैं. वे सत्ता की बनाई हुई शब्दावली को बिना सवाल किए दोहराते हैं. इस वजह से वे सिर्फ प्रचारक ही नहीं रह जाते, बल्कि जनसंहार के साझेदार भी बन जाते हैं.
जनसंहार का विरोध करने वालों को, जिनमें विश्वविद्यालय परिसरों के छात्र भी शामिल हैं और इनमें बड़ी संख्या यहूदी छात्रों की भी है, ‘हमास समर्थक’ और ‘यहूदी-विरोधी’ कहकर बदनाम किया जाता है. पत्रकार कैंपस के हिलेल भवनों (यहूदी छात्र केंद्र) में बैठे जायोनी छात्रों को ढूंढ निकालते हैं, जो दावा करते हैं कि विरोध-प्रदर्शनों से उन्हें ‘अपनी सुरक्षा का डर’ है. मगर मुसलमानों के खिलाफ बढ़ती नफरत या छात्रा प्रदर्शनकारियों पर होने वाले दमन, यानी पुलिस की बर्बर हिंसा और 3,000 गिरफ्तारियों से लेकर निलंबन, प्रोबेशन, निष्कासन, डिग्री रोकना और सहानुभूति रखने वाले शिक्षकों की नौकरी छीनने तक, इस सब पर मीडिया की नजर मुश्किल से ही जाती है.
फिलिस्तीनी आजादी के नारे, जैसे ‘फ्रॉम द रिवर टू द सी, पैलेस्टाइन विल बी फ्री’ (नदी से समंदर तक, फिलिस्तीन आजाद होगा), और फिलिस्तीनी झंडे को भी अपराध घोषित कर दिया गया है.
इशारा साफ है: यहूदी जिंदगियां मायने रखती हैं. फिलिस्तीनी जिंदगियां नहीं.
इतिहासकार रशीद खालिदी, राॅबिन एंडरसन की किताब ‘द कंप्लिसिट लेंस: यूएस मीडिया कवरेज ऑफ इजराइल्स जेनोसाइड इन गजा’ की भूमिका में लिखते हैं, ‘संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों, सम्मानित मानवाधिकार संगठनों, मेडिकल जर्नलों और पेशेवर डाॅक्टरों की रिपोर्टों को आम तौर पर मुख्यधारा का मीडिया सम्मान देता है और उन्हें प्रमुखता से प्रकाशित करता है. लेकिन इस जंग में ऐसा नहीं है. अगर इन स्रोतों का जिक्र होता भी है, तो साथ में उतनी ही जगह इजराइल के पेशेवर प्रचारकों और अमेरिका में बैठे उसके अनगिनत हिमायतियों की घिनौनी बदनामी और झूठे इल्जामों को भी दी जाती है. जनसंहार का विरोध करने वाले लोगों को हमास का समर्थक या आतंकवाद-हमदर्द कहकर बदनाम करने के अलावा, इनका सबसे बड़ा हथियार है ‘एंटीसेमिटिज्म (यहूदी-विरोध) जैसे संगीन इल्जाम का व्यवस्थित तरीके से गलत इस्तेमाल.’
मुख्यधारा मीडिया से पाठकों और दर्शकों का बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया की तरफ जाना, जहां खबरें इजराइल लाॅबी, अमेरिकी सरकार या बड़ी कंपनियों के हिसाब से छांटी नहीं जातीं, इस बात का साफ सुबूत है कि मुख्यधरा मीडिया दिवालिया हो चुका है. इसके जवाब में फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स, यूट्यूब और टिकटाॅक जैसी सोशल मीडिया कंपनियों ने ‘प्लेटफाॅर्मसाइड’ शुरू कर दिया है, यानी एल्गोरिदम के जरिए खबरों की पहुंच सीमित करन; शैडो बैनिंग के जरिए बिना बताए पोस्ट की पहुंच रोकन; लाइव स्ट्रीमिंग पर पाबंदियां लगाना और अकाउंट बंद करना, ताकि फिलिस्तीन से जुड़ी रिपोर्टिंग ज्यादा से ज्यादा लोगों तक न पहुंच सके.
यह सेंसरशिप जनता से जनसंहार की भयावह सच्चाई छिपाने की एक सुनियोजित कोशिश का हिस्सा है.
7 अक्टूबर का बार-बार जिक्र करके पश्चिमी मीडिया जनसंहार को उसके पूरे ऐतिहासिक संदर्भ से काट देता है. यह गजा पर इजराइल की 19 साल से चली आ रही लंबी नाकाबंदी को नजरअंदाज करता है. पश्चिमी मीडिया में 7 अक्टूबर को ‘बिना उकसावे’ हुआ हमला बताया जाता है. लेकिन 2008 और 2009 की सर्दियों में गजा में निहत्थे फिलिस्तीनियों पर इजराइल द्वारा किए गए कत्लेआम, 2012 और 2014 में गजा पर उसके हमले और 2018-19 के ‘ग्रेट मार्च ऑफ रिटर्न’ के दौरान की गई हिंसा को भुला दिया जाता है.
1948 की नकबा, जब यूरोपीय जायोनियों ने ऐतिहासिक फिलिस्तीन की 78 फीसदी से ज्यादा जमीन पर कब्जा कर हड़प ली, 7 लाख 50 हजार से ज्यादा फिलिस्तीनियों को जबरदस्ती बेदखल किया, 530 से ज्यादा फिलिस्तीनी गांव तबाह किए और 15,000 फिलिस्तीनियों की हत्या की, उसका भी शायद ही कभी जिक्र होता है. 1948 में अपने घरों से बेदखल किए गए लोगों में से 70 फीसदी को गजा जाने पर मजबूर किया गया था.
जायोनी परियोजना की पूरी बुनियाद ही इतिहास को जान-बूझकर भुला देने पर टिकी है.
एंडरसन अपनी किताब में लिखती हैं, ‘एक बार जब हमास को एक ऐसा क्रूर, आतंकवादी गुट साबित कर दिया गया जिसके सदस्य बिना किसी अफसोस के बच्चों को यातना देते, टुकड़े-टुकड़े करते और उनके सिर काटते हैं, तो फिर किसी और सफाई की जरूरत नहीं रह जाती. मीडिया ने इजराइल के हिंसा भरे इतिहास को रिपोर्ट करने से जान-बूझकर परहेज किया, और नतीजे में मुख्यधारा मीडिया ने फिलिस्तीनियों की रोजमर्रा की जिंदगी की हालत को भी नजरअंदाज कर दिया.’
गजा में फिलहाल जंगबंदी होने का झूठा दावा भी पश्चिमी मीडिया के लिए गजा से मुंह मोड़ने का बहाना बन गया है. जिस जंगबंदी के लागू होने की बात कही जा रही है, उसके बाद से ही इजराइल कम-से-कम 1,286 फिलिस्तीनियों को मार चुका है और 4,257 को घायल कर चुका है. जनसंहार से इनकार करने का यह रवैया शुरुआत से ही पश्चिमी मीडिया की रिपोर्टिंग की पहचान रहा है. यह न सिर्फ इजराइल के अपराधें को छिपाता है, बल्कि इजराइल की उस मंशा को भी ढंकता है जिसके तहत वह गजा से सारे फिलिस्तीनियों का जातीय सफाया कर पूरी तरह खदेड़ना चाहता है. इस तरह अंतरराष्ट्रीय कानून को भी लगभग बेअसर बना दिया जाता है, और पत्रकारिता के पेशे का मजाक बनाकर रख दिया जाता है.
जब यह जातीय सफाया अपने आखिरी मुकाम तक पहुंचेगा, तब भी मुझे पूरा यकघन है कि पश्चिमी मीडिया हम पर इजराइली प्रचार, घुमा-फिराकर इस्तेमाल किए गए शब्दों और घिसे-पिटे जुमलों की बौछार करता रहेगा.
वो जनसंहार को आखिरी तक जायज ठहराता रहेगा.