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2047 का भारत: न्यायपालिका की जमीनी हकीकत और आम आदमी के लिए न्याय

2047 का भारत: न्यायपालिका की जमीनी हकीकत और आम आदमी के लिए न्याय

-- जस्टिस डाॅ. एस. मुरलीधर

[ पिछले 24 अगस्त को 28वें दत्तात्रेय श्रीनिवास बोरकर स्मृति व्याख्यान को संबोधित करते हुए जस्टिस मुरलीधर ने कहा कि जंतर-मंतर पर ‘जेन-जी’  के नेतृत्व में हुए हालिया छात्र आंदोलन भारतीय लोकतंत्र के जुझारूपन को दर्शाते हैं, साथ ही उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के खिलाफ आपराधिक कानूनों के इस्तेमाल पर गहरी चिंता जताई. उन्होंने रेखांकित किया कि एक ‘निरंकुश राज्य’ की ज्यादतियों से नागरिकों की हिफाजत करने के मामले में न्यायपालिका का रिकाॅर्ड असंगत और कई बार बेहद निराशाजनक रहा हैऋ इसलिए 2047 के भारत की ओर बढ़ते हुए संवैधानिक मूल्यों, न्यायिक जवाबदेही और हर नागरिक तक न्याय की आसान पहुंच को मजबूत करना बेहद जरूरी है. प्रस्तुत है व्याख्यान के सम्पादित अंश ]

आज मैं इस विषय में थोड़ा बदलाव करके इसे ‘2047 के भारत की कुछ तस्वीरें’ कहना चाहूंगा. आजादी के पिछले 77-78 सालों का अनुभव यही बताता है कि आने वाले 20 सालों की कोई एक तय तस्वीर खींचना मुमकिन नहीं है.

आज मैं मुख्य रूप से अपनी अदालत और न्यायिक व्यवस्था पर बात करूंगा. खास तौर पर कचहरियों के अंदरूनी कामकाज और प्रशासनिक व्यवस्था पर, जिस पर आमतौर पर बात नहीं होती.

हकीकत यह है कि जो टूटी-फूटी औपनिवेशिक कानूनी व्यवस्था हमें अंग्रेजों से विरासत में मिली थी, वह आज भी वैसी ही टूटी-फूटी है. 18वीं सदी के अंत में जब अंग्रेजों ने यह व्यवस्था लागू की, तो कुछ ही दिनों में यह पंगु हो गई. काॅर्नवालिस ने 1790 में अफसरों के हाथों में सारी कमान सौंपी, पर अफसर खुलेआम रिश्वत खाने लगे, मुकदमों में तारीख-पर-तारीख का खेल शुरू हुआ, जेलें खचाखच भर गईं और वहां की हालत नारकीय हो गई. यह सब आज भी हमारे लिए कोई नई बात नहीं है.

1833 में विलियम बेंटिंक के दौर में भी यही माना गया कि सस्ता और तेजी से न्याय दिलाने का सपना फेल हो गया है. 1923 में भी यही सवाल उठा और 1958 में जब देश के पहले अटाॅर्नी जनरल एम. सी. सीतलवाड़ की अगुवाई में विधि आयोग बैठा, तो वही पुराना सवाल सामने था: क्या हमें इस पुरानी व्यवस्था को बदलना चाहिए या अपने पारंपरिक तरीकों की तरफ लौटना चाहिए? तब भी फैसला यही हुआ कि मौजूदा ढर्रे में ही थोड़े-बहुत पैबंद लगा दिए जाएं.

1992 में जस्टिस कृष्णा अय्यर ने अपने खास अंदाज में कहा था कि एक आम आदमी के लिए अदालत की यह प्रक्रिया एक ऐसी पहेली और भूलभुलैया है जिसकी भाषा समझ से परे है, जहां फैसले लाॅटरी की तरह निकलते हैं, जहां सुस्ती, भारी खर्चा, तकनीकी दांव-पेंच और तानाशाही का बोलबाला है.

आज इतने दशकों बाद भी हम उन्हीं बुनियादी मुश्किलों से जूझ रहे हैं: मुकदमों का अंबार, जजों की भारी कमी, बेहिसाब खर्च, भारी अनिश्चितता और तारीख पर तारीख.

जमीनी हकीकत

पहले जिला और निचली अदालतों को देखिए. हमारे जिला न्यायालयों में 4.4 करोड़ से ज्यादा मुकदमे लटके पड़े हैं, जिनमें से 80 फीसदी मामले आपराधिक (फौजदारी) हैं. हर महीने लगभग 29 लाख नए मुकदमे दर्ज होते हैं और जज केवल 24 लाख मुकदमों का ही निपटारा कर पाते हैं. जजों के हजारों पद खाली पड़े हैं. हमारे देश में एक-एक जिला जज पर औसतन 2,200 से ज्यादा मुकदमों का बोझ है. हर साल नए मुकदमों के आने और पुराने के निपटने की रफ्तार ऐसी है कि कुल पेंडेंसी लगभग जस की तस बनी रहती है. निचली अदालतें मानो उसी जगह खड़े रहने के लिए पागलों की तरह दौड़ रही हैं.

हाई कोर्टों का हाल भी अलग नहीं है. वहां 60 लाख से ज्यादा मामले अटके हैं. स्वीकृत पदों के मुकाबले सैंकड़ों जजों की कुर्सियां खाली हैं. जहां 1,500 मुकदमों का बोझ होना चाहिए, वहां एक जज के सिर पर औसतन 8,000 मुकदमों का भारी बोझ है.

सुप्रीम कोर्ट में भी 80,000 से ज्यादा मामले पेंडिंग हैं. वहां एक जज पर 2,400 से ज्यादा मुकदमों का बोझ है, जो दुनिया के किसी भी सुप्रीम कोर्ट के जज से कहीं ज्यादा है. हर सोमवार और शुक्रवार को एक जज को कम से कम 60-70 मुकदमों की फाइलें घोटनी पड़ती हैं. यह दिमाग और दिल दोनों पर कितना बड़ा तनाव है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.

यह सही है कि मुकदमों के बोझ के मामले में हमारी न्यायपालिका दुनिया में सबसे आगे है. लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि जो जज काम कर रहे हैं, वे अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा पिस रहे हैं.

वकीलों की भारी फौज, फिर भी जजों की कमी क्यों?

देश में 20 लाख से ज्यादा वकील हैं, फिर भी अदालतों के लिए सही जज क्यों नहीं मिल पा रहे?

जिला अदालतों में जूनियर स्तर पर तो नई पीढ़ी के लड़के-लड़कियां आ रहे हैं, जिनमें महिला वकीलों की तादाद अच्छी-खासी बढ़ रही है. लेकिन सीनियर डिवीजन में, जहां 25 फीसदी सीटें अनुभवी वकीलों की सीधी भर्ती से भरी जानी होती हैं, वहां साल-दर-साल पद खाली रह जाते हैं.

मुझे दिल्ली हाई कोर्ट के अपने साथी जस्टिस मदन लोकुर का एक वाकया याद आता है. वे जजों के इंटरव्यू लेकर लौटे तो उन्होंने एक उम्मीदवार का फाॅर्म दिखाया. उसमें एक काॅलम था: ‘आप जिन लोगों को जानते हैं उनके नाम लिखें.’ उस वकील साहब ने पहला नाम लिखा था: ‘नरेंद्र मोदी, प्रधनमंत्री’.

जस्टिस लोकुर ने पूछा, ‘आप मोदी जी को जानते हैं, पर क्या वे आपको जानते हैं?’

उसने कहा, ‘सर, सवाल तो सिर्फ यह था कि मैं किसे जानता हूं.’

जस्टिस लोकुर ने मजाक में कहा, ‘फिर तो आप राष्ट्रपति का नाम भी लिख सकते थे!’

उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, ‘सर, मेरे भाई ने अपने फाॅर्म में राष्ट्रपति का नाम ही लिखा है, वह बाहर अपनी बारी का इंतजार कर रहा है.’

यह हमारे यहां की कानूनी पढ़ाई के स्तर और जिला स्तर के वकीलों की समझ पर एक बड़ा सवालिया निशान है.

हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति का कोलेजियम सिस्टम भी पूरी तरह पारदर्शी नहीं बन पाया है. इसमें अक्सर सरकार की दखलंदाजी और देरी देखने को मिलती है. जजों के रिटायर होने की तारीख पहले से तय होती है, फिर भी उनके जाने से पहले नए जज का नाम तय नहीं हो पाता. केवल स्वीकृत पद बढ़ा देने से कुछ नहीं होगा जब तक भर्ती की प्रक्रिया पारदर्शी और तेज न हो.

अदालतें कार बनाने की फैक्ट्री नहीं हैं

अदालतों को फैक्ट्री की असेंबली लाइन नहीं समझा जा सकता जहां मुकदमों का निपटारा कारें बनाने जैसा हो. हर दर्ज मुकदमा असल में पेंडिंग नहीं होता; उसे सुनवाई के लायक बनने में कई चरणों से गुजरना पड़ता है. एक कत्ल के मुकदमे की तुलना मामूली चालान या एक्सीडेंट के केस से नहीं हो सकती.

इसके अलावा, करोड़ों मुकदमों में से लाखों ऐसे हैं जो कागजों पर ‘जिंदा’ हैं पर असल में मर चुके हैं. कहीं पार्टियां मर चुकी हैं, कहीं विवाद की वजह ही खत्म हो चुकी है, तो कहीं कानून बदल चुका है.

जब मैं उड़ीसा हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस था, मैंने देखा कि जंगलात कानून और आबकारी के 30,000 से 40,000 ऐसे मुकदमे चल रहे थे जहां 5 किलो से ज्यादा सूखी लकड़ी बीनने पर या 5 लीटर महुआ की कच्ची शराब रखने पर गरीबों पर केस ठोके गए थे. ये नियम 70 साल पुराने थे और अदालतें इन्हीं से भरी पड़ी थीं. हमने सरकार से बात करके सीमाएं थोड़ी बढ़वाईं और एक झटके में 30,000 से ज्यादा बेकार मुकदमे बंद हो गए.

अगर हम युवा कानून के छात्रों और रिटायर्ड अफसरों की मदद से रिकाॅर्ड रूम की खाक छानें और ऐसे मरे हुए मुकदमों की छंटनी कर दें, तो असली मुकदमों की संख्या बहुत घट जाएगी.

जजों की अंदरूनी परेशानियां और प्रशासनिक बोझ

अक्सर लोग सोचते हैं कि जज कम काम करते हैं, लेकिन सच यह है कि 20 से 30 फीसदी जज पूरी ईमानदारी, मेहनत और लगन से मुकदमों का भारी बोझ खींच रहे हैं. एक जज को हर रोज दर्जनों केस निपटाने के बाद भी शाम को पहले से ज्यादा फाइलों के अंबार का सामना करना पड़ता है, जहां बदमिजाज वकीलों और वादियों की बदसलूकी, बेबुनियाद शिकायतों और मीडिया के तीखे दबाव के बीच काम करना उनकी मजबूरी बन जाता है. इसके साथ ही उस गहरे मानसिक तनाव का अंदाजा लगाइए, जहां एक फैमिली कोर्ट के जज को रोज पांच साल के मासूम बच्चे से पूछना पड़ता है कि ‘तुम मां के साथ जाओगे या बाप के साथ?’ और वह बच्चा पलटकर यह चुभता हुआ सवाल दाग देता है कि ‘मैं क्यों चुनूं?’

जब मैं 2006 में नया जज बना, तो मेरे सीनियर साथी जस्टिस मुकुल मुद्गल थे. एक दिन शाम को मैं अपना लिखा एक फैसला दिखाने उनके कमरे में गया, तो देखा कि वे हाथ में प्लास्टिक का एक मग लिए बैठे हैं. मैंने पूछा, ‘यह क्या हो रहा है?’ वे हंसकर बोले, ‘बाल्टी और मग कमेटी की मीटिंग!’ यानी हाई कोर्ट के तीन जज बैठकर यह तय कर रहे थे कि कचहरी के लिए कौन से तौलिए, बाल्टियां और मग खरीदे जाएं.

निचली अदालतों के जजों की हालत और भी खराब है. वे पूरी तरह स्थानीय पुलिस और प्रशासन के रहमोकरम पर निर्भर हैं. अगर पुलिस गवाह और मुल्जिम को पेश न करे, तो जज कुछ नहीं कर सकता.

सुधार के खोखले रास्ते और तकनीक की सीमाएं

हमने फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाए, ट्रिब्यूनल बनाए, पर नतीजा क्या निकला? वही पुराने जज, वही वकील और वही काम करने का ढर्रा. प्रोफेसर मार्क गैलैंटर ने ठीक कहा था कि ट्रिब्यूनल बनाना हाईवे के ट्रैफिक को बाईपास पर मोड़ने जैसा है; कुछ ही समय में वह बाईपास भी जाम हो जाता है और सारा ट्रैफिक वापस हाईवे पर आकर अटक जाता है.

लोक अदालतों में अक्सर गरीब आदमी की मजबूरी, मुकदमों के खर्च और देरी का फायदा उठाकर उसे कम पैसे में समझौता करने पर मजबूर कर दिया जाता है. जिसे 20 लाख मिलना चाहिए, वह 10-15 साल की थकान के बाद 5 लाख में समझौता कर लेता है, और न्यायपालिका इसे अपनी ‘उपलब्धि’ मानती है.

कंप्यूटर और डिजिटलाइजेशन की बात करें तो बजट की कोई कमी नहीं है, अक्सर पैसा बिना खर्च किए वापस लौट जाता है. लेकिन बुनियादी ढांचा कमजोर है: बिजली गुल रहती है, इंटरनेट गायब रहता है और ई-फाइलिंग के बाद भी वकीलों से कागज की भारी फाइलें जमा करने को कहा जाता है.

2047 का भारत कैसा होना चाहिए?

अगर हम 2047 के भारत को सचमुच बेहतर बनाना चाहते हैं, तो हमें कुछ कड़े कदम उठाने होंगे, जहां कानूनी व्यवस्था को जजों और वकीलों की सहूलियत के बजाय आम मुवक्किल के नजरिए से बदलना सबसे पहली प्राथमिकता बने. बाबासाहेब डाॅ. भीमराव अंबेडकर ने 26 जनवरी 1950 को चेतावनी दी थी कि हम अंतर्विरोधों के जीवन में प्रवेश कर रहे हैं, और आजादी के इतने सालों बाद भी सत्ता में बैठे लोग उस संवैधानिक नैतिकता को लगातार चोट पहुंचा रहे हैं, जबकि संविधान का मुख्य काम सरकार की मनमानी पर लगाम लगाना है और अदालत का फर्ज सत्ता के आगे झुकने के बजाय कमजोर नागरिक और ताकतवर राज्य के बीच एक मजबूत ढाल बनकर खड़ा होना है. इसके साथ ही ऊपर से थोपे गए जनविरोधी कानूनों पर रोक लगनी चाहिए और इंसान की निजी आजादी – वह किससे शादी करे, किसके साथ रहे, क्या पहने या क्या खाए – को अपराध बनाना तुरंत बंद होना चाहिए, ताकि सरकार की आलोचना करने, कार्टून बनाने या शांतिपूर्ण आवाज उठाने पर लोगों को जेलों में ठूंसना बंद हो और यूएपीए (UAPA) व पीएमएलए (PMLA) जैसे दमनकारी कानून व बिना सुनवाई जेल में सड़ाने वाले कठोर प्रावधान 2047 तक केवल इतिहास और संग्रहालयों की चीज बनकर रह जाएं. 2047 के ऐसे भारत में हाथ से मैला उठाना, सीवर में इंसानों का उतरना, बच्चों का कूड़ा बीनना, बंधुआ मजदूरी, बाल श्रम, माॅब लिंचिंग और धर्म-जाति के नाम पर होने वाले तमाम जुल्मों का नामोनिशान मिट जाना चाहिए.

आइए 24 अगस्त 2047 की एक ऐसी शाम का सपना देखें जहां पड़ोसियों से अमन हो, शहरों की हवा और गंगा-जमुना का पानी साफ हो और हमारे समाज की विविधता व रंग पूरी तरह सुरक्षित रहें, लेकिन इस हसीन सपने के बीच जमीनी हकीकत हमें यह भी याद दिलाएगी कि यह अपना ही भारत है, जहां सड़कों पर वही थोड़ा-बहुत ट्रैफिक जाम और देसी जुगाड़ होगा और किसी कचहरी में वकील हड़ताल पर बैठे होंगे. उसी अदालत के एक कोने में वकीलों की भारी-भरकम अंग्रेजी और कानूनी दांव-पेंच से बेबस एक बुजुर्ग मुवक्किल खड़ा होगा, जो अपने वकील के न आने से तंग आकर खुद हाथ जोड़कर अपनी सीधी-सादी मातृभाषा में जज के सामने गुहार लगाएगा, और जब जज साहब पूछेंगे कि ‘क्या कोई कानूनी मदद चाहिए?’, तो वह बुजुर्ग हैरान होकर बस इतना ही कहेगा: ‘नहीं साहब, मदद नहीं... सिर्फ न्याय चाहिए.’

https://thebarbulletin.com/justice-muralidhar-urgent-judicial-reforms-india-2047/

29 August, 2026