वर्ष 35 / अंक - 24 / मोदी का नया भारत: 1% मालामाल, 99% बदहाल

मोदी का नया भारत: 1% मालामाल, 99% बदहाल

मोदी का नया भारत: 1% मालामाल, 99% बदहाल

-- पर्यवेक्षक

अंग्रेजों से भी ज्यादा आर्थिक असमानता मोदी राज में

थाॅमस पिकेटी दुनिया के उन गिने-चुने और सबसे प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों में से एक हैं, जिन्होंने आर्थिक असमानता के विषय पर वैश्विक बहस की दिशा बदल दी है. ‘वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब’ के सह-निदेशक के रूप में, पिकेटी अपने कठोर डेटा-आधारित रिसर्च के लिए जाने जाते हैं. मार्च 2024 में, पिकेटी और उनके सहयोगी शोधकर्ताओं (नितिन कुमार भारती, लुकास चांसल आदि) ने भारत की अर्थव्यवस्था पर एक ऐतिहासिक और आंखें खोल देने वाली रिपोर्ट प्रकाशित की. इस रिपोर्ट का शीर्षक था – ‘भारत में आय और संपत्ति की असमानता (1922-2023): द राइज ऑफ द बिलियनेयर राज’.

इस रिपोर्ट ने सीधे तौर पर भारत के ‘आर्थिक चमत्कार’ के राजनीतिक दावों की धज्जियां उड़ा दीं. रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि आज का भारत अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासनकाल से भी अधिक असमान हो चुका है:

टाॅप 1% का पूरे देश पर कब्जा

2022-23 के आंकड़ों के अनुसार, भारत की कुल राष्ट्रीय संपत्ति का 40.1% हिस्सा देश के केवल टाॅप 1% अति-अमीरों के पास है. इसी तरह, देश की कुल राष्ट्रीय आय का 22.6% हिस्सा भी सिर्फ इसी 1% वर्ग की जेब में जा रहा है. भारत में असमानता की दर आज अमेरिका, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों को भी पीछे छोड़ चुकी है.

0.001% का खौफनाक सच

रिपोर्ट का सबसे डरावना हिस्सा यह है कि भारत के सबसे अमीर 10,000 लोग (जो आबादी का सिर्फ 0.001% हैं), उनके पास देश की कुल दौलत का 17% हिस्सा है. इन 10,000 लोगों के पास इतनी अकूत दौलत है, जो भारत की नीचे की 50% आबादी (यानी लगभग 46 करोड़ लोगों) की कुल संपत्ति से करीब तीन गुना ज्यादा है.

अरबपतियों की फैक्ट्री बना भारत 

1991 के उदारीकरण के समय भारत में सिर्फ 1 अरबपति था. लेकिन पिछले एक दशक में यह आंकड़ा राॅकेट की तरह उड़कर 162 अरबपतियों को पार कर गया.

पिकेटी की यह रिपोर्ट कोई राजनीतिक बयानबाजी नहीं है. यह एक अकाट्य आर्थिक साक्ष्य है जो बताता है कि पिछले एक दशक में भारत में जो भी ‘विकास’ हुआ है, वह पूरी तरह से कुछ मुट्टीभर लोगों को सबकुछ सौंप देने के माॅडल पर आधारित रहा है.

मोदी राज का आर्थिक ढांचा: धन का क्रूर और नीतिगत हस्तांतरण

सवाल यह उठता है कि सिर्फ 10-12 सालों में ऐसा क्या हुआ कि देश की 80 करोड़ जनता तो 5 किलो मुफ्त राशन की लाइन में लग गई, लेकिन इन मुट्टी भर काॅरपोरेट्स की दौलत हजारों गुना बढ़ गई?

इसका सीधा जवाब उन नीतियों में छिपा है, जिन्हें ‘आर्थिक सुधार’ कहकर लागू किया गया. पिछले एक दशक में भारत में एक ऐसा एकाधिकारवादी ढांचा तैयार किया गया, जिसने बाजार की प्राकृतिक प्रतिस्पर्धा को कुचल दिया और सारे संसाधन चंद काॅरपोरेट घरानों की झोली में डाल दिए.

काॅरपोरेट टैक्स में भारी कटौती और जनता पर बोझ

2019 में सरकार ने काॅरपोरेट्स का टैक्स 30% से घटाकर 22% कर दिया. इससे सरकारी खजाने को सालाना लगभग 1.45 लाख करोड़ रुपये का घाटा हुआ. कंपनियों ने इस बचे हुए पैसे से देश में कोई नया रोजगार पैदा नहीं किया, बल्कि अपना पुराना कर्ज चुकाया और शेयरधारकों को लाभांश बांटे. इस भारी घाटे की भरपाई कैसे हुई? आम आदमी के पेट्रोल-डीजल पर अंधाधुंध एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर और रोजमर्रा की जरूरत की चीजों पर जीएसटी थोपकर. यानी गरीबों से वसूला गया टैक्स अमीरों की बैलेंस शीट मजबूत करने में लगा दिया गया.

छोटे कारोबारियों का खामोश पतन

एक तरफ काॅरपोरेट्स के वारे-न्यारे हो रहे थे, दूसरी तरफ देश की अर्थव्यवस्था की असली रीढ़ – एमएसएमई और खुदरा सेक्टर – को नीतियों के भारी झटकों ने तबाह कर दिया.

आज जमीनी हकीकत यह है कि पूंजी के घोर अभाव और असमान प्रतिस्पर्धा के कारण अनगिनत छोटी-मंझोली कंपनियों को अपने ऑपरेशंस पूरी तरह से बंद करने को मजबूर होना पड़ा है. जिन व्यापारियों का बिजनेस किसी सरकारी ठेके पर नहीं, बल्कि सीधे बाजार और ग्राहकों पर निर्भर था, उनकी कमर टूट चुकी है. जहां बड़े काॅरपोरेट्स आसानी से 7% की दर पर बैंकों से हजारों करोड़ का लोन ले लेते हैं, वहीं एक छोटे खुदरा व्यापारी को अपना अस्तित्व बचाने के लिए 12% से 15% की भारी ब्याज दर पर कर्ज लेना पड़ता है. बिना सस्ती पूंजी के इस ‘बिलियनेयर राज’ में छोटे व्यापार का टिके रहना असंभव हो गया है.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की सुनामी: भारत के ‘हाई-फाई’ रोजगारों का अंत

हम अभी मोदी सरकार की आर्थिक एकाधिकार की तबाही से उबर भी नहीं पाए थे कि आसमान से एक नई और भयंकर तकनीकी सुनामी आ गिरी है – यह है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI).

मई 2026 में जारी की गई जानी-मानी एर्न्स्ट एंड यंग (Ernst & Young) की ‘इकाॅनमी वाॅच’ रिपोर्ट ने एक बहुत बड़ी चेतावनी दी है. रिपोर्ट के अनुसार, एआइ का आक्रामक विस्तार भारत के ‘स्किल्ड लेबर फोर्स’ (कुशल कार्यबल) और आइटी-आधारित विकास माॅडल के लिए एक विनाशकारी खतरा बन गया है.

1991 के बाद भारत ने अपने अंग्रेजी बोलने वाले युवाओं के दम पर बीपीओ (BPO), काॅल सेंटर और सर्विस सेक्टर की एक विशाल इंडस्ट्री खड़ी की थी. इसी ने भारत के मध्यम वर्ग को जन्म दिया था. लेकिन आज, एडवांस्ड मशीन लर्निंग और जनरेटिव एआई (Generative AI) ने इस पूरे माॅडल की बुनियाद हिला दी है.

आज वेबसाइट्स पर ग्राहकों से बात करने, उनका डेटा इकट्टा करने और सेल्स के लिए कंपनियों को इंसानों की जरूरत नहीं रही. एआइ पर चलने वाले स्मार्ट बाॅट्स दिन भर में ये काम बिना वेतन के, और शून्य गलती के साथ हैंडल कर लेते हैं. कस्टमर सपोर्ट, डेटा एंट्री, बेसिक कोडिंग, और लीड मैनेजमेंट जैसे एंट्री-लेवल व्हाइट-काॅलर जाॅब्स लगभग खत्म हो चुके हैं. बड़ी आईटी कंपनियों ने नए युवाओं की हायरिंग लगभग रोक दी है. जिन डिग्रियों के लिए युवाओं ने लाखों का कर्ज लिया था, वे डिग्रियां आज रद्दी के कागज बन गई हैं. पढ़े-लिखे युवाओं को अब मजबूरी में गिग इकाॅनमी (डिलीवरी जाॅब्स) में धकेला जा रहा है.

विवैश्वीकरण और छिनता हुआ ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’

सोवियत संघ के पतन के बाद के वैश्वीकरण के दौर में विशाल आबादी और ‘सस्ता लेबर’ एक बहुत बड़ी ताकत हुआ करती थी. पश्चिमी देशों की पूंजी और काम भारत-चीन की तरफ खिंचा चला आता था.

लेकिन 2020 के बाद दुनिया विवैश्वीकरण (De-globalization) की तरफ मुड़ चुकी है. पश्चिमी देश अब राष्ट्रवाद और सुरक्षा के नाम पर उत्पादन को वापस अपने देशों में ले जा रहे हैं. वे अच्छी तरह समझ गए हैं कि उन्हें भारत के सस्ते इंसानी मजदूरों की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि उनके पास एआइ और ऑटोमेशन की ताकत है. जिन देशों की आबादी कम है, वे आज सबसे ज्यादा फायदे में हैं.

भारत का वह ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ (Demographic Dividend) जिसका हम दुनिया भर में ढिंढोरा पीटते थे, अब एक ‘जनसांख्यिकीय आपदा’ (Demographic Disaster) में बदल चुका है. जब करोड़ों युवाओं के पास काम नहीं होगा, तो यह विशाल आबादी विकास का इंजन नहीं, बल्कि एक डरावना सामाजिक टाइम-बम (Time-bomb) बन जाएगी.

गिफ्ट सिटी (GIFT City): पूंजी पलायन (Capital Flight) का ‘वीआईपी’ रास्ता

ऐसे समय में जब देश के युवाओं को रोजगार देने के लिए कारखाने लगाने की जरूरत है, जब देश के खुदरा और छोटे-मंझोले व्यापारियों को सस्ती पूंजी की सख्त जरूरत है, तब देश का पैसा देश में ही रुकना चाहिए. लेकिन नीतियां इसके ठीक विपरीत काम कर रही हैं.

सरकार ने गुजरात में ‘गिफ्ट सिटी’ नाम का एक ऐसा फाइनेंशियल हब बनाया है, जो हकीकत में देश के ‘सुपर-रिच’ लोगों के लिए पैसा बाहर भेजने का एक कानूनी ‘टैक्स-हैवन’ बन गया है. ‘फैमिली इन्वेस्टमेंट फंड्स’ (FIF) के नियमों के जरिए भारत के अरबपति परिवार अब अपना पैसा बिना किसी रुकावट के सीधे अमेरिकी शेयर बाजारों और विदेशी रियल एस्टेट में लगा रहे हैं.

जहां एक आम भारतीय अपनी गाढ़ी कमाई पर भारी इनकम टैक्स और शेयर बाजार के मुनाफे पर कैपिटल गेन्स टैक्स भरता है, वहीं गिफ्ट सिटी से विदेश में निवेश करने वाले इन अरबपतियों को 10 साल तक की ‘टैक्स हाॅलिडे’ (टैक्स छूट) दी जाती है.

यह विदेशी निवेश (FDI) लाने का कोई जरिया नहीं है, बल्कि भारत की पूंजी को वैध तरीके से विदेशों में पार्क करने का एक वीआईपी लाउंज है. जो पैसा भारत के एमएसएमई (MSME) सेक्टर की नस-नस में दौड़ना चाहिए था, वह पैसा अब डाॅलर बनकर पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को सींच रहा है.

दयनीय स्थिति की ओर बढ़ता आम भारतीय

जब हम थाॅमस पिकेटी की रिपोर्ट की हकीकत, एर्न्स्ट एंड यंग द्वारा जारी की गई एआइ की चेतावनी, विवैश्वीकरण के क्रूर झटके और गिफ्ट सिटी के जरिए पूंजी के पलायन को एक साथ जोड़कर देखते हैं, तो भविष्य की बेहद डरावनी तस्वीर उभरती है.

भारत आज एक ऐसे चौराहे पर आ खड़ा हुआ है जहां:

  1. देश की 40% से ज्यादा संपत्ति सिर्फ 1% लोगों ने अपने कब्जे में कर ली है.
  2. छोटे स्वतंत्र व्यापार (MSME, खुदरा, छोटे-मंझोले उद्यमी) पूंजी के अभाव और बड़े काॅरपोरेट्स के एकाधिकार के कारण दम तोड़ रहे हैं.
  3. एआइ की सुनामी ने मध्यम वर्ग के युवाओं की उन ‘व्हाइट-काॅलर’ नौकरियों को निगल लिया है, जिनके दम पर उन्होंने कभी गरीबी से बाहर निकलने का सपना देखा था.
  4. बची-खुची घरेलू पूंजी को गिफ्ट सिटी के जरिए टैक्स-फ्री रूप से विदेशों में भेजा जा रहा है.

यह आर्थिक खाइयां अब इतनी चौड़ी हो चुकी हैं कि इन्हें पाटना लगभग असंभव-सा हो गया है. अगर यही एकाधिकारवादी नीतियां जारी रहीं, तो आने वाले कुछ ही वर्षों में भारत का मध्यम वर्ग पूरी तरह से सिकुड़ जाएगा. समाज केवल दो ही हिस्सों में बंट जाएगा – एक वह अति-कुलीन 1% वर्ग जो एआइ, पूंजी और देश के सभी संसाधनों का मालिक होगा, और दूसरा वह 99% वर्ग जो अपनी रद्दी हो चुकी डिग्रियों और कर्ज के बोझ तले एक बेहद दयनीय और संघर्षपूर्ण जीवन जीने को मजबूर होगा.

भारत की नियति चंद अरबपतियों की तिजोरियों का आकार बढ़ाने में नहीं हो सकती. जब तक भारत का नीति-निर्माण ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ के इस मोहपाश से नहीं टूटेगा, जब तक छोटे व्यापारियों को सस्ती पूंजी और संरक्षण नहीं मिलेगा, और जब तक एआइ के इस निर्मम दौर में देश की युवा आबादी के लिए कोई नया आर्थिक माॅडल तैयार नहीं किया जाएगा, तब तक भारत के आम नागरिक का भविष्य एक गहरी अंधेरी सुरंग में ही भटकता रहेगा.


13 June, 2026