वर्ष 35 / अंक - 27 / नगरनौसा (नालंदा): डिग्री काॅलेज की मांग करनेवालों...

नगरनौसा (नालंदा): डिग्री काॅलेज की मांग करनेवालों पर पुलिसिया दमन

नगरनौसा (नालंदा): डिग्री काॅलेज की मांग करनेवालों पर पुलिसिया दमन

[ 30 जून की सुबह भाकपा(माले) महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य की अगुआई में भाकपा(माले) नेताओं के एक दल और 2 जुलाई को  आइसा बिहार के राज्य अध्यक्ष धनंजय व राज्य सचिव दीपांकर के नेतृत्व में आइसा की एक तथ्य-जांच टीम ने नालंदा जिले के नगरनौसा प्रखंड के कैला पंचायत एवं आसपास के गांवों का दौरा किया. यह दौरा 18 जून को डिग्री काॅलेज की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन पर हुए पुलिस दमन की सच्चाई जानने के उद्देश्य से किया गया. टीम ने 50 से अधिक घरों में जाकर पीड़ित परिवारों से बातचीत की, घटनास्थलों का निरीक्षण किया, क्षतिग्रस्त घरों, वाहनों और दुकानों को देखा तथा महिलाओं, छात्रों, बुजुर्गों और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज किए. प्रस्तुत है इनकी एक समेकित रिपोर्ट ]

आंदोलन की पृष्ठभूमि

नगरनौसा और आसपास के ग्रामीण कई वर्षों से क्षेत्र में एक सरकारी डिग्री काॅलेज की स्थापना की मांग कर रहे हैं. आसपास के हजारों छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा के लिए दूर-दराज जाना पड़ता है. आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के अनेक विद्यार्थी इसी कारण पढ़ाई बीच में छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं. लगातार उपेक्षा के बाद ग्रामीणों, छात्रों और युवाओं ने लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन शुरू किया.

20 मई को ग्रामीणों ने लगभग दो घंटे तक सड़क जाम कर डिग्री काॅलेज की मांग उठाई. इसी दिन कैला गांव के विद्यालय में मध्याह्न भोजन खाने से लगभग 60 बच्चे-बच्चियां बीमार पड़ गए. इस मानवीय संकट को देखते हुए आंदोलनकारियों ने अपना आंदोलन रोककर बच्चों के इलाज और उनकी सुरक्षा को प्राथमिकता दी.

21 मई से 29 मई तक नगरनौसा प्रखंड कार्यालय के समक्ष अनिश्चितकालीन धरना चला. धरने में ग्रामीणों, छात्रों, महिलाओं और विभिन्न जनसंगठनों की लगातार भागीदारी रही. पूरे आंदोलन के दौरान प्रशासन से कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया.

30 मई को पुनः लगभग पांच घंटे तक सड़क जाम किया गया. इस दौरान प्रशासन की ओर से एसडीएम ने डिग्री काॅलेज निर्माण का आश्वासन दिया. प्रशासन के भरोसे पर ग्रामीणों ने आंदोलन स्थगित कर दिया. लेकिन कुछ दिनों बाद जब निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ तो संबंधित जेई (श्रनदपवत म्दहपदममत) ने ग्रामीणों को बताया कि ऊपर से काम रोक देने का निर्देश मिला है. इससे ग्रामीणों में भारी आक्रोश फैल गया. इसके बाद ग्रामीणों ने बैठक कर 18 जून को पुनः आंदोलन करने का निर्णय लिया.

आंदोलन शुरू होने से पहले ही पुलिसिया दमन

ग्रामीणों के अनुसार 18 जून को प्रस्तावित कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही सुबह लगभग 5 बजे भारी संख्या में पुलिस गांव पहुंच गई.

सबसे पहले गांव के तीन भाइयों को घर भेजने का दबाव बनाया गया. जब उन्होंने कहा कि वे अपने ही घर के बाहर खड़े हैं, तब पुलिस ने उनकी बेरहमी से पिटाई की और पूछताछ के नाम पर थाने ले गई.

लगभग आधे घंटे के भीतर पुलिस बल की संख्या लगातार बढ़ती गई. पूरे गाँव में फ्लैग मार्च निकाला गया. इसके बाद पुलिस ने पूरे गांव में एक साथ कार्रवाई शुरू कर दी.

पूरे गांव को बना दिया गया निशाना

तथ्य-जांच टीम को लगभग सभी परिवारों ने एक जैसी घटनाएं बताईं. ग्रामीणों के अनुसार पुलिस ने जो घर बंद मिला, उसका दरवाजा तोड़ दिया. जहां लोहे का गेट था वहां पुलिस छत के रास्ते घरों में घुसी.

किसी प्रकार की महिला, बच्चे या बुजुर्ग की परवाह किए बिना घरों में मौजूद लोगों को पीटा गया. जांच टीम ने जिन घरों का निरीक्षण किया, वहां आज भी टूटे हुए दरवाजे, क्षतिग्रस्त सामान और पुलिस कार्रवाई के निशान मौजूद हैं.

महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर अत्याचार

तथ्य-जांच में अनेक ऐसी घटनाएं सामने आईं जो बेहद चिंताजनक हैं – एक महिला ने बताया कि पुलिस ने एक पांच वर्षीय मासूम बच्चे को उसकी मां के सामने पकड़कर तीन मंजिला मकान से नीचे फेंक देने की धमकी दी.

एक 80 वर्षीय पैरालिसिस से पीड़ित बुजुर्ग महिला को भी नहीं छोड़ा गया. उन्हें बेरहमी से पीटा गया, जिसके बाद वे लगभग दो घंटे तक बेहोश रहीं. महिलाओं ने बताया कि उनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया तथा घरों में घुसकर मारपीट की गई.

कई ऐसे बुजुर्ग को भी मारा गया जो चलने में असमर्थ है और जिनके वो आश्रित हैं उन्हें जेल भेज दिया गए है.

लूटपाट और तोड़फोड़

तथ्य-जांच में यह आरोप भी लगातार सामने आया कि पुलिस कार्रवाई केवल लाठीचार्ज तक सीमित नहीं थी. कई परिवारों ने पुलिस पर लूटपाट का भी आरोप लगाया.

टीम की मुलाकात सुदामा देवी से हुई. उन्होंने बताया कि उनकी बहू अंचल कुमारी के कान से पुलिसकर्मियों ने सोने की बाली खांचकर निकाल ली, जिससे उनके कान में गंभीर चोट लगी. उनके 10 वर्षीय बेटे आर्यन ने विरोध किया तो उसे भी लात से सीना पर मारा जिसमें जूते से जोत लगने के कारण वो बुरी तरह घायल है.

किराना दुकान में तोड़फोड़

एक महिला, जो अपने घर में किराना दुकान चलाती हैं, उन्होंने बताया कि पुलिस ने उन्हें बेरहमी से पीटा. उनके शरीर पर चोटों के निशान आज भी मौजूद हैं. घर में खड़ी दो मोटरसाइकिलों को पूरी तरह तोड़ दिया गया. दुकान में रखा सामान बिखेर दिया गया. इतना ही नहीं, दुकान में रखे लगभग 10 किलो आम पुलिसकर्मियों ने घर के बाहर बैठकर आपस में बांटकर खाए.

वाहनों को निशाना बनाया गया

ग्रामीणों ने बताया कि जिन घरों में बाइक थीं, उन्हें तोड़ दिया गया. सड़क किनारे खड़े 25 से अधिक ऑटो रिक्शों को भी क्षतिग्रस्त किया गया.

महिलाओं और बच्चों को धमकी

एक किराए के मकान में रहने वाली महिला ने बताया कि पुलिस ने उनकी गोद से बच्चा छीन लिया और कहा ‘अपने पति को बुलाओ, नहीं तो बच्चे को छत से फेंक देंगे.’ बाद में जब पुलिस को पता चला कि उनका पति बेंगलुरु में काम करता है, तब बच्चे को वापस किया.

तथ्य-जांच टीम की मुलाकात 13 वर्षीय नौवीं कक्षा की छात्रा अनु कुमारी से हुई. अनु ने बताया कि पुलिस ने उनके सिर पर पिस्तौल रखकर धमकाया. इस घटना के बाद वह बेहोश हो गईं. आज भी वह मानसिक आघात से उबर नहीं पाई हैं. परिवार ने बताया कि घटना के बाद वह स्कूल और कोचिंग नहीं जा पा रही हैं.

टीम को यह भी बताया गया कि जिस शिक्षक के यहां क्षेत्र के अधिकांश छात्र पढ़ते थे, उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया है. इसके कारण पूरे इलाके के छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हुई है.

सत्येंद्र यादव के पुत्र सुबोध यादव की शादी 25 जून को होने वाली थी. घर में शादी की तैयारियां चल रही थीं. लेकिन पुलिस ने उन्हें भी पीटा और गिरफ्तार कर लिया.

शिक्षा का अपमान

सुरेंद्र कुमार के घर का दरवाजा तोड़कर पुलिस अंदर घुसी. घर में तोड़फोड़ की गई. परिवार ने बताया कि जब पुलिस को पता चला कि इस घर का एक छात्र बीएचयू में पढ़ता है तो पुलिसकर्मियों ने भद्दी-भद्दी गालियां देते हुए कहा – ‘बहुत पढ़े-लिखे बनने चले हो.’

टीम का मानना है कि यह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं बल्कि शिक्षा प्राप्त करने की आकांक्षा का भी अपमान है.

गिरफ्तारियां और मुकदमे

घटना के बाद 39 लोगों को गिरफ्तार किया गया. इनमें एसएफआई की राज्य अध्यक्ष काॅमरेड कांति के साथ उनकी दो बहन सावित्री और गायत्री भी शामिल हैं. (कुल तीन महिला अन्य पुरुष गिरफ्तार)

कुल 67 लोगों को नामजद अभियुक्त बनाया गया और लगभग 250 अज्ञात लोगों पर एफआईआर दर्ज की गई.

दूसरी ओर ग्रामीणों ने भी पुलिस की बर्बर कार्रवाई, मारपीट, तोड़फोड़ और लूटपाट को लेकर पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई है.

एक गंभीर सवाल: पुलिस हिरासत में रहने के दौरान व्हाट्सएप चैट किसने की ?

तथ्य-जांच टीम के समक्ष एक ऐसा गंभीर मामला सामने आया, जो केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी का नहीं, बल्कि न्याय प्रक्रिया, नागरिकों की निजता (Privacy) और डिजिटल सुरक्षा का भी प्रश्न है. ग्रामीणों एवं परिजनों के अनुसार सूरज कुमार को 18 जून की सुबह लगभग 8 बजे पुलिस ने हिरासत में लेकर उनका मोबाइल फोन भी अपने कब्जे में ले लिया था. लेकिन उपलब्ध व्हाट्सएप चैट के अनुसार, उसी मोबाइल नंबर से शाम लगभग 4 बजे तक लगातार संदेश भेजे जाते रहे जिसमें प्रशासन के खिलाफ भड़काऊ बात है. प्रशासन नागरिकों को कहते रहा है कि तुमलोग थाना को बम से उड़ाने की प्लानिंग कर रहा था, तो शक है कि चैट में यह भी वो लोग शामिल किया होगा.

यदि उस समय सूरज कुमार पुलिस हिरासत में थे और उनका मोबाइल भी पुलिस के कब्जे में था, तो उनके व्हाट्सएप अकाउंट का इस्तेमाल किसने किया? ग्रामीणों ने आशंका जताई कि ऐसा अन्य हिरासत में लिए गए लोगों के मोबाइल के साथ भी हुआ हो सकता है. यदि ऐसा है, तो यह नागरिकों की निजता, डिजिटल सुरक्षा और पूरे मामले की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है.

तथ्य-जांच टीम मांग करती है कि हिरासत में लिए गए सभी लोगों के मोबाइल की जब्ती, कस्टडी और जब्ती के बाद हुई डिजिटल गतिविधियों की स्वतंत्र डिजिटल फाॅरेंसिक जांच कराई जाए, ताकि सच्चाई सामने आए और न्याय व्यवस्था पर जनता का विश्वास कायम रहे.

तथ्य-जांच टीम का निष्कर्ष

तथ्य-जांच टीम के समक्ष आए बयानों, घटनास्थल के निरीक्षण तथा पीड़ित परिवारों से हुई बातचीत से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि डिग्री काॅलेज जैसी लोकतांत्रिक और न्यायसंगत मांग को बलपूर्वक दबाने का प्रयास किया गया. ग्रामीणों के आरोपों के अनुसार पुलिस कार्रवाई आंदोलनकारियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे गांव को सामूहिक दंड देने जैसी स्थिति उत्पन्न हुई. महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों, छात्रों और आम ग्रामीणों तक को इस कार्रवाई का सामना करना पड़ा. घरों में घुसकर मारपीट, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, कथित लूटपाट, बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां और व्यापक एफआईआर ने पूरे क्षेत्र में भय का वातावरण बना दिया.

नगरनौसा की लड़ाई अब केवल डिग्री काॅलेज की स्थापना की मांग नहीं रह गई है. यह लोकतांत्रिक अधिकारों, शिक्षा के अधिकार, पुलिसिया दमन के विरोध और न्याय की लड़ाई बन चुकी है.

मुख्य मांगें:

1. 18 जून की घटना की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच कराई जाए.
2. दोषी पुलिस अधिकारियों एवं कर्मियों पर आपराधिक कार्रवाई की जाए.
3. सभी निर्दाेष गिरफ्तार लोगों को अविलंब रिहा किया जाए.
4. झूठे मुकदमे वापस लिए जाएं.
5. जिन परिवारों की संपत्ति का नुकसान हुआ है, उन्हें उचित मुआवजा दिया जाए.
6. नगरनौसा में तत्काल सरकारी डिग्री काॅलेज की स्थापना की घोषणा की जाए.



04 July, 2026