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पेपर लीक, जेल और तिलचट्टे: युवाओं और लोकतंत्र के प्रति व्यवस्थागत अवमानना

पेपर लीक, जेल और तिलचट्टे: युवाओं और लोकतंत्र के प्रति व्यवस्थागत अवमानना

पेपर लीक, जेल और तिलचट्टे: युवाओं और लोकतंत्र के प्रति व्यवस्थागत अवमानना
तिलचट्टे और परजीवी. ये शब्द भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बेरोजगार युवाओं के संदर्भ में इस्तेमाल किए और उन लोगों पर  भड़क उठे जो “मीडिया”, “सोशल मीडिया”, “आरटीआई कार्यकर्ता” और “एक्टिविस्ट” बनकर “व्यवस्था पर हमला” करने का साहस करते हैं. मनुष्यों के लिए कीड़े-मकोड़े और परजीवियों का इस्तेमाल अमानवीकरण की भाषा है, जो ऐतिहासिक रूप से हिटलर के समय से फासीवादी नफरती भाषणों में देखी जाती रही है, जहां सत्ता पर सवाल उठाने वालों को पहले उनकी मर्यादा से वंचित किया जाता है और फिर उन्हें व्यवस्था का दुश्मन करार दिया जाता है. इन असंवैधानिक और अपमानजनक टिप्पणियों के खिलाफ सोशल मीडिया पर व्यापक आक्रोश उभड़ने के बाद मुख्य न्यायाधीश ने दावा किया कि मीडिया ने उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया है और उनका संदर्भ केवल फर्जी और झूठी डिग्रियों वाले लोगों से था.

मुख्य न्यायाधीश द्वारा युवाओं और जेन-जी पीढ़ी के खिलाफ की गई ये अपमानजनक टिप्पणियां कोई अलग-थलग घटना नहीं हैं, बल्कि उन लोगों के खिलाफ संस्थागत अवमानना के व्यापक पैटर्न का हिस्सा हैं जो सवाल उठाने, संघर्ष संगठित करने, अधिकारों की रक्षा करने या एक बेहतर और अधिक लोकतांत्रिक समाज की कल्पना करने का साहस करते हैं. हाल ही में 11 मई को पर्यावरण संबंधी चिंताओं से जुड़े एक मामले में मुख्य न्यायाधीश ने पर्यावरण कार्यकर्ताओं की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि जब देश अच्छी प्रगति कर रहा होता है, तब ऐसे मुकदमे केवल विकास परियोजनाओं में अड़ंगा लगाने के लिए दायर किए जाते हैं. इससे पहले 29 जनवरी 2026 को पेन थोजिलालार्गल संगम बनाम भारत संघ मामले में मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि “झंडा यूनियन देश में औद्योगिक विकास को रोकने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं.”

हम यहां जो देख रहे हैं वह केवल न्यायाधीश की एक टिप्पणी नहीं है, बल्कि मोदी के भारत में लोकतंत्र के प्रति तिरस्कार की व्यापक राजनीतिक संस्कृति के साथ न्यायिक अहंकार का मेल है. जहां मुख्य न्यायाधीश तिलचट्टों और परजीवियों की भाषा का प्रयोग करते हैं, वहीं प्रधान मंत्री प्रदर्शनकारियों को “आंदोलनजीवी” कहते हैं और बढ़ती बेरोजगारी से त्रस्त युवाओं से स्वरोजगार के नाम पर सड़कों पर पकौड़े बेचने को कहते हैं, जबकि रोजमर्रा के सड़क विक्रेताओं की आजीविका बुलडोजर से नष्ट की जा रही है.

सत्ता में या अधिकार के पदों पर आसीन लोगों की अपमानजनक और विशेषाधिकारपूर्ण बयानबाजी के बीच हमें लाखों युवाओं के जीवन और मेहनत के बर्बाद होने पर आपराधिक चुप्पी और जवाबदेही की पूरी कमी भी देखने को मिलती है. हाल ही में हुए नीट यूजी परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक ने न केवल हजारों युवाओं को निराशा में धकेल दिया है, बल्कि एक बार फिर यह उजागर कर दिया है कि मोदी सरकार के अंतर्गत संस्थानों ने किस प्रकार युवाओं के भविष्य को बार-बार बर्बाद किया है. यह कोई अकेली घटना नहीं है. पिछले 10 वर्षों में प्रश्नपत्र लीक की चौंका देने वाली 89 घटनाएं सामने आई हैं. जेईई मेन्स 2021, नीट यूजी 2024, यूजीसी नेट 2024 और कई अन्य परीक्षाओं में मोदी की संदिग्ध निजी एजेंसी एनटीए ने छात्रों की शिक्षा और कड़ी मेहनत के प्रति अपनी अक्षमता और घोर उपेक्षा साबित कर दी है. प्रतियोगी परीक्षाओं में साल दर साल प्रश्नपत्र लीक का सिलसिला जारी है, लेकिन सरकार द्वारा कोई गंभीर कार्रवाई नहीं की गई है. इसके बजाय भ्रष्ट और अक्षम एनटीए को संरक्षण और राजनीतिक छूट प्रदान की जाती है.

इस पेपर लीक के बाद से कम-से-कम चार छात्रों ने आत्महत्या कर ली है, जिनमें झुंझुनू का एक 22 वर्षीय छात्रा भी शामिल है, जिसे अच्छे अंक आने की उम्मीद थी. व्यवस्थागत भ्रष्टाचार के कारण जान गंवाने वाले ये युवा अब छात्रों के बीच पहले से ही मौजूद भयावह आत्महत्या संकट को और बढ़ा रहे हैं. 2024 में छात्रों की आत्महत्याओं की संख्या रिकाॅर्ड 14,488 तक पहुंच गई है, जो 2023 के 13,892 मामलों से 4.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है. जैसे-जैसे जांच गहरी होती जा रही है और राजस्थान एक केंद्र के रूप में उभर रहा है, बड़े कोचिंग सेंटरों और भाजपा नेता दिनेश बिवाल के नाम सामने आने से निजी कोचिंग माफिया और भाजपा के करीबी लोगों के बीच एक गहरे गठजोड़ की ओर इशारा मिलता जा रहा है.

अपने भविष्य पर हो रहे इस हमले के मद्देनजर देश के छात्रों और युवाओं ने सही मांग की है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस विफलता की सीधी जिम्मेदारी लें और इस्तीफा दें. उन्होंने यह भी दोहराया है कि एनटीए को भंग किया जाना चाहिए और केंद्रीकृत नीट परीक्षा प्रणाली को समाप्त किया जाना चाहिए, जिसने बार-बार संघवाद और चिकित्सा शिक्षा तक एक-समान पहुंच को कमजोर किया है. इसके अलावा, उन्होंने मांग की है कि निजी कोचिंग माफिया की भूमिका को सामने लाया जाए और न केवल पेपर लीक की सिलसिलेवार घटनाओं के लिए, बल्कि सार्वजनिक शिक्षा के प्रणालीगत विनाश में जिम्मेदार लोगों को उनकी भूमिका केे लिए जवाबदेह ठहराया जाए.

छात्रों के भविष्य को चौपट करने की जवाबदेही लेने से इन्कार करने वाली यही व्यवस्था सवाल पूछने के लिए युवाओं और कार्यकर्ताओं को जेल भेजने में संकोच नहीं करती. हमारे पास पहले से ही उमर खालिद और शरजील इमाम के मामले हैं, जिन्हें धार्मिक कट्टरता और बहुसंख्यकवादी राजनीति की व्यवस्था पर सवाल उठाने मात्रा के लिए कठोर और दमनकारी यूएपीए के तहत पांच साल से अधिक समय तक जेल में रखा गया है. हाल ही में जब मनेसर, नोएडा और अन्य जगहों के युवा श्रमिकों ने श्रम अधिकारों और न्यूनतम मजदूरी की मांग करते हुए मोदी सरकार द्वारा फ्व्यापार में आसानीय् के नाम पर प्रचारित आधुनिक गुलामी और शोषणकारी परिस्थितियों का विरोध किया, तो सैकड़ों मजदूरों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया और उन पर षड्यंत्रकारी होने का आरोप लगाया गया. वास्तव में, गिरफ्तार किए गए श्रमिकों की सही संख्या अभी भी स्पष्ट नहीं है, और कई श्रमिकों को अपमान और हिरासती यातनाओं का सामना करना पड़ा है. श्रमिकों के संघर्ष का समर्थन करने के लिए कई लोगों पर एक अन्य कठोर कानून – राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) – के तहत आरोप लगाए गए हैं, जिनमें पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर की रहने वाली और दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक 25-वर्षीय आकृति चौधरी भी शामिल हैं.

मुख्य न्यायाधीश युवाओं और कार्यकर्ताओं की बार-बार भर्त्सना करने में कोई कसर नहीं छोड़ते, लेकिन जब बात उन लोगों के खिलाफ राज्य द्वारा किए जा रहे दमन की आती है जो सिर्फ सभी के लिए बेहतर भविष्य की मांग कर रहे हैं, तो पूरी तरह चुप्पी छाई रहती है. दरअसल, 17 मई को न्यायमूर्ति बीवी. नागरत्ना और उज्ज्वल भुयान की पीठ ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज किए जाने पर सही सवाल उठाया, जहां इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्यीय खंडपीठ ने जमानत याचिका खारिज कर दी थी और के.ए. नजीब मामले (2021) में वृहद पीठ के फैसले का ठीक से पालन नहीं किया था, जिसमें लंबे समय तक कारावास को जमानत का आधार माना गया था. भाजपा सरकार इन कठोर कानूनों को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर असहमति जताने वालों, युवाओं और यहां तक कि अपने श्रम अधिकारों की मांग करने वाले श्रमिकों को वर्षों तक जेल में बंद रखने के लिए कर रही है.

हम स्पष्ट रूप से देखते हैं कि संस्थानों में फासीवादी विमर्श और बयानबाजी का फैलाव हो रहा है, साथ ही युवाओं की आवाजों के प्रति पूर्ण तिरस्कार भी है. ऐसा लगता है कि सत्ताधारी वर्ग और उन संस्थानों में बैठे लोगों के लिए, जिन्हें स्वतंत्र होना चाहिए, कोई भी युवा जो सांप्रदायिक-फासीवादी जहर फैलाने वाले या क्षेत्र, भोजन, पहनावे अथवा धर्म के नाम पर गरीबों पर हमला करने वाले गली-मोहल्ले के गिरोहों का हिस्सा नहीं है, वह उनका युवा नहीं है.

जो व्यवस्था बनाई जा रही है, वह लोकतंत्र पर सवाल उठाने और उसकी रक्षा करने वालों को हिकारत की नजर से देखती है. साथ ही, यह देखकर सुकून मिलता है कि नौजवान लोग नीट परीक्षा के पेपर लीक, श्रमिकों के अधिकारों के उल्लंघन या मुख्य न्यायाधीश की अमानवीय बयानबाजी के खिलाफ सड़कों पर और सोशल मीडिया पर मुखर विरोध कर रहे हैं और वे लोकतंत्र के प्रति इस अवमानना के आगे नहीं झुकेंगे.


23 May, 2026