वर्ष 35 / अंक - 24 / हमारा मर्सिया मत लिखो, हम अभी जिंदा हैं !

हमारा मर्सिया मत लिखो, हम अभी जिंदा हैं !

हमारा मर्सिया मत लिखो, हम अभी जिंदा हैं !

‘वामपंथ की वापसी और जनतंत्र की हिफाजत – ये दोनों अब एक ही सिक्के के दो पहलू हैं’

-- दीपंकर भट्टचार्य

[नेशनल हेराल्ड, 7 जून 2026, में छपे ‘Quit writing our obituaries, we aren’t dead yet’ शीर्षक लेख का हिंदी अनुवाद ]

असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने मोदी दौर में भाजपा की ‘अजेयता’ के मिथक को फिर से मजबूत करने की कोशिश की है. और इस मिथक के साथ हमें मुफ्त में कई मर्सिये भी थमा दिए गए हैं – तमिलनाडु में द्रविड़ियन राजनीति के अंत का ऐलान, क्षेत्रीय दलों और इंडिया गठबंधन की कब्र खोदने की कवायद, और बेशक वामपंथ की पुरानी विरासत पर विदाई गीत.

भाजपा की यह ‘अजेयता’ का मिथक 2024 में लगभग टूट ही गया था, हालांकि पूरी तरह नहीं. भाजपा अपने दम पर सिर्फ 240 सीटों तक सिमट गई थी, जो साधारण बहुमत से 33 सीट कम थीं. मोदी 3.0 की सरकार तभी बन सकी जब उसे जद(यू) और टीडीपी जैसे क्षेत्रीय दलों का सहारा मिला.

उस आंशिक झटके के बाद से यह हुकूमत चुनावों को सत्ता-विरोधी जन-असंतोष की लहर से बचाने और जादुई बहुमत गढ़ने की कला में और माहिर हो गई है. बेशर्म संस्थागत हेराफेरी और बेहद सोची-समझी सामाजिक इंजीनियरिंग के मेल से यह काम किया जा रहा है. महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली से लेकर बिहार, और अब हाल में असम तथा पश्चिम बंगाल तक, हमने चुनाव-दर-चुनाव इसी रणनीति को काम करते देखा है.

2024 के चुनाव के बाद संघ परिवार ने जो आक्रामक रणनीति अपनाई है, उसका असरदार जवाब अभी तैयार किया जाना बाकी है. लेकिन विपक्ष के नाम लिखे जा रहे इन राजनीतिक मर्सियों का भी तर्क के साथ जवाब देना जरूरी है. मिसाल के तौर पर, क्षेत्रीय पार्टियों के लिए लिखे जा रहे जल्दबाजी भरे खयाली मर्सियों को ही देख लीजिए. यह सच है कि तमिलनाडु में डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन को बड़ी हार का सामना करना पड़ा है, लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वहां भाजपा या उसकी सहयोगी एआईएडीएमके ने उनकी जगह ले ली है. इसके उलट, तमिलनाडु में एक और क्षेत्रीय ताकत – टीवीके (तमिलगा वेत्री कड़गम) – का उभार देखने को मिला है, जिसने अपने नाम के मुताबिक काफी असरदार मौजूदगी दर्ज कराई है.

भाजपा आज भले ही 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सत्ता में हो, लेकिन उनमें से 6 जगहों पर वह अब भी क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर ही हुकूमत चला रही है.

डीएमके और तृणमूल की हार को क्षेत्रीय पार्टियों के अंत की शुरुआत बताकर पेश किया जा रहा है, तो वहीं केरल में एलडीएफ की हार को भारत की राजनीति में वामपंथ के हाशिये पर चले जाने की निशानी बताकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है.

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि 1977 से अब तक वामपंथ कम-से-कम तीन प्रमुख राज्यों – पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल – में से किसी न किसी एक राज्य में सत्ता में रहा है.

पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे ने लगातार 34 साल (1977-2011), त्रिपुरा में 25 साल (1993-2018) और केरल में 10 साल (2016-2026) तक सरकार चलाई. लेकिन पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के उलट, केरल की राजनीति का मिजाज हमेशा अलग रहा है. वहां आम तौर पर हर पांच साल पर सरकार बदलती रही है. 2021 का चुनाव इसका एक अपवाद था, जब एलडीएफ लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटा था.

इसलिए एलडीएफ की हार कोई अनहोनी नतीजा नहीं थी. ऐसे में सिर्फ इस वजह से कि आज किसी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं है, वामपंथ को ‘गैर-जरूरी’ या ‘पुराना पड़ चुका’ घोषित करना सरासर बेतुकी बात है. कम्युनिस्ट वह पहली गैर-कांग्रेसी राजनीतिक धारा थे जो किसी राज्य में सत्ता तक पहुंचे थे, लेकिन 1977 तक वामपंथ को मुख्य रूप से संघर्षों और जनआंदोलनों की एक विपक्षी ताकत के रूप में ही देखा जाता था.

इसलिए चुनावी नजरिए से वामपंथ के लिए असली चिंता किसी राज्य की सत्ता हाथ से निकल जाने की नहीं, बल्कि उन राज्यों में उसके वोट प्रतिशत का गिरना है जहां कभी उसका मजबूत जनाधार हुआ करता था. इस लिहाज से देखें तो सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे को सबसे बड़ा झटका पश्चिम बंगाल में लगा है, जहां उसका वोट प्रतिशत 2011 में 41 फीसदी से कुछ ज्यादा था, जो हालिया चुनावों में घटकर लगभग 5 फीसदी रह गया है.

2011 में वाम मोर्चे की हार कोई हैरानी की बात नहीं थी. 34 साल तक लगातार सत्ता में रहने के बाद ऐसी थकान स्वाभाविक थी, खासकर तब जब औद्योगीकरण के नाम पर जमीन अधिग्रहण की अलोकप्रिय मुहिम ने गांवों में वामपंथ के सामाजिक आधार को गहरी चोट पहुंचाई थी और उसके साथ उसके रिश्तों में बड़ी दरार पैदा कर दी थी.

लेकिन 2016 में महज 10 फीसदी वोट और 3 सीटों वाली भाजपा का 2026 तक उछलकर लगभग 46 फीसदी वोट और 208 सीटों तक पहुंच जाना कहीं ज्यादा गंभीर चिंता का विषय है. यह सिर्फ सीपीआई(एम) के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे वाम आंदोलन के सामने खड़ी एक बड़ी राजनीतिक चुनौती है.

महज दस साल के भीतर भाजपा पश्चिम बंगाल की राजनीति के हाशिये से उठकर सत्ता के केंद्र तक पहुंच गई है. 2026 के चुनावों में चुनावी धांधली और हेरफेर के जिन हथकंडों ने भाजपा की जीत को बेहिसाब बड़ा दिखाने में भूमिका निभाई, वे अपनी जगह हैं. लेकिन उससे भी ज्यादा चिंता की बात पश्चिम बंगाल में संघ की जहरीली सांप्रदायिक नफरत, कट्टरता और समाज को बांटने वाली सोच का गहराई तक फैल जाना है. यह सिर्फ वामपंथ के लिए नहीं, बल्कि हर समझदार और तरक्कीपसंद भारतीय के लिए चिंता का विषय होना चाहिए.

कोलकाता में भाजपा की ताजपोशी के बाद के पहले ही महीने के घटनाक्रम का जायजा लीजिए, साफ समझ में आ जाएगा कि संघ परिवार अपने आक्रामक एजेंडे को लागू करने की कितनी जल्दबाजी में है.

चाहे गाय काटने पर पाबंदी हो, जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है; या फिर बिना किसी पुनर्वास के रेहड़ी-पटरी वालों और फेरीवालों को उजाड़ना; विपक्षी नेताओं और दफ्तरों पर हमलों से लेकर मूर्तियों, स्मारकों और दुकानों को जमींदोज करना; और असहाय लोगों को डिटेंशन कैंपों यानी नजरबंदी शिविरों में ठूंसने तक – जिन्हें अब चालाकी से ‘होल्डिंग सेंटर’ का नाम दिया गया है – पश्चिम बंगाल में जो कुछ हो रहा है, वह ‘परिवर्तन’ नहीं, बल्कि अराजकता और हिंसक घेरेबंदी का राज है.

साफ है कि इनका मकसद बंगाल की उस पूरी विरासत को उलट देना है, जो उसकी तरक्कीपसंद सोच, उदार लोकतांत्रिक मूल्यों और गंगा-जमुनी संस्कृति की पहचान रही है. पश्चिम बंगाल के इन नए ‘फतह करने वालों’ के लिए सत्ता का मतलब जवाबदेही और जिम्मेदारी नहीं, बल्कि बदले की अंधी भूख और बेलगाम आक्रामकता है. इतिहास याद दिलाता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी की बंगाल-विजय ने ही सामंती ताकतों के साथ ‘स्थायी बंदोबस्त’ के जरिये औपनिवेशिक गुलामी का रास्ता खोला था.

भाजपा की बंगाल-विजय उसी की मानिंद है – न सिर्फ राजनीतिक-सांस्कृतिक हमले की तेजी, बल्कि आज की ‘वेस्ट इंडिया कंपनी’ के लिए नए ‘स्थायी बंदोबस्त’ की चाहत भी. छोटे कारोबारों और रोजगार पर हो रहे हमलों, बेदखली और अधिकार-छीनने के इस दौर के बीच यह समझना मुश्किल नहीं कि काॅर्पाेरेट कब्जे और पूंजी के जमावड़े की बूटों की आहट साफ सुनाई देती है.

संघ परिवार के लिए पश्चिम बंगाल लंबे समय से प्रतीक्षित एक ‘आखिरी सरहद’ था. बंगाल में भाजपा की जीत ने त्रिपुरा और मेघालय से लेकर असम और पश्चिम बंगाल तक, बांग्लादेश के चारों ओर भाजपा-शासित राज्यों की श्रृंखला पूरी कर दी है. और बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भाजपाई मुख्यमंत्रियों के साथ ‘अंग-बंग-कलिंग’ का सर्किट भी पूरा हो गया है. इस हौसले से लबरेज होकर भाजपा अपने ‘एक देश, एक पार्टी’ के अभियान को और तेज करेगी.

परिसीमन और ‘एक देश, एक चुनाव’ – ये दोनों इरादतन भारत की चुनावी व्यवस्था को भाजपा के शिकंजे में कसने के लिए हैं. लेकिन अगर हम अर्थव्यवस्था, शासन या विदेश नीति की तरफ देखें, तो मोदी सरकार रसातल में पहुंच चुकी है. इसे अब इस हुकूमत के सबसे चाटुकार समर्थक भी नकार नहीं सकते.

तो सरकार कई संकटों से कैसे निपटती है? बुलडोजर का बटन और जोर से दबाती है. बेहतर तनख्वाह मांगने वाले मजदूरों को जेल में ठूंसती है. परीक्षा में दोबारा जांच की मांग करने वाले छात्रों को ‘पाकिस्तानी’ कह देती है.

यहां तक कि आंदोलन करने वाले युवाओं को भारत के चीफ जस्टिस ‘काकरोच’ (तिलचट्ट) कहते हैं. और जब आक्रोशित युवा ‘काकरोच जनता पार्टी’ बनाकर डिजिटल मोर्चे पर पलटवार करता है, तो घबराई हुई सरकार उनके सोशल मीडिया हैंडल बंद करा देती है.

पिछले सौ साल में कम्युनिस्ट भारत में आजादी, इंसाफ और जनता के हकों की सबसे जीवंत, प्रतिबद्ध और लगातार उठने वाली आवाजों में से एक रहे हैं. आज पहले से कहीं ज्यादा भारतीय जनतंत्र को देश के कम्युनिस्टों की दरकार है – जो इस वक्त की मांग पर खरे उतरें और जमीन से एक दूसरी आजादी की लड़ाई खड़ी करें. वामपंथ की वापसी और जनतंत्र की हिफाजत – ये दोनों अब एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.

13 June, 2026