वर्ष 35 / अंक - 24 / पश्चिम बंगाल की पहली भाजपा सरकार का पहला महीना

पश्चिम बंगाल की पहली भाजपा सरकार का पहला महीना

पश्चिम बंगाल की पहली भाजपा सरकार का पहला महीना

पश्चिम बंगाल में पहली बार भाजपा सरकार बनने के बाद से सिर्फ एक महीना बीता है. इसी एक महीने में पश्चिम बंगाल के लोगों ने भाजपा के बारे में इतना कुछ जान लिया है, जितना वे दूसरे राज्यों या केंद्र में पार्टी के शासन को देखकर भी नहीं जान पाते. भाजपा ‘बदलाव’ का नारा देकर सत्ता में आई है. उसने चुनावी अभियान के दौरान सार्वजनिक जीवन से ‘भय’ खत्म करने और ‘भरोसा’ जगाने का वादा किया था. लेकिन पश्चिम बंगाल में लाखों लोगों के लिए भाजपा शासन के पहले महीने का अनुभव सिर्फ डर और असुरक्षा से भरा रहा है.

जिन लोगों ने एसआइआर में अपना मताधिकार खो दिया है, उनके लिए मुश्किलों का दौर अभी शुरू ही हुआ है. सैकड़ों लोगों को डिटेंशन कैंपों में भेजा जा रहा है, जिन्हें अब ‘होल्डिंग सेंटर’ कहा जा रहा है. बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और बीमार लोगों को जबरदस्ती भारत-बांग्लादेश सीमा के पार भेजा जा रहा है, जहां से बांग्लादेशी बाॅर्डर फोर्स उन्हें वापस धकेल देती है. वोट से वंचित होने के बाद अब वे देश से भी वंचित हो गए हैं. कई अन्य लोग, जो शायद अभी डिटेंशन और देश-निकाले की इस स्थिति तक नहीं पहुंचे हैं, वे भी कई तरह के अधिकार और नकद प्राप्ति (कैश ट्रांसफर) के फायदे खोने लगे हैं.

पूरे राज्य में बुलडोजर तबाही मचा रहे हैं, घर और दुकानें गिरा रहे हैं और लाखों लोगों को उनके घरों और रोजगार से बेदखल कर रहे हैं. किसी पुनर्वास और अक्सर किसी पूर्व सूचना के बिना ही बुलडोजर रात में पहुंचकर लोगों को उजाड़ रहे हैं और उनकी आजीविका खत्म कर रहे हैं. ग्रेटर कोलकाता इलाके में शहरी गरीबों और मेहनतकश लोगों के लिए हर स्टेशन और हर काॅलोनी में अब यही कड़वी सच्चाई देखने को मिल रही है. हजारों रेलवे हाॅकरों, फेरीवालों और छोटे दुकानदारों की जिंदगी पूरी तरह से अनिश्चित और असुरक्षित हो गई है.

सरकारी कर्मचारियों के लिए वादा किया गया डीए (मंहगाई भत्ता) और महिलाओं के लिए बढ़ा हुआ नकद फायदा अब टले हुए सपनों जैसा लग रहा है. कोई भी नकद फायदा देने से पहले, सरकार न सिर्फ व्यक्तिगत लाभार्थियों बल्कि उनके पूरे परिवारों के बारे में हर संभव जानकारी इकट्ठा करना चाहती है. एक ही झटके में राज्य में ओबीसी आरक्षण को 17 प्रतिशत से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया गया है. 2011 के बाद जारी किए गए हर जाति प्रमाण पत्र का अब दोबारा प्रमाण पत्र जरूरी कर दिया गया है. मूल निवासियों को भी धर्म के आधार पर बांटने की कोशिश की जा रही है. भाजपा अब आरक्षण के उस संवैधानिक अधिकार को, जो सभी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समूहों के लिए निर्धारित था, सिर्फ हिंदुओं के अधिकार में बदलने पर आमादा है.

यह तकलीफ निश्चित रूप से सभी को महसूस नहीं हो रही है. ऐसे बहुत से लोग हैं जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को दी जा रही इस तकलीफ को ‘प्रगति’ या ‘विकास’ की जरूरी कीमत मानकर सही ठहराने और उसका स्वागत करने को तैयार हैं. मुख्यधारा का मीडिया ‘बुलडोजर राज’ के लिए लोगों की सहमति बनाने में जुटा है. जो लोग अभी तक शासन के नए प्रतीक के तौर पर बेकाबू होते बुलडोजर का समर्थन नहीं कर रहे हैं, वे भी ‘इंतजार करो और देखो’ की नीति अपनाए हुए हैं. इस बीच, भाजपा की ‘वाशिंग मशीन’ तेजी से काम कर रही है. सत्ता से बाहर होने के बाद टीएमसी का संगठन अब साफ तौर पर भाजपा की आजमाई हुई ‘लालच और दबाव’ की रणनीति और ‘ऑपरेशन लोटस’ के दांव-पेंच का शिकार हो सकता है. ऐसा लगता है कि पंचायत और नगरपालिका स्तर के प्रतिनिधियों से लेकर विधायक और सांसद तक, टीएमसी छोड़कर भाजपा में शामिल होने वालों की बढ़ती संख्या ने अब आधिकारिक टीएमसी को अल्पमत में ला दिया है.

टीएमसी के नेताओं के भाजपा में शामिल होने की होड़ के मद्देनजर अब कांग्रेस और टीएमसी के बीच सुलह की संभावना साफ तौर पर दिख रही है और समझ में भी आती है. बेशक, यह देखना अभी बाकी है कि टीएमसी-कांग्रेस गठबंधन जमीनी स्तर पर विपक्ष के तौर पर खुद को कैसे नए सिरे से खड़ा करता है. पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों के लिए जरूरी है कि वे इस अहम मोड़ पर इस राज्य में संकट से जूझ रहे मेहनतकश लोगों की आवाज बनकर एकजुट हों. संयुक्त वामपंथ के बेदखली-विरोधी प्रतिरोध अभियान में जो जोश दिखा है, वह काफी उत्साहजनक है. भाकपा(माले) कार्यकर्ताओं, नागरिक समाज समूहों और मानवाधिकार संगठनों ने पश्चिम बंगाल के मताधिकार-वंचित लोगों तक पहुंचने के लिए जो पहल की है, वह भी एक अहम कदम है. जैसे-जैसे भाजपा सरकार अपना विभाजनकारी और गुमराह करने वाला एजेंडा आगे बढ़ा रही है और अपना दमनकारी चेहरा दिखा रही है, वामपंथियों को हर कदम पर लोगों के साथ जमीनी स्तर पर मौजूद रहना होगा.

पश्चिम बंगाल में भाजपा की अभूतपूर्व जीत कई वजहों का नतीजा है. समूची चुनाव प्रक्रिया के दौरान – वोटर लिस्ट तैयार करने से लेकर वोटों की गिनती और नतीजों की घोषणा तक – चुनाव में धांधली के पक्के संकेत मिलते हैं. लेकिन इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात है जमीनी स्तर पर भाजपा का वास्तविक विस्तार और टीएमसी कुशासन के खिलाफ लोगों के गुस्से को संघ ब्रिगेड के हिंदुत्ववादी एजेंडे की तरफ मोड़ने की उसकी क्षमता. हमें याद है कि कैसे 2002 के गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी ने गुजरात चुनावों को पाकिस्तान-विरोधी वोट में बदल दिया था. असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में भाजपा इसी तरह की रणनीति पर काम कर रही है, जिसमें वह बांग्लादेश, खासकर बांग्लादेश की राजनीति में जमात-ए-इस्लामी के बढ़ते प्रभाव, को लगातार अपने हमले का निशाना बना रही है.

पश्चिम बंगाल की वामपंथी और लोकतांत्रिक ताकतों के सामने चुनौती भाजपा की इस सांप्रदायिक साजिश को नाकाम करने की है. इसका जवाब उन वर्गीय हितों को बनाए रखने में है जो हिंदुओं और मुसलमानों को जोड़ते हैं, सामाजिक न्याय के उस एजेंडे को आगे बढ़ाने में है जो वंचित और हाशिए पर पड़े हर समूह से जुड़े हैं, और उस समावेशी संस्कृति को मजबूत करने में है जिसने औपनिवेशिक काल से ही इस क्षेत्र की पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों की मानसिकता को बनाए रखा है और सशक्त किया है. ईद के त्योहार को नफरत और टकराव का अखाड़ा बनाने की भाजपा की कोशिश बुरी तरह नाकाम रही, जब पश्चिम बंगाल के मुख्य रूप से हिंदू पशु व्यापारियों और डेयरी किसानों ने पशु वध पर लगी रोक के खिलाफ आवाज उठाई. पश्चिम बंगाल की मिली-जुली संस्कृति आर्थिक परस्पर-निर्भरता और सामाजिक सह-अस्तित्व के गहरे रिश्तों पर टिकी है, जिसने लोगों को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की हर कोशिश को नाकाम कर दिया. बंटवारे के बाद के शुरूआती वर्षों के दौरान पश्चिम बंगाल में वामपंथ का विकास कृषि सुधारों, शरणार्थियों के पुनर्वास, समतामूलक शिक्षा और दबे-कुचले व हाशिए पर पड़े लोगों के सम्मान और सुरक्षा के लिए किए गए संघर्षों के जरिए हुआ. कम्युनिस्ट आंदोलन की इसी बुनियादी पहचान और ताकत के दम पर चुनावी जीतें हासिल हुईं और लंबे समय तक सत्ता में रहने का मौका मिला. आज एक बार फिर कम्युनिस्टों को अपनी इसी बुनियादी ताकत और शानदार विरासत के बल पर पलटवार करना होगा.


13 June, 2026