गांधी जयंती की पूर्व संध्या में एसआइआर पर जनसुनवाई
1 अक्तूबर 2026 को भाकपा(माले) ने आईएमए हाॅल, पटना में एसआइआर के मुद्दे पर जन सुनवाई आयोजित की. इस जनसुनवाई में भाकपा(माले) ने बिहार के 10 विधानसभा में 102 बूथों पर किए गए सर्वे रिपोर्ट प्रस्तुत किया. इस रिपोर्ट में इस बात के ठोस प्रमाण दिए गए हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पूर्व चुनाव आयोग द्वारा राज्य में किए गए मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) में मतदाता सूची से भारी तादाद लोगों के नाम गायब कर उनको मतदान करने से वंचित कर दिया गया. कुछ लोगों का नाम अनुपस्थित बता कर काट दिया गया और कई ऐसे लोग जो जीवित हैं, उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. दूसरी ओर, भारी तादाद में ऐसे लोगों के नाम जोड़ दिए गए हैं, जिनका कोई उन बूथों पर अता-पता नहीं मिला.
जनसुनवाई में मतदाता सूची से नाम हटा कर मतदान से वंचित कर दिए गए 18 लोग भी उपस्थित हुए और उन्होंने जनसुनवाई में अपनी गवाही दर्ज करवायी. इनमें 103-भोरे विधानसभा क्षेत्र के सुरेश भगत व राम सूरत चौधरी, 106-जीरादेई विधानसभा क्षेत्र से भगवान साह व रमाशंकर साह, 107-दरौली विधानसभा क्षेत्र से अंबिका मांझी, 195-अगिआंव विधानसभा क्षेत्र से सूर्यदेव राम. 190-पालीगंज विधानसभा क्षेत्र से मंटू कुमार, किरण देवी, शिवशंकर यादव व नंदनी देवी, 203-डुमरांव विधानसभा क्षेत्र से लालजी सिंह, देवराज राजभर व ओमप्रकाश राम, 214-अरवल विधानसभा क्षेत्र से मुन्नी देवी, गीता देवी और विशुन सिंह 217-घोषी विधानसभा क्षेत्र से बैजू पंडित, कुंदन मांझी, कुली कुरैशी और मो. सरफराज आदि शामिल रहे.
जनसुनवाई में जूरी के बतौर पटना विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. भारती एस कुमार, वीकेएसयू आरा के पूर्व कुलपति प्रो. रमाशंकर आर्य, पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पुष्पेंद्र, बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शकील अहमद खान मौजूद थे. जनसुनवाई की अध्यक्षता भाकपा(माले) के वरिष्ठ नेता केडी यादव और संचालन भाकपा(माले) के मगध प्रभारी कुमार परवेज ने की.
भाकपा(माले) राज्य सचिव कुणाल जनसुनवाई का बीज वक्तव्य देते हुए बताया कि बिहार के 10 विधानसभा क्षेत्रों – अगिआंव, तरारी, आरा, डुमरांव, पालीगंज, अरवल, घोषी, दरौली, जीरादेई और भोरे में चुनाव परिणाम पर एसआइआर के असर की जांच के उद्देश्य से 10-10 बूथों की जांच की गई है. घर-घर जाकर मतदाता सूची से काटे गए नामों और सूची में जोड़े गए नामों की सत्यता की जांच की गई. जांच से पता चला कि बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं के नाम काटे गए हैं और फर्जी मतदाताओं के नाम जोड़े गए हैं. इससे बहुत आसानी से चुनाव परिणाम को बदला जा सकता है. हमारी जांच ने एसआइआर के जरिए वोट चोरी के भाजपाई साजिश की पुष्टि की है.
मुख्य वक्ता का. दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा
हमने एसआइआर की साजिश को सबसे पहले पहचाना. इस वोट चोरी के खिलाफ इंडिया गठबंधन की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ ने बिहार में मतदाताओं के अधिकार के हनन के खिलाफ आवाज उठाई. फिर भी करीब 70 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से काट दिए गए जिसका चुनाव परिणाम पर भारी असर पड़ा. चुनाव बाद आहम घर-घर गए और मतदाता सूची में दर्ज नामों का सर्वे किया. 100 बूथों के सर्वे में 36 ऐसे लोग मिले जो जीवित हैं, लेकिन मतदाता सूची से उनका नाम गायब है. यदि यही अनुपात 70 लाख मतदाताओं पर लागू करें तो करीब 14 लाख लोग प्रभावित होंगे. 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव और 2024 में संसदीय चुनाव में इंडिया गठबंधन दल बहुमत के करीब पहुंच गए थे. इस खतरे को देखते हुए ही एसआइआर की साजिश रची गई. गौरतलब है कि वास्तविक एसआइआर से पहले ही जून 2025 से पहले ही भारी तादाद में मतदाताओं के नाम काट दिए गए.
अब स्थिति यह हो गई है कि जनता सरकार नहीं चुन रही, बल्कि सरकार यह तय कर रही है जनता कौन होंगे. इसके लिए 2023 में नया कानून बनाया गया. इस कानून के तहत प्रधानमंत्री, उनके एक मंत्री और विपक्ष के नेता की समिति के माध्यम से चुनाव आयोग की नियुक्ति की व्यवस्था कर चुनाव आयोग की संस्थागत निष्पक्षता को कमजोर कर दिया गया. मुख्य चुनाव आयुक्त और उनके दो सहयोगियों को अभूतपूर्व कानूनी संरक्षण देकर उनके खिलाफ कार्रवाई का रास्ता बेहद सीमित कर दिया गया.
तब भी, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने तीन सदस्यों वाले चुनाव आयोग में दो सदस्यों की सहमति के बगैर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा मनमाने फैसले लिए जाने का खुलासा किया. इससे आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हुए. 26 सितंबर को दोपहर 3 बजे हुई बैठक में आयोग ने कहा कि आगे होने वाली बैठकों का एजेंडा और मिनट्स जारी किए जाएंगे. यह अपने आप में बताता है आयोग के भीतर पारदर्शिता की कितनी भारी कमी थी.
आज चुनाव आयोग संविधान, कानून और न्याय की भावना का मजाक बना रहा है. देश के सामने यह सवाल भी है कि जब आम जनता महंगाई और आर्थिक संकट से जूझ रही है, तब संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज और उनके खर्च को लेकर पारदर्शिता क्यों नहीं होनी चाहिए.
इसी बीच बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने दावा किया कि बिहार में एक भी वोटर का नाम नहीं कटा है. मैंने उनसेे कहा था कि वे 1 सितंबर को आईएमए हाॅल की इस जनसुनवाई में आकर इस पूरी स्थिति को देखें. लेकिन वे लोग तो इस व्यवस्था से राजनीतिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं, वे इसके खिलाफ क्यों जायेंगे? आज खतरा सिर्फ वोट पर नहीं है. उसके साथ-साथ आधार, राशन और दूसरे नागरिक अधिकार भी प्रभावित हो रहे हैं. दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों के व्यवहार में भी जवाबदेही की कमी दिखाई दे रही है. जनता के सवालों का जवाब देने के बजाय सत्ता का अहंकार दिखाई दे रहा है.
बंगाल में बिहार से भी ज्यादा बड़ा एसआइआर हुआ. तार्किक गड़बड़ियों के नाम पर लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए. शिकायतों के बाद ट्रिब्यूनल बनाया गया और बाद में यह भी सामने आया कि बड़ी संख्या में ऐसे लोगों के नाम चुनाव आयोग स्वयं मतदाता सूची से बाहर करने की कोशिश कर रहा है.
और अभी दिल्ली में भी जब बड़ी संख्या में लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की शिकायतें आने लगीं तो चुनाव आयोग ने कहा कि किसी वीआइपी का नाम नहीं काटा जाएगा. लेकिन, बाबा साहब डाॅ. अंबेडकर के संविधान में सभी नागरिकों के वोट बराबर है. लोकतंत्र में कोई वीआइपी मतदाता नहीं होता. हर नागरिक के मत समान है.
फाॅर्म-6 के संबंध में भी चुनाव आयोग की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. आयोग की जिम्मेदारी है कि वह मतदाता सूची को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाए, न कि ऐसी प्रक्रिया खड़ी करे जिसमें सही मतदाता को अपने अधिकार के लिए बार-बार संघर्ष करना पड़े.
इंडिया गठबंधन की बैठक में इस पूरी स्थिति के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया गया है. 2023 के कानून को खत्म करने, मतदाता सूची में हुई गड़बड़ियों को दूर करने, जहां आवश्यक हो वहां पुनः चुनाव कराने, बैलेट से चुनाव कराने और सबसे बढ़कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग उठाई गई है. और अब गोवा और महाराष्ट्र से चुनाव अधिकारियों को लेकर सामने आई शिकायतों ने तो चुनाव आयोग पर उठ रहे सवालों को और गंभीर बना दिया है.
किसानों और नौजवानों के आंदोलनों ने हमें बताया कि लोकतांत्रिक संघर्ष के जरिए बड़ी मांगें भी हासिल की जा सकती हैं. इसलिए हम इन मांगों पर पूरे देश में एक सप्ताह तक प्रतिवाद करेंगे, हमारे सांसद राष्ट्रपति को ज्ञापन देंगे और नवंबर में दिल्ली सहित देश के कई बड़े शहरों में विशाल रैलियां आयोजित करेंगे. आंदोलन ही लोकतंत्र में जनता की सबसे बड़ी ताकत है. आंदोलन के जरिए ही देश ने आजादी हासिल की थी. इसी संघर्ष के रास्ते हम अपने संविधान, अपने अधिकार और अपने वोट की रक्षा करेंगे.
वोट लुटेरों को कड़ी सबक देना जरूरी: जनसुनवाई की जूरी
जूरी की अध्यक्ष प्रो. भारती एस. कुमार ने कहा कि सर्वे के नतीजे बेहद चौंकाने वाले और चिंतित करने वाले हैं. 100 बूथों के सर्वे में बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता मिले हैं जो जीवित हैं, लेकिन मतदाता सूची से उनके नाम गायब हैं. यह स्थिति चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है.
इन गड़बड़ियों के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. उन्हें तत्काल अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए. साथ ही, जिनके राजनीतिक निर्देशों पर चुनाव आयोग ने इस तरह की कार्रवाई की है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को भी इसकी जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देना चाहिए.
यह केवल मतदाता सूची का सवाल नहीं है, बल्कि देश के लोकतंत्र और नागरिकों के मताधिकार का सवाल है. यदि किसी नागरिक का वोट ही सूची से हटा दिया जाएगा, तो उसके लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा कैसे होगी? इसलिए ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनाव आयोग की जवाबदेही सुनिश्चित करने सहित इन सभी मांगों को लेकर देशभर में जोरदार लोकतांत्रिक आंदोलन खड़ा किया जाना चाहिए. जनता के वोट और संविधान की रक्षा के लिए यह संघर्ष व्यापक और निर्णायक होना चाहिए.
जूरी सदस्य बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाने की मांग करते हुए कहा कि पूरे बिहार के 243 विधानसभा क्षेत्रों में 70 लाख से अधिक लोगों के नाम मतदाता सूची काटा जाना संविधान की उस मूल भावना के बिल्कुल विपरीत है, जिसमें लोकतंत्र ‘जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए’ शासन की व्यवस्था है. आज देश के लोकतंत्र, संविधान और नागरिकों के मताधिकार पर गंभीर खतरा है. इसलिए देश को आजादी की एक और लोकतांत्रिक लड़ाई लड़ने की जरूरत है. देश की आर्थिक नीतियों और संसाधनों को कुछ बड़े काॅरपोरेट घरानों तथा विदेशी हितों के हवाले किए जाने के सवाल पर भी जनता को आवाज उठानी होगी.
पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पुष्पेंद्र ने कहा कि आज जनता का सरकार पर से विश्वास उठ चुका है और सरकार ने भी मान लिया है कि यह जनता हमको फिर से चुनने वाली नहीं हैँ. इसलिए अब ऐसे तरीके अपनाये जा रहे हैँ जिससे जनता की इच्छा का कोई मतलब न रह जाये और उनकी सरकार चलती रहे. जिस दिन कानून के जरिये चुनाव आयोग से सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को बाहर कर दिया गया उसी दिन से चुनाव आयोग की वैधता संदिग्ध बन गईं. अब तो चाहे परिसीमन हो या एसआइआर या अन्य नागरिक अधिकार – सुप्रीम कोर्ट व चीफ जस्टिस की भूमिका भी गैर जिम्मेदराना दिखती है.
प्रो. रमाशंकर आर्या ने कहा कि संघ-भाजपा ने देश को बर्बादी के रास्ते पर धकेल दिया है. नागरिकों के मताधिकार के साथ ही नई नीतियों व कानूनों के जरिए शैक्षणिक संस्थानों को भी मटियामेट कर देने और समाज पर मनुवादी संकहताओं को थोप देने का पुरजोर प्रयास किया जा रहा है. आज चुप न रह बिना डरे हर अन्याय के खिलाफ अपनी बुलंद आवाज उठाने का वक्त है.
वरिष्ठ कांग्रेस नेता शकील अहमद खान ने कहा कि इस देश में नागरिकों को संविधान द्वारा जो सुरक्षा मिली है, उसे छीनने की लगातार कोशिश हो रही है. एक ओर गरीब व कमजोर लागों का दमन और दूसरी ओर मुसलमानों का दुश्मन करार देना और हिन्दू-मुसलमानों को आपस में लड़वाने की कोशिश. ज्ञानेश कुमार इसी भाजपाई मशीन का एक पुर्जा है. इस साजिश के खिलाफ लारेगों को गोलबंद कर हमें हमें एक बड़ी लड़ाई लड़नी है.