वर्ष 35 / अंक - 27 / श्यामाप्रसाद मुखर्जी पर संघ ब्रिगेड का झूठा प्रचार

श्यामाप्रसाद मुखर्जी पर संघ ब्रिगेड का झूठा प्रचार

श्यामाप्रसाद मुखर्जी पर संघ ब्रिगेड का झूठा प्रचार

-- शुभम शर्मा

स्वपन दासगुप्ता ने एक बार फिर अपनी बहसबाजी दिखाई है. यह लेख अंग्रेजी अखबार ‘द टेलीग्राफ’ में छपा है, नाम है ‘मिथ पंक्चर्ड’. इसमें वे तीन बड़े दावे करते हैं. पहला, बंगाल की साझी संस्कृति एक झूठ है. दूसरा, इस झूठ को गढ़ने और फैलाने का काम खुद बुद्धिजीवी वर्ग ने किया, जिसमें ‘भद्रलोक’ और वामपंथी दोनों शामिल हैं. तीसरा, आज के पश्चिम बंगाल के असली नायक हिंदू महासभा के नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी ही हैं.

इन तीनों में से तीसरी बात को इतिहास के सबूतों से ही खारिज किया जा सकता है. किसी नेता की सही परख इस बात से होती है कि उसके ही जमाने के बड़े लोग उसे कैसे देखते थे और उसके साथ कैसा बर्ताव करते थे. नेताजी सुभाष चंद्र बोस, जिन्हें महात्मा गांधी ने राजनीतिक मतभेदों के बावजूद ‘देशभक्तों में राजकुमार’ कहा था, वे श्यामाप्रसाद मुखर्जी को नफरत की नजर से देखते थे. उन्होंने बंगाल में मुखर्जी और उनकी पार्टी हिंदू महासभा के खिलाफ ताकत के इस्तेमाल की धमकी तक दी थी. बलराज मधोक ने श्यामाप्रसाद की जीवनी में लिखा है कि कलकत्ता म्युनिसिपल काॅर्पाेरेशन के चुनावों के दौरान ‘सुभाष बोस के आदमी महासभा की हर सभा भंग कर देते थे और उसके उम्मीदवारों की पिटाई करते थे. तो इसका नतीजा यह हुआ कि महासभा के उम्मीदवार इतने डर गए और हिम्मत हार गए कि उन्होंने कोई सभा करना ही बंद कर दिया.’

मधोक और आज के हिंदुत्ववादी कहते हैं कि सुभाष बोस और श्यामाप्रसाद के बीच आपसी  सम्मान विकसित हो गया था. लेकिन यह सच से कोसों दूर है. नेताजी ने अपनी किताब ‘द इंडियन स्ट्रगल’ में साफ शब्दों में हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग दोनों के खिलाफ लिखा है, और दोनों को सांप्रदायिक संगठन बताया है. उन्होंने लिखा: ‘फूट डालो और राज करो की पुरानी नीति के तहत अंग्रेज सरकार इन पार्टियों को बढ़ावा देती है, ताकि इंडियन नेशनलिस्ट कांग्रेस को कमजोर किया जा सके.’ उन्होंने यह भी लिखा: ‘हिंदू महासभा में, मुस्लिम लीग की तरह ही, न सिर्फ पुराने राष्ट्रवादी शामिल थे बल्कि बड़ी तादाद में ऐसे लोग भी थे जो असली राजनीतिक लड़ाई में उतरने से डरते थे और खुद के लिए एक सुरक्षित ठिकाना चाहते थे.’

सुभाष बोस बिल्कुल सही थे. दिसंबर 1939 में जब हिंदू महासभा का कलकत्ता में औपचारिक शुभारंभ हुआ, तब भारत के वायसराय लिनलिथगो ने खुश होकर लंदन को लिखा: हिंदू महासभा धीरे-धीरे लेकिन जोरदार तरीके से एक राजनीतिक ताकत बनती जा रही है. यहां इनकी एक बड़ी सभा हुई जिसमें कड़े सांप्रदायिक और कांग्रेस-विरोधी प्रस्ताव पास हुए. मुझे हैरानी नहीं होगी अगर महासभा कांग्रेस का जनाधार खींचने में कामयाब हो जाए.

4 मई 1940 को अपने साप्ताहिक अखबार फाॅरवर्ड ब्लाॅक में सुभाष बोस ने फिर से हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग को ‘सांप्रदायिक संगठन’ बताया और लिखा कि ‘ये सांप्रदायिक संगठन पहले से भी ज्यादा सांप्रदायिक होते जा रहे हैं.’ स्निग्धेंदु भट्टाचार्य ने अपनी किताब ‘मिशन बंगाल: ए सैफ्रन एक्सपेरिमेंट’ में आनंदबाजार पत्रिका के पुराने अंकों को खंगालकर दिखाया है कि ठीक आठ दिन बाद, 12 मई 1940 को, सुभाष बोस ने झाड़ग्राम के दुर्गा मैदान में एक जनसभा में हिंदू महासभा पर फिर तीखा हमला बोला. आनंदबाजार पत्रिका ने 14 मई 1940 के अंक में उनका भाषण छापा था: हिंदू महासभा ने त्रिशूल लिए हुए साधुओं को वोट मांगने के लिए भेजा है. हिंदू जब भी त्रिशूल और भगवा कपड़े देखते हैं तो सिर झुका देते हैं. हिंदू महासभा राजनीति में धर्म का इस्तेमाल करके गंदगी फैला रही है. इन गद्दारों को राष्ट्रीय जीवन से बाहर निकाल फेंको. किसी को भी इनकी बात नहीं सुननी चाहिए... इससे बड़ा झूठ कोई नहीं कि हिंदुओं और मुसलमानों के हित अलग-अलग हैं. बाढ़, अकाल और महामारी किसी को नहीं बख्शते.

श्यामाप्रसाद का राजनीतिक कैरियर और राष्ट्रवाद का दावा इतना कमजोर था कि अंग्रेजों को उन्हें जेल में डालने की जरूरत ही कभी महसूस नहीं हुई. उन्हें पश्चिम बंगाल का नया नायक बनाना भी बेतुकी बात है. 1953 में उनकी मृत्यु से पहले, 1951-52 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनसंघ (हिंदू दक्षिणपंथ का नया मोर्चा, जो 21 अक्तूबर 1951 को श्यामाप्रसाद की अगुवाई में बना) बुरी तरह हारा. बंटवारे के बाद पश्चिम बंगाल की ज्यादातर हिंदू आबादी ने सांप्रदायिक जनसंघ और उसके नेता श्यामाप्रसाद को पूरी तरह ठुकरा दिया. बंगाल में जनसंघ को सिर्फ नौ सीटें मिलीं. 1962 के विधानसभा चुनावों में तो जनसंघ की और भी बुरी हालत हुई. उसके सारे पच्चीस उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई. दूसरी ओर, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का वोट प्रतिशत राज्य में 1952 के 10.76% से बढ़कर 1957 में 17.81% और 1962 में 24.96% हो गया.

बंगाली अपने नायक चुनने में दासगुप्ता के इस झूठे प्रचार के झांसे में कभी नहीं आएंगे. अंडमान की सेल्युलर जेल की दीवारों पर उन अनगिनत बंगालियों के नाम लिखे हैं जिन्होंने साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ते हुए कैद झेली. असली नायक वही थे, और उनके साथ नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी, जिनका नाम सुनते ही अंग्रेज कांप उठते थे.

बंगाल की साझी संस्कृति को झूठ बताने की दासगुप्ता की बात तो और भी निराश करने वाली है. ऑक्सफोर्ड से इतिहास में पीएचडी होने के बावजूद दासगुप्ता इस सच को नजरअंदाज कर देते हैं कि राष्ट्र, समुदाय, और लोगों की पहचान लंबे समय में धीरे-धीरे बनती है. इस बनावट में यह तय करना कि कौन दुश्मन है और कौन दोस्त, यह एक सोचा-समझा राजनीतिक फैसला होता है. अमरीकी आजादी से पहले वहां के बाशिंदे खुद को ‘न्यू इंग्लैंडर’, ‘वर्जीनियन’ या ‘पेंसिल्वेनियन’ कहते थे. ब्रिटेन से आजादी के बाद ही ‘अमरीकी’ पहचान बनी. अंग्रेजों ने 1707 के संघ के बाद खुद को ‘ब्रिटिश’ कहना शुरू किया. भारी-भरकम साम्राज्य ने भी इस नई पहचान को मजबूत किया. भारत में भी राष्ट्रीय पहचान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई से ही उभरी. धर्मनिरपेक्षतावादियों ने ‘भारतीयता’ का एक साझा, विविधतापूर्ण सपना देखा जिसमें सभी समुदाय साथ रह सकें. वहीं सांप्रदायिक सोच वालों को हमेशा धार्मिक समुदायों के बीच लड़ाई और दुश्मनी ही नजर आई. यह सांप्रदायिक तबका ज्यादातर अंग्रेजों का साथी था, जबकि दूसरा तबका अंग्रेजों से भारत को आजाद कराने में जुटा था.

बंगाल में भी यही दो नजरिए टकराए. एक तरफ बंकिम ने आनंदमठ में बंगाली हिंदुओं को मुसलमानों से लड़ने और अंग्रेजों का साथ देने की सलाह दी. दूसरी तरफ रवींद्रनाथ ने हिंदू-मुस्लिम बातचीत की जरूरत को समझा. 1935 में मौलवी अब्दुल करीम की किताब की भूमिका में टैगोर ने लिखा कि उन्होंने अपने विश्वविद्यालय विश्व-भारती में इस्लामिक संस्कृति का विभाग क्यों खोला: हिंदू-मुस्लिम टकराव की सबसे बड़ी वजहों में एक यह है कि हम एक-दूसरे को कम जानते हैं. हम साथ-साथ रहते हैं फिर भी हमारी दुनिया बिल्कुल अलग होती है. इस दूरी ने अब तक बहुत नुकसान किया है और आगे भी बुरा भविष्य लाएगी. एक-दूसरे की संस्कृति और रीति-रिवाजों को समझ-बूझ के साथ जानकर ही हम शांति और भाईचारे का माहौल बना सकते हैं. इसी मकसद से मैंने कुछ साल पहले विश्व-भारती में इस्लामिक संस्कृति विभाग शुरू किया.

सुभाष बोस भी हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्के समर्थक थे. वे कायस्थ परिवार से आते थे, जो ब्राह्मणों जैसे पुरोहित तबके से अलग, बंगाल के राजदरबारों में लेखा-जोखा और लिखा-पढ़ी का काम संभालते थे. इसीलिए बोस भारतीय इतिहास को किसी एक धर्म के दूसरे पर राज करने की कहानी नहीं मानते थे, बल्कि सभी धर्मों के मेल-जोल की कहानी मानते थे. अपनी अधूरी आत्मकथा में सुभाष बोस ने लिखा कि अंग्रेजों के आने से पहले भारत में ‘मुस्लिम राज’ कहना गलत नाम है, क्योंकि ‘प्रशासन हिंदू और मुसलमान मिलकर चलाते थे... और मुगल साम्राज्य को भारत में मजबूत करने में हिंदू सेनापतियों का बड़ा हाथ था. 1757 में पलासी में अंग्रेजों ने जिस नवाब सिराजुद्दौला को हराया, उसका सेनापति भी एक हिंदू था.’ सुभाष बोस के अपने पुरखे भी मुगलों से पहले के मुस्लिम सुल्तानों की सेवा में थे. उनके एक पुरखे महीपति को सुल्तान ने ‘सुबुद्धि खान’ की उपाधि दी थी (सुबुद्धि यानी अच्छी सलाह देने वाला). महीपति के पोते गोपीनाथ बोस सुल्तान हुसैन शाह (1493-1519) के राज में वित्त और नौसेना मंत्री बने और उन्हें ‘पुरंदर खान’ की उपाधि मिली.

भाजपा की जीत से उत्साहित होकर दासगुप्ता बंगाल की एक नई तस्वीर गढ़ने में लगे हैं, जिसमें पूरे इतिहास में हिंदू-मुस्लिम लगातार लड़ते नजर आएं. नई सरकार का 20 जून को ‘पश्चिम बंगाल दिवस’ मनाने का फैसला इस झूठ को और पक्का करता है. 20 जून को ही बंगाल विधानसभा ने बंगाल के दो टुकड़े करने का फैसला किया था. पश्चिमी हिस्सा पश्चिम बंगाल बना और पूर्वी हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश). देश और प्रांत को बांटने वाले इस फैसले पर खुशी मनाने की कोई वजह ही नहीं बनती. भारत तो 18 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पास होने का दिन भी आजादी दिवस के तौर पर नहीं मनाता. और 20 जून 1947 के इस वोट का श्रेय श्यामाप्रसाद को देना तो और भी बेतुका है. बंगाल विधानसभा के 90% से ज्यादा हिंदू सदस्य कांग्रेसी थे. बंगाल का बंटवारा एक ऐसी हकीकत बन चुका था जिसे उस वक्त कोई नहीं रोक सकता था. यहां तक कि शरतचंद्र बोस की एकजुट, आजाद और संप्रभु बंगाल बनाने की कोशिशों को भी कोई गंभीरता से नहीं लेता था, फाॅरवर्ड ब्लाॅक भी नहीं.

दासगुप्ता का यह लेख झूठ गढ़ने की एक कोशिश भर है. इसका नाम ‘मिथ पंक्चर्ड’ रखना ही गलत है. मुझे पूरा भरोसा है कि बंगाल के लोग दासगुप्ता और उनकी सरकार की इस चाल को ठुकरा देंगे.

(लिबरेशन, जुलाई 2026 से साभार, लेखक कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, यूके से विश्व इतिहास में एमफिल हैं.)

04 July, 2026