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हल्द्वानी में ऐपवा की एक दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला सम्पन्न

अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (ऐपवा) व ट्रेड यूनियन ऐक्टू द्वारा संयुक्त रूप से हल्द्वानी के नगर निगमा सभागार में “एक दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला” का आयोजन किया गया। महिला कार्यशाला में राज्य भर से आशा, आंगनबाड़ी, भोजन माता, किसान महिलाएं, घरेलू महिलाएं व छात्राएं शामिल हुईं। कार्यशाला में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए “ऐपवा” की राष्ट्रीय सचिव शशि यादव ने कहा कि, “देश में महिलाओं पर हमले तेज हुए हैं। केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद इस तरह की प्रवृति में इजाफा हुआ है। आर.एस.एस. प्रमुख मोहन भागवत का यह कहना कि महिलाओं को घर की चाहरदीवारी में ही रहना चाहिए, इस मानसिकता को दिखाता है कि कामकाजी महिलाओं के प्रति उनका नजरिया क्या है। कुल मिलाकर महिलाओं के प्रति फासीवादी-दमनकारी रूझान बनाने की कोशिशें हो रही हैं।” उन्होंने कहा कि, “इस प्रवृति का मुकाबला करते हुए महिलाएं हर क्षेत्र में आगे आकर संघर्ष कर रही हैं। पर महिलाओं को अपने श्रम का सही दाम नहीं मिल रहा है। महिला कमगारों के लिए समान काम का समान वेतन का कानून झुनझुना साबित हो रहा है। आशा-आंगनबाड़ी-भोजनमाता-फैक्ट्री मजदूर के रूप में काम कर रही महिलाओं के श्रम का खुला शोषण हो रहा है। इस दमनकारी नीति के खिलाफ एक विशाल महिला आंदोलन जो श्रम के सम्मान और समान काम का समान वेतन और महिलाओं के लिए सम्मानजनक कार्य स्थितियों के लिए संघर्ष जैसे मुद्दों पर आधारित...

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बिन्दुखत्ता की थाती है – लाल झंडा थामे, लड़ने का जज्बा

6 सितम्बर को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने नैनीताल जिले के बिन्दुखत्ता को नगरपालिका बनाए जाने का फैसला वापस लेने का ऐलान किया. दरअसल जब लगभग डेढ़ वर्ष पहले बिन्दुखत्ता को नगरपालिका बनने की घोषणा उत्तराखंड सरकार ने की थी, तभी अखिल भारतीय किसान महासभा और भाकपा(माले) ने इसका विरोध करते हुए, राजस्व गाँव बनाने की बिन्दुखत्ता की दशकों पुरानी मांग को पूरा किये जाने का सवाल उठाया था. इस मामले पर भाकपा(माले) और अखिल भारतीय किसान महासभा की त्वरित पहलकदमी का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि 18 दिसम्बर 2015 को बिन्दुखत्ता को नगरपालिका बनाने की अंतरिम अधिसूचना जारी हुई और 20 दिसम्बर 2015 को भाकपा(माले) और अखिल भारतीय किसान महासभा द्वारा नगरपालिका बनाए जाने के खिलाफ, लिखित आपत्तियां लालकुँआ तहसील के जरिये और फैक्स द्वारा शहरी विकास विभाग को भेज दी गयी. भाकपा(माले) और अखिल भारतीय किसान महासभा ने सुनिश्चित किया कि नगरपालिका की घोषणा की आड़ में बिन्दुखत्ता को राजस्व गाँव बनाए जाने की, तकरीबन चार दशक से अधिक पुरानी लड़ाई को किनारे न धकेल दिया जाए. इस इलाके में लोगों को जमीन पर मालिकाना अधिकार दिलाने की यह लड़ाई भाकपा(माले) और उसके जनसंगठन सत्तर के दशक से लड़ते आये हैं. इस सतत संघर्ष का ही परिणाम है कि बिन्दुखत्ता को राजस्व गाँव बनने की मांग को सभी राजनीतिक पार्टियों को अपने घोषणा पत्र में शामिल करना पड़ा है. वर्तमान में लालकुँआ क्षेत्र...

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लालू प्रदास का पतन

लालू प्रसाद का पतन और नई संभावनाओं का उदय . पार्टी की ३६ वी वर्षगांठ के अवसर पर प्रकाशित 22 अप्रील...

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बिहार विकास आंदोलन

आज बिहार के विकास का सवाल जोरदार रूप में उठा है और यह आम जनता के दिलोदिमाग को मथ रहा है एबं बिहार की राजनीति का अहम मुद्दा बन गया है. हालांकि बिहार विकास का सवाल काफी पुराना सवाल है लेकिन बंटवारे ने अभी इसे ज्यादा अहम बना दिया है और आज इस सवाल को इसी संदर्भ में ओठाया जा रहा है. लिहाजा विकास के जितने नुस्खे सामने आ रहे हैं, वै सभी इसी संदर्भ के इर्द-गिर्द घुमाते नजर आते हैं और एेसा लगता है मानो यह सवाल बंटवारे की उपज है. इसलिए बंटवारे के फलस्वरूप होने वाले आर्थिक नुकसान के आंकड़े की तस्वीर इस टंग से पेश की जा रही है कि उसमें वह हिसाब-किताब तक शामिल नहीं रहता जो झारखंड क्षेत्र पर व्यय हो रहा था. इस प्रकार की भरपाई के बतौर आर्थिक पैकेज की रकम के सवाल पर आपाधापी मची है. और, बिहार विकास के इस पुराने व अहम सवाल को आर्तिक पैकेज के दायरे में सीमित कर देने की कोशिस चल रही है. … … … … इस अवसर पर हम बिहार विकास से संबंधित विनोद मिश्र के दो लेखों एवं दीपंकर भट्टाचार्य के एक लेख को इस पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं. आशा है, बिहार विकास के लिए जद्दीजहद कर रहे लोगों के लिए यह पुस्तिका मार्गदर्शक बनेगी. बिहार राज्य कमेटी, भाकपा...

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गहरे आर्थिक संकट में भारत

प्रकाशक की ओर से इस पुस्तिका के मूल संस्करण का लेखन 2013 के अंत में हुआ था और वह फरवरी 2014 में प्रकाशित हुई थी. उसके बाद हमारे देश में सरकार तो बदली लेकिन आर्थिक मोर्चे पर कोई बदलाव नहीं आया. यहां तक कि हंगराजन समिति द्वारा निर्धारित लज्जास्पद रूप से बेहद कम आय की गरीबी रेखा (देहात में 32 और शहरों में 47 रुपए प्रतिदिन) के अनुसार एक तिहाई आबादी अति गरीब बनी हुई है. मुद्रा स्फीति की ऊंची दर, अल्प वृद्धि, अटल बेरोजगारी और बैंकों में बढ़ता हुआ बट्टा खाता जैसी बीमारियां हालांकि पहले की तरह ही अब भी असाध्य बनी हुई हैं फिर भी पिछले दस सालों से जिन कार्पोरेट समर्थक जन विरोधी आर्थिक नीतियों का अनुसरण किया जा रहा था उन पर जोर पहले के मुकाबले बढ़ा ही है. इसका सबसे तकलीफदेह उदाहरण रेल भाड़े और माल भाड़े में हालिया बढ़ीत्तरी और उसकी रक्षा में दिए गए तर्क हैं (कि नई सरकार तो उसी फैसले को लागु कर रही है जो पुरानी सरकार का है). मुकेश अंबानी की मांग के अनुसार गैस की कीमत बढ़ाने और गरीबों की सब्सिडी में कटौती से एेसे ही संकेत मिल रहे हैं. … …...

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पुलिस जुल्म की दास्तान

बिहार मे हमने राबड़ी राज को जंगलराज कहा है. वयों से हमारी पार्टी इनका दमन झेलती आई है. लेकिन इनके खिलाफ हमारा संघर्ष कभी रुका नहीं. यह जैसे जारी था, वैसे आगे भी जारी रहेगा. — विनोद मिश्र...

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मैं नास्तिक क्यों हूं ?

नौजवानों के क्रांतिकारी मानस के प्रकाश-स्तंभ भगत सिंह भगत सिंह मात्र 18 बर्ष की उम्र में 1925 में लाहौर में गठित नौजवान भारत सभा के महासचिव बने और 23 मार्च 1931 में करीब दो बर्ष जेल में गुजारने के बाद अपने साथियों राजगुरू और खुखदेव के साथ फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिए गए मृत्यु के समय वे सिर्फ 23 बर्ष के थे. इस छोटे से कार्यकाल में और इतनी कम उम्र में राष्ट्रीय स्तर पर क्रांतिकारी गतिविधियां संगठित करने के साथ-साथ उन्होंने तमाम बिषयों पर इतना कुछ पढ़ा व लिखा कि सोच कर अचंभा होता...

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राष्ट्र नायक शहीदे आजम भगत सिंह

“देश को एक आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है. और जो लोग इस बात को महसूस करते हैं उनका कर्तव्य है कि साम्यवादी सिद्धांतों पर समाज का पुनर्निर्माण करें. जब तक यह नहीं किया जाता और मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण तथा एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र के शोषण को, जिसे साम्राज्यवाद कहते हैं, समाप्त नहीं कर दिया जाता, तब तक मानवजाति को उसके क्लेशों से छुटकारा मिलना असंभव है, और तब तक युद्धों को समाप्त कर विश्व शांति के युग का प्रादुर्भाव करने की सारी बातों महज ढोंग के अतिरिक्त कुछ नहीं...

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मोदी माडल की सच्चाई

ये वंद लेख लोकसभा-2014 के चुनावों की पूर्व-बेला में हमारे देश की सत्ता के दरयाजै दस्तक हे रही तनाव-तबाही और तानाशाही की हकीकत को समझने और उनसे आगाह रहने के इरादे से यहाँ इकट्टे किए गए हैं. अनुमान है कि इन चुनावों में विभिन्न राजनीतिक पार्टियां 500 करोड़ डालर सर्च कर रही हैं. ये लेख इस बातका खुलासा करेंगे क्यों देश के सबसे बड़े पूंजीपति अब मोदी के लिए सब कुछ दांव पर लगाए हुए हैं, जबकि इन्हीं पूंजीपति घरानों ने पिछले दस में कांग्रेस सरकारों में हुए तमाम घोटालों की मलाई काटी थी. … … … … … ये पुस्तिका उन सभी भारतवासीयों को समर्पित है जो हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई के मूल्यों और इंसानियत को प्यार करते हैं, जो भारत पर साम्प्रदायिक तानाशाही, पूंजीवादी लूट और झूट की ताकतों का कब्जा कतई न होने...

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कम्युनिस्ट क्या चाहते है

“पूर्ण रूप से विकसित प्रकृतिवाद के रूप में (यह) कम्युनिज्म मानवतावाद के समकक्ष होता है, और पूर्ण रूप से विकसित मानवतावाद के रूप में प्रकृतिवाद के बराबर होता हैं. मनुष्य और प्रकृति के बीच के तथा नुष्य और मनुष्य के बीच के अंतर्द्वंद्व का वह सच्चा समाधान होता है — वह अस्तित्व और सारतत्व के बीच के, विषयीकरण और आत्मपुष्टिकरण के बीच के, व्यक्ति तथा प्रजाति के बीच के संघर्ष का वास्तविक समाधान होता है. इतिहास की पहेली का समाधान ही कम्युनिज्म है, और इस बात को स्वयं जानता है कि वह यह समाधान...

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सामाजिक बदलाव के महानायक कामरेड रामनरेश राम

सामाजिक बदलाव के महानायक कामरेड रामनरेश राम गरीब-मेहनतकशों की राजनैतिक दावेदारी के प्रेरणास्रीत कामरेड रामनरेश राम के प्रथम स्मृति दिबस 26 अक्टूबर 2011 के अवसर पर भाकपा (माले), भोजपुर जिला कमेटी की ओर से...

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LIBERATION - Central Organ of CPI(ML) October 2017

LIBERATION - Central Organ of CPI(ML) October 2017