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छात्राओं को पंख लगाने की बजाए पंख कतरने में लगे हैं नीतीश कुमार, स्कूल-काॅलेज बन गए हैं कत्लगाह: मीना तिवारी.

प्रेस हैंड आउट (11 January)
वैशाली के अंबेदकर कन्या वि़द्यालय छात्रा हत्याकांड की उच्चस्तरीय जांच कराये सरकार. हत्यारे-बलात्कारी की शिनाख्त कर अविलंब कड़ी सजा दी जाए.
17 जनवरी को राज्यव्यापी प्रतिवाद.
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पटना 11 जनवरी 2016
वैशाली के दौलतपुर के राजकीय अंबेदकर कन्या आवासीय विद्यालय की 10 वीं कक्षा में पढ़ रही मेरी बेटी ने दिनांक 6 जनवरी की शाम में मुझे फोन किया और मुझे स्कूल आने को कहा. अगली सुबह 7 जनवरी को मैं स्कूल पहुंची. बेटी ने मुझसे किसी सर का जिक्र करते हुए कहा कि – ‘सर गलत कार्य करने को कहते हैं. कहते हैं कि ऐसा करोगी तो परीक्षा में नंबर बढ़वा देंगे.’ इतना सुनने के बाद मैंने कहा कि प्राचार्य से बात करती हूं. मेरी बेटी ने मुझे रोकते हुए कहा -‘नहीं, मां, तुम्हारे जाने के बाद मुझे ये मारे-पीटेंगे.’ मैंने एक न सुनी और अपनी बेटी का झोला-सामान लेकर चलने को कहा. जब मैं अपनी बेटी को हाॅस्टल से घर ले जाने लगी, तो वहां के शिक्षकों ने उसे मेरे साथ जाने नहीं दिया. उसका झोला वगैरह छीन लिया और मुझे स्कूल के गेट से बाहर कर दिया गया. मैं निराश होकर घर लौट आई, शाम में उससे बात हुई.

अगले दिन फकुली पुलिस थाने के जरिए मुझे पता चला कि मेरी बेटी इस दुनिया में नहीं रही. जब मैं स्कूल पहुंची, तो उसके शरीर के चीथड़े कर दिए गए थे. उसके दोनों ब्रेस्ट और जांघ में चाकू मारा गया था. उसकी लाश को हाॅस्टल के नीचे वाली नाली में फेंक दिया गया था. लाश को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उसकी बेदर्द हत्या के पहलेे उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना को भी अंजाम दिया गया था. उक्त बातें मुजफ्फरपुर जिले के महादलित परिवार से आने वाली मृतक छात्रा की मां कुसुमी देवी ने बताया.

भाकपा-माले की केंद्रीय कमिटी सदस्य व ऐपवा की महासचिव काॅ. मीना तिवारी ने कहा कि इस बर्बर घटना की जांच करने माले-ऐपवा व आइसा की एक राज्यस्तरीय टीम वैशाली स्थित स्कूल और मृतका के घर पर पहुंची. इस टीम में उनके अलावा आइसा के राज्य सचिव शिवप्रकाश रंजन, राज्य अध्यक्ष मोख्तार, वैशाली जिला ऐपवा की नेता शीला देवी, विश्वेश्वर यादव और मुजफ्फरपुर के साथी थे.

उन्होंने कहा कि जब उनकी टीम राजकीय अंबेदकर कन्या आवासीय उच्च विद्यालय पहुंची, तो पता चला कि स्कूल के प्राचार्य को सस्पेंड कर दिया गया है और प्रभारी प्राचार्य डीएम के यहां किसी बैठक में हैं. स्कूल में कुछ पुरुष शिक्षकों व रसोइया से मुलाकात हुई. स्कूल में कुछ महिला शिक्षक भी हैं. लेकिन कैंपस में न तो कोई शिक्षक रूकते हैं, न वार्डन. कहने को तीन गार्ड हैं, उसमें एक महिला है. महिला गार्ड अभी डीएम के यहां सेवा दे रही हैं. विद्यालय हाजीपुर-महुआ रोड में मुख्य शहर से तीन किमी की दूरी पर है. वह सुनसान इलाका है. स्कूली महिला छात्रावास में मेडिकल आदि चीजों की कोई व्यवस्था नहीं है. सब कुछ भगवान भरोसे है.

स्कूल में तो जांच टीम को कुछ खास पता नहीं चला, लेकिन मुजफ्फरपुर के कुढ़नी प्रखंड में मृतका की सहपाठियों ने कहा कि 7 जनवरी की रात में गार्ड ने उक्त छात्रा को पानी देने के बहाने आवाज देकर बुलाई. कुछ देर में उसके चिल्लाने की आवाज आई और फिर वह रात में दुबारा नहीं लौटी. सुबह उसकी लाश नाले में मिली.

छात्राओं के साथ इस तरह की घटना इस स्कूल में कोई नई बात नहीं है. एक दूसरी लड़की ने आज से 1 साल पहले किसी एक अन्य लड़की के साथ बलात्कार व उसकी हत्या की चर्चा की. खुद मृतका के साथ छठी क्लास में एक बार छेड़-छाड़ की घटना शिक्षकों द्वारा हुई, जिसका उसने जबरदस्त विरोध किया था. स्कूल का कैंपस पूरी तरह असुरक्षित है. मुख्य गेट में ताला तक नहीं है. जहां छात्राओं के परिजनों के अंदर प्रवेश पर रोक है, वहीं कैंपस के भीतर कल्याण पदाधिकारी, खाना बनाने वाले एनजीओ चलाने वाले लड़के और गार्ड की सहमति से बाहर से आने वाले लड़कों का प्रवेश बेरोक-टोक जारी रहता है.

जांच टीम ने कहा कि इस वीभत्स बलात्कार-हत्या कांड की उच्चस्तरीय जांच करायी जानी चाहिए और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करनी होगी. ऐपवा महासचिव मीना तिवारी ने कहा कि बिहार में तथाकथित सामाजिक न्याय की सरकार में कमजोर वर्ग की छात्राओं पर बढ़ता दमन सरकार का असली चेहरा उजागर हो रहा है. नीतीश सरकार छात्राओं के सशक्तीकरण का दावा कर रही है, लेकिन आज सरकारी विद्यालय तक छात्र-छात्राओं के लिए कत्लगाह बन चुके हैं. छात्राओं को पंख देने की बजाए, सरकार उनका पंख उखाड़ने में लगी है. स्कूलों-काॅलेजों में पढ़ने वाली छात्रायें भयानक शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न से गुजर रही हैं. सरकार लंबे-चैड़े वादे व डींग हांकने की बजाए इस वीभत्स स्थिति पर गंभीरता से विचार करे.

उन्होंने पीड़िता के परिवार को 20 लाख का मुआवजा व सरकारी नौकरी और तमाम स्कूल-कैंपसों में सुरक्षा की मांग उठायी. उन्होंने कहा कि इस बर्बर घटना के खिलाफ पीड़ितो के न्याय के सवाल पर हम राज्यव्यापी आंदोलन चलायेंगे. आज 11 जनवरी की शाम सभी जिला मुख्यालयों पर कैंडल मार्च निकाला जाएगा, 17 जनवरी को रोहित वेमुला की शहादत दिवस के दिन भी राज्यव्यापी प्रतिवाद आयोजित किये जाएंगे.

मीना तिवारी, महासचिव, ऐपवा
कुसुमी देवी, पीड़िता की माता
शिवप्रकाश रंजन, राज्य सचिव आइसा
नवीन कुमार, राज्य सचिव, इनौस

कामरेड स्वपन मुखर्जी नहीं रहे

 कॉमरेड स्वपन मुखर्जी - 17 नवम्बर 1953 - 6 सितम्बर 2016

कॉमरेड स्वपन मुखर्जी
17 नवम्बर 1953 – 6 सितम्बर 2016

नई दिल्ली, 06 सितम्बर, 2016

पार्टी पोलिट ब्यूरो सदस्य कॉमरेड स्वपन मुखर्जी की असामयिक मृत्यु की खबर देते हुए भाकपा (माले) केन्द्रीय कमेटी दुःख और गहरा सदमा महसूस कर रही है. वे एक बैठक के सिलसिले में चंडीगढ़ गए थे और वहीं एक साथी के घर पर रुके थे. सुबह के सवा चार बजे अचानक दिल का दौरा पड़ने के कारण उनकी मृत्यु हुई.

उनकी पैदाइश 17 नवंबर, 1953 को हुई. उनके पिता सरकारी कर्मचारी थे. 70 के दशक के शुरुआती दौर में दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज से बी.एससी. करने के दौरान ही वे उस दौर के बहुत सारे युवाओं की तरह नक्सलबाड़ी आन्दोलन से प्रेरित हुए और माले आन्दोलन में शामिल हुए. बी.एससी. के दिनों से ही वे प्रतिबद्ध क्रांतिकारी थे, उसी समय उन्होंने आजादपुर इलाके के मजदूरों, दिल्ली ट्रांसपोर्ट कोर्पोरेशन के कर्मचारियों, शिक्षकों और छात्रों में काम-काज संगठित करना शुरू कर दिया था.

भाकपा (माले) आन्दोलन के पहले चरण के बाद के चौतरफा भ्रमों और हताशा के दौर में भी कामरेड स्वपन दृढ़ता से पार्टी की क्रांतिकारी दिशा और चारु मजूमदार की विरासत की जमीन पर मजबूती से डटे रहे.

28 जुलाई 1974 को गठित भाकपा (माले) केन्द्रीय कमेटी, जिसमें कामरेड जौहर महासचिव थे, के पहले ही कामरेड ईश्वरचंद त्यागी की अगुवाई में कुछ और साथियों के साथ कामरेड स्वपन ने बिहार के साथियों से संपर्क कर लिया था, जो तब तक कामरेड जौहर के नेतृत्त्व में काम कर रहे थे. 1976 की शुरुआत में हुई दूसरी पार्टी कांग्रेस के दौर से ही कामरेड स्वपन की दिल्ली के पार्टी काम-काज में सक्रिय भागीदारी रही.

सन 1976 के बीच से लेकर 1978 तक आपातकाल और उसके बाद के हालात में पुलिस से बचने के लिए उन्होंने कुछ दिन के लिए दिल्ली छोड़ दी. आपातकाल के बाद उन्होंने टाइम्स ऑफ़ इंडिया के क्लर्क के रूप में कुछ दिनों काम दिया. इस बीच वे लगातार दिल्ली में पार्टी संगठन बनाने के काम में सक्रिय रहे.

कामरेड स्वपन मुख्य रूप से आपातकाल की पृष्ठभूमि में पैदा हुए PUCL और PUDR के नेतृत्त्व वाले मानवाधिकार आन्दोलनों में बहुत सक्रिय रहे. वे जस्टिस वी एम तारकुंडे और गोविन्द मुखोटे जैसे लोगों के संपर्क में थे. वे नागभूषण पटनायक और नेल्सन मंडेला की रिहाई के लिए चले आन्दोलनों में बेहद सक्रिय थे. 84 के सिख विरोधी जनसंहार के खिलाफ और वियतनाम व अफ्रीका के उपनिवेशवाद विरोधी साम्राज्यवाद विरोधी आन्दोलनों समेत कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अभियानों के पक्ष में भाकपा (माले) की ओर से वे लगातार सक्रिय रहे. सन 82 के शुरुआत में उनकी सक्रिय भूमिका के चलते दिल्ली में तानाशाही के खिलाफ एक सेमिनार आयोजित हुआ. इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए 26 अप्रैल 1982 को आई पी एफ का जन्म हुआ जिसके वे सक्रिय जीवंत संगठकों में से एक थे.

इस पूरे दौर में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के कर्मचारी के बतौर काम करते हुए कामरेड स्वपन भूमिगत दिल्ली राज्य इकाई के सदस्य रहे. 87 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और फिर पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए, दिल्ली आईपीएफ के प्रभारी बने और दिल्ली के मजदूर वर्ग को संगठित करने का जिम्मा लिया. उन्होंने भाकपा (माले) के मजदूर संगठन को संगठित करने की चुनौती स्वीकार की और 1989 में चेन्नई में हुए पहले सम्मलेन में एआईसीसीटीयू के संस्थापक महासचिव चुने गए.

93 में वे भाकपा (माले) की केन्द्रीय कमेटी में चुने गए. इसी साल वे पंजाब में पार्टी संगठन के प्रभारी बने और अगले तीन दशकों तक महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते रहे. 98 में वे एक बार फिर एआईसीसीटीयू के महासचिव बने और मई 2015 में पटना में हुए एआईसीसीटीयू के सम्मलेन तक वे इस जिम्मेदारी को निभाते रहे. इसके बाद पार्टी की ज्यादा सीधी जिम्मेदारियां स्वीकार करने के लिए वे एआईसीसीटीयू के उपाध्यक्ष बने. आख़िरी वक्त तक वे पोलिट ब्यूरो की ओर से दिल्ली, पंजाब, चंडीगढ़, महाराष्ट्र और ओड़िशा के प्रभारी थे.

हल के वर्षों में कामरेड स्वपन ने एआईपीएफ के गठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. वे सक्षम पार्टी संगठक थे. वे हमेशा सर्वसुलभ, बहसों और नए विचारों का स्वागत करने वाले थे, अपार धैर्य के साथ पार्टी इकाईयों को पार्टी लाइन समझाने और और उसे लागू करने के लिए साथियों को प्रेरित करते थे. उनकी सर्वाधिक कमी दिल्ली, मुम्बई, पंजाब और चंडीगढ़ के उन नौजवान साथियों को खलेगी, जिनका वे नेतृत्त्व करते थे, जिनके लिए वे प्रेरणा का श्रोत थे. एक संगठक के बतौर वे सघन योजना निर्माण के सिद्धांत पर अमल करते थे और नेतृत्व की पहली कतार में रहते हुए योजनाओं को पूरी तरह लागू करने की मिसाल थे.

धैर्यशाली और विनम्र श्रोता, हमेशा सीखने को तैयार कामरेड स्वपन विभिन्न विचारधाराओं के कार्यकर्ताओं, जनांदोलनों, सांस्कृतिक रुझानों और वाम-जनवादी पार्टियों में बेहद सम्मानित थे.

कॉमरेड स्वपन का जाना हमारी पार्टी के लिए ही नहीं, लोकतांत्रिक आन्दोलनों की पूरी धारा के लिए अपूरणीय क्षति है. आख़िरी सांस तक उन्होंने सक्रिय, आशा-उत्साह से लबरेज, अथक जिन्दगी जी.

भाकपा (माले) कामरेड स्वपन की जीवन-साथी कामरेड शर्मिला, पुत्र शोभिक, पुत्री उपासना और अन्य परिवारजनों के प्रति गहन संवेदना व्यक्त करती है.

कॉमरेड स्वपन मुखर्जी को लाल सलाम!


 

–       भाकपा (माले) केन्द्रीय कमेटी

सामाजिक परिवर्तन यात्रा आरंभ

प्रकाशनार्थ-प्रसारणार्थ.

माले की राज्यव्यापी सामाजिक परिवर्तन यात्रा आरंभ. पटना में भगत सिंह चौक से निकली यात्रा.

मौके पर पोलित ब्यूरो सदस्य अमर ने कहा – नरेन्द्र मोदी जनता के नहीं अंबानी-अडानी के सेवक हैं.

सिवान, भोजपुर, जहानाबाद, दरभगा, रोहतास, अरवल आदि जगहों पर भी निकली है यात्रा.
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पटना 4 सितंबर 2016

बढ़ते सामाजिक उत्पीड़न व सांप्रदायिक उन्माद के खिलाफ भाकपा-माले की ‘‘सामाजिक परिवर्तन यात्रा’’ आज से आरंभ हो गयी है. राजधानी पटना सहित सिवान, भोजपुर, रोहतास, अरवल, जहानाबाद, दरभंगा, गया आदि कई जिलों में यात्रा निकली है. यह यात्रा 15 सितंबर तक चलेगी, इस दरम्यान माले नेता देश में दलितों-अल्पसंख्यकों-महिलाओं और मजदूर-किसानों पर बढ़ते सामाजिक उत्पीड़न व सांप्रदायिक उन्माद के खिलाफ जनता को गोलबंद करने का काम करेंगे. 19 सितंबर को सासाराम में ‘‘सामाजिक परिवर्तन सम्मेलन’’ का आयोजन किया गया है, जिसमे भाकपा माले महासचिव कामरेड दीपंकर भट्टाचार्य और गुजरात दलित आंदोलन के नेता भाग लेंगे.

पटना में भगत सिंह चौक से यात्रा निकली. जिसका नेतृत्व अखिल भारतीय खेत व ग्रामीण मजदूर सभा के राज्य सचिव गोपाल रविदास, किसान नेता कृपानारायण सिंह, युवा नेता साधु शरण दास आदि कर रहे हैं. परिवर्तन यात्रा को झंडा दिखाकर पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य कामरेड अमर ने रवाना किया. इस मौके पर पार्टी की राज्य कमिटी के सदस्य कॉ. अभ्युदय, कॉ. उमेश सिंह, कॉ. नवीन कुमार, इनौस नेता मनीष कुमार सिंह, गुरूदेव दास सहित कई नेता उपस्थित थे.
मौके पर आयोजित सभा को संबोधित करते हुए कॉ. अमर ने कहा कि आज एक तरफ जहां केंद्र की सत्ता हथियाने के बाद मोदी सरकार और संघ परिवार ने देश के संविधान, लोकतंत्र व धर्मनिरपेक्षता पर हमला बोल दिया है, वहीं दूसरी ओर वह देश बेचने में लगी है. उन्होंने कहा कि यह बेहद शर्मनाक है कि नरेन्द्र मोदी अंबानी के ब्रांड एबेंसडर बन गये हैं और सरकारी उपक्रमों की जगह जियो सिम का प्रचार कर रहे हैं. देश की जनता भूख से त्रस्त है, महंगाई की मार झेल रही है, उसे भोजन चाहिए. लेकिन मोदी सरकार निजी कंपनियों की पैरवी कर रही हैं. नरेन्द्र मोदी जनता के नहीं अंबानी-अडानी जैसे पूंजीपतियों के सेवक बन गये हैं.

अभ्युदय ने कहा कि अकलियतों पर लगातार बढ़ते हमले के बाद दलितों पर बर्बर हमले किए जा रहे हैं। मनुस्मृति के दकियानूसी विचारों को थोपने और हिंदू राष्ट्र बनाने का उन्मादी खेल खेला जा रहा है। ‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर साम्राज्यवादियों-विदेशी कंपनियों को लूट की खुली छूट दे दी गई है। कारपोरेटपरस्ती, बढ़ती महंगाई, बढ़ते सामाजिक उत्पीड़न, साम्प्रदायिक हमले व धर्मिक उन्माद के जरिए देश में नई किस्म की गुलामी थोपने की फासीवादी कोशिशें जारी हैं। इस हमले के खिलाफ आज देश की व्यापक जनता और लोकतांत्रिक समाज उठ खड़ा हुआ है। संघियों को बार-बार कदम पीछे हटाने को मजबूर होना पड़ रहा है।

कॉ. गोपाल रविदास ने कहा कि भाजपा विरोध के नाम पर बिहार की सत्ता में आई नीतीश-लालू की सरकार के शासन में भी सामंती-साम्प्रदायिक ताकतों के मनोबल में कोई कमी नहीं आई है। दलित-गरीबों को खेतों, कार्यालयों और शिक्षण संस्थानों से बेदखल किया जा रहा है। प्रतिरोध की आवाज और संघर्ष को लाठियों से दबाया जा रहा है। लगता है, बिहार की सरकार भाजपा के ही नक्शे कदम पर बढ़ रही है। इन ताकतों के नेतृत्व में बढ़ते उत्पात व उन्माद के खिलाफ हमारी पार्टी ने सामाजिक परिवर्तन यात्रा निकाल रही है.

अन्य जिलों में भी निकली है सामाजिक परिवर्तन यात्रा

भोजपुर में तरारी के विधायक सुदामा प्रसाद ने परिवर्तन यात्रा को झंडा दिखाकर विदा किया. इस टीम में इनौस के राज्य अध्यक्ष मनोज मंजिल, राजू यादव, अजीत कुशवाहा आदि छात्र-युवा शामिल हैं. मौके पर पार्टी जिला सचिव जवाहर लाल सिंह, दिलराज प्रीतम, जितेन्द्र कुमार आदि उपस्थित थे. जहानाबाद में पार्टी की केंद्रीय कमिटी सदस्य रामजतन शर्मा, राज्य कमिटी सदस्य व र्चिर्चत किसान नेता रामाधार सिंह ने सामाजिक परिवर्तन यात्रा के दौरान कई जगहों पर सभा को संबोधित किया. अरवल, सिवान, रोहतास, दरभंगा आदि जगहों पर भी यात्रा निकली हुई है.

कुमार परवेज, कार्यालय सचिव, भाकपा-माले

सामाजिक उत्पीड़न और सांप्रदायिक उन्माद से मुक्ति की लड़ाई बिहार से गुजरात तक है जारी: माले.

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19 सितंबर को सासाराम में आयोजित ‘सामाजिक परिवर्तन सम्मेलन’ में भाग लेंगे गुजरात दलित आंदोलन के नेता जिग्नेश मेवाणी.

बिहार में 4 से 15 सितंबर तक सामाजिक उत्पीड़न व सांप्रदायिक उन्माद के खिलाफ सामाजिक परिवर्तन यात्रा में भाग लेंगे छात्र-नौजवान-

काॅरपोरेट लूट, सांप्रदायिक हिंसा, राज्य दमन और दलितों पर अत्याचार पर आधारित है भाजपा का गुजरात माॅडल.

5 एकड़ की भूमि की मांग पर गुजरात में 15 सितंबर को रेले रोको आंदोलन के समर्थन में बिहार में भी होगा चक्का जाम.

पटना 21 अगस्त 2016

भाजपा के ‘गुजरात माॅडल’ की सच्चाई पूरी तरह बेपर्द हो गयी है. भाजपा जिसे ‘विकास’ का बेहतरीन माॅडल बता रही थी, वहां दलित उत्पीड़न के खिलाफ दलितों के ऐतिहासिक उभार और उसके बाद दलित-अल्पसंख्यकों की मजबूत एकता पूरे देश को एक नया संदेश दे रही है. भाजपा के इस माॅडल में जहां एक तरफ दलितों पर अमानवीय अत्याचार है, वहीं दूसरी ओर काॅरपोरट घरानों को लूट की पूरी छूटें हासिल हैं. अल्पसंख्याकें के खिलाफ गुजरात को सांप्रदायिक उन्माद व राज्य दमन की लेबोरट्री बना देने की नरेन्द्र मोदी और भाजपा के कारनामांे से तो पूरी दुनिया परिचित है.

अहमदाबाद से ऊना तक (5 अगस्त से लेकर 15 अगस्त) आयोजित दलित अस्मिता यात्रा में बिहार से भाकपा-माले और इंकलाबी नौजवान सभा के नेतागण शामिल हुए. तरारी से माले विधायक सुदामा प्रसाद और दरौली से पूर्व विधायक अमरनाथ यादव इस यात्रा के हिस्सा बने. वहीं, इंकलाबी नौजवान सभा के राज्य अध्यक्ष मनोज मंजिल, रविन्द्र यादव, जितेन्द्र पासवान, सुजीत कुशवाहा आदि नेता पूरी यात्रा के हिस्सा बने और 15 अगस्त को ऊना में आयोजित सभा में हिस्सा लिया. 15 अगस्त की सभा में भाकपा-माले पोलित ब्यूरो सदस्य कविता कृष्णन भी शामिल हुईं. यात्रा के दौरान बिहार से गये नेेताओं ने जगह-जगह सभाओं को संबोधित किया.
भाकपा-माले ने बिहार में लंबे समय से सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ सामाजिक परिवर्तन के लिए दलितों-गरीबों की चल रही लड़ाई का प्रतिनिधित्व किया है. नौजवानों की टीम ने यात्रा के दौरान गुजरात के दलितों के साथ संवाद स्थापित किया और कहा कि आज बिहार की लड़ाई गुजरात तक फैल गयी है. यह बेहद स्वागतयोग्य है. दिल्ली में बैठी मोदी सरकार और विभिन्न राज्यों में कायम जनविरोधी, दलित विरोधी, छात्र-नौजवान विरोधी, मजदूर-किसान विरोधी सरकारों के खिलाफ छात्र-नौजवानों, मजदूर-किसानों, दलित-अल्पसंख्यकों, महिलाओं और बुद्धिजीवियों का व्यापक मोर्चा बनने लगा है. आने वाले दिनों में दलित मुक्ति का प्रश्न और व्यापक व राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण करेगा.
गुजरात की दलित अस्मिता यात्रा के संदेश को अब हम बिहार के ग्रामीण इलाकों में ले जायेंगे. आगामी 4 से 15 सितंबर तक बिहार में भाकपा-माले ने सामाजिक परिवर्तन यात्रा संचालित करने का निर्णय लिया है. 15 सितंबर को गुजरात में जारी दलित आंदोलन ने रेल रोको कार्यक्रम का आयोजन किया है. इसके समर्थन में हम पूरे बिहार में कार्यक्रम आयोजित करेंगे. 19 सितंबर को भाकपा-माले के 10 वें राज्य सम्मेलन के अवसर पर सासाराम में सामाजिक परिवर्तन सम्मेलन का आयोजन किया गया है, जिसे गुजरात दलित आंदोलन के नेता जिग्नेश मेवाणी भी संबोधित करेंगे.

गुजरात में दलितों के ऐतिहासिक आंदोलन ने आरक्षण में सिमटे दलित प्रश्न को एक बार फिर से व्यापक आयाम प्रदान किया है. जिस तरह से साठ के दशक में नक्सलबाड़ी के निम्न जाति किसानों व आदिवासियों की लड़ाई का फैलाव पूरे देश में हुआ और बिहार के भोजपुर जिले के एकवारी में नक्सबाड़ी की चिंगारी पहुंची और सामाजिक अत्याचार के खिलाफ लोकतंत्र के लिए चल रही लड़ाई से वह एकाकार हुई, उसी तरह आज बिहार व गुजरात की भी लड़ाई एकाकार हो रही है. सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई का संदेश लेकर बिहार के नौजवान गुजरात गए थे. गुजरात में सदियों से जारी सामाजिक गुलामी की प्रथाओं से मुक्ति व भूमि का सवाल प्रमुखता से उठ खड़ा हुआ है.

गुजरात के दलित उभार ने कुछ मांगों को प्रमुखता से उठाया है. सरकार को अमानीवय परंपराओं, जैसे मैला ढोने, मरे पशुओं का खाल खींचने आदि जैसे कार्यों के लिए सरकारी व्यवस्था करनी होगी. यह बेहद शर्मनाक है कि आज भी ये सारे अमानवीय कार्य दलित समाज के हिस्से हैं. गुजरात में दलितों की आबादी कम है, लेकिन दलित उत्पीड़न की घटनायें कहीं अधिक हैं. इन उत्पीड़न की घटनाओं में दोषियों को सजा देने का अनुपात यदि शेष भारत में 22 प्रतिशत है, तो गुजरात में महज 2.9 प्रतिशत है. वहां अंबानी-अडानी को जहां जमीन लूटने की पूरी छूट है, महज 1 लाख 63 हजार 808 एकड़ जमीन पर गरीबों-दलितों को पर्चा मिला है. पर्चा मिल भी गया है, तो उस पर उनका कब्जा नहीं है. 50 हजार एकड़ भूदान की जमीन है, जिस पर भी उनका कब्जा नहीं है. दलित उभार की प्रमुख मांगों में जमीन का वितरण, वनाधिकार कानून को लागू करना, हर जिला में दलित उत्पीड़न की घटनाओं पर तत्काल कार्रवाई के लिए न्यायालय की व्यवस्था, सफाईकर्मियों के लिए सम्मानजनक रोजगार की व्यवस्था आदि शामिल हैं.

राजाराम सिंह – केंद्रीय कमिटी सदस्य भाकपा-माले

मनोज मंजिल – राज्य अध्यक्ष, इनौस

रविन्द्र यादव – इनौस

जितेन्द्र पासवान – इनौस

सुजीत कुशवाहा – इनौस

शराब से हुई मौतें प्रशासन और शराब माफियाओं के नापाक गठजोड़ का परिणाम: माले

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पटना 19 अगस्त 2016

गोपालगंज में जहरीली शराब से बड़े पैमाने पर हुई मौत के लिए सीधे तौर नीतीश सरकार द्वारा शराबबंदी पर लाया गया काला कानून और जिला प्रशासन व सदर अस्पताल का गैरजिम्मेवाराना रवैया दोषी है. जिला प्रशासन लंबे समय तक जहरीली शराब से मौत से ही इंकार करती रही. वहीं, सदर अस्पताल में सिविल सर्जन कहते रहे कि ‘तुम सब लोग फंस जाओगे, सबको सजा हो जाएगी और इस तरह उन्होंने अस्पताल से केवल रेफर करने का काम किया. यही वजह थी कि मरने वालों की संख्या 17 तक पहुंच गई. भाकपा-माले की जांच टीम को यह भी पता चला कि शराबबंदी पर कड़े कानून की वजह से कई लोग अस्पताल ही नहीं पहुंचे और इस तरह मरने वालों की संख्या कहीं अधिक है.

हमारी जांच टीम को पता चला कि 18 अगस्त को शहर में अखाड़ा को लेकर जिला प्रशासन ने एक जिला स्तरीय शांति समिति की बैठक बुलाई थी. इस बैठक में भी भाकपा-माले ने शहर के अंदर खजूरबानी में शराब की बिक्री का ठोस तथ्य प्रशासन उपलब्ध कराया था और इस पर रोक लगाने की मांग की थी. लेकिन जिला प्रशासन ने इसे मानने से इंकार कर दिया. बैठक से ही एसपी ने किसी को फोन किया और कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है. जबकि खजूरबानी में शराब बनाने की बात पूरे शहर को पता है. ऐसे में स्वाभाविक सवाल उठता है कि प्रशासन को इसकी कैसे जानकारी नहीं है? यदि समय रहते जिला प्रशासन ने उचित कदम उठाये होते, तो इस दर्दनाक हादसे को रोका जा सकता था. मरने वालों में (दीनानाथ मांझी, परमा महतो, मंटू गिरी, उमेश चैहान, शशिकांत शर्मा, रामजी शर्मा, सोवराती मियां, अनील राम, राजू राम, दुर्गेश राम, विनोद सिंह, दिनेश महतो, बंधु राम, धर्मेन्द्र महतो, प्रेमचंद सिंह, मनोज साह, भुटेली शर्मा) शामिल हैं. जिला प्रशासन के इस आपराधिक लापरवाही के लिए वहां के डीएम व एसपी को तत्काल पद से निलंबित किया चाहिए.

नीतीश सरकार ने पहले पूरे बिहार को शराब में डुबोया और अब वह ‘शराबबंदी’ पर राजनीति चमका रही है. जबकि उसे शराबबंदी की वजह से जिन समुदायों का परंपरातगत पेशा नष्ट हुआ, उनके लिए उसे वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था करनी चाहिए थी. ऐसा कहीं नहीं हो रहा है. गोपालगंज की दर्दनाक घटना ने इस सच की ओर भी इशारा किया है कि बिना राजनीतिक-प्रशासनिक संरक्षण के शराब की बिक्री संभव नहीं है. एक तरफ सरकार शराबबंदी का प्रचार चला रही है, तो दूसरी ओर राजनेता-प्रशासन व शराब माफियाओं का गठजोड़ शराब के उत्पादन व तस्करी में लगा हुआ है. उत्तरप्रदेश से सटे जिलों में शराब की तस्करी खुलेआम हो रही है, और यह सरकार व प्रशासन को भी अच्छे से पता है. इसलिए ‘शराबबंदी’ पर राजनीति की बजाए बिहार में शराब की फैक्ट्रियों को तत्काल बंद किए जाने चाहिए और तस्करी पर सख्ती से रोक लगानी चाहिए.

शराब का सेवन कोई आपराधिक कृत्य नहीं, बल्कि एक सामाजिक बुराई है. लेकिन शराबबंदी को लेकर सरकार ने जो काला कानून बनाया है, वह कहीं से उचित नहीं है. इस काले कानून को अविलंब वापस किया जाए और शराब से छुटकारा दिलाने के लिए आपराधिक व्यवहार की बजाए नशा से पीड़ितों के पुनर्वास व सुधार के उपायों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.

गोपालगंज की घटना के खिलाफ 20 अगस्त को भाकपा-माले ने गोपालगंज में प्रदर्शन का भी कार्यक्रम लिया है.
जांच टीम में भाकपा-माले विधायक दल के नेता महबूब आलम, राज्य स्थायी समिति सदस्य काॅ. राजाराम व गोपालगंज जिला सचिव काॅ. इंद्रजीत चैरसिया तथा सिवान जिला सचिव काॅ. नईमुद्दीन असंारी शामिल थे.

महबूब आलम राजाराम
नेता विधायक दल, भाकपा-माले राज्य स्थायी समिति सदस्य, भाकपा-माले

ग्वाल टोली (बलरामपुर) की घटना दुर्भाग्यपूर्ण व अफसोसजनक – कुणाल

पटना 30 जुलाई 2016.

माले राज्य सचिव कुणाल ने बलरामपुर के ग्वाल टोली शाखा प्रबंधक पर बलरामपुर के पार्टी विधायक महबूब आलम द्वारा थप्पड़ मारे जाने की घटना को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए इस पर अफसोस जताया है. उन्होंने कहा है कि लंबे समय से बैंक द्वारा गरीबों-महिलाओं के साथ गलत व्यवहार, भ्रष्टाचार व अनियमितता का यह नतीजा है. उन्होंने बैंक में जारी भ्रष्टाचार व अनियमितता की बैंक द्वारा उच्चस्तरीय जांच कराए जाने की भी मांग की है.

उन्होंने कहा कि अभी बलरामपुर का संपूर्ण इलाका बाढ़ की चपेट में है और लोगों के सामने जीवन-मरण का सवाल है. कहने की जरूरत नहीं कि यह इलाका बिहार के सबसे पिछड़े इलाकों में एक है, जहां से व्यापक पैमाने पर पलायन होता है. दूर-दराज कमाने वाले लोग बैंकों के जरिए पैसा अपने घर वालों को भेजते हैं. लेकिन आम लोगों की शिकायत रहती है कि शाखा प्रबंधक उनका ही पैसा देने में काफी आना-कानी करते हैं और लोगों को बेवजह परेशान करते हैं, ताकि उसमें घूस ली जा सके विभिन्न योजनायें भी आजकल बैंकों से ही संचालित हो रही हैं, लेकिन बैंक प्रबंधक के खराब व्यवहार के कारण आम लोगों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. आम लोगों के पक्ष में काम करने की बजाए बैंक आज बिचौलियों व लूट का अड्डा बनता जा रहा है. बिना कमीशन का कोई काम नहीं होता है और बैंक अधिकारी गरीबों के साथ मालिक जैसा सलूक करते हैं.

हालिया घटनाक्रम में 20-25 महिलायें विधायक महबूब आलम से शिकायत करने पहुंची कि ग्वालटोली शाखा के प्रबंधक उनका पैसा नहीं दे रहे और कमीशन मांग रहे हैं. साथ ही, छात्राओं का एकाउंट भी नहीं खोल रहे. इसी विषय पर बातचीत करने के लिए महबूब आलम बैंक मैनेजर के पास पहुंचे, जहां स्थिति बिगड़ गयी और माहौल खराब हो गया और ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना घट गयी.

माले राज्य सचिव ने कहा कि ऐसी परिस्थिति भविष्य दुबारा न घटे, इसलिए ग्वाल टोली शाखा की अनियमितता और जनता के साथ उसके सलूक की उच्चस्तरीय जांच करानी चाहिए.

बिहार विधानसभा से गुजरात दलित उत्पीड़न के खिलाफ निंदा प्रस्ताव की मांग करेगा माले.

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गुजरात में राज्य मशीनरी और पुलिस के संरक्षण में अपराधी गौरक्षा समितियों ने दलितों पर किया हमला.
बिहार विधानसभा से गुजरात दलित उत्पीड़न के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाने की माले करेगा मांग.
टाॅपर घोटाला के राजनीतिक संरक्षण की न्यायिक जांच और अन्य मुद्दों पर 1 अगस्त को विधानसभा के समक्ष धरना.

पटना 31 जुलाई 2016
ऊना की घटना देश के विभिन्न हिस्सों में चल रही घटनाओं का ही एक दोहराव है. पूरी घटना में साफ तौर पर दिखता है कि किस तरह राज्य प्रशासन, पुलिस और हिंदू हितों की रक्षा के नाम पर समाज में मौजूद विभिन्न लंपट – गुंडा तत्वों का संगठित गठजोड़ आरएसएस – भाजपा के ऐजेंडे को लागू कर रहा है. ऊना के आसपास के गांवों में भी लंपट – अपराधी तत्वों ने अपने आप को गौ रक्षक बताते हुए गौ रक्षा दल बनाऐ हैं. इस घटना के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों/कर्मियों को तत्काल निलंबित कर उनके ऊपर दलित एक्ट के मुताबिक कार्यवाही की जानी चाहिए.

इस पूरे मामले में राज्य की भाजपा सरकार और उसके इशारे पर पुलिस – प्रशासन ने लगातार अपराधियों को बचाने का काम किया है. यह इस बर्बर घटना पर उसके द्वारा की गई कार्यवाही से स्पष्ट हो जाता है. हम जब इस घटना के 15 दिन बीत जाने के बाद इस इस गांव में पहुंचे तो तब तक पूरी घटना में शामिल 40 से ज्यादा लोगों में से सिर्फ 17 लोगों की गिरफ्तारी हुई थी. ग्रामीण इस बात का जिक्र स्पष्ट तौर पर करते हैं कि पूरी घटना पुलिस की शह पर हुई लेकिन मात्र तीन पुलिस वालों को निलंबित किया गया है. दिनांक 11.07.16 को धारा 307, 395, 324, 323, 504 और ‘गुजरात पुलिस एक्ट’ 135 आई.पी.सी के तहत मात्र 6 लोगों को ही नामजद किया गया.
इस दौरे के बाद स्थानीय जनता – ग्रामीणों और प्रभावितों से बातचीत करने के बाद हमने महसूस किया है कि केन्द्र में सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने पूरे देश में अल्पसंख्यकों – दलितों – लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले संगठनों व्यक्तियों पर हमला लगातार तेज हुआ है. गुजरात प्रकरण ने इसे और भी वीभत्स तरीके से सामने ला दिया है. दलितों को बुरी तरह अपमानित और पीटे जाने वाले इस प्रकरण के लिए राज्य सरकार और मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल ने जिस तरह उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाकर अपराधियों को परोक्ष रूप से शह दी उसके लिए जांच टीम मांग करती है कि मुख्यमंत्री को दलितों से माफी मांगते हुए अपने पद से इस्तीफ देना चाहिए.
ऊना में तथाकथित गौ रक्षकों द्वारा हमले में बुरी तरह मारे और अपमानित किए गए दलित नौजवानों के परिवारों से मुलाकात की. ऊना कस्बे के पास स्थित मोटा समधिया गांव की आबादी 3000 है, इसमें 26 -27 दलित परिवार रहते हैं. सभी दलित परिवारों के लोग खेत मजदूर हैं, नौजवानों का एक छोटा हिस्सा पढ़ा लिखा बेरोजगार है. इन दलित परिवारों में सिर्फ एक परिवार (बालू भाई वीरा भाई समदिया) मरे हुए घरेलू जानवरों का चमड़ा उतरने का काम करता है. यह हमला इसी परिवार के नौजवानों पर किया गया

अपने दौरे में जांच दल अहमदाबाद के चांदखेड़ा में इस घटना के विरोध में विभिन्न दलित संगठनों द्वारा चलाए जा रहे धरने में भी शामिल हुआ और उनकी मांगों और आंदोलन के प्रति अपनी एकजुटता जाहिर की. गंभीर रूप से घायल सभी दलितों को अविलंब 5 – 5 लाख रूपए का मुआवजा दिया जाय साथ ही उन्हें सम्मानजनक ढंग से जिंदगी बसर करने के लिए रोजगार की गारंटी सरकार करे. गुजरात के इस बर्बर प्रकरण में जांच दल मांग करता है कि जगह जगह गठित गौ – रक्षा दलों (जिनमें कि आरएसएस और शिवसेना के लोग ही हैं) पर तत्काल गुजरात में प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए.
जांच टीम में भाकपा माले के पोलित ब्यूरो सदस्य काॅ प्रभात कुमार, अखिल भारतीय खेत मजदूर सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व सांसद रामेश्वर प्रसाद सिंह, आॅल इंडिया पीपुल्स फोरम के तुषार परमार, इंकलाबी नौजवान सभा के राष्ट्रीय सचिव अमित पटनवाडिया और ब्लैक पैंथर के अभिषेक परमार शामिल थे.

भाकपा-माले बिहार विधानसभा के चालू सत्र में गुजरात में दलितों के बर्बर दमन के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाने की मांग करेगी.
इधर बिहार में मुजफ्फरपुंर, दरभंगा आदि जगहों पर दलितों-गरीबों पर बढ़ते सामंती-सांप्रदायिक पर रोक लगाने, टाॅपर घोटाले के राजनीतिक संरक्षण की उच्चस्तरीय जांच कराने, अनाज के बदले पैसा योजना वापस लेने, मध्यान्ह भोजन योजना को एनजीओ के हवाले किए जाने के खिलाफ 1 अगस्त को विधानसभा के समक्ष एक दिवसीय धरना दिया जाएगा.

रामेश्वर प्रसाद धीरेन्द्र झा
पूर्व सांसद व केंद्रीय कमिटी सदस्य, भाकपा-माले पेलित ब्यूरो सदस्य, भाकपा-माले