अराजक सिडकुल – पूंजीपतियों के समक्ष नतमस्तक सरकार और पिटना एक श्रमिक नेता का

- इंद्रेश मैखुरी, राज्य कमेटी सदस्य, भाकपा (माले) उत्तराखण्ड

के.के.बोरा हमला_1बीती 2

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भाकपा (माले) का दो दिवसीय राज्य सम्मलेन श्रीनगर (गढ़वाल) में सम्पन्न

- इन्द्रेश मैखुरी

भाकपा(माले) का दो दिवसीय राज्य सम्मलेन श्रीनगर (गढ़वाल) में सम्पन्न हुआ. सम्मलेन स्थल टिहरी राजशाही के खिलाफ निर्णायक शहादत देने वाले कामरेड नागेन्द्र सकलानी को समर्पित था और सम्मलेन नगर को पेशावर विद्रोह के नायक कामरेड चन्द्र सिंह गढ़वाली को समर्पित किया गया था. राज्य सम्मलेन से 15 सदस्यीय राज्य कमेटी चुनी गयी, जिसमे कामरेड राजेन्द्र प्रथोली, राजा बहुगुणा, पुरुषोत्तम शर्मा, बहादुर सिंह जंगी, कैलाश पाण्डेय, के.के.बोरा, आनंद सिंह नेगी, इन्द्रेश मैखुरी, विमला रौथाण, गोविन्द कफलिया, के.पी.चंदोला,

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Shraddhanjali

The CPI(ML) Uttarakhand State Committee has expressed profound grief at the sudden demise of Party member in Nainital, Comrade Mohan Singh. He was only 48. A condolence meet was organised at Haldwani State Office attended by many including State Secretary Comrade Rajendra Pratholi. Comrade Mohan Singh joined communist led peasant movemen

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उत्तराखण्ड राज्य कमेटी

Communist Party of India (Marxist-Leninist) Liberation

Uttarakhand State Committee

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन

उत्तराखण्ड राज्य कमेटी

  1. Com. Rajendra Pratholi (राजेंद्

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कांग्रेस-भाजपा-बागियों से जनता की जीत जरुरी है

- इन्द्रेश मैखुरी

कुछ समय पहले जब हरीश रावत ये कह रहे थे कि “न खाता न बही, जो हरीश रावत कहे, वो ही सही” तो ऐसा लगा रहा था कि 2014 में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही वो अपने और अपनी सरकार के लिए कोई इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त कर चुके हैं. लेकिन खाता-बही वाले अपने अमृत वचन के दो-तीन महीने के अन्दर ही हरीश रावत की अवस्था यह हो गई कि खाता-बही से तो वो पहले ही हाथ झाड़ चुके थे, अब सत्ता से भी हाथ धो बैठे हैं.

सरकार गिराने को लेकर शुरू हुआ शह-मात का खेल जारी है. पल-पल बदलते घटनाक्रम में कभी हरीश रावत, कभ

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“न गढ़वाली,न कुमाउनी हम उत्तराखंडी छों” – चन्द्र सिंह राही जी को श्रद्धांजलि

- इन्द्रेश मैखुरी

चन्द्र सिंह राही, ग्रामोफोन, कैसेट, सी.डी. दौर की पहली पीढ़ी के गढ़वाली लोकगायकों में से एक थे. उनका जन्म 28 मार्च 1942 को हुआ और 10 जनवरी 2016 को वे इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह गए. वे बेहतरीन आवाज के स्वामी थे. उनकी लहराती आवाज उम्र के सात दशक बाद भी पूरे सुरीलेपन के साथ कायम थी. ख़ास तौर पर जब वे गीत के बीच में अलाप लेते थे- “आँ…हाँ..हाँ.हो..” या “ओ….हो…हरी हो” तो आवाज की खनक सुनने वालों के भीतर भी छनछनाहट पैदा करती थी. गाते हुए, बिना सुर

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राजजात के लिए हुए करोड़ों के कार्यों में धन की जम कर बंदरबांट

- इन्द्रेश मैखुरी

अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता, जब उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार, नंदादेवी राजजात को सफलता पूर्वक आयोजित करने के लिए अपनी पीठ अपने आप ठोक रही थी. लेकिन अब अखबारों में इस तथाकथित सरकारी सफलता के कच्चे चिट्ठे बाहर निकल रहे हैं. अमर उजाला में छपी खबर के मुताबिक राजजात के लिए हुए करोड़ों के कार्यों में धन की जम कर बंदरबांट हुई. खबर के अनुसार चमोली जिले की तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती रजनी भंडारी ने निविदा समिति की अनुशंसाओं को दरकिनार कर, अधिक दरों पर टेंडर डालने वालों को काम आवंटित कर दिए. यह खब

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मेले – उत्सव – घुमन्तु मुख्यमंत्री और शहीदों का अपमान

- इन्द्रेश मैखुरी

हरीश रावत राज्य से अधिक मेलों के मुख्यमंत्री होते जा रहे हैं. मेलों में उनके जाने की यदि यही गति रही तो वे गिनिज बुक में सर्वाधिक मेलों का उद्घाटन करने वाले मुख्यमंत्री के रूप में स्वयं को दर्ज किये जाने का दावा पेश कर सकते हैं. दरअसल जैसे मोदी विदेश घूम कर प्रधानमन्त्री बनने का उत्सव मना रहे हैं, वैसे ही हरीश रावत मेलों में घूम-घूम कर मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी का उत्सव मना रहे हैं. ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री के मन का मोर, मेला नाम सुनते ही हेलीकाप्टर पर चढने को मचल उठता है. वह मेला किसका है,

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कामरेड मान सिंह पाल – एक जुझारू साथी की कुछ यादें

- भाकपा (माले), उत्तराखण्ड राज्य कमेटी

कामरेड मान सिंह पाल का जन्म अस्कोट, जौलजीवी में 1962 में हुआ। 1979 में वे उत्तराखंड के हल्द्वानी में ट्रक क्लीनर का काम कर रहे थे। इस बीच बिन्दुखत्ता में चल रहे भूमि संघर्ष की खबरों से प्रभावित होकर वे बिन्दुखत्ता आ गए और बिन्दुखत्ता के भूमि संघर्ष में जुट गये। 1981 में इस आंदोलन का भाकपा माले से संपर्क हुआ और इसके प्रमुख नेता पार्टी से जुड़े। उस दौर में यहीं उनका भाकपा (माले) से संपर्क हुआ। शीघ्र ही अपने जुझारू तेवर के कारण वे इस भूमि संघर्ष के मुख्य नेता बहादुर सिंह जंगी, भुवन जोशी आदि के स

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