COMMENTARY

Suicide of a Refugee : Plight of Sri Lankan Tamils in Tamil Nadu

On 6th March this year, a 45 year-old Sri Lankan Tamil refugee Raveendran climbed up to the high-tension electric tower in the Uchapatti refugee camp of Madurai, and electrocuted himself by touching the wire, falling fifty feet. Before he committed suicide,

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What Is The Government Hiding?

(Author is a Research Consultant with the Coalition for Nuclear Disarmament and Peace. This is a slightly updated version of an article that appeared in Scroll.in) On March 11, news came out that there has been a leak at the

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Corporate Plunder From Public Sector Banks

The Modi Government has made it clear that while it will help corporations loot and scoot from India, it will brand activists defending the rights of India’s poor as ‘anti-nationals’. The Modi Government prevented the environmental activist Priya Pillai

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Right to Privacy vs the State and Private Interests

Most of us have seen some or the other family member, friend, colleague, or neighbor bustle about getting an Aadhar Card for the whole family. Mass camps were conducted where we live to have everyone come in and give biometric

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उत्तराखंड : हाई कोर्ट में राजनीति

उत्तराखंड की राजनीति में पिछले 10-12 दिन से जारी उथल-पुथल में नित नए दृश्य उपस्थित हो रहे हैं. यह सत्ता संघर्ष विधानसभा से निकल कर राजभवन, राष्ट्रपति भवन होता हुआ उच्च न्यायालय, नैनीताल पहुँच गया है. उच्च न्यायालय में भी 29 और 30 मार्च को एकल पीठ और मुख्य न्यायाधीश वाली दो न्यायाधीशों की पीठ में सत्ता से बाहर कर दिए गए निवर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत और विपक्षी भाजपा ने जिस तरह के दांव-पेंच दिखाए, वे अजब-गजब हैं. हाई कोर्ट में दो दिन दो अलग-अलग पीठों के फैसले और उससे पहले हुए घटनाक्रम से यह साफ़ है की भले ही इस प्रकरण से जुड़े सभी पक्ष विधानसभा में विशवास-अविश्वास मत पर जोर आजमाईश में खुद के बलशाली होने का दावा कर रहे हों, लेकिन वास्तविकता यह है कि सदन परीक्षण यानि फ्लोर टेस्ट का सामना करने को कोई तैयार नहीं है. केंद्र में सत्तासीन और उत्तराखंड में अब तक विपक्ष में रही भाजपा तो पहले ही सदन में संख्या बल की आजमाईश से किनारा करते हुए नजर आ चुकी थी. वरना राज्यपाल द्वारा हरीश रावत को बहुमत सिद्ध करने के लिए दिए गए समय से ठीक एक दिन पहले 27 मार्च को राज्य में केंद्र सरकार राष्ट्रपति शासन नहीं लगाती. लेकिन सबसे चौंकाने वाला रुख तो सत्ता से बेदखल हुए हरीश रावत का है. हरीश रावत बार-बार यह दावा करते रहे कि वे विधानसभा में बहुमत साबित कर देंगे. 29 मार्च को जब नैनीताल उच्च न्यायालय में उनके द्वारा दाखिल याचिका पर न्यायामूर्ति यू. सी. ध्यानी की एकल पीठ ने विधानसभा में शक्ति परीक्षण का आदेश दिया तो इसे हरीश रावत और उनके वकीलों ने इसे अपनी जीत करार दिया. 30 मार्च को इस फैसले को भारत सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के  मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति के. एम. जोसेफ और न्यायमूर्ति वी. के. बिष्ट की खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी. आश्चर्यजनक रूप से अभिषेक मनु सिंघवी के नेतृत्व में हरीश रावत की तरफ से खड़ी वकीलों की टीम ने भी न्यायमूर्ति यू. सी. ध्यानी के विधानसभा में शक्ति परीक्षण का आदेश देने वाले फैसले को स्थगित करने पर सहमति प्रकट की. यह वही फैसला है जिसे एक दिन पहले ही  निवर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत और उनके अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भी न्याय और लोकतंत्र की जीत बताया था. हरीश रावत ने उस समय फिर एक बार दावा ठोका था कि वे विधानसभा में बहुमत सिद्ध कर देंगे. फिर चौबीस घंटे बीतते-न-बीतते ऐसा क्या हुआ कि हरीश रावत जिस फैसले को अपनी जीत के रूप में प्रचारित कर रहे थे, उनके वकील उसी फैसले को स्थगित करवाने के लिए सहमत हो गए ? यह समझने के लिए 29 मार्च को दिए गए नयायमूर्ति यू. सी. ध्यानी के फैसले पर निगाह डालते हैं. इस फैसले में न्यायमूर्ति यू. सी. ध्यानी ने लिखा कि चूँकि विधानसभा अस्तित्व में हैं और अध्यक्ष भी अभी अपने पद पर हैं, इसलिए 31 मार्च को विधानसभा में शक्ति परीक्षण हो. साथ ही उन्होंने कहा कि 9 बागी हो चुके विधायकों समेत सभी को शक्ति परीक्षण में वोट देने का अधिकार होगा. हालांकि 9 बागी विधायकों का वोट अलग से गिनने का निर्देश भी उक्त फैसले में हैं. फैसले में राष्ट्रपति शासन लगाये जाने पर स्थगनादेश तो नहीं दिया गया, लेकिन उसपर कई सवाल उठाये गए हैं. इस मामले में अदालत के हस्तक्षेप को न्यायोचित ठहराते हुए राजस्थान राज्य बनाम भारत सरकार, 1997 में उच्चतम न्यायलय के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया है कि “अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं यदि वे इस बात से संतुष्ट हों कि फैसला दुराग्रहपूर्ण मंशा या असंगत अथवा अप्रासंगिक आधारों पर लिया गया हो”. यह राष्ट्रपति शासन लगाए जाने पर मुकम्मल टिप्पणी है. राष्ट्रपति शासन के मामले में नजीर माने जाने वाले उच्चतम न्यायालय के एस. आर. बोम्मई बनाम भारत सरकार, 1994 के फैसले के पैरा संख्या 118 और 119 का हवाला भी न्यायमूर्ति यू. सी. ध्यानी ने अपने फैसले में दिया. एस. आर. बोम्मई के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि “इस मामले में जहाँ कुछ विधायकों ने मंत्रिमंडल से समर्थन वापस लेने का दावा किया है, मंत्रिमंडल की शक्ति का परीक्षण केवल सदन के पटल पर ही हो सकता है मंत्रिमंडल की शक्ति का अंदाजा किसी व्यक्ति चाहे वह राज्यपाल या राष्ट्रपति ही क्यूँ न हो, के निजी आकलन के आधार पर नहीं हो सकता है.” हालांकि इस फैसले पर सवाल खड़े करने वालों का तर्क था कि सरकार जब अस्तित्व में है ही नहीं तो सदन परीक्षण किसका होगा? न्यायमूर्ति यू. सी. ध्यानी के फैसले से तो यह ध्वनित होता है कि सदन परीक्षण का आदेश गडबड नहीं है बल्कि गलती राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के तरीके से ही शुरू हो गयी थी. वे अपने फैसले में लिखते हैं कि राज्यपाल ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 175 के अंतर्गत प्राप्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए मुख्यमंत्री को विश्वास मत हासिल करने का निर्देश दिया. राज्यपाल ने अभी तक धारा 175 के तहत दिया उक्त निर्देश वापस नहीं लिया है. जस्टिस ध्यानी प्रश्न करते हैं कि राज्यपाल द्वारा सदन में विश्वास मत हासिल करने के निर्देशों को ‘शार्ट सर्किट’ करते हुए क्या धारा 356 को लागू किया जा सकता है? उक्त सभी टिप्पणियों को देखें तो साफ़ है कि राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के तौर-तरीके पर गंभीर सवाल खड़े किये गए हैं. इस तरह देखें तो हरीश रावत और कांग्रेस इसे अपने पक्ष में दिया गया फैसला मान सकते थे. उन्होंने ऐसा दावा किया भी. पर उपरी बेंच में वे इस फैसले को स्थगित करने पर क्यूँ सहमत हुए? दरअसल इसी फैसले में जो 9 बागी विधायक हैं, उन्हें भी विधानसभा की कार्यवाही में विश्वास मत के दौरान शामिल होने का अधिकार दिया गया है और उनके मत को अलग से गिने जाने का निर्देश भी दिया गया है. हालांकि फैसले में दल बदल पर काफी विस्तृत टिप्पणी है और इसी लोकतंत्र के आधारभूत तंतु को नष्ट करने वाला बताया गया है. फैसले में कहा गया है कि अगर विधायक इस तरह से वोट करेंगे कि वे अयोग्य साबित हो जाएँ तो वैधानिक परिणाम भुगतने के लिए उन्हें तैयार रहना चाहिए. लेकिन साथ ही कहा गया कि वह अवस्था अभी आई नहीं है. हालांकि बागी विधायकों के वकीलों ने स्वयं अदालत में कहा कि 356 लागू होने के चलते सदन की कार्यवाही नहीं चल सकती. इस तरह देखें तो बागी विधायक, जिन्हें उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने वोट देने और विधानसभा की कार्यवाही में शामिल होने का अधिकार दिया, वे स्वयं सदन में शक्ति परीक्षण के विरुद्ध तर्क दे रहे थे. केंद्र सरकार की तरफ से खड़े वकील ने कहा कि वास्तविक रूप से अभी राष्ट्रपति शासन लागू ही नहीं हुआ है. वह तो संसद के अनुमोदन के बाद लागू होगा, इसलिए अभी कोई राहत नहीं दी जानी चाहिए. एक तरह से विधानसभा में शक्ति परीक्षण का उन्होंने विरोध ही किया. और जैसा कि पहले इंगित किया जा चुका कि विधानसभा में मत परीक्षण पर जोर देने वाले उच्च न्यायालय की एकल पीठ के इस फैसले को स्थगित किये जाने पर स्वयं हरीश रावत ने डबल बेंच में सहमति प्रकट की. यानि विधानसभा में शक्तिपरीक्षण से हरीश रावत खुद भी मुंह चुरा रहे हैं. यह बड़ी विचित्र बात है कि जो हरीश रावत बहुमत का दावा कर रहे हैं और बागी व भाजपा जो हरीश रावत के अल्पमत में होने का दावा कर रहे हैं, उनमे से कोई भी विधानसभा के भीतर अपने बात सिद्ध करने को राजी नहीं है. यह दरअसल उत्तराखंड में चल रही सिद्धान्हीन राजनीति की अवस्था को ही पुनः उजागर करता है. इस राजनीतिक नाटक की शरुआत होते ही बागी विधायक भाजपा के विमान में सवार हो कर राज्य से बाहर चले गए. भाजपा ने अपने विधायकों को जयपुर पहुंचा दिया. कांग्रेस के विधायक कार्बेट पार्क के रिजार्टो में कैद हो गए. ये सम्मानित जनप्रतिनिधि हैं.लेकिन यह एक जगह गाय-बकरियों की तरह घेर कर रखा जाना दर्शाता  है कि माननीयों के बारे में उनके अपने दलों/खेमों में क्या मान्यता है? मान्यता यह है कि कोई भी “माननीय” अकेला छोड़ा गया तो वह न जाने कब दूसरे के हाथों बिक जाए. इसे हॉर्स ट्रेडिंग कहा जाता है पर घोड़े बेचारे को खुद बिकने का सौभाग्य कहाँ प्राप्त है? जिनके बारे में उनके दल/खेमें यह भरोसा करने को तैयार न हों कि वे अकेले में बिकेंगे नहीं, वे यदि माननीय हैं तो फिर अवमाननीय कैसे होते हैं? बहरहाल माननीयों के इस बिकाऊ अवस्था को प्राप्त होने के चलते ही तीनों खेमों यानी कांग्रेस, भाजपा और बागियों को विधानसभा में मत परीक्षण से भागना ही सबसे सही कदम लग रहा है. धुर विरोधी होते हुए भी इस मामले में तीनों में एका है. उच्च न्यायालय भी वे राहत पाने नहीं राजनीतिक दांव-पेंच आजमाने ही गए हुए हैं. इस मामले में अगली सुनवाई 6 अप्रैल को निर्धारित है. पर प्रश्न यह भी है कि जब माननीय अपने दल/खेमों वालों पर तक भरोसा नहीं कर पा रहे हों तो फिर जनता को ही उनपर भरोसा क्यूँ करना चाहिए ?  

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হে অামার দেশ : উঠে দাঁড়াও

এক নয়া ভারত গড়ে তুলতে : ভগৎ সিং-অাম্বেদকরের পথে এইচসিইউ থেকে জেএনইউ : ক্যাম্পাস বাঁচাও! গণতন্ত্র বাঁচাও! ভারত বাঁচাও!

    এইচসিইউ, জেএনইউ ও উচ্চ শিক্ষার ওপর অার এস এস-বিজেপি সরকারের হামলা রুখে দাও! বন্দি জেএনইউ ছাত্রদের মুক্তি চাই! জেএনইউ ছাত্রদের ওপর থেকে দেশদ্রোহ ও অন্যান্য উদ্দেশ্যপ্রণোদিত অভিযোগ তুলে নাও! ইন্ডিয়ান পেনাল কোড থেকে দেশদ্রোহ ধারা বাতিল কর ! ৮ জেএনইউ ছাত্রের ওপর থেকে সাসপেনশন তুলে নাও ! বিশ্ববিদ্যালয়সমূহ ও অন্যান্য উচ্চ শিক্ষা প্রতিষ্ঠানসমূহে বর্ণ বৈষম্য সমাপ্ত করতে “রোহিত অাইন” চালু কর! এইচসিইউ ও জেএনইউ ছাত্রদের বিরুদ্ধে দমনপীড়ন এবং মিথ্যা প্রচার ও ক্ষমতার অপব্যবহারের জন্য স্মৃতি ইরানিকে অবশ্যই পদত্যাগ করতে হবে!
“ভগৎ সিং এই সময় তুমি ভারতে জন্ম নিয়ো না এখনো এখানে দেশপ্রেমিকদের ফাঁসি দেওয়া হয় যদি তুমি জনতার পক্ষে মুখ খোল, তোমাকে দেশদ্রোহী বলা হবে, ধর্মঘট তো দূর অস্ত – এমনকি বক্তৃতা দিলেও জেল হবে।” – শৈলেন্দ্র এফটিঅাইঅাই থেকে শুরু করে অাইঅাইটি মাদ্রাজ, এইচসিইউ ও জেএনইউ এবং এখন এলাহাবাদ বিশ্ববিদ্যালয় – মোদী সরকার বিশ্ববিদ্যালয় ক্যাম্পাসসমূহের ওপর এবং ভিন্ন মত পোষণের অধিকারের ওপর যুদ্ধ ঘোষণা করেছে। যদি এই যুদ্ধে এক তরুণ জীবন – রোহিত ভেমুলার – অকালে খসে পড়েছে, অারও কয়েক জন জেএনইউ তরুণ ছাত্র দেশদ্রোহিতার দায়ে অভিযুক্ত, তাদের অকথ্য কুৎসাপ্রচার, গ্রেপ্তারি, সাসপেনশন ও থানা লক-অাপে অত্যাচারের সম্মুখীন হতে হচ্ছে। তবে এইচসিইউ ও জেএনইউ ছাত্রদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ বিজেপির ওপর বুমেরাং হয়ে পড়েছে। সারা দেশের জনগণ জেএনইউ ছাত্রদের পুঁজিবাদ, জাতিবাদ ও সাম্প্রদায়িকতাবাদ থেকে স্বাধীনতার শ্লোগানকে সমর্থন করেছেন। তারা রোহিত ভেমুলা এবং জেএনইউ ছাত্রদের ভারতের জনগণের প্রতি দায়বদ্ধতা ও ভালবাসার জন্য বাহবা জানিয়েছেন। জনগণ উপলব্ধি করছেন যে, যেসব বিজেপি-অারএসএস নেতারা সাংবাদিক ও অান্দোলনকারীদের মারধোর করে, কানহাইয়ার জিভ কেটে দেওয়া বা তাকে গুলি করে হত্যার কথা বলে, যাদবপুরের ছাত্রদের ওপর হামলা চালায়, জেএনইউ-এর ছাত্রীদের বেশ্যা বলে গালাগালি দেয় এবং রোহিত ভেমুলাকে বারে বারে দেশ-বিরোধী তকমা লাগিয়ে দেয় তাদের কোনো দেশপ্রেম নেই। গণতন্ত্র ও ভারতের জনগণের অধিকারের প্রতি তাদের রয়েছে কেবল ঘৃণা ও অবমাননা। রোহিত ভেমুলা ও জেএনইউ ছাত্রদের ডাইনি খোঁজা রোহিতকে বিশ্ববিদ্যালয় থেকে বহিস্কার করা হয়েছিল এক এবিভিপি নেতাকে অাহত করার ভূয়ো অভিযোগে। তাকে ও তার সাথীদের অাম্বেদকরপন্থী হওয়া এবং সাম্প্রদায়িক দাঙ্গার বিরুদ্ধে অাওয়াজ তোলার জন্য 'দেশ-বিরোধী, জাতিবাদী ও উগ্রপন্থী তকমা লাগানো হয়েছে। জেএনইউএসইউ প্রেসিডেন্ট কানহাইয়া কুমার, সাধারণ সম্পাদক রামা নাগা, প্রাক্তন প্রেসিডেন্ট অাশুতোষ কুমার ও প্রাক্তন উপ-সভাপতি অনন্ত প্রকাশ নারায়ণ এবং উমর খলিদ ও অনির্বান ভট্টাচার্য সহ অাট জন ছাত্রকে বিশ্ববিদ্যালয় থেকে সাসপেন্ড করা হয়েছে এবং তাদের বিরুদ্ধে ভূয়ো ভিডিও, ভূয়ো টুইট ও ভূয়ো গোয়েন্দা রিপোর্টের ওপর ভিত্তি করে দেশদ্রোহিতার অভিযোগ অানা হয়েছে। অাবার যেমন রোহিতের মামলায় তাদেরকেও বিজেপি-অারএসএস-এর নীতির বিরুদ্ধে চ্যালেঞ্জ জানানোর অপরাধে 'দেশ-বিরোধী' তকমা লাগানো হয়েছে। এবিভিপির উস্কানিতে ও বিজেপি সাংসদদের নেতৃত্বে রোহিত এবং জেএনইউ ছাত্রদের বিরুদ্ধে কুৎসা প্রচার ও বিশ্ববিদ্যালয় থেকে বহিস্কার করা হয়েছে। ডাইনি খোঁজার ফলশ্রুতিতে রোহিত ভেমুলার দুঃখজনক মৃত্যুর ঘটনা থেকে শিক্ষা নেওয়ার পরিবর্তে মোদী সরকার জেএনইউ ছাত্রদের ওপর এমনকি অারও জঘন্য রকম ডাইনি খোঁজা চালিয়ে যাচ্ছে। কেন মোদী সরকার রোহিত ও জেএনইউ-কে ভয় পাচ্ছে? গ্রামীণ ভারতের বঞ্চিত ও দরিদ্র পরিবার থেকে উঠে অাসা রোহিত ও জেএনইউ ছাত্ররা বিশ্ববিদ্যালয়ে প্রবেশ করতে সক্ষম হয়েছে, পড়াশুনা করছে, দেশের দরিদ্র ও বঞ্চিতদের কাছে বিশ্ববিদ্যালয়গুলোকে প্রবেশসাধ্য করেছে এবং সমাজের অবহেলিতদের দাবিকে ঊর্ধ্বে তুলে ধরেছে। কর্পোরেট কর্তৃক উচ্চশিক্ষার অধিগ্রহণ, ফেলোশিপ হ্রাস করে দেওয়া, ভারতের উচ্চশিক্ষাকে ডব্লিউটিও-র কাছে হস্তান্তর করা – এসবের বিরুদ্ধে তারা লড়াই চালিয়েছে। জেএনইউ যে সরকারি ভর্তুকি পায় সেটা তুলে ধরে বিজেপি-অারএসএস প্রশ্ন তুলেছে যে, যে সরকার তাদের ভর্তুকি দিচ্ছে তার বিরুদ্ধে জেএনইউ ছাত্ররা কেন বলবে? অামরা তাদের বলতে চাই : সরকার প্রদত্ত নিরপেক্ষ সমদর্শী উচ্চমানের শিক্ষা এবং রাজনৈতিক স্বাধীনতা দেশের ছাত্র ও যুবদের মৌলিক অধিকার। ভর্তুকি কোনো দয়া দাক্ষিণ্য নয় – না তা অামাদের ভিন্ন মত প্রকাশ করা, বিতর্ক করা ও প্রশ্ন করার গণতান্ত্রিক অধিকারের বিনিময়ে অর্জন করতে হবে। বিশ্ববিদ্যালয়গুলো চলে দেশের অাপামর শ্রমিক ও কৃষকের শ্রমের টাকায় অার তাই জেএনইউ ছাত্ররা তাদের জন্য কথা বলে। মোদী ও তার মন্ত্রীরা রোহিত ও জেএনইউ এবং অন্যান্য ছাত্র সংগঠনের কর্মীদের ভয় পায়, কারণ তারা সরকারের ছাত্র-বিরোধী ও দরিদ্র-বিরোধী মনোভাবকে উন্মোচিত করে দেয়। কারা ভারতের ধ্বংস ও বিভাজন চায় অার কারাই বা তার জনগণকে রক্ষা করছে? জওহরলাল নেহরু বিশ্ববিদ্যালয়ে ৯ ফেব্রুয়ারী কিছু দুর্ভাগ্যজনক শ্লোগান ওঠার পর জেএনইউ ছাত্র ইউনিয়ন (জেএনইউ এসইউ) এবং জেএনইউ-র সমস্ত প্রগতিশীল ও গণতান্ত্রিক সংগঠন 'ভারতের ধ্বংস চাই' এই ধরনের বিভাজনমূলক শ্লোগানের নিন্দা জানায়। তবে এখন এটা পরিস্কার যে শ্লোগান সংক্রান্ত ইস্যুটা সরকারের কাছে জেএনইউ-র ওপর সর্বাত্মক অাক্রমণ নামিয়ে অানার জন্য একটা ছুতো মাত্র। তার কারণ জেএনইউ ছাত্ররা শিক্ষাক্ষেত্রে ব্যয়বরাদ্দ হ্রাস, সরকারের সমস্ত ধরনের ছাত্র-বিরোধী ও জনবিরোধী নীতির তীব্র বিরোধিতা করে যাচ্ছে। সর্বোপরি, যখন কেন্দ্রীয় সরকারের মন্ত্রীরা ভারতবাসীদের রামজাদে ও হারামজাদে, যারা গোমাংস ভক্ষণ করে ও যারা তা করে না এইভাবে বিভাজিত করার চেষ্টা করছে, যখন তারা অান্তঃজাতি ও অান্তঃধর্মাবলম্বীদের মধ্যে বিবাহের বিরোধিতা করছে, যখন তারা গণহত্যায় মৃত দলিতদের 'কুকুর'এর সাথে তুলনা করে তখন তারা ভারতকে টুকরো টুকরো করছে না? যখন অারএসএস-এর সমর্থকরা গান্ধী থেকে দাভলকার, কালবুর্গীদের মতো মানুষদের তাঁদের চিন্তাধারার জন্য হত্যা করে চলেছে তখন তারা ভারতকে ধ্বংস করছে না? এই সমস্ত শক্তিকে প্রতিরোধ করে ছাত্ররাই ভারতীয় জনগণের ঐক্যকে রক্ষা করছে। একজন অত্যন্ত খ্যাতনামা বিজেপিপন্থী ব্যক্তিত্ব অনুপম খের এইচসিইউ থেকে জেএনইউ-এর ক্যাম্পাসে নামিয়ে অানা দমনপীড়নকে কীটনাশক ছড়ানোর সাথে তুলনা করেন, অন্যদিকে বিজেপি ও এবিভিপির নেতারা ক্যাম্পাস থেকে বামপন্থী ও প্রগতিশীলদের বহিস্কার করার ও তাদের থেকে ক্যাম্পাসকে শুদ্ধ করার ডাক দিয়েছে। তাহলে রোহিত ভেমুলা কি একজন কীট ছিল, যাকে এইচসিইউ থেকে বহিস্কার করা হয়েছে ক্যাম্পাস পরিশুদ্ধ করার জন্য? এই অমানবিক ভাষা হিটলারের জার্মানিকে স্মরণ করিয়ে দেয় এবং এই রকম অারও মন্তব্য বিজেপি নেতাদের, যাতে তারা অাক্রান্ত দলিত ও মুসলিমদের কুকুর ও কুকুরের বাচ্চার সাথে তুলনা করে। যখন সরকার কৃষক ও অাদিবাসীদের জমি ও সম্পত্তি কেড়ে নিয়ে বহুজাতিকদের হাতে তুলে দেয়, যখন শ্রমিকদের ওপর অাক্রমণ নামিয়ে অানে, যখন উচ্চশিক্ষাকে ‌‌ডব্লিউটিও-র কাছে বিক্রি করে দেয়, যখন ছাত্রদের জন্য জীবিকার ব্যবস্থা করতে অস্বীকার করে ভবিষ্যত ধ্বংস করে দেয় তখন তারা ভারতকে ধ্বংস করছে না? জেএনইউ ছাত্ররা ও দেশের ছাত্র-যুবরা এবং দেশের জনগণের অান্দোলনই প্রকৃত অর্থে দেশপ্রেমিক এবং তারাই প্রকৃত অর্থে দেশের জনগণকে ধ্বংসের হাত থেকে রক্ষা করছে। রোহিত ভেমুলা ও জেএনইউ-এর সমর্থনে সাহসী ছাত্র-যুব অান্দোলন অারএসএস-এর 'জাতীয়তাবাদ'-এর মুখোশ খুলে দিয়েছে এবং সংবিধান প্রদত্ত স্বাধীনতাকে নস্যাৎ করা, হিন্দুত্ববাদ ও কর্পোরেটপন্থী এজেন্ডার বিরুদ্ধে ভিন্ন স্বরকে স্তব্ধ করে দেওয়া – সরকারের এই সমস্ত অাসল এজেন্ডাকে উন্মোচিত করে দিয়েছে। অার সরকার এগুলো সম্পন্ন করছে গুণ্ডাদের দ্বারা, খুন-হামলা ও পুলিশী মেশিনারিকে ব্যবহার করে। অাম্বেদকর-ভগৎ সিং-এর চিন্তাধারা ও সংবিধানের ওপর অাক্রমণ

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বামপন্থী বন্ধু, সমর্থক, দরদিদের প্রতি খোলা চিঠি

প্রিয় সাথী, অাপনি, অামি, অামরা সকলেই এই মুহূর্তে এক বড় ধরনের রাজনৈতিক লড়াইয়ের অংশীদার। সকলেরই ইচ্ছা বিগত ৫ বছর ধরে যে প্রতারক, বিশ্বাসঘাতক সরকারটা চলল তাকে উচিত শিক্ষা কিভাবে দেওয়া যায়। বাংলার বুকে প্রতিদিন যেভাবে গণতন্ত্র অাক্রান্ত ও রক্তাক্ত হচ্ছে, জনগণের অধিকারগুলো যেভাবে বিপন্ন ও পদদলিত হচ্ছে, তাকে কিভাবে প্রতিহত করা যায় এবং গণতন্ত্র ও অধিকারকে রক্ষা করা যায়। এটি অামাদের সম্মিলিত ইচ্ছা। এ প্রশ্নে বোধহয় অামাদের মধ্যে কোনো ভিন্নতা নেই। নিঃসন্দেহে বলা যায়, রাজ্যের সমাজসচেতন, শান্তিপ্রিয়, গণতন্ত্রপ্রিয় সমস্ত মানুষই অামাদের সাথে একমত হবেন। প্রতিদিন হাজার হাজার প্রতিশ্রুতি ও উন্নয়নমুখী কাজ-কর্মের নামে যে তঞ্চকতা চলল, তার স্বরূপ মানুষের কাছে স্পষ্টভাবে তুলে ধরা অামাদের অাশু কর্তব্য। 'সততার প্রতীক' যেভাবে 'দুর্নীতির মডেল' হয়ে উঠলেন, তাও মানুষ স্বচক্ষে দেখছেন। কিন্তু জনগণের এই ইচ্ছা-অাকাঙ্খা ও অভিজ্ঞতার সাথে চরম বিশ্বাসঘাতকতা করে সিপিএম নেতৃত্ব এক বিপথগামী পথে পুনরায় যাত্রা শুরু করলেন। যুক্তি হিসাবে হাজির করলেন একরাশ কুযুক্তি : “অামরা দুর্বল, তাই একার পক্ষে তৃণমূল কংগ্রেসকে পরাজিত করা সম্ভব নয়”, “অামরা কোনো জোট বা অাঁতাত করছি না, অামরা একসাথে বসে অাসন বোঝাপড়া করছি”, যাতে “একের বিরুদ্ধে এক প্রার্থী দেওয়া যায়” – ইত্যাদি। বলা হল, অতীত ভুলে যেতে হবে, বর্তমানটাই অাসল কথা। বর্তমানের প্রয়োজনে 'গণতান্ত্রিক' কংগ্রেস দলের সাথে অাসন বোঝাপড়া কোনো অন্যায় নয়, বরং মার্কসবাদ-লেনিনবাদ সম্মত। দলের প্রথম সারির নেতা ও রাজ্য সম্পাদক কমরেড সূর্যকান্ত মিশ্র জানালেন, এটা বুঝতে না পারা রাজনৈতিক সংকীর্ণতা। সূর্যবাবু দলের মুখপত্র গণশক্তি পত্রিকায় (১৩ মার্চ ২০১৬) এক বিরাট মাপের নির্দেশাত্মক নিবন্ধ লিখলেন, কর্মী-সমর্থক-দরদিদের 'সব বিভ্রান্তি' কাটিয়ে তোলার চেষ্টা চালালেন। অতীতেও এ ধরনের 'বিভ্রান্তি' কাটানোর লক্ষ্যে নেতৃত্বের পক্ষ থেকে লেখা হয়েছিল, “শিল্পায়নই অাজকের যুগের শ্রেণীসংগ্রাম”। এসব কথায় অামরা পরে অাসব। গোড়ার কথা দিয়ে শুরু করা যাক। 'অতীত'কে ভুলে যেতে হবে, নতুবা এখন মনে না রাখলেও চলবে! এই 'অতীত' কত পুরনো? ৭০-৭২-৭৫ সালের কথা ভুলে যেতে বলছেন? অাচ্ছা ভোলা গেল! অারও একটু পেছনের অতীতে যদি যাই – ১৯৬৪ সালে তৎকালীন সিপিঅাই নেতৃত্ব (অাপনাদের ভাষায়, ডাঙ্গে-চক্র) যখন কংগ্রেসের মধ্যে প্রগতিশীল গণতান্ত্রিক বুর্জোয়া খুঁজতে ব্যস্ত, তখন অাপনাদের নেতৃত্ব সিপিঅাই ভেঙে নতুন দল সিপিঅাই(এম) তৈরি করে কি ভুল করেছিল? তখন কি কদর্য, কদর্য শ্লোগান সিপিঅাই নেতৃত্ব বিশেষত ডাঙ্গে চক্রের বিরুদ্ধে দিয়েছিলেন, সে সবও না হয় ভুলে গেলাম। 'কংগ্রেসী বন্ধুদের' সঙ্গে ওঠা-বসা করতে করতে সিপিঅাই দলটার হাল কি হয়েছে, তাতো দেখতেই তো পাচ্ছেন। যাক, সেসব অতীতের কথা, অামরা সবাই প্রাণপণ চেষ্টায় সেসব ভুলেও গেলাম। প্রগলভ কমরেড সূর্যবাবুর লেখাটা পড়ে হাসিটা চেপে রাখতে পারলাম না। অাপনাদের সাথে হাসিটা তাই ভাগ করে নিলাম। সূর্যবাবুর কথাটা হুবহু অাপনাদের কাছে তুলে ধরা যাক, “কেউ কেউ প্রশ্ন করছেন, কংগ্রেসের মধ্যে কি অাপনারা গণতান্ত্রিক শক্তি খুঁজছেন? শুধু কংগ্রেস কেন? অামি বলব, তৃণমূলের মধ্যে, বিজেপির মধ্যেও গণতান্ত্রিক শক্তি রয়েছে। এটা অামাদের ১৯৬৪ সালের বোঝাপড়া” (গণশক্তি, ঐ)। সূর্যবাবুর নিশ্চয়ই বোঝা উচিত এটা ১৯৬৪ সালের 'বোঝাপড়া' হতে পারে না, কেননা সেই সময় তৃণমূল কংগ্রেসও ছিল না, বিজেপিও ছিল না। একটা দলের মধ্যে গণতান্ত্রিক ব্যক্তি বা শক্তি থাকলেই সে দলটা কি গণতান্ত্রিক দল হয়ে যায়? কি বলেন সূর্যবাবু? তবে কি কোনো একদিন 'গণতান্ত্রিক' বিজেপি ঠেকাতে 'গণতান্ত্রিক' তৃণমূল কংগ্রেসের সাথে, বা কংগ্রেস ঠেকাতে বিজেপি-তৃণমূলের সাথেও অাপনারা অাসন বোঝাপড়ায় যাবেন? যাক সে কথা। এভাবে গণতান্ত্রিক ব্যক্তি ও শক্তি খুঁজতে গেলে হিটলার, মুসোলিনীর দলেও বহু গণতান্ত্রিক ব্যক্তি/শক্তি খুঁজে পাবেন। রাশিয়ার বুকে স্টলিপিন প্রতিক্রিয়ার যুগে এভাবেই মেনশেভিকরা 'কনস্টিটিউশনাল ডেমোক্রাট' (সংবিধানপন্থী গণতন্ত্রী)-কে গণতান্ত্রিক অাখ্যা দিয়ে জোট গড়ায় কমরেড লেনিন মেনশেভিকদের সম্পর্কে কী বলেছিলেন একবার স্মরণ করে দেখুন। যদি স্মরণে না থাকে, তবে সোভিয়েত ইউনিয়নের “কমিউনিস্ট (বলশেভিক) পার্টির ইতিহাস” (পৃঃ ৯৪-৯৫) একবার পড়ে নিতে পারেন। “ব্ল্যাক হান্ড্রেড” (কৃষ্ণ শতক) অত্যাচারের নৃশংসতার পরেও ঐ ধরনের 'প্রতারক গণতন্ত্রীদের' সাথে সংশ্রব না রাখার কথাই কমরেড লেনিন বারবার লিখে গেছেন, বলে গেছেন !! ভারতের মতো কৃষিপ্রধান, পশ্চাদপদ পুঁজিবাদী সমাজে ও রাষ্ট্রে প্রাক-বিপ্লব পরিস্থিতিতে কোনো রাজনৈতিক দল কৃষকদের জন্য কী নীতি গ্রহণ করছে, শ্রমিক ও অন্যান্য শ্রমজীবী জনগণের স্বার্থ রক্ষায় কী ভূমিকা পালন করেছে ও করছে, রাজনৈতিক গণতন্ত্রের পক্ষে তাদের অবস্থান কী – কংগ্রেসকে গণতান্ত্রিক বলে ঘোষণার অাগে এসব প্রশ্ন বিচার করার কোনো প্রয়োজন কমরেড সূর্যকান্ত মিশ্র ও তাঁর অন্যান্য নেতৃবর্গের বিচারে অাসলো না? 'জরুরি অবস্থা

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जरूरत है देश में कई-कई और जेएनयू बनाने की

एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय में दो शोध छात्रों ने अपने सहपाठी से पूछा- ये जेएनयू क्या है? जेएनयू को लांछित किये जाने के इस दौर में जब उसे ‘जेएनयू यानी जेहादी नक्सली यूनिवर्सिटी’ जैसे जहरीले विशेषणों से नवाजा जा रहा है, ये प्रश्न भी एक हकीकत है.

एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा यह समझ पाने में नाकाम है कि आखिर जेएनयू पर इतनी बात क्यूं हो रही है. जो विश्वविद्यालयों के बारे में नहीं जानते, वे घृणा अभियान के संचालकों के नजरिये से यही समझ रहे हैं कि ये कुछ बिगडैल लड़के-लड़कियों और वैसे ही शिक्षकों का विश्वविद्यालय है. जो जेएनयू को लांछित करने का अभियान चलाये हुए हैं, विश्वविद्यालयों के बारे में उनकी अपनी समझ सीमित है. इसलिए जेएनयू उनके लिए अंधों का हाथी हो गया है. उसे दानवी सिद्ध करने के लिए नित नए किस्से गढ़े जा रहे हैं.

देशद्रोहियों का अड्डा, टैक्स पेयरों के पैसे उड़ाने वालों की छवि गढ़ते इन किस्सों से इतर जेएनयू का शानदार अकादमिक और राजनीतिक अतीत व वर्तमान है. यह इस दानवीकरण करने के दौर में जानबूझ कर अनदेखा करने और भुलाने की कोशिश की जा रही है.

जेएनयू में राजनीतिक सक्रियता, विचारों का खुलापन और अधिकतम लोकतांत्रिक स्पेस एक ऐसी विशेषता है, जो दुनिया के हमारे सबसे बड़े लोकतंत्र में अन्यत्र लगभग दुर्लभ ही है. विश्वविद्यालय के अधिकारियों के विरुद्ध आन्दोलन करते हुए भी लोकतांत्रिक चेतना वहां छात्र संगठनों की दृष्टि से ओझल नहीं होती.

पिछले दशक में छात्र आन्दोलन के एक किस्से से इसे बेहतर समझा जा सकता है. हुआ यूं कि जेएनयू के छात्र-छात्रायें विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन के सामने अपनी विभिन्न मांगों को लेकर धरना दे रहे थे. इसी बीच विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार अपनी कार से प्रशासनिक भवन पहुंचे. छात्र-छात्राओं ने रजिस्ट्रार की कार को घेर लिया. घंटे भर के आसपास यह घेराव चला. कोई उदंडता नहीं, कोई अराजकता नहीं. बाद में आन्दोलन के सन्दर्भ में चर्चा करने के लिए आयोजित विभिन्न छात्र संगठनों की बैठक में इस घेराव पर बात हुई.

सोचिए रजिस्ट्रार या कोई अन्य अधिकारी देश में किसी और आन्दोलनकारी भीड़ के बीच फंस जाए तो उसके साथ क्या सुलूक होगा? ऐसी हालात में आम दृश्य यह होगा कि भीड़ के बीच फंसने वाले अधिकारी को भीड़ खींच कर बाहर निकालेगी, दौड़ा कर पीटेगी और कार तोड़-फोड़ दी जायेगी या आग के हवाले कर दी जायेगी. वहां कुछ न होना जेएनयू की लोकतान्त्रिक समझ से ही मुमकिन होता है.

प्रधानमन्त्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने बयान दिया था कि अंग्रेजी राज ने देश को गुड गवर्नेंस सिखाया. इसके बाद जब वे जेएनयू गए तो उन्हें वहां आइसा ने काला झंडा दिखाया. इस घटना के बाद आइसा के नेता से उक्त घटना पर एक प्रोफेसर साहिबा ने तीखी नारजगी जाहिर की. उक्त प्रोफेसर साहिबा की पार्टी उस समय केंद्र सरकार की समर्थक थी. उक्त प्रोफेसर साहिबा ने क्या कहा, सुनिए

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A Budget of Betrayal

Arun Jaitley doesn’t Address the Burning Issues Facing The Common People and The Indian Economy The budget presented today by Finance Minister Arun Jaitley does not address the burning issues facing the common people and the Indian economy, while

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Salary-starved Municipal Employees Expose the Myth of Urban Governance in Delhi

For two weeks, municipal employees of Delhi were on strike demanding the most basic right of a worker – to get his or her due salary on time. This is not the first time that municipal employees have had to go

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Hold Panchayat Elections on Party Basis

The Bihar government has to take back its condition of mandatory toilet for fighting panchayat elections. It should be noted that the CPI(ML) and AIARLA had taken up a campaign demanding revocation of the ‘toilet’ condition, conducting panchayat elections

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WB Update : Can the CPI(M) Regain Lost Ground in Bengal

The stage has nearly been set for the forthcoming Assembly elections in West Bengal. Five years ago Mamata Banerjee had come to power with the grand promise of 'parivartan' (change), pitting the seductive subaltern imagery of Ma-Mati-Manush (mother-land-common man) against

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