COMMENTARY

Modi Government Subverting Institutions, Undermining Constitutional Norms

In two and a half years the Modi Government has already packed Universities, educational and cultural institutions with hand-picked RSS men, overriding considerations of institutional autonomy and transparency. Now, constitutional norms are being eroded by the Government in appointments to

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SC Order On National Anthem Allows Bullies To Pose As Patriots

In a recent order, a Supreme Court bench of Justices Dipak Misra and Amitava Roy ordered the national anthem to be played in movie halls before every film, stipulating that every member of the audience must stand while the anthem

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Say a Firm and Loud NO to ‘Encounter Raj’

In Gujarat, Narendra Modi had consolidated his rule first by giving a free hand to the Sangh brigade to carry out the infamous Gujarat genocide and then by manipulating the state machinery to engineer a string of extra-judicial killings. And

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500 और 1000 के नोटों का विमुद्रीकरण : आम जनता के लिए आर्थिक आपातकाल, काला धन जमाखोरों के लिए नये अवसर

- दीपंकर भट्टाचार्य - 9 नवम्बर वह दिन था जब मोदी सरकार के आदेश पर एनडीटीवी इण्डिया चैनल को एक दिन के लिए बंद किया जाना था ताकि मीडिया को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा‘ और ‘जिम्मेदार पत्रकारिता‘ का पाठ पढ़ाया जा सके। लेकिन इस अघोषित आपातकाल को पूरे देश में विरोध का सामना करना पड़ा, फलस्वरूप सरकार पीछे हटने पर मजबूर हुई और यह प्रतिबंध लागू होने से रुक गया। जनता इसके बाद राहत की सांसें ले पाती, कि नरेन्द्र मोदी ने अचानक एक घोषणा कर दी वह भी ‘आर्थिक आपातकाल‘ से कम नहीं है। 8 नवम्बर की मध्य रात्रि से 500 और 1000 के नोट गैरकानूनी घोषित कर दिये गये। एक ही झटके में सरकार ने 14 लाख करोड़ रुपये यानि प्रचलन में मौजूद कुल भारतीय मुद्रा के 86 प्रतिशत को रद्दी कागज में बदल दिया। मोदी और उनके मंत्री एवं उनके पक्ष में जनमत बनाने वाले तुरंत हरकत में आ गये और इस कदम को काले धन के विरुद्ध एक निर्णायक एवं अभूतपूर्व युद्ध, एक और सर्जिकल स्ट्राइक, की संज्ञा दे डाली। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब भारत में मुद्रा का विमुद्रीकरण हुआ हो। आजादी की पूर्व संध्या पर 1946 में 1000 और 10000 के नोट रद्द किये गये थे, जो कि 1954 में 1000, 5000 और 10000 के मूल्यों में पुनः जारी किये गये। बड़े मूल्य वाले इन नोटों को मोरारजी देसाई की सरकार द्वारा जनवरी 1978में एक बार फिर रद्द कर दिया गया था। हाल ही में जनवरी 2014 में किये गये आंशिक विमुद्रीकरण को भी हमने देखा जब वर्ष 2005से पहले छपे 500 और 1000 के सभी नोटों को प्रचलन से वापस लिया गया था। इसलिए अब यह बताने की कोई जरूरत नहीं रह जाती कि विमुद्रीकरण से काले धन पर कभी भी बंदिश नहीं लग पायी है। इस बार का विमुद्रीकरण इसलिए विलक्षण है कि इसकी निहायत ही नाटकीय अन्दाज में स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा उद्घोषणा की गई और बिना किसी पूर्व सूचना के तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया। ठीक वैसे ही जैसे कि 1975 के आपातकाल ने भी आधी रात में अचानक दस्तक दे दी थी। इस नाटकीय विमुद्रीकरण को काले धन के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक बताना नितांत ही भ्रामक है। सभी जानते हैं कि 2014के लोकसभा चुनाव में मोदी ने विदेशी बैंकों से काला धन वापस लाने का बार-बार वायदा किया था। इस वापस लाये जाने वाले खजाने से प्रत्येक भारतीय को 15 लाख रुपये देने का वायदा किया गया था, जिसे बाद में भाजपा अध्यक्ष द्वारा ‘जुमला‘ बता कर खारिज कर दिया गया। अब, मोदी राज के दो साल बीतने के बाद विदेशी बैंकों में जमा धन की चर्चा को घरेलू जमाखोरी की ओर मोड़ दिया गया है,मानो कि काला धन वाले धन्नासेठ अपने पैसे को घरों में छिपा कर रखते हैं और उसे एक ही झटके में बाहर निकाल लिया जायेगा। ऐसे दावे पर भरोसा तो किसी कल्पनालोक में जाकर ही हो सकता है। असल जीवन में सभी जानते हैं कि काले धन का बहुत छोटा हिस्सा ही कैश में रखा जाता है, वह भी थोड़े समय के लिए और अधिकांश हिस्सा निरंतर गैरकानूनी सम्पत्ति (रीयल एस्टेट, सोना, शेयर या किसी अन्य फायदे वाली सम्पत्ति में निवेश) में बदलता रहता है, अथवा राजनीतिक-आर्थिक तंत्र के संचालन में खप जाता है (राजनीतिक फण्डिंग, रिश्वत आदि जो सत्ता के दलालों और परजीवी वर्गों की विलासिता के खर्चों को पूरा करने में लगता है)। यदि मान भी लिया जाय कि इस विमुद्रीकरण से काले धन की समस्या का समाधान हो जायेगा, तो यह काले धन के उस बहुत ही छोटे अंश का होगा जो इस समय कैश में मौजूद है। सर्जिकल कुशलता तो उसे कहते हैं जो किसी बीमार अंग को काट कर निकाल दे और आसपास के स्‍वस्‍थ अंगों पर कोई असर न पड़े, परन्‍तु इस तथाकथित ‘सर्जिकल स्ट्राइक‘ ने तो आम जनता - दिहाड़ी मजदूरों, स्ट्रीट वेण्डरों, छोटे व्यापारियों और बैंको एवं डेविट/क्रेडिट कार्डों की पहुंच से बाहर आम लोगों - पर चौतरफा हमला बोल दिया है। 500, 1000 और यहां तक कि अब 2000 रुपये वाले नये नोट जल्द ही वापस आ जायेंगे। सत्‍ता की खुशामद में रहने वाले अफवाहें चला रहे हैं कि नये नोट इतनी अत्‍याधुनिक तकनीकी से ऐसे बनाये जायेंगे कि उनके जाली नोट नहीं बन सकेंगे, यहां तक कि सेटेलाइट के माध्यम से उनके लेन-देन पर भी नजर रहेगी, हालांकि आर.बी.आई. ऐसी सम्भावना को खारिज कर चुकी है। खैर, आगे से जाली नोट बनेंगे या नहीं यह तो आने वाला समय ही बतायेगा, लेकिन इतना तय है कि विशाल मात्रा में नगदी वाले ज्यादातर लोग अपनी मुद्रा को नये नोटों से बदल लेंगे क्योंकि 30 दिसम्बर तक 2.5 लाख तक की राशि जमा करने वालों को आयकर की जांच में नहीं लिया जायेगा। चूंकि सरकार विमुद्रीकरण की योजना बनाने और इसकी तैयारियों में पिछले काफी समय से लगी रही होगी, तब क्रोनी पूंजीवाद के इस जमाने में इसका पूर्वानुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि काले धन वाले बड़े धन्नासेठों ने अपनी तैयारियां भी तदनुरूप कर लीं होंगी। यह तो गरीब, निम्नमध्य वर्ग के लोग और छोटी बचत करने वाले एवं छोटे-छोटे व्यापारी हैं जो अप्रत्‍याशित रूप से घेर लिए गये, जिनमें से अधिकांश पूरी तरह मुद्राविहीन स्थिति में फंस गये हैं और अपनी दैनन्दिन व आकस्मिक जरूरतों को पूरा करने के लिए 100 रुपये के नोटों को ब्लैक मार्केट में खरीदने को बाध्य हो रहे हैं। जिन लोगों को तत्काल ही इलाज, शादी अथवा यात्रा आदि के लिए जरूरी भुगतान करने थे वे भारी असुविधा और मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। मोदी सरकार और भाजपा के प्रचारक जनता पर हुए इस ‘कोलेटरल डैमेज‘ और ‘थोड़े समय की असुविधा‘ के प्रति बिल्कुल भी चिन्तित नहीं हैं। इसके विपरीत जो अपनी समस्या सामने रख रहा है उसे तत्काल ही भ्रष्टाचार और काले धन का हिमायती बताया जा रहा है, ठीक उसी तरह जिस प्रकार गौ-गुण्डागर्दी और शासन के भगवाकरण का विरोध करने वालों पर राजद्रोह का आरोप मढ़ा गया था और सर्जिकल स्ट्राइक एवं झूठे एनकाउण्टरों पर सवाल खड़ा करने वालों को राष्ट्रविरोधी और आतंकवाद का पक्षधर बताया गया था। गहराते कृषि संकट, बेतहाशा बढ़ती कीमतें और घटते जाते रोजगार की मार अब भाजपा के धुर समर्थक भी महसूस कर रहे हैं, इसीलिए अर्थव्यवस्था मोदी सरकार की सबसे कमजोर नस बन गई है। विमुद्रीकरण की इस नाटकबाजी से भाजपा को लग रहा है कि उसे चर्चा करने लायक एक ऐसा बिन्दु मिल जायेगा जिससे जनता के गुस्से को ठण्डा किया जा सके और पार्टी द्वारा किये गये बड़े-बड़े आर्थिक वायदों के प्रति कुछ आशा और भरोसा फिर से बन सके। राजनीतिक गणित और काले धन पर हमले के ढोंग से परे, इसमें कोई शक नहीं कि इस कवायद के पीछे काफी गहरे आर्थिक मंतव्य हैं। बैंकें नगदी के भारी संकट (लिक्यूडिटी क्राइसिस) से गुजर रही हैं। उन्हें भारी मात्रा में कॉरपोरेट कर्जों की माफी के लिए मजबूर किया गया और उससे भी विशाल मात्रा में बैंकों के बकाये के भुगतान नहीं हो रहे हैं। ऐसे में अति विशाल मात्रा में आम जनता की बचत के पैसों और इसके साथ ब्लैक से व्हाइट बनाये लिए गये काले धन की अच्छी खासी मात्रा पूंजी के नये श्रोत बन वर्तमान नगदी संकट को हल करने का काम करेंगे। दूसरे शब्दों में, हम जो देख रहे हैं वह एक नये रूप में कॉरपोरेटों के लिए संकट निवारक रणनीति है। वित्त मंत्री अरुण जेटली के अनुसार यह कैशलैस (नगदीविहीन) अर्थव्यवस्था की ओर एक ठोस कदम है। सम्पन्नता की ओर गतिशील तबका तो ज्यादातर इंटरनेट बैंकिंग और कार्ड आधारित लेन-देन के युग में प्रवेश कर चुका है। गली-मुहल्लों की अर्थव्यवस्था वाला भारत जिसमें सब्जी बेचने वाले, रोजाना या साप्ताहिक पारम्परिक बाजारों में दुकान लगाने वाले, गली के परचून वाले या अन्य छोटे दुकानदार आदि हैं जो अभी प्लास्टिक मनी की कैशलैस दुनिया के बाहर हैं। इस विमुद्रीकरण का मकसद ऐसे सभी लोगों को या तो बाजार से बाहर धकेल देना है, अथवा उन्हें आर्थिक पुनर्गठन के नये रूप के हवाले कर देना है जिसमें बड़ी मछलियों द्वारा छोटी मछलियों को हमेशा से निगला जाता रहा है। उन करोड़ों भारत वासियों के लिए जो बैंकिंग नेटवर्क से पूरी तरह कटे हुए न होकर भी उसके हाशिये पर ही रहते हैं, यह कदम केवल तात्‍कालिक परेशानी पैदा करने वाला ही नहीं वरन् उनकी आर्थिक असुरक्षा को बढ़ाने एवं और उन्‍हें ज्‍यादा कमजोर बनाने वाला कदम है। भाजपा प्रतिष्ठान के भ्रामक दावों की असलियत सामने लाने के साथ-साथ काले धन और कॉरपोरेट लूट के असल खतरे के खिलाफ प्रभावी कार्यवाही के लिए दबाव बनाना चाहिए और आम लोगों को आर्थिक अराजकता और मुश्किलों में डालने वाली संवेदनहीन सरकार के खिलाफ जनता की गोलबंदी भी करनी चाहिए। जो सरकार हमारी बैंकों को सरेआम लूटने वाले ललित मोदी और विजय माल्‍या जैसों को खुशी-खुशी देश के बाहर भागने में मदद करती है, और जो सरकार बैंकों का पैसा वापस न कर पूरी बैंकिंग व्‍यवस्‍था को भारी संकट में डालने वाली स्‍वेच्‍छाचारी बड़ी-बड़ी कम्‍पनियों का नाम तक बताने से इंकार कर रही है- उन्‍हें सजा देना या शर्मसार करना तो दूर की बात है- काला धन, भ्रष्‍टाचार और राज्‍य प्रायोजित कॉरपोरेट लूट के सवाल पर ऐसी सरकार के दोहरे चरित्र और मिलीभगत का भण्‍डाफोड़ करना होगा। भाजपा कह रही है कि सर्जिकल स्ट्राइकों - जो पहले भारी हो-हल्‍ला मचा लाइन ऑफ कंट्रोल पर की गई और उसके बाद हमारी जेबों पर कर दी - को आगामी विधानसभा चुनावों में वोटों में बदल दो। हमें आने वाले चुनावों को जनता की गोलबंदी के सहारे इन मंसूबों को नाकाम करते हुए अघोषित राजनीतिक और आर्थिक आपातकाल थोपने वालों को सबक सिखाने के अवसर में बदलना होगा।

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Demonetization Drive : Economic Emergency for the Common People, New Opportunities for Black Money Offenders

-- Dipankar Bhattacharya November 9 was supposed to be the day when NDTV India had been asked by the Modi government to go off air for a day to teach the media a lesson in 'national security' and 'responsible journalism'. The

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Gender Justice And Equality Not Communally-Defined ‘Uniformity’

While fully supporting the Muslim women’s groups in their struggle for abolition of various patriarchal practices in Muslim Personal Laws, the bid to open the debate on ‘Uniform Civil Code’ must be viewed with caution and opposed in the

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Socio-Economic Emancipation, Social Equality and Equity Vs the ‘Social Harmony’ of Modi and the RSS

The Una uprising – in the BJP’s own ‘model’ state Gujarat – organically raised the issues of dignity, land and livelihood. Dalits, rebelling against the Gau-Goons, declared they would no longer handle animal carcasses and demeaning forms of labour – and instead

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Why Indian workers abroad are indebted to a former Jharkhand MLA

(A piece by Shahnawaz Akhtar in DailyO on 11 September 2016) Early this year, Hulas Chandra Singh, Ruplal Thakur and Deewakar Mahto along with 40 others went to Malaysia. All coughed up around Rs 50,000 each to work abroad. Before taking a flight, all

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Modi’s Foreign Policy and the Kashmir-Balochistan Conundrum

The cat is now out of the bag. Towards the end of his long and tiring Independence Day address, Modi let the Balochistan cat jump out of the bag of diplomatic silence. He said he had been getting many messages

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Reflections on the CPI(M)’s Suicidal ‘Bengal Line’

Some fifty years ago, when the Congress faced its first major phase of decline on a pan-Indian scale in the wake of the 1962 India-China war, the demise of Nehru, and the profound economic crisis of the mid-1960s, the CPI(

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Bangladesh Government Must Take Responsibility For Its Refusal to Tackle Religious Extremism

The heinous massacre of diners at a Dhaka cafe by terrorists in the name of Islam has shocked people across the world. The terrorists stormed the café shouting Islamic slogans, and took the diners hostage. They brutally tortured and killed

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Creating An Anti-People Rulers’ ‘Consensus’

(See Liberation September 2015 for an earlier piece, ‘Notes on GST Bill: An Integral Part of the Neo-liberal Reform Agenda’. Some of the points covered in that piece have not been repeated for the sake of brevity.) With the ‘honeymoon period’

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