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वर्ग-जाति अंतर्संबंध और सामाजिक न्याय आंदोलन की चुनौतियां

वर्ग-जाति अंतर्संबंध और सामाजिक न्याय आंदोलन की चुनौतियां

आधुनिक भारत के सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों के इतिहास पर नजर डालें तो पाएंगे कि वर्ग और जाति की अवधारणाओं के आपसी संबंधों को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है. कई बार यह बहस तीखे वैचारिक मतभेदों का रूप भी लेती रही है. परंपरागत मार्क्सवादी दृष्टिकोण में आर्थिक शोषण और वर्ग संघर्ष को बदलाव का केंद्रीय आधार माना गया. दूसरी ओर अंबेडकरवादी, समाजवादी और सामाजिक न्याय की विभिन्न धाराओं ने यह प्रश्न उठाया कि भारतीय समाज को केवल वर्ग के नजरिए से नहीं समझा जा सकता, क्योंकि यहां जाति सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संबंधों की एक निर्णायक वास्तविकता रही है.

आज यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जा रहा है कि भारतीय समाज में आर्थिक शोषण और सामाजिक उत्पीड़न को अलग-अलग करके नहीं समझा जा सकता. जाति और वर्ग के प्रश्न न तो एक-दूसरे के विकल्प हैं और न ही एक-दूसरे के विरोधी. वे भारतीय समाज की ऐसी परस्पर जुड़ी हुई वास्तविकताएं हैं जिनकी संयुक्त समझ के बिना सामाजिक परिवर्तन की कोई भी परियोजना अधूरी रहेगी.

भारतीय समाज में वर्ग और जाति का अंतर्संबंध

वर्ग सामाजिक विश्लेषण की एक बुनियादी श्रेणी है. विवाद उसके महत्व और उसकी केंद्रीयता को लेकर नहीं, बल्कि भारतीय समाज की जटिल वास्तविकताओं में उसकी व्याख्या को लेकर है. मार्क्स ने जब कहा था कि मानव समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है, तो उनका आशय केवल आर्थिक समूहों के बीच संघर्ष से नहीं था. वर्ग उत्पादन संबंधों, संसाधनों पर नियंत्रण, श्रम के संगठन और सत्ता के वितरण से निर्मित सामाजिक संबंधों की एक व्यापक अभिव्यक्ति है.

भारत में भूमि स्वामित्व, श्रम का विभाजन, शिक्षा तक पहुंच, सामाजिक प्रतिष्ठा और राजनीतिक शक्ति का वितरण लंबे समय तक जाति व्यवस्था से जुड़ा रहा है. इसलिए वर्गीय संरचना को जातिगत संरचना से अलग करके नहीं समझा जा सकता. यहां आर्थिक स्थिति और सामाजिक स्थिति अनेक बार एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं.

एक समय यह माना गया था कि औद्योगीकरण, शहरीकरण और बाजार का विस्तार जातिगत असमानताओं को स्वतः कमजोर कर देगा. लेकिन भारतीय अनुभव इससे भिन्न रहा. ऐसा होने के बाद भी रोजगार के अवसरों, सामाजिक नेटवर्क, शिक्षा और सामाजिक गतिशीलता पर जाति का प्रभाव बना रहा. निजी क्षेत्र से लेकर उच्च शिक्षा तक अनेक क्षेत्रों में जातिगत विषमताएं आज भी दिखाई देती हैं.

नवउदारवादी दौर में यह अंतर्संबंध और अधिक जटिल हुआ है. असंगठित क्षेत्र, ठेका श्रम, दिहाड़ी मजदूरी, सफाई कार्य और कम वेतन वाले रोजगारों में दलितों, आदिवासियों और अत्यंत पिछड़े समुदायों की अधिक उपस्थिति इस बात का संकेत है कि सामाजिक और आर्थिक असमानताएं आज भी एक-दूसरे को पुनरुत्पादित कर रही हैं. इसलिए वर्ग संघर्ष को केवल मजदूरी या जमीन की लड़ाई तक सीमित नहीं किया जा सकता.

भारतीय वाम आंदोलन के भीतर भी समय के साथ इस प्रश्न पर गंभीर पुनर्विचार हुआ है. खासकर भाकपा(माले) ने अपने गठन काल से ही जाति और वर्ग के संबंधों को भारतीय समाज की ठोस वास्तविकताओं के आधार पर समझने का प्रयास किया है. भूमि, मजदूरी और लोकतांत्रिक अधिकारों के संघर्षों के साथ-साथ दलितों, पिछड़ों और उत्पीड़ित समुदायों के सामाजिक सम्मान तथा बराबरी के सवालों को भी उसने अपने राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनाया. इस प्रक्रिया में वर्ग को केवल आर्थिक श्रेणी नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक श्रेणी के रूप में समझने की कोशिश विकसित हुई.

भाकपा(माले) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने हाल के दिनों में इस बात पर जोर दिया है कि भारत में वर्ग संघर्ष को जाति-विरोधी संघर्ष, लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के प्रश्नों से अलग करके नहीं समझा जा सकता. उनके अनुसार वर्ग कोई अमूर्त आर्थिक अवधारणा नहीं, बल्कि समाज के भीतर मौजूद वास्तविक सामाजिक संबंधों की अभिव्यक्ति है. इसलिए वे ‘क्लास’ के साथ दो और ‘सी’ यानि ‘कास्ट’ व ‘कल्चर’ तथा दो ‘जी’ यानि ‘जेंडर’ और ‘जेनरेशन’ को जोड़ने की बात करते हैं.



जाति: सामाजिक सत्ता और असमानता की संरचना

भारतीय समाज की विशिष्टता उसकी ऐतिहासिक जाति व्यवस्था रही है. इस व्यवस्था ने लंबे समय तक यह निर्धारित किया कि कौन किस प्रकार का काम करेगा, किसे शिक्षा मिलेगी, किसके पास संसाधन होंगे और कौन सामाजिक सम्मान से वंचित रहेगा.

जाति केवल एक सामाजिक पहचान नहीं रही है. उसने श्रम विभाजन, भूमि स्वामित्व, शिक्षा, राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक प्रतिष्ठा को नियंत्रित किया है. यानि कि जाति भारतीय समाज में सामाजिक सत्ता की एक संरचना रही है.

जाति व्यवस्था ने केवल असमानता पैदा नहीं की, बल्कि मेहनतकश समाज को अलग-अलग समूहों में बांटकर उनकी सामूहिक एकता को भी कमजोर किया. इसलिए जाति का प्रश्न केवल सम्मान का प्रश्न नहीं है. यह सामाजिक और आर्थिक शक्ति के वितरण का भी प्रश्न है.

भारतीय समाज में जाति व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष की एक लंबी परंपरा रही है. ज्योतिबा फुले ने शूद्र-अतिशूद्र एकता का विचार प्रस्तुत करते हुए शिक्षा और सामाजिक मुक्ति को जोड़ा. उन्होंने बहुजन समाज की राजनीतिक चेतना को विकसित करने का प्रयास किया और ब्राह्मणवादी सामाजिक वर्चस्व को चुनौती दी.

दक्षिण भारत में पेरियार के आत्मसम्मान आंदोलन ने जन्म आधारित श्रेष्ठता और सामाजिक वर्चस्व के विरुद्ध संघर्ष का रास्ता दिखाया. उन्होंने तर्कशीलता, समानता और आत्मसम्मान को सामाजिक परिवर्तन का आधार बनाया.

बिहार में भी सामाजिक न्याय की चेतना का विकास महत्वपूर्ण आंदोलनों के माध्यम से हुआ. बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में चला जनेऊ आंदोलन सामाजिक सम्मान और बराबरी की आकांक्षा का प्रतीक था. इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया की एक महत्वपूर्ण परिणति 1933 में गठित त्रिवेणी संघ के रूप में सामने आई.

त्रिवेणी संघ केवल यादव, कुर्मी और कोइरी समुदायों का संगठन नहीं था. वह सामाजिक सम्मान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आर्थिक अधिकारों की आकांक्षा का एक व्यापक आंदोलन था. उसने बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति की नींव रखने का महत्वपूर्ण कार्य किया. त्रिवेणी संघ ने यह स्थापित किया कि लोकतंत्र केवल मताधिकार का प्रश्न नहीं है, बल्कि सत्ता संरचनाओं में समान भागीदारी और सामाजिक सम्मान का भी प्रश्न है. बाद के दशकों में पिछड़े वर्गों की राजनीति, मंडल आंदोलन और सामाजिक न्याय की समकालीन धारा के विकास में इस ऐतिहासिक विरासत की महत्वपूर्ण भूमिका रही.

अंबेडकर और सामाजिक लोकतंत्र की परियोजना

डाॅ. भीमराव अंबेडकर ने जाति उन्मूलन को व्यापक सामाजिक परिवर्तन की परियोजना के रूप में विकसित किया. उन्होंने जाति को भारतीय समाज की सबसे बड़ी लोकतंत्र-विरोधी संरचना के रूप में देखा.

उनका प्रसिद्ध कथन कि ‘जाति केवल श्रम का विभाजन नहीं, बल्कि श्रमिकों का विभाजन है’ भारतीय समाज को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी प्रदान करता है. उनके अनुसार जाति व्यवस्था केवल सामाजिक भेदभाव की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि असमानता को स्थायी बनाने वाली संरचना थी.

उनका मानना था कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी टिकाऊ हो सकता है जब उसके आधार में सामाजिक लोकतंत्र मौजूद हो. समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व केवल संवैधानिक आदर्श नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समाज की आवश्यक शर्तें हैं. इसलिए उन्होंने प्रतिनिधित्व, आरक्षण, शिक्षा और आर्थिक सशक्तीकरण को सामाजिक न्याय के बुनियादी आधारों के रूप में देखा.

इसलिए अंबेडकर की परियोजना को केवल प्रतिनिधित्व की राजनीति तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता. वह सामाजिक सम्मान, लोकतांत्रिक अधिकार और आर्थिक न्याय की संयुक्त परियोजना थी.

वर्ग और जाति की राजनीति: एकता और अंतर्विरोध

भारतीय समाज में वर्ग और जाति दोनों की अपनी विशिष्ट भूमिका है. हर जाति एक वर्ग नहीं है और हर वर्ग एक जाति नहीं है. फिर भी दोनों के बीच गहरा अंतर्संबंध मौजूद है.

ग्रामीण भारत में भूमिहीनता, कम मजदूरी और सामाजिक उत्पीड़न के अनुभव बताते हैं कि आर्थिक शोषण और सामाजिक अपमान अनेक बार एक ही प्रक्रिया के दो रूप होते हैं. इतिहासकार सुमित सरकार ने संकेत किया है कि जब वंचित समूहों के व्यापक आर्थिक संगठन विकसित नहीं हो पाते, तब उनका प्रतिरोध कई बार जातीय संगठनों के रूप में सामने आता है.

फुले, पेरियार और अंबेडकर के आंदोलन केवल पहचान के आंदोलन नहीं थे. उनके केंद्र में मनुष्य की गरिमा, बराबरी और अधिकार का प्रश्न था. लेकिन पहचान आधारित राजनीति की अपनी सीमाएं भी हैं. जब वह व्यापक सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के एजेंडे से कट जाती है, तो कई बार केवल सत्ता में हिस्सेदारी तक सीमित हो जाती है.

दूसरी ओर वर्गीय राजनीति भी तब सीमित हो जाती है जब वह सामाजिक उत्पीड़न के विशिष्ट रूपों को गौण मानने लगती है. इसलिए सामाजिक परिवर्तन की कोई भी गंभीर परियोजना वर्ग और जाति दोनों प्रश्नों को साथ लेकर ही आगे बढ़ सकती है.

मंडल के बाद सामाजिक न्याय की राजनीति

मंडल आंदोलन ने भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव पैदा किया. पिछड़े और वंचित समुदायों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी. शिक्षा, रोजगार और सत्ता संस्थानों में उनकी उपस्थिति मजबूत हुई. लोकतंत्र का सामाजिक आधार व्यापक हुआ और सार्वजनिक जीवन में नए सामाजिक समूहों की भागीदारी बढ़ी.

यह भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी उपलब्धि थी. लेकिन समय के साथ सामाजिक न्याय की राजनीति के भीतर भी कई अंतर्विरोध उभरकर सामने आए. व्यापक बहुजन एकता की जगह अनेक जातीय दावेदारियां उभरने लगीं. कई बार सामाजिक परिवर्तन का व्यापक एजेंडा चुनावी गणित तक सीमित होता गया.

पिछड़े समुदायों के भीतर भी असमानताएं बनी रहीं. अत्यंत पिछड़े, महादलित और गरीब तबकों के प्रश्न नए रूप में सामने आए. इससे सामाजिक न्याय की राजनीति के समक्ष नई चुनौतियां पैदा हुईं.

नवउदारवाद, काॅरपोरेट वर्चस्व और सांप्रदायिक राजनीति

पिछले तीन दशकों में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों ने भारतीय समाज को गहराई से प्रभावित किया है. संपत्ति और आय की असमानताएं बढ़ी हैं. स्थायी रोजगार के अवसर घटे हैं. असंगठित और असुरक्षित रोजगारों का विस्तार हुआ है. इन परिवर्तनों का सबसे अधिक प्रभाव दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, महिलाओं और गरीब तबकों पर पड़ा है. जिनके पास पहले से ही शिक्षा, संपत्ति और सामाजिक पूंजी का अभाव था, वे नई आर्थिक व्यवस्था में और अधिक असुरक्षित हो गए हैं.

इसी दौर में सांप्रदायिक राजनीति और बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद का उभार भी देखने को मिला है. धार्मिक ध्रुवीकरण के जरिए रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक असमानता जैसे मूल प्रश्नों से ध्यान हटाने की कोशिश की जाती है. इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि मेहनतकश और वंचित तबकों की साझा एकता कमजोर पड़ती है. इसलिए, सामाजिक न्याय की राजनीति के सामने आज केवल प्रतिनिधित्व का नहीं, बल्कि नवउदारवादी आर्थिक नीतियों, काॅरपोरेट लूट, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण व संघ-भाजपा नीत मनुवादी सामाजिक वर्चस्व के खिलाफ व्यापक लोकतांत्रिक प्रतिरोध खड़ा करने की भी चुनौती है.

जाति जनगणना और सामाजिक न्याय

इसी संदर्भ में जाति आधारित जनगणना का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है. किसी भी लोकतांत्रिक समाज में नीतियां विश्वसनीय आंकड़ों के आधार पर बनती हैं. यदि गरीबी, बेरोजगारी और स्वास्थ्य की स्थिति जानने के लिए आंकड़ों की आवश्यकता है, तो सामाजिक समूहों की वास्तविक स्थिति समझने के लिए भी आंकड़े आवश्यक हैं.

जाति जनगणना का उद्देश्य समाज को जातियों में बांटना नहीं है. इसका उद्देश्य यह जानना है कि विभिन्न सामाजिक समूहों की शिक्षा, रोजगार, आय, भूमि स्वामित्व, स्वास्थ्य और संस्थागत भागीदारी की वास्तविक स्थिति क्या है.

बिना विश्वसनीय आंकड़ों के सामाजिक न्याय की नीतियां अनुमान और धारणाओं पर आधारित रह जाती हैं. यदि जाति जनगणना को शिक्षा, रोजगार, भूमि सुधार, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा की नीतियों से जोड़ा जाए, तो यह सामाजिक और आर्थिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपकरण साबित हो सकती है.

निष्कर्ष: सामाजिक न्याय की नई दिशा

आज सामाजिक न्याय की राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रतिनिधित्व और पुनर्वितरण, सामाजिक सम्मान और आर्थिक अधिकार, तथा जाति-विरोधी संघर्ष और वर्गीय संघर्ष के बीच एक नई एकता विकसित करने की है.

भारत का अनुभव बताता है कि सामाजिक अपमान और आर्थिक शोषण को अलग-अलग करके नहीं समझा जा सकता. इसलिए सामाजिक न्याय का एजेंडा केवल आरक्षण, प्रतिनिधित्व और पहचान तक सीमित नहीं रह सकता. उसे भूमि सुधार, रोजगार, श्रम अधिकार, सार्वजनिक शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के प्रश्नों को भी अपने केंद्र में रखना होगा.

नवउदारवाद, बढ़ती आर्थिक असमानता और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के इस दौर में लोकतंत्र की रक्षा और सामाजिक न्याय की लड़ाई एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं. इक्कीसवीं सदी के भारत में परिवर्तन का रास्ता तभी मजबूत होगा जब जाति-विरोधी संघर्ष, आर्थिक न्याय की लड़ाई और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा का संघर्ष एक साझा जनवादी परियोजना के रूप में आगे बढ़ेगा. यही सामाजिक न्याय की अगली ऐतिहासिक दिशा है.

(जारी)

20 June, 2026