5 अगस्त 2026 को उत्तर प्रदेश विधानसभा के पटल पर सरकार ने 24 नवंबर 2024 को सम्भल हिंसा की जांच के लिए गठित न्यायिक आयोग की रिपोर्ट को पेश किया. इस न्यायिक जांच आयोग का नेतृत्व सेवानिवृत न्यायधीश देवेन्द्र कुमार अरोरा कर रहे थे. इस तीन सदस्यीय आयोग में दो सेवानिवृत आइएएस अधिकारी – अमित मोहन प्रसाद व अरविन्द कुमार जैन शामिल थे. 450 पन्नों की इस रिपोर्ट में 199 गवाहों के बयान दर्ज करने और घटना से सम्बंधित फारेंसिक रिपोर्टों, वीडियो फुटेज और पुलिस रिकार्ड का बारीकी से अध्ययन दावा किया गया है.
सदन में पेश की गयी जस्टिस देवेन्द्र अरोरा आयोग की रिपोर्ट में मुख्य रूप से जो खुलासे किये गये हैं, उसमें सम्भल हिंसा को एक अचानक भड़का आक्रोश नही, बल्कि एक सुनियोजित साजिश करार दिया गया है, जो सम्भल शाही जामा मस्जिद के सर्वे को रोकने और स्थानीय प्रशासन पर दबाव बनाने के लिए सरकार की छवि बिगाडने के उद्देश्य से की गयी थी.
जांच आयोग ने रिपोर्ट में हिंसा रोकने के लिए पुलिस द्वारा किये गये प्रयासों की तारीफ की है और इस हिंसा में मारे गये चारों (स्थानीय निवासियों के अनुसार पांच) लोगों की मौत को पुलिस फायरिंग से नहीं, बल्कि दंगाईयों द्वारा की गयी फायरिंग से हुई बतायी है. इस तरह इस रिपोर्ट में पुलिस को क्लीन चिट दे दी गयी है.
जांच रिपोर्ट में हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों में सम्भल के सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, स्थानीय विधायक के बेटे सुहैल इकबाल, जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी के सदर जफर अली सहित अन्य को दोषी ठहराया है जो कि सभी मुस्लिम है. साथ ही, पुलिस प्रशासन से इनके खिलाफ सख्त कार्यवाही करने की सिफारिश भी की गई है.
सम्भल हिंसा पर न्यायिक आयोग की इस रिपोर्ट को समझने के लिए जरूरी है कि सम्भल हिंसा की वजहों की बारीकी से पड़ताल की जाए, साथ ही उस समय के घटनाक्रमों, तथ्यों, और योगी सरकार की जारी नीतियों पर एक नजर डाली जाये.
सम्भल हिंसा की वजह व साजिश समझने की कोशिश
सम्भल हिंसा की यह घटना उस समय हुई जब लगभग हर दूसरे दिन किसी न किसी मस्जिद-दरगाह-मदरसे -ईदगाह आदि पर कोई न कोई हिन्दूवादी व्यक्ति, या व्यक्तियों का समूह या संगठन उस स्थल को मंदिर तोड़ कर बनाये जाने का दावा अदालत में कर रहा था, अदालतें ज्यादातर ऐसे दावों को स्वीकार कर नोटिस आदि जारी कर रही थी जबकि ‘प्लेसेज आफ वर्शिप एक्ट 1991 (पूजा स्थल कानून) उन्हें ऐसा करने से रोकता था. ऐसे ही दावे बहराईच की गाजी मसूद की दरगाह, विश्व प्रसिद्ध अजमेर की ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह से लेकर देवबंद, सहारनपुर के मदरसे सहित सैकड़ों जगहों पर किये जा रहे थे और इसके जरिये जगह-जगह साम्प्रदायिक विभाजन फैदा करने की कोशिशें हो रही थीं.
ऐसा ही एक दावा सम्भल की शाही जामा मस्जिद पर भी किया गया. सम्भल की इस शाही जामा मस्जिद का निर्माण 1526-1529 ईस्वी में मुगल शासक बाबर के आदेश पर उसके सेनापति मीर बेग ने कराया था. मस्जिद के मेहराब पर मौजूद शिलालेख में यह बात दर्ज है. साथ ही, ऐतिहासिक पुस्तक ‘बाबरनामा’ में भी इसका जिक्र है. यहां पिछले 500 सालों से नमाज पढ़ी जा रही है.
सम्भल मुरादाबाद मंडल में आने वाला एक बहुत पुराना शहर है जिसकी अक्सरियत मुस्लिम है. मुरादाबाद मंडल में सम्भल, मुरादाबाद, बिजनौर, अमरोहा व रामपुर जिले आते है. यह इलाका पूरे उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक मुस्लिम सघन आबादी वाला है और यहां भाजपा से ज्यादा सपा के विधायक-सांसद जीतते रहे हैं, इस कारण यह भाजपा के लिए चुनौती भरा क्षेत्र है. राम मंदिर आंदोलन के बाद भाजपा उत्तर प्रदेश की सत्ता में आई तो, लेकिन यह ज्यादा लंबे समय तक नहीं रह पाई. एक लम्बे अर्से तक उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा का शासन रहा. भाजपा को दुबारा उत्तर प्रदेश की सत्ता मिलने में जहां मोदी लहर का उभार एक वजह थी वहीं मुजफ्फरनगर दंगों से पैदा हुए साम्प्रदायिक विभाजन का भी बड़ा योगदान था. भाजपा ने मुजफ्फरनगर दंगों से समझ लिया था कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में अपनी सत्ता को स्थायित्व देने के लिए उसे इतने क्षेत्रीय स्तर पर भी जहां-जहां मुस्लिम आबादी ज्यादा है, साम्प्रदायिक विभाजन बढाने के लिए नये-नये मुद्दे तलाशने होंगे. इसीलिए सहारनपुर से लेकर सम्भल, बहराइच, श्रावस्ती, फतेहपुर, बलरामपुर, बनारस, अम्बेडकर नगर आदि जिलों में मस्जिदों व दरगाहों पर दावे व हमले बढे़ और अतिक्रमण के नाम पर बुलडोजर कार्यवाहियों ने जोर पकड़ लिया. इसके साथ ही, रामपुर में – जहां प्रदेश में मुस्लिम आबादी का औसत सबसे ज्यादा है – आजम खां के खिलाफ कार्यवाही तेज कर दी गई. योगी सरकार का उत्साह छीनी गयी चुनावी जीत से और बढ़ गया था. रामपुर के सफल प्रयोग के बाद अयोध्या-काशी की तरह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक स्थाई विवाद व साम्प्रदायिक विभाजन की राजनीति करने के केन्द्र के रूप में सम्भल को निशाने पर लिया गया.
सम्भल में वाद दर्ज कराने के बाद की घटनाएं
सम्भल के चंदौसी सिविल कोर्ट (सीनियर डिवीजन) में कौशलेन्द्र कृष्ण (श्री कैला देवी मंदिर के पीठाधीश और श्री कल्कि धाम के ऋृषि पुत्र), एड. हरिशंकर जैन व एड. विष्णु शंकर जैन सहित 8 हिन्दू याचिकाकर्ताओं द्वारा ‘श्री हरिहर मंदिर बनाम इंतजामिया कमेटी’ दीवानी वाद दायर किया गया. याचिकाकर्ताओं द्वारा दावा किया गया कि मंदिर को वर्ष 1526-1529 में मुगल शासक बाबर के आक्रमण के समय जबरन तोड़ कर मस्जिद का ढांचा खड़ा किया गया था. याचिकाकर्ताओं ने विवादित स्थल पर हिन्दू श्रद्धालुओं को दर्शन व पूजन के लिए निर्बाध प्रवेश देने का अधिकार देने की मांग की थी.
यह वाद 19 नवम्बर 2024 को दायर किया गया और उसी दिन सुनवाई कर, न्यायालय सिविल कोर्ट (सीनियर डिवीजन) के न्यायधीश आदित्य सिंह ने – दूसरे पक्ष को नोटिस देकर अपना पक्ष रखने का मौका दिये बगैर – तुरंत सर्वे का आदेश दे दिया और एडवोकेट रमेश सिंह राघव को सर्वे कमिश्नर नियुक्त भी कर दिया. 19 नवम्बर की शाम ही सर्वे कमिश्नर ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) के लोगों व स्थानीय प्रशासन के साथ शाही जामा मस्जिद का सर्वे भी कर लिया. कहीं कोई हिंसा नही हुई और न ही कोई विरोध प्रदर्शन हुआ, जबकि सम्भल की यह शाही जामा मस्जिद 1920 से ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत केन्द्रीय रूप से संरक्षित स्मारक घोषित है और इसका चरित्र हमेशा से ही मस्जिद का रहा है.
इस पूरी प्रक्रिया में लगता है कि इसे अंजाम देने वालों का मकसद पूरा नहीं हुआ था. 24 नवम्बर को इसीलिए अदालत द्वारा दूसरा सर्वे आदेश दिये बिना दूसरी बार सर्वे टीम वहां पहुंच गई. इस सर्वे टीम के साथ हिन्दूवादी संगठनों के लोग भी थे जो नारेबाजी कर रहे थे. इसने माहौल बिगाड़ने की शुरुआत की. मुस्लिम समाज के लोग भड़क उठे और सड़क पर आ गये. उसके बाद जो कुछ हुआ वह सबने देखा है – गोली चली और 5 लोग मारे गये. इस मामले में पुलिस की भूमिका क्या रही और साम्प्रदायिक नजरिये से कैसी ग्रस्त थी, वह तो सम्भल पुलिस के तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी के मीडिया बयानों से ही स्पष्ट है. वहां की सिविल अदालत ने तो उन पर एफआइआर दर्ज करने का आदेश तक दे दिया था. परन्तु तुरंत ही उस जज का ही तबादला करा दिया था.
मुकदमें व गिरफ्तारियां
सम्भल हिंसा में पुलिस फायरिंग में जो लोग मारे गये वे सभी मुस्लिम थे. न्यायिक आयोग ने नईम, बिलाल, मोहम्मद कैफ व अयान का जिक्र भी किया है. तब अलग-अलग पुलिस थानों में कुल 12 एफआइआर पुलिस द्वारा दर्ज की गयी, जिनमें शुरुआत में 25 नामजद व 2500 अज्ञात दिखाए गये हैं. कुल 129 लोगों को जेल भेजा गया जो कि लगभग सभी मुस्लिम है. इनमें करीब 120 लोगों को अदालत से जमानत मिल चुकी है. लेकिन वे लोग जिन पर देशद्रोह व एनएसए लगाया गया है, अभी भी जेल में बंद हैं.
जामा मस्जिद के इंतजामिया कमेटी के सदर जफर अली को घटना के 40 दिन बाद उनकी उस प्रेस कांफ्रेंस के बाद गिरफ्तार किया गया जिसमें उन्होंने दावा किया था कि पुलिस ने उनके सामने गैर सरकारी हथियार से फायरिंग की थी. अपने दावे को लेकर वे न्यायिक जांच आयोग के सामने पेश भी होने वाले थे.
मुकदमों व जेल के अलावा भी मुस्लिम समाज के लोगों के दर्जनों घरों-दुकानों-सम्पतियों पर बुलडोजर कार्यवाही कर नुकसान पहुंचाया गया. वहां अभी तक मस्जिदों-दरगाहों-कब्रिस्तानों पर अतिक्रमण के नाम पर बुलडोजर कार्यवाही व साम्प्रदायिक विभाजन की राजनीति जारी है.
न्यायिक आयोग द्वारा अपनी रिपोर्ट में साजिश के नजरिये से दायर किये गये वाद, उस पर उसी दिन बिना दूसरे पक्ष को सुने दिये गये सर्वे आदेश, दुबारा बिना आदेश के सर्वे और वहां उकसावे वाली नारेबाजी के विडियो, पुलिस फायरिंग के विडियो व पीडितों सहित जफर साहब की प्रेस कांफ्रेंस का वीडियो, सीओ अनुज चौधरी के बयानों का संज्ञान न लेना और सरकार व पुलिस की कार्यवाही व बातों को पूरी तरह सही ठहराने ने इस रिपोर्ट पर सवाल खड़े कर दिये हैं. यह रिपोर्ट एकतरफा है, राजनीतिक उद्देश्यों से प्ररित है और मुस्लिम समाज के लोगों पर जारी दमन जो जायज ठहराने के साथ ही उनपर और ज्यादा दमन ढाने और निशाना बनाने का बहाना मुहैय्या कराती है. योगी सरकार को 2027 के चुनाव के लिए इसकी ही तो जरुरत है.