वर्ष 35 / अंक - 33 / अगस्त का महीना और आजादी का जज्बा

अगस्त का महीना और आजादी का जज्बा

अगस्त का महीना और आजादी का जज्बा

हर साल भारत 9 अगस्त को ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की सालगिरह मनाता है, जो भारत का अपना खास साम्राज्यवाद-विरोधी दिवस है. 1942 में भारत ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा उपनिवेश था, और औपनिवेशिक शासकों को इस बात का बहुत घमंड था कि उनके विशाल वैश्विक साम्राज्य में सूरज कभी अस्त नहीं होता है. जब एआइसीसी (अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी) के मुंबई अधिवेशन में ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित हुआ, तो इसके जवाब में औपनिवेशिक शासकों ने गांधी और कांग्रेस के पूरे नेतृत्व को गिरफ्तार कर लिया. फिर भी भारत के लोगों ने मोर्चा संभाला. 1942 का आंदोलन 1857 के बाद औपनिवेशिक भारत का सबसे बड़ा जन-विद्रोह बन गया, जिसने औपनिवेशिक शासन से पूर्ण स्वतंत्रता के लिए भारतीय लोगों के अंतिम प्रयास की शुरूआत की, और वास्तव में औपनिवेशिक शासकों को पांच साल के भीतर देश छोड़ना पड़ा.

इस साल इस खास दिन ने एक नया और बेहद खास महत्व अपना लिया. अगस्त माह से पहले जंतर-मंतर का जुलाई महीना आया. 1942 में औपनिवेशिक शासकों के साथ सांठ-गांठ करने वाले लोग अब भारत के शासक हैं. उन्होंने उसी औपनिवेशिक नियम-पुस्तिका का पालन करने की कोशिश की – सोनम वांगचुक का अपहरण कर लिया गया और आम प्रदर्शनकारियों को लाठियों (जिन्हें मशहूर लोक गायक हेमांग बिस्वास ने ‘माउंट बैटन साहब’ द्वारा छोड़ा गया ‘बैटन’, यानी लाठी कहा था), पैलेट गन (जिन्हें राज्य दमन की कश्मीर प्रयोगशाला में और अचूक बनाया गया था), आंसू गैस के गोले और एके-47 असाॅल्ट राइफलों से चुप कराने की कोशिश की गई. फिर भी जेन-जी के साहस और शक्ति से प्रेरित होकर भारत के लोगों ने खुद को 1942 के ‘भारत छोड़ो’ भावना का योग्य उत्तराधिकारी साबित किया. बेहद अहंकारी मोदी सरकार को धर्मेंद्र प्रधान की बलि देनी पड़ी.

जुलाई 2026 के जंतर-मंतर का जज्बा तब से पूरे भारत में फैल रहा है. नालसर विश्वविद्यालय (हैदराबाद) के 450 से अधिक लाॅ (विधिशास्त्र) स्नातकों ने खुले तौर पर भारत के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश से अपनी डिग्री लेने से इनकार कर दिया है, जिनका पिछला रेकाॅर्ड मोदी सरकार के हर असंवैधानिक कदम को सही ठहराने का रहा है. स्कूली छात्र पूरे भारत में सार्वजनिक शिक्षा की कारगर व्यवस्था की मांग को लेकर विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं. झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक के खिलाफ शक्तिशाली आंदोलन खड़ा हुआ है. समय के साथ एक अच्छी बात यह भी हुई कि संसद के मानसून सत्र में जमीनी स्तर की आवाजें भी जोर-शोर से उठीं, जिसमें छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की बर्बरता के लिए गृह मंत्री अमित शाह की जवाबदेही की मांग की गई. 9-10 अगस्त को भारत में ट्रेड यूनियनों और किसान संगठनों के बड़े पैमाने पर प्रदर्शन भी देखने को मिले.

ताकत के दम पर युवाओं के उभार को दबाने में नाकाम रहने के बाद मोदी सरकार अब संघ ब्रिगेड को लामबंद करके जंतर-मंतर के प्रतिवाद को बदनाम करने और झारखंड के विरोध-प्रदर्शनों का इस्तेमाल करके संघी विमर्श को आगे बढ़ाने का एक जवाबी अभियान चलाने की कोशिश कर रही है. गोदी मीडिया, जिसने जंतर-मंतर के प्रतिवाद-प्रदर्शनों को नजरअंदाज किया था, झारखंड के विरोध-प्रदर्शनों को जेन जी के ‘आदर्श’ प्रतिवाद के तौर पर पेश करने में लगा है, जिसमें न तो ‘आजादी’ के नारे लगते हैं, न ही प्रदर्शनकारियों को खिलाने के लिए किसी जुनैद द्वारा बिरयानी परोसी जाती है, और न ही मोदी सरकार के खिलाफ कोई ‘अपशब्द’ कहे जाते हैं. जब कामरेड नेहा जंतर-मंतर और झारखंड के बीच की एकता को बनाए रखने के लिए रांची पहुंचीं – जहां आइसा पहले से ही झारखंड के प्रतिवादों का सक्रिय हिस्सा रहा है – तो संघ ब्रिगेड ने उनके चेहरे पर स्याही फेंक दी.

क्या हम संघ ब्रिगेड को जेन-जी के प्रतिवाद-प्रदर्शनों के साथ अपनी खतरनाक ‘बांटो और राज करो’ की राजनीति खेलने दे सकते हैं? क्या हम मोदी सरकार को ‘आजादी’ के नारे को अपराध की श्रेणी में लाने की इजाजत दे सकते हैं? अगर भारत आजादी के नारे का जश्न नहीं मना सकता, तो क्या संघ ब्रिगेड भारतीयों से गुलामी का जश्न मनाने की उम्मीद करता है? आजादी शब्द का मतलब सिर्फ राष्ट्रीय स्वतंत्रता नहीं है – जिसकी रक्षा के लिए भारतीय जनता हर साम्राज्यवादी खतरे का सामना करने को तैयार है – बल्कि इसका मतलब भारतीय लोगों की वे स्वतंत्रताएं और आजादी भी है, जिनका जिक्र भारत के संविधान की प्रस्तावना में किया गया है. एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य के तौर पर भारत के लिए आजादी शब्द – चाहे उसे इंडिपेंडेंस, फ्रीडम या लिबर्टी कहें – के इस्तेमाल को ही अपराध की श्रेणी में लाने से अधिक घिनौना अपमान और कुछ नहीं हो सकता.

अगर मोदी सरकार हमारे आंतरिक लोकतंत्र को दबा रही है, तो दूसरी ओर वह हमारी मुश्किल से हासिल की गई आर्थिक संप्रभुता और सामरिक स्वायत्तता को भी अमेरिकी साम्राज्यवाद तथा युद्ध व हमला के नरसंहारी अमेरिका-इजराइल गठजोड़ के हाथों गिरवी रख दे रही है. इसलिए यह देखना सुकून की बात है कि जहां छात्र प्रतिवादों ने सबके लिए सार्वजनिक शिक्षा, भ्रष्टाचार-मुक्त परीक्षा प्रणाली, संस्थागत आजादी और सरकारों की जवाबदेही के मुद्दों को सामने रखा है, वहीं मजदूरों और किसानों के बढ़ते प्रतिरोध सरकार के सामने रोजगार की सुरक्षा और सम्मान, श्रमिक अधिकारों की रक्षा, सब के लिए गुजारा-योग्य वेतन की गारंटी और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के नाम पर अमेरिकी कृषि-व्यवसाय के फायदे के लिए भारतीय किसानों के हितों की बलि चढ़ने के आसन्न खतरे जैसे मुद्दे उठा रहे हैं.


15 August, 2026