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सुमित सरकार: जनता के संघर्षों से राष्ट्र-निर्माण की पड़ताल का इतिहासकार

सुमित सरकार: जनता के संघर्षों से राष्ट्र-निर्माण की पड़ताल का इतिहासकार

सुमित सरकार नहीं रहे. 13 अगस्त को दिल्ली में 87 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ. आधुनिक भारत के इतिहास को समझने वाली कई पीढ़ियों के लिए यह सिर्फ एक बड़े इतिहासकार का निधन नहीं, बल्कि एक ऐसी बौद्धिक परंपरा के महत्वपूर्ण अध्याय का अवसान है, जिसने इतिहास को सत्ता और शासकों की कथा से निकालकर समाज, वर्ग, जाति, किसान, मजदूर, महिला और जन आंदोलनों की जटिल दुनिया में देखने की कोशिश की.

मैं उनसे भौतिक रूप से कभी नहीं मिला. लेकिन उनकी पुस्तक माॅडर्न इंडिया (1885-1947) आज भी मेरे बैग में रहती है. किसी तथ्य की तलाश हो, किसी ऐतिहासिक संदर्भ को समझना हो या आधुनिक भारत की किसी राजनीतिक प्रक्रिया की पृष्ठभूमि जाननी हो, बार-बार उसी पुस्तक की ओर लौटता हूं. इस अर्थ में सुमित सरकार से मेरा संबंध किसी व्यक्तिगत मुलाकात का नहीं, बल्कि अध्ययन और विचार का संबंध है. शायद यही किसी बड़े शिक्षक और इतिहासकार की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है. वह हमारे सामने उपस्थित हुए बिना भी हमारे बौद्धिक जीवन का हिस्सा बन जाता है.

इतिहास सिर्फ तारीखों और घटनाओं का नाम नहीं

सुमित सरकार की महत्ता को समझने के लिए उस दौर को समझना जरूरी है जिसमें उनका इतिहास लेखन विकसित हुआ. भारतीय इतिहास लेखन में लंबे समय तक औपनिवेशिक और राष्ट्रवादी दोनों तरह की ऐसी प्रवृत्तियां मौजूद थीं, जिनमें इतिहास मुख्यतः बड़े नेताओं, संस्थाओं और राजनीतिक घटनाओं के इर्द-गिर्द घूमता था.

मार्क्सवादी इतिहास लेखन ने इस तस्वीर को काफी बदला. उसने औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था, वर्ग संबंधों, किसान आंदोलनों, मजदूर आंदोलनों और आर्थिक शोषण को इतिहास के केंद्र में लाने का महत्वपूर्ण काम किया. लेकिन मार्क्सवादी इतिहास लेखन के भीतर भी कई बार एकरेखीय व्याख्या का खतरा दिखाई देता था. इतिहास को किसी निश्चित दिशा में आगे बढ़ती प्रक्रिया के रूप में देखने की प्रवृत्ति में विभिन्न सामाजिक शक्तियों की जटिलता और उनके अंतर्विरोध कई बार पीछे छूट जाते थे.

सुमित सरकार की पीढ़ी ने इस समस्या को गंभीरता से लिया. उन्होंने मार्क्सवादी इतिहास-दृष्टि को छोड़ा नहीं, बल्कि उसके भीतर से इतिहास को अधिक जटिल, बहुस्तरीय और स्रोत-आधारित ढंग से समझने की कोशिश की. यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी.

कैंब्रिज स्कूल की चुनौती और सुमित सरकार

1960 और 1970 के दशकों में भारतीय राष्ट्रवाद की व्याख्या को एक दूसरी दिशा से भी चुनौती मिली. कैंब्रिज स्कूल के इतिहासकारों ने राष्ट्रवादी आंदोलन की पारंपरिक व्याख्याओं पर सवाल उठाते हुए भारतीय राजनीति को स्थानीय अभिजात वर्गों, गुटबंदी और सत्ता-संसाधनों में हिस्सेदारी की प्रतिस्पर्धा के रूप में देखने पर जोर दिया.

इस हस्तक्षेप को पूरी तरह खारिज कर देना उचित नहीं होगा. कैंब्रिज इतिहासकारों ने यह जरूरी सवाल उठाया कि राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर स्थानीय सत्ता-संबंध क्या थे, नेतृत्व किन सामाजिक समूहों से आया और राजनीतिक लामबंदी के पीछे स्थानीय हितों की क्या भूमिका थी.

बेयली और वाशब्रुक जैसे सूक्ष्म अध्ययन करने वाले अध्येताओं ने भारतीय राजनीति के स्थानीय और क्षेत्रीय आधारों पर नए सवाल खड़े किए. उन्होंने यह दिखाया कि औपनिवेशिक भारत की राजनीति को केवल ऊपर से चलने वाली राष्ट्रीय राजनीति के रूप में नहीं समझा जा सकता. स्थानीय अभिजात वर्ग, जातीय समूह, क्षेत्रीय हित और सत्ता-संसाधनों के लिए संघर्ष भी राजनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित करते थे.

लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब इन वास्तविक अंतर्विरोधों को ही पूरे राष्ट्रीय आंदोलन की व्याख्या बना दिया जाए. यदि राष्ट्रवाद को केवल अभिजात वर्गों की आपसी प्रतिस्पर्धा मान लिया जाए तो उन करोड़ों किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों, महिलाओं और आम लोगों की राजनीतिक सक्रियता का क्या होगा, जिन्होंने औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष को व्यापक सामाजिक शक्ति में बदला?

सुमित सरकार की ऐतिहासिक दृष्टि की खूबी यही थी कि वे इन अंतर्विरोधों को स्वीकार करते हुए भी राष्ट्रीय आंदोलन की व्यापक ऐतिहासिक प्रक्रिया को केवल अभिजात राजनीति में सीमित नहीं करते.

सबाल्टर्न इतिहास और उसके बाद

इसी दौर में रणजीत गुहा और उनके साथियों के नेतृत्व में सबाल्टर्न इतिहास लेखन सामने आया. इसने इतिहास के उस ढांचे को चुनौती दी जिसमें राष्ट्र का इतिहास मुख्यतः अभिजात राजनीतिक नेतृत्व का इतिहास था.

सबाल्टर्न इतिहास ने पूछा. किसान कहां हैं. आदिवासी कहां हैं. स्थानीय विद्रोह कहां हैं. उन लोगों की अपनी राजनीतिक चेतना कहां है जो कांग्रेस या औपनिवेशिक राज्य के औपचारिक ढांचे के बाहर संघर्ष कर रहे थे?

यह भारतीय इतिहास लेखन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हस्तक्षेप था. इसने इतिहास के स्रोतों का एक विशाल भंडार खोला और उन सामाजिक समूहों को इतिहास के केंद्र में लाने की कोशिश की, जिन्हें पारंपरिक इतिहास लेखन ने अक्सर हाशिए पर रखा था.

लेकिन सबाल्टर्न इतिहास की अपनी सीमाएं भी थीं. जन-इतिहास के असंख्य टुकड़ों और स्थानीय अनुभवों को सामने लाते हुए कभी-कभी वह उस व्यापक ऐतिहासिक प्रक्रिया को पकड़ने में कठिनाई महसूस करता है जिसमें ये अलग-अलग संघर्ष एक-दूसरे से जुड़ते हैं. वह इतिहास को कई बार इतने अलग-अलग अनुभवों में बांट देता है कि उसकी व्यापक सामाजिक दिशा और संरचनात्मक संबंध धुंधले पड़ जाते हैं.

सुमित सरकार ने इस चुनौती को गंभीरता से लिया. उनके लिए जनता को इतिहास में शामिल करना जरूरी था, लेकिन जनता के इतिहास को व्यापक सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक संरचनाओं से काटकर समझना भी उचित नहीं था. यही उनकी मार्क्सवादी विरासत की महत्वपूर्ण विशेषता थी.

स्रोतों के विस्तार ने इतिहास को बदला

कैंब्रिज और सबाल्टर्न इतिहास लेखन की बहसों के साथ इतिहास के स्रोतों का संसार भी लगातार विस्तृत हो रहा था. निजी दस्तावेज सामने आ रहे थे. वायसरायों और औपनिवेशिक अधिकारियों के निजी पत्र उपलब्ध हो रहे थे. स्थानीय अभिलेखों और सामाजिक समूहों से जुड़े दस्तावेजों का अध्ययन बढ़ रहा था.

इन स्रोतों ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और औपनिवेशिक समाज की कई स्थापित व्याख्याओं को चुनौती दी. चंपारण जैसे इलाकों का अध्ययन भी इसी कारण नए सवाल पैदा कर रहा था. कपिल कुमार ने चंपारण के लंबे ऐतिहासिक विकास का अध्ययन करते हुए यह दिखाने की कोशिश की कि किस तरह एक लंबे दौर में आबादी और उत्पादन संबंधों में बड़े बदलाव हुए और उद्योग से जुड़े लोगों की बड़ी संख्या खेती पर निर्भर होने लगी. यह सिर्फ आर्थिक बदलाव नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक शासन के तहत सामाजिक संरचना में आए व्यापक परिवर्तनों का संकेत था.

इस तरह नए स्रोत और नए अध्ययन यह मांग कर रहे थे कि भारतीय इतिहास को पुराने राजनीतिक आख्यानों से आगे जाकर देखा जाए. सुमित सरकार इसी बदलते इतिहास लेखन के बीच अपनी विशिष्ट पद्धति विकसित कर रहे थे.

सुमित सरकार की मौलिकता: न एकरेखीय इतिहास, न बिखरा हुआ इतिहास

सुमित सरकार ने दो अतियों से बचने की कोशिश की.

एक ओर वे इतिहास को किसी पहले से तय सूत्र में बांधाने के खिलाफ थे. दूसरी ओर वे इतिहास को अलग-अलग अनुभवों और घटनाओं के ऐसे संग्रह में बदल देने के भी पक्ष में नहीं थे, जिसमें कोई व्यापक ऐतिहासिक संबंध दिखई ही न दे.

उनकी आधुनिक भारत (1885-1947) इसी दृष्टि का शानदार उदाहरण है. पुस्तक में औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था, मध्यवर्गीय राजनीति, स्वदेशी आंदोलन, किसान और आदिवासी संघर्ष, जाति आंदोलन, मजदूर आंदोलन, गांधी, साम्प्रदायिकता, जन राजनीति और अंततः स्वतंत्रता तथा विभाजन को एक व्यापक ऐतिहासिक प्रक्रिया में देखने की कोशिश की गई है.

यहां इतिहास न तो सीधी सड़क है और न ही बिखरी हुई पगडंडियों का जंगल. यह संघर्षों, अंतर्विरोधों, समझौतों और आकस्मिक मोड़ों से भरा हुआ टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता है. सुमित सरकार इसी जटिलता को इतिहास की शक्ति मानते हैं, कमजोरी नहीं.

स्वदेशी आंदोलन: इतिहासकार की प्रयोगशाला

सुमित सरकार की पहली महत्वपूर्ण कृति The Swadeshi Movement in Bengal थी. इस पुस्तक ने स्वदेशी आंदोलन को केवल बंगाल विभाजन और कुछ बड़े राष्ट्रवादी नेताओं की प्रतिक्रिया के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसके भीतर मौजूद विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक धाराओं का सूक्ष्म अध्ययन किया.

स्वदेशी आंदोलन में बहिष्कार था, राष्ट्रीय शिक्षा थी, स्वदेशी उद्योग थे, छात्र थे, मजदूर थे, गांवों में समितियां थीं, क्रांतिकारी राजनीति थी और साथ ही हिंदू-मुस्लिम संबंधों का जटिल प्रश्न भी था.

सुमित सरकार इन सभी को एक ही रंग में नहीं रंगते. वे आंदोलन की शक्ति के साथ उसकी सीमाओं को भी देखते हैं. वे यह सवाल उठाते हैं कि आंदोलन व्यापक सामाजिक शक्ति बनने की अपनी संभावनाओं को अंततः क्यों कायम नहीं रख सका. ब्रिटिश दमन निश्चित रूप से महत्वपूर्ण था, लेकिन केवल दमन को कारण मान लेना आंदोलन की आंतरिक कमजोरियों और सामाजिक सीमाओं को समझने से बच निकलना होगा.

यही इतिहासकार की ईमानदारी है. किसी आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखने का अर्थ उसकी कमजोरियों को छिपाना नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक शक्ति और सीमाओं दोनों को समझना है.

राष्ट्रवाद को समझने का संतुलित नजरिया

सुमित सरकार के सामने एक कठिन सवाल था. क्या भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को उसके नेतृत्व की सीमाओं के बावजूद ऐतिहासिक रूप से प्रगतिशील प्रक्रिया माना जाए.

उनका उत्तर न तो राष्ट्रवादी महिमामंडन था और न कैंब्रिज जैसी पूर्ण अवमूल्यन की प्रवृत्ति. वे कांग्रेस और उसके नेतृत्व की वर्गीय तथा सामाजिक सीमाओं को देखते हैं. किसानों, मजदूरों, महिलाओं, आदिवासियों और विभिन्न सामाजिक समूहों की अपनी आकांक्षाओं को भी सामने रखते हैं.

लेकिन वे यह भी देखते हैं कि इन तमाम अंतर्विरोधों के बीच राष्ट्रीय आंदोलन औपनिवेशिक शासन के खिलाफ एक ऐसी व्यापक राजनीतिक शक्ति में बदल गया जिसने आधुनिक भारत के निर्माण की जमीन तैयार की.

राष्ट्रवाद उनके लिए कोई पवित्र और निर्दाेष प्रक्रिया नहीं थी. लेकिन वह केवल अभिजात वर्ग का षड्यंत्र भी नहीं था. यही द्वंद्वात्मकता उनके इतिहास लेखन की शक्ति है.

आधुनिक भारत: सवाल सिर्फ सत्ता हस्तांतरण नहीं

सुमित सरकार के इतिहास को पढ़ते हुए एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है. 1947 उनके लिए केवल अंग्रेजों के चले जाने की तारीख नहीं है.

औपनिवेशिक शासन से राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल करना एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी, लेकिन उसके साथ औपनिवेशिक राज्य की संस्थाओं और सामाजिक संरचनाओं की निरंतरता का प्रश्न भी मौजूद था. सेना, पुलिस, न्यायपालिका और प्रशासनिक ढांचे में औपनिवेशिक विरासतों की मौजूदगी स्वतंत्र भारत के सामने एक गंभीर प्रश्न था. इस अर्थ में राजनीतिक स्वतंत्रता और सामाजिक मुक्ति को एक ही चीज मान लेना इतिहास की जटिलता को कम कर देता है.

यहां सुमित सरकार का इतिहास आज भी हमारे लिए उपयोगी बनता है. वह हमें स्वतंत्रता को न तो कम करके देखने देता है और न उसे एक ऐसी पूर्ण मुक्ति के रूप में देखने देता है जिसके बाद इतिहास के सारे प्रश्न समाप्त हो गए.

इतिहास के भीतर वर्ग, जाति और जनता

सुमित सरकार की मार्क्सवादी दृष्टि का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वर्ग उनके लिए कोई अकेली श्रेणी नहीं है. भारतीय समाज को समझने के लिए जाति, समुदाय, क्षेत्र, लिंग और वर्ग के परस्पर संबंधों को देखना जरूरी है.

उनकी रचनाओं में किसान आंदोलनों के साथ जातिगत आंदोलनों, महिला प्रश्न, मजदूर संघर्ष और साम्प्रदायिक राजनीति पर भी गंभीर ध्यान मिलता है. यही वजह है कि उनका इतिहास लेखन भारतीय समाज को एक जटिल सामाजिक संरचना के रूप में देखने में मदद करता है.

सुमित सरकार ने कठिन रास्ता चुना. उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि उन्होंने इतिहास को एक बंद अध्याय नहीं, बल्कि लगातार चलने वाली बहस के रूप में देखा. सुमित सरकार के निधन के साथ आधुनिक भारत के इतिहास की एक बड़ी आवाज जरूर मौन हुई है, लेकिन उनका इतिहास मौन नहीं हुआ.

वह उन किताबों में मौजूद है जिन्हें विद्यार्थी आज भी पढ़ते हैं. उन बहसों में मौजूद है जिन्हें इतिहासकार आज भी आगे बढ़ा रहे हैं. और उन सवालों में मौजूद है जो हर लोकतांत्रिक समाज को अपने अतीत से पूछने चाहिए.

आज जब सत्ता इतिहास को अपने अनुकूल ढालने की कोशिश कर रही है, तब सुमित सरकार की विरासत हमें याद दिलाती है कि इतिहास का असली सवाल यह भी है कि समाज कैसे बदला, उत्पादन संबंध कैसे बदले, जनता कैसे लड़ी और सत्ता ने उन संघर्षों का कैसे जवाब दिया? इतिहास को मिथक में बदलना आसान है. उसे दस्तावेजों, सामाजिक संबंधों और जन संघर्षों की रोशनी में समझना कठिन है. ऐसी स्थिति में इतिहासकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है.

मेरे लिए उनकी सबसे बड़ी विरासत यही है. इतिहास को न तो सत्ता की भाषा में पढ़ना और न ही किसी तैयार वैचारिक खांचे में बंद कर देना, बल्कि स्रोतों, समाज और जनता के संघर्षों के बीच उसके अर्थ को तलाशना.

उनकी किताब मेरे बैग में अब भी है. आधुनिक भारत को समझने की जरूरत जब तक बनी रहेगी, इस किताब की ओर लौटने की जरूरत भी बनी रहेगी.

सुमित सरकार को विनम्र श्रद्धांजलि!

15 August, 2026