-- मनमोहन
रविवार 14 जून को अमेरिका और ईरान ने उस युद्ध में युद्धविराम समझौते की घोषणा की, जिसे ट्रंप प्रशासन और इस्राइल ने 28 फरवरी को शुरू किया था. इस युद्ध में ईरान में 3,636 से ज्यादा लोग मारे गए, 26,500 से अधिक घायल हुए, जबकि लेबनान में 3,800 लोगों की जान गई और 11,800 से ज्यादा घायल हुए. दुनिया भर में ऊर्जा और खाद्य संकट गहरा गया, लेकिन इतनी तबाही मचाने के बावजूद अमेरिका और इस्राइल अपने किसी भी घोषित लक्ष्य को हासिल नहीं कर सके.
ईरानी समाचार एजेंसी तसनीम के मुताबिक, दोनों देशों के बीच हुए 14-सूत्रीय समझौता ज्ञापन (MoU) की मुख्य बातें ये हैं: लेबनान सहित सभी मोर्चों पर स्थायी युद्धविराम, एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते पर बातचीत, अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाना, होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजरानी बहाल करना, ईरान पर लगे प्रतिबंधों को समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू करना, अवरुद्ध किये गये धन और परिसंपत्तियों को मुक्त करना, तेल निर्यात पर लगी रुकावटें हटाना, ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम-से-कम 300 अरब डाॅलर की व्यवस्था करना तथा भविष्य के समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के बाध्यकारी प्रस्ताव के जरिए मंजूरी दिलाना.
अगर इस समझौते को उसके राजनीतिक मायने में पढ़ा जाए, तो यह ईरान की ऐतिहासिक जीत और अमेरिकी साम्राज्यवाद की रणनीतिक पराजय का दस्तावेज नजर आता है. अमेरिका और इस्राइल ने ईरान को बिना किसी शर्त झुकाने के इरादे से अभूतपूर्व सैन्य दबाव बनाया. विमानवाहक युद्धपोत तैनात किए गए, समुद्री नाकेबंदी लागू की गई और ईरान के नागरिक तथा रणनीतिक ढांचे पर लगातार विनाशकारी बमबारी की गई. लेकिन अंत में जो समझौता सामने आया, वह उनके घोषित लक्ष्यों की जीत नहीं, बल्कि उनसे पीछे हटने का दस्तावेज साबित हुआ. समझौते की पूरी रूपरेखा साफ तौर पर ईरान के पक्ष में झुकी हुई दिखाई देती है.
अमेरिका को इरान के पुनर्निर्माण तथा आर्थिक विकास के लिए कम-से-कम 300 अरब डाॅलर की व्यवस्था करनी होगी – यही इस समझौते का सबसे चौंकाने वाला पहलू है. हालिया युद्ध की पृष्ठभूमि में देखें तो यह रकम सामान्य आर्थिक सहायता से कहीं ज्यादा युद्ध मुआवजे जैसी लगती है. इतिहास में आम तौर पर विजेता पराजित देश के पुनर्निर्माण का खर्च नहीं उठाता; उलटे हारने वाले पक्ष से इसकी कीमत वसूली जाती है. लेकिन यहां अमेरिका को अपने ही प्रतिद्वंद्वी के पुनर्निर्माण के लिए संसाधन जुटाने होंगे.
समझौते में 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते की समयसीमा तय की गई है. अमेरिका को पहले अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटानी होगी, प्रतिबंधों में ढील देनी होगी, अवरुद्ध धन और परिसंपत्तियां लौटानी होंगी और तेल निर्यात पर लगी रुकावटें समाप्त करनी होंगी. उसके बाद ही आगे की बातचीत होगी. दूसरे शब्दों में, शुरुआती रियायतें अमेरिका देगा, जबकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम की मौजूदा स्थिति बनाए रखेेगा. दस्तावेज में केवल इतना कहा गया है कि ईरान फिर से पुष्टि करता है कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा; उसके परमाणु कार्यक्रम पर कोई नई कानूनी बाध्यता या अतिरिक्त रोक नहीं लगाई गई है.
यह समझौता नेतन्याहू और उनकी गठबंधन सरकार के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका है. समझौते की खबर आते ही इस्राइल और दुनिया भर की जायोनी लाॅबी में बेचैनी फैल गई. इस्राइली टीवी चैनलों पर मानो मातम पसरा हुआ था. जिन लोगों ने यह सपना देखा था कि अमेरिका को युद्ध में झोंककर वे ईरानी सरकार को गिरा देंगे, उसका परमाणु कार्यक्रम, यूरेनियम संवर्धन क्षमता और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पूरी तरह खत्म कर देंगे, उनके लिए यह समझौता करारी निराशा लेकर आया. इनमें से एक भी लक्ष्य हासिल नहीं हुआ. युद्ध का नतीजा यह रहा कि ईरान अपनी जगह डटा रहा, जबकि अमेरिका और इस्राइल को अपने घोषित उद्देश्यों से पीछे हटना पड़ा.
ट्रंप प्रशासन के पीछे हटने की वजह केवल युद्ध का मैदान नहीं था. युद्ध के कारण ऊर्जा की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी ने अमेरिका में महंगाई को तीन वर्षों के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचा दिया. ट्रंप की जनस्वीकृति लगातार गिर रही थी, उनकी अपनी पार्टी के भीतर विरोध बढ़ रहा था और मध्यावधि चुनाव सिर पर थे. खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं में आई सुस्ती का असर ट्रंप परिवार के कारोबारी हितों पर भी पड़ने लगा था. ट्रंप को उम्मीद थी कि वे वेनेजुएला की तरह एक तेज और आसान जीत हासिल कर लेंगे. लेकिन जैसे ही साफ हो गया कि ईरान न झुकने वाला है और न ही सत्ता परिवर्तन की साजिश का शिकार बनने वाला है, व्हाइट हाउस ने टकराव के बजाय समझौते का रास्ता चुना.
पिछले पच्चीस वर्षों में पश्चिम एशिया में अमेरिका को जितनी भी सैन्य नाकामियों का सामना करना पड़ा है, उनमें ईरान के खिलाफ यह युद्ध शायद सबसे ज्यादा दूरगामी असर वाला साबित होगा. अफगानिस्तान, इराक, यमन, लीबिया और सीरिया के विपरीत, इस्लामी गणराज्य ईरान ने न केवल अमेरिकी दबाव का सामना किया, बल्कि सत्ता परिवर्तन की एक और कोशिश को भी विफल कर दिया. यह युद्ध कभी केवल एक सरकार को गिराने का सवाल नहीं था. इसके पीछे पूरे पश्चिम एशिया का राजनीतिक नक्शा बदलने और एक नए, विस्तारित ‘ग्रेटर इस्राइल’ की परियोजना को आगे बढ़ाने की महत्वाकांक्षा थी. ईरान को झुकाने में नाकामी ने उसी परियोजना पर सबसे गहरी चोट पहुंचाई है. नेतन्याहू के लिए ट्रंप का पीछे हटना केवल एक सामरिक झटका नहीं, बल्कि ऐसी राजनीतिक पराजय है जिसके असर आने वाले वर्षों तक महसूस किए जाएंगे.
लगभग आठ दशकों से फिलिस्तीन, लेबनान, सीरिया और पूरे क्षेत्र में युद्ध, कब्जे, जमीन हड़पने और जनसंहार की नीति पर चलने वाला इस्राइल इस युद्ध में अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक विफलताओं में से एक का सामना कर रहा है. उसने अमेरिका को युद्ध में झोंकने के लिए अपनी पूरी राजनीतिक और कूटनीतिक ताकत लगा दी, जबकि अमेरिकी जनता का बड़ा हिस्सा इस युद्ध के खिलाफ था. मोसाद से लेकर हसबरा तक, AIPAC से लेकर ADL तक, ईरानी राजशाही समर्थक समूहों से लेकर हूवर इंस्टीट्यूशन और दूसरे थिंक टैंकों तक – पूरी जायोनी लाॅबी ने इस युद्ध को निर्णायक जीत में बदलने की भरसक कोशिश की. लेकिन नतीजा इसके ठीक उलट निकला.
युद्धविराम के बाद ईरान पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत स्थिति में खड़ा दिखाई देता है. उसकी राजनीतिक व्यवस्था बरकरार है, परमाणु विज्ञान और तकनीक पर उसका संप्रभु अधिकार बना हुआ है, उसकी क्षेत्रीय अखंडता सुरक्षित है और होर्मुज जलडमरूमध्य पर उसकी रणनीतिक स्थिति पहले से अधिक मजबूत होकर उभरी है.
यह सच है कि इस्राइल ने ट्रंप को युद्ध में धकेलकर ईरान के नागरिक ढांचे, ऐतिहासिक धरोहरों, विश्वविद्यालयों, अस्पतालों और दूसरे असैनिक ठिकानों पर हमले करवाए. मासूम बच्चों तक को नहीं बख्शा गया. लेकिन अंधाधुंध तबाही अपने-आप में कोई रणनीतिक जीत नहीं होती. युद्ध का असली पैमाना यह है कि उसके राजनीतिक नतीजे क्या निकले. और इस कसौटी पर देखेें तो इस्राइल अपने घोषित लक्ष्यों में से एक भी हासिल नहीं कर सका.
ईरान के वैज्ञानिक, शिक्षक, इंजीनियर और सांस्कृतिक धरोहरों के विशेषज्ञ इस तबाही की भरपाई में जुट चुके हैं. विश्वविद्यालय फिर से खुल रहे हैं, शोध संस्थान अपना काम शुरू कर रहे हैं और आम लोग धीरे-धीरे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौट रहे हैं. जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनका दुख कभी मिट नहीं सकता, लेकिन ईरान इस तबाही से उबर जाएगा. इतना ही नहीं, जब युद्ध की धूल बैठेगी तो ईरानी जनता अपनी नागरिक आजादियों और लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई भी पहले की तरह जारी रखेगी. इस युद्ध ने राजशाही की वापसी के ख्वाब देखने वालों, उनके विदेशी आकाओं और जायोनी परियोजना के स्थानीय मोहरों को राजनीतिक रूप से पूरी तरह बेनकाब कर दिया है.
गजा में जारी जनसंहार के बीच इस्राइल ने लेबनान और फिर ईरान तक युद्ध का विस्तार किया और ट्रंप प्रशासन को भी इस मुहिम में शामिल कर लिया. इसके साथ ही पश्चिमी काॅरपोरेट मीडिया ने पूरी कोशिश की कि बहस का केंद्र जनसंहार और आक्रामकता से हटाकर ईरान को ‘खलनायक’ साबित करने पर ले जाया जाए. उपनिवेशवादी जायोनी राज्य को ‘आत्मरक्षा’ करने वाला लोकतंत्र और उसके हमलों को नैतिक अभियान की तरह पेश किया गया. लेकिन घटनाओं ने इस प्रचार की पोल खोल दी. हकीकत यह थी कि इस्राइल लगातार अमेरिका पर युद्ध जारी रखने का दबाव बना रहा था, जबकि आखिरकार ट्रंप प्रशासन को अमेरिकी जनता की युद्ध-विरोधी भावना और बदलते राजनीतिक हालात के आगे समझौते का रास्ता चुनना पड़ा.
यही वजह है कि इस युद्ध की जीत केवल ईरानियों की नहीं, बल्कि अमेरिका की युद्ध-विरोधी जनता की भी है. यह युद्ध अमेरिकी कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी के बिना शुरू किया गया था और उसके खिलाफ पूरे अमेरिका में व्यापक विरोध उभरा. लाखों लोगों ने साफ कहा कि यह युद्ध अमेरिका का नहीं, बल्कि इस्राइल की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं का युद्ध है. आखिरकार व्हाइट हाउस को इसी जनदबाव और अपने राजनीतिक हितों को देखते हुए पीछे हटना पड़ा.
इस युद्ध ने एक बार फिर साबित किया कि किसी भी स्वाभिमानी राष्ट्र की संप्रभुता उसकी जनता की होती है, किसी अस्थायी सरकार की नहीं. ईरान ने क्या हासिल किया? उसकी राज्य व्यवस्था कायम रही. देश का विघटन नहीं हुआ. परमाणु विज्ञान और तकनीक पर उसका संप्रभु अधिकार बना रहा. इस्राइल का पसंदीदा मोहरा रजा पहलवी सत्ता में लौटने का सपना भी पूरा नहीं कर सका. ईरान ने हमले सहे, लेकिन आत्मसमर्पण नहीं किया. उसने जवाबी कार्रवाई की, क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया और अंततः होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपने रणनीतिक प्रभाव का एहसास पूरी दुनिया को करा दिया.
अगर गजा में हुए जनसंहार ने पश्चिमी दुनिया में इस्राइल के ‘शांतिप्रिय लोकतंत्र’ होने का भ्रम तोड़ दिया था, तो ईरान पर हमले ने उसे अमेरिका के लिए भी एक बोझिल और अविश्वसनीय सैन्य साझेदार के रूप में उजागर कर दिया. आज एक के बाद एक सर्वे यही दिखा रहे हैं कि इस्राइल दुनिया की सबसे अधिक अलोकप्रिय उपनिवेशवादी सत्ता बनता जा रहा है. ‘ग्लोबल कंट्री परसेप्शन्स 2026’ सर्वे में 129 देशों और तीन अंतरराष्ट्रीय संगठनों के बीच इस्राइल सबसे नीचे रहा. दूसरी ओर, प्यू रिसर्च सेंटर के हालिया सर्वे के अनुसार लगभग 60 प्रतिशत अमेरिकी वयस्क इस्राइल के प्रति प्रतिकूल राय रखते हैं और नेतन्याहू पर अविश्वास लगातार बढ़ रहा है. 50 वर्ष से कम उम्र के अधिकांश अमेरिकी – चाहे वे किसी भी प्रमुख राजनीतिक दल से जुड़े हों – अब इस्राइल की नीतियों को नकारात्मक नजर से देखते हैं.
लगातार सामने आ रहे सबूत यह भी दिखाते हैं कि इस्राइली तंत्र ने ऐसे यातना केंद्र बना रखे हैं, जहां फिलिस्तीनी पुरुषों और महिलाओं के साथ व्यवस्थित यौन हिंसा और अमानवीय अत्याचार किए जाते हैं. यहां तक कि द न्यूयाॅर्क टाइम्स को भी इस सच्चाई को स्वीकार करना पड़ा, भले ही उसने इसे खोजी रिपोर्ट के बजाय एक राय लेख के रूप में प्रकाशित किया. फिलिस्तीन, लेबनान और ईरान की जनता के खिलाफ किए गए युद्ध अपराधों और जनसंहार के लिए इस्राइल का ऐतिहासिक हिसाब-किताब होना अब टाला नहीं जा सकता.
इसका यह मतलब हरगिज नहीं है कि अब ईरान की सारी समस्याएं खत्म हो गई हैं. ईरानी जनता को अब शांति की लड़ाई भी जीतनी है. देश के सामने गंभीर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियां मौजूद हैं. ईरानियों ने यह युद्ध इसलिए नहीं जीता कि वे, जैसा कुछ अमेरिकी टिप्पणीकार दावा करते हैं, अचानक और ज्यादा कट्टर हो गए. उन्होंने इसलिए जीत हासिल की क्योंकि इस युद्ध ने उनके भीतर गहराई से रची-बसी उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रीय चेतना को फिर से जगाया.
ईरानी जनता ने हमेशा विदेशी हमलों और घरेलू दमन – दोनों के खिलाफ संघर्ष किया है और आगे भी करती रहेगी. हर ईरानी को अपनी सरकार की आलोचना करने, नागरिक आजादियों की मांग उठाने, स्वतंत्र प्रेस, स्वतंत्र मजदूर यूनियनों, छात्र संगठनों और महिलाओं के अधिकारों के लिए संगठित होने का पूरा अधिकार है. लेकिन इन अधिकारों की रक्षा तभी संभव है, जब देश की राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता सुरक्षित रहे, विदेशी दखलंदाजी लोकतांत्रिक आंदोलनों को अपहृत न कर सके और इस्राइल-अमेरिका के बम नागरिक आबादी पर बरसना बंद हों.
यह समझौता टिकेगा या नहीं, इसका जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है. अगर ट्रंप अपने वादे से मुकरते हैं, या इस्राइल फिर से युद्ध छेड़ता है, तो ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर उसी तरह नियंत्रित कर सकता है, जैसा उसने इस युद्ध के दौरान करके दिखाया. दूसरी ओर, क्षेत्रीय स्तर पर मिली रणनीतिक नाकामी की भरपाई के लिए नेतन्याहू गजा में और भी ज्यादा बर्बरता का रास्ता अपना सकता है.
फिलिस्तीनी पहले ही जनसंहार, नस्लवादी दमन, बेदखली और जातीय सफाया का सामना कर रहे हैं. लेकिन इस्राइल की सबसे बड़ी समस्या यही है कि फिलिस्तीनी प्रतिरोध को सैन्य ताकत से खत्म नहीं किया जा सकता. न हमास हथियार डालेगा, न हिज्बुल्लाह और न ही ईरान अपना प्रतिरोध छोड़ेगा. गजा ने साबित कर दिया है कि इतिहास के सबसे निर्मम दमन के बावजूद उसकी सामाजिक बुनियाद टूटी नहीं है. अगर नेतन्याहू फिर से गजा पर हमला करता है, तो दुनिया भर में इस्राइल के खिलाफ जनमत और तेज होगा, जबकि उसकी अर्थव्यवस्था पहले ही बढ़ते वैश्विक बहिष्कार और राजनीतिक अलगाव का दबाव झेल रही है.
पश्चिम एशिया सचमुच बदल गया है, लेकिन वैसा नहीं जैसा नेतन्याहू चाहता था. ईरान पर हमले का सबसे बड़ा नतीजा यह निकला कि पिछले 25 वर्षों में पहली बार इस्राइल और उसके सबसे बड़े सहयोगी अमेरिका के बीच गंभीर रणनीतिक दरार दिखाई दी. दूसरी ओर, ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ा है और फिलिस्तीन, लेबनान तथा पूरे क्षेत्र में प्रतिरोध की भावना पहले से कहीं अधिक मजबूत होकर उभरी है, भले ही सीरिया अब ईरान के प्रभाव-क्षेत्र से बाहर हो.
लगातार युद्ध, सैन्य वर्चस्व और विस्तारवादी विचारधारा के सहारे कोई भी औपनिवेशिक परियोजना हमेशा नहीं चल सकती. इस्राइल भी अपनी सैन्य शक्ति की सीमाओं से टकराए बिना नहीं रहेगा. सीरिया हो या लेबनान, अंततः उसे पीछे हटना पड़ेगा. संभव है कि पूरे पश्चिम एशिया को अपनी ताकत के बल पर नया रूप देने की यही परियोजना आगे चलकर इस्राइल की सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल साबित हो.
युद्ध के इस चरण का अंत, युद्ध का अंत नहीं है. अमेरिकी साम्राज्यवाद अपनी ढलती हुई वैश्विक बादशाहत को बचाने के लिए नए टकरावों और नए युद्धों की तैयारी करता रहेगा. 2015 में ओबामा प्रशासन के दौरान हुआ जेसीपीओए समझौता ट्रंप ने 2018 में तोड़ दिया और उसी ने 2026 के युद्ध की जमीन तैयार की. आज का युद्धविराम भी स्थायी शांति की गारंटी नहीं है; अगर साम्राज्यवादी नीतियां और क्षेत्रीय विस्तारवाद जारी रहे, तो यही ढांचा किसी नए युद्ध की भूमिका भी बन सकता है. इसलिए इस युद्धविराम का स्वागत करते हुए भी सबसे बड़ी जिम्मेदारी दुनिया भर की अमनपसंद और जनवादी ताकतों की है कि वे युद्ध, जनसंहार और साम्राज्यवादी दखल के खिलाफ अपना संघर्ष और मजबूत करें.