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जनेऊ आंदोलन के 100 साल बनाम बिहार में एनकाउंटर राज की पदचाप

जनेऊ आंदोलन के 100 साल बनाम बिहार में एनकाउंटर राज की पदचाप

बिहार में जनेऊ आंदोलन के 100 साल पूरे हुए हैं. यह सिर्फ एक सामाजिक आंदोलन की वर्षगांठ नहीं, बल्कि ब्राह्मणवादी वर्चस्व के खिलाफ सामाजिक बराबरी, आत्मसम्मान और सत्ता में हिस्सेदारी की लड़ाई की ऐतिहासिक विरासत की याद है. यादव समुदाय सहित पिछड़ी जातियों ने जिस संघर्ष की आग जलायी, उसी जमीन पर आगे चलकर त्रिवेणी संघ और सामाजिक न्याय की राजनीति खड़ी हुई.

लेकिन आज, जब सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद कुछ लोग यह घोषणा कर रहे हैं कि “त्रिवेणी संघ की यात्रा पूरी हो गई”, तब बिहार की मौजूदा परिस्थितियां इस दावे की असलियत खोल देती हैं. सवाल है – क्या सचमुच सामाजिक न्याय की लड़ाई पूरी हो गई है? या फिर बिहार को दोबारा मनुवादी-सामंती दौर में धकेलने की तैयारी चल रही है?

आज बिहार में दलितों और अति पिछड़ों के घरों पर बुलडोजर चल रहे हैं. मुसलमान माॅब लिंचिंग का शिकार हो रहे हैं. “जीरो टाॅलरेंस” के नाम पर एनकाउंटर राज की जमीन तैयार की जा रही है. और यह सब सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनते ही अचानक तेज क्यों हो गया? क्या यह महज संयोग है?

सिवान में सोनू यादव का एनकाउंटर तमाम कानूनी प्रक्रियाओं को धता बताते हुए कर दिया गया. हाल के महीनों में कई घटनाएं उत्तर प्रदेश के योगी माॅडल की याद दिलाती हैं, जहां अदालत, संविधान और कानून को किनारे कर पुलिस को ही न्यायाधीश बनाने की कोशिश होती है. दूसरी तरफ सत्ता संरक्षित बाहुबली खुलेआम हथियार लहराते हैं, लेकिन सत्ता और मीडिया उन्हें “माननीय” और “संत-महात्मा” की तरह पेश करते हैं. आखिर कानून का डंडा सिर्फ गरीब, पिछड़े, दलित और मुसलमानों पर ही क्यों टूटता है?

इन घटनाओं को सिर्फ कानून-व्यवस्था के संकट के रूप में नहीं देखा जा सकता. यह एक खतरनाक राजनीतिक-सामाजिक परियोजना है, जिसके तहत एक खास जाति और समुदाय को योजनाबद्ध तरीके से “अपराधी” घोषित किया जा रहा है. क्योंकि वही तबके बिहार में सामाजिक न्याय और महागठबंधन की राजनीति का बड़ा सामाजिक आधार रहे हैं. यादव समुदाय से समाजवादी और कम्युनिस्ट आंदोलनों में एक से बढ़कर एक नेता निकले. मध्यवर्ती जातियों में सामंतवाद विरोधी संघर्षों का मजबूत आधार बना. भाजपा-आरएसएस अच्छी तरह जानते हैं कि इस सामाजिक आधार को तोड़े बिना उनकी स्थायी राजनीतिक जीत संभव नहीं है. इसलिए अपराध, सांप्रदायिकता और मीडिया ट्रायल के जरिए सामाजिक न्याय की पूरी विरासत को “अपराध” के विमर्श में बदल देने की कोशिश हो रही है.

जनेऊ आंदोलन ने बिहार में पहली बार ऊंची जातियों के सामाजिक एकाधिकार को खुली चुनौती दी थी. मुंगेर के लाखोचक समेत कई इलाकों में यादवों को सिर्फ जनेऊ पहनने के “अपराध” में पीटा गया, मारा गया, अपमानित किया गया. लेकिन वे झुके नहीं. क्योंकि लड़ाई सिर्फ धागा पहनने की नहीं थी, इंसान माने जाने की थी.

बाद के दौर में समाजवादी और कम्युनिस्ट आंदोलनों में यादव, कुशवाहा और अन्य मध्यवर्ती जातियों की बड़ी भागीदारी रही. 1970 के दशक से इन्हीं वंचित तबकों के उभार ने सामंती सत्ता संरचना की नींव हिला दी. पहली बार सत्ता के गलियारों में उन तबकों की आवाज पहुंची, जिन्हें सदियों तक हाशिये पर रखा गया था.

यह सही है कि जिन नारों और सपनों के साथ यह उभार हुआ था, वह अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सका. सामाजिक न्याय का विमर्श कई बार अंधगली में भी फंसा और उसके भीतर अंतर्विरोध भी पैदा हुए. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसकी आड़ में आज झूठी मुठभेड़ों, बुलडोजर राज, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और मीडिया ट्रायल को वैधता दे दी जाए. असल मकसद है – पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों की साझा राजनीतिक चेतना को तोड़ो और फिर पुराने सामंती-मनुवादी ढांचे को नए चेहरे के साथ स्थापित कर दो.

जनेऊ आंदोलन के 100 साल आज सिर्फ इतिहास को याद करने का अवसर नहीं हैं. यह चेतावनी का भी क्षण है. अगर सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों की ताकतें आज नहीं चेतीं, तो बिहार को “एनकाउंटर राज” और मनुवादी राजनीति की प्रयोगशाला में बदलने की कोशिशें और तेज होंगीं.

इसलिए जनेऊ आंदोलन की असली विरासत सिर्फ स्मृति नहीं, प्रतिरोध है. बराबरी की लड़ाई अभी अधूरी है – और उसे आज फिर नए सिरे से लड़ने की जरूरत है.


09 May, 2026