वर्ष 35 / अंक - 19 / बीजेपी का जबरिया बंगाल दखल, तमिलनाडु में डीएमके की...

बीजेपी का जबरिया बंगाल दखल, तमिलनाडु में डीएमके की हार

बीजेपी का जबरिया बंगाल दखल, तमिलनाडु में डीएमके की हार

असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी – इन पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम भारत के सभी हिस्सों पर अपने केंद्रीकृत राजनीतिक नियंत्रण को अधिकतम करने की दिशा में भाजपा के अभियान के लिए एक बड़े छलांग को दर्शाते हैं. खासकर पश्चिम बंगाल में सत्ता पर भाजपा का कब्जा राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में एक भूचाल जैसा बदलाव लेकर आया है, जहां यह पार्टी हाल ही में 2019 तक एक हाशिये की खिलाड़ी बनी हुई थी. केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में वोट प्रतिशत और सीटों के लिहाज से भाजपा की सीधी बढ़त बहुत महत्वपूर्ण नहीं रही, लेकिन मोदी सरकार के सबसे मुखर वैचारिक विरोधियों में से एक डीएमके की करारी हार ने दक्षिण भारत में भाजपा के लिए एक बड़ी बढ़त दर्ज की है.

असम में, भाजपा ने पहले ही एक बेहद लक्षित और असंतुलित परिसीमन अभ्यास के जरिए अपनी संभावनाओं को मजबूत कर लिया था; और मतदाता सूची के पुनरीक्षण ने, भले ही वह अन्य एसआईआर प्रभावित राज्यों (विशेषकर पश्चिम बंगाल) जितना ‘विशेष’ और ‘गहन’ न रहा हो, तब भी उसे और मजबूत किया, जिसके परिणामस्वरूप भाजपा-असम गण परिषद-बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट गठबंधन को भारी बहुमत मिला. बिहार में पहले से ही भाजपा का अपना मुख्यमंत्री होने के साथ, असम और पश्चिम बंगाल की जीतें पूरे पूर्वी क्षेत्र में संघ परिवार को कहीं अधिक वर्चस्व प्रदान करेंगी. इस प्रकार पश्चिम बंगाल में 2026 की भाजपा की जीत, 2014 में मोदी सरकार के उदय के बाद से उसकी सबसे बड़ी चुनावी उपलब्धि है.

ये जीतें पूर्व-एसआईआर काल के सामान्य और परिचित चुनावी नियमों के तहत हासिल नहीं की गई हैं. पश्चिम बंगाल में, इस परिणाम को हासिल करने के लिए लगभग 90 लाख मतदाताओं को मताधिकार से वंचित किया गया, जिनमें से करीब साढ़े तीन लाख नाम न्यायाधिकरणों के सामने लंबित थे – जिनमें से केवल 139 नाम पहले चरण से पहले और 1,468 दूसरे चरण से पहले ही स्वीकृत हुए. 60 लाख नामों की पहली बड़ी कटौती ने 2021 में बीजेपी के 60 लाख वोटों के अंतर को समाप्त कर दिया (जब उसे 2,29,05,474 वोट मिले थे, जबकि टीएमसी को 2,89,68,281 वोट मिले थे), जबकि ‘निर्णयन’ और न्यायाधिकरणों के माध्यम से लक्षित बहिष्कार ने 2026 में भाजपा को 30 लाख से अधिक वोटों की बढ़त दिलाई (भाजपा के 2,92,24,167 बनाम तृणमूल कांग्रेस के 2,60,13,379 वोट).

एसआईआर के नाम पर की गई इस चुनावी ‘सर्जिकल’ सफाई ने वह आधार तैयार किया, जिस पर भाजपा ने पश्चिम बंगाल में अपनी अभूतपूर्व जीत दर्ज की. इस सांख्यिकीय ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के साथ-साथ चुनाव प्रक्रिया के संचालन – गिनती के चरण तक – में भी चुनाव आयोग ने तटस्थता की हर धारणा को त्याग दिया और अभूतपूर्व स्तर पर केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को तैनात किया गया. मतदान और मतगणना प्रक्रिया में अनियमितताओं की शिकायतें कई निर्वाचन क्षेत्रों से सामने आई हैं, खासकर ममता बनर्जी के अपने निर्वाचन क्षेत्र भवानीपुर से, जहां वे 14वें राउंड तक आगे थीं, लेकिन आरोप है कि भाजपा नेताओं ने केंद्रीय बलों और इस कार्य में लगे अधिकारियों के समर्थन से प्रक्रिया को बाधित किया. ये आरोप गंभीर हैं और भाजपा तथा चुनाव आयोग – दोनों को इसके लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए. टीएमसी ने बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली की शिकायत की है और विरोध के तौर पर ममता बनर्जी ने पद छोड़ने से इनकार कर दिया है.

पांच राज्यों के समग्र चुनावी परिणामों से निकलने वाले राजनीतिक संदेशों के संदर्भ में, केरल और पुडुचेरी के परिणाम स्थापित चुनावी पैटर्न के अनुरूप माने जा सकते हैं. केरल में आम तौर पर हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन होता है. कोविड महामारी के बाद 2021 में एलडीएफ ने इस परंपरा को तोड़ा था और अब सत्ता परिवर्तन शायद अपेक्षित था. फिर भी यह महत्वपूर्ण है कि वोट प्रतिशत और सीटों दोनों के मामले में एलडीएफ का प्रदर्शन 1982 के बाद सबसे निचले स्तर पर आ गया है. पुडुचेरी में एनआर कांग्रेस ने प्रभावी रूप से कांग्रेस की जगह ले ली है और एनडीए के भीतर भाजपा की स्थिर सहयोगी के रूप में सत्ता बनाए रखी है. दूसरी ओर विपक्ष डीएमके और उभरते टीवीके गुटों के बीच बंटा हुआ रहा.

केरल और पुडुचेरी से अधिक, तमिलनाडु, असम और पश्चिम बंगाल के परिणाम निश्चित रूप से अधिक गहन ध्यान की मांग करते हैं. करिश्माई फिल्म अभिनेता जोसेफ विजय चंद्रशेखर के नेतृत्व में उभरती नई राजनीतिक शक्ति टीवीके (तमिलगा वेत्री कड़गम-तमिलनाडु विक्ट्री पार्टी) का अभूतपूर्व उभार पिछले कुछ वर्षों से दिख रहा था, लेकिन इसके प्रभाव और परिणाम की तीव्रता का अनुमान कम ही लोगों ने लगाया था.

नई पार्टी (टीवीके) ने डीएमके के लंबे समय से चले आ रहे प्रभुत्व के खिलाफ जनता में व्याप्त गुस्से और पिछले छह दशकों से चले आ रहे डीएमके-एआईएडीएमके के द्विध्रुवीय प्रभुत्व से बदलाव की इच्छा को प्रभावी ढंग से भुनाया. युवाओं और महिलाओं के भारी समर्थन के साथ टीवीके सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, जो बहुमत के आंकड़े से थोड़ा ही पीछे रही. अब यह देखना बाकी है कि ‘जन-केंद्रित राजनीति’ और ठोस कल्याणकारी कदमों के अपने दावों पर टीवीके कितना खरा उतरती है और तमिलनाडु में किस प्रकार के सामाजिक-राजनीतिक पुनर्संयोजन को जन्म देती है.

असम और पश्चिम बंगाल के परिणाम मोटे तौर पर ‘बांग्लादेशी मुसलमानों की घुसपैठ से हिंदुओं को बचाने’ की साझा झूठ कथा के इर्द-गिर्द गढ़े गए हैं. असम में बीजेपी ने सत्ता-विरोधी रुझान को मात देने के लिए इस मुस्लिम-विरोधी प्रचार का उपयोग किया, जबकि पश्चिम बंगाल में इसे लंबे समय से सत्ता में रही सरकार के खिलाफ जन-असंतोष के साथ जोड़ा गया. असम में परिसीमन पहले ही इस तरह किया गया था कि अल्पसंख्यकों (धार्मिक और भाषाई दोनों) की वोट शक्ति को कमजोर किया जा सके. मतदाता सूची के पुनरीक्षण ने विपक्ष की संभावनाओं को और कम कर दिया. मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बंगाली-भाषी मुसलमानों को निशाना बनाते हुए तीव्र नफरत-आधारित अभियान चलाया और एजीपी व बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ गठबंधन में 126 में से 102 सीटें (लगभग 80% बहुमत) जीत लीं.

पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी ने भी उतना ही तीखा मुस्लिम-विरोधी अभियान चलाया, जिसमें मुसलमानों को आंतरिक दुश्मन और बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के हितों के लिए स्थायी खतरे के रूप में पेश किया गया. भाजपा द्वारा मुस्लिम समुदाय को लगभग पूरी तरह अलग-थलग कर देने के कारण, मुस्लिम प्रतिनिधित्व अब विपक्षी दलों में सिमट गया है. उदाहरण के लिए, असम में कांग्रेस के 19 विधायकों में से 18 मुस्लिम हैं. पश्चिम बंगाल में 38 में से 32 मुस्लिम विधायक टीएमसी से हैं, जो विधानसभा में पार्टी की कुल संख्या का लगभग 40% है. सुवेंदु अधिकारी ने खुले तौर पर भाजपा की जीत को ‘हिंदुओं की जीत’ बताया और केवल हिंदुओं के लिए काम करने की बात कही, साथ ही विपक्ष का समर्थन करने वाले हिंदुओं से भाजपा में आने का आह्वान किया. इस स्तर की खुली सांप्रदायिक लामबंदी पश्चिम बंगाल में अभूतपूर्व है.

मुस्लिम मतदाताओं का लक्षित बहिष्कार, मुस्लिम प्रतिनिधियों का व्यवस्थित हाशियाकरण, और जातीय सफाए तथा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की खुली अपील – यह सब एसआईआर के इस दौर में सांप्रदायिक राजनीति के नए आयाम को दर्शाता है, जिसमें भारत के अल्पसंख्यकों और हाशिये पर मौजूद समूहों से नागरिक अधिकार छीनने की सताने वाली मूलप्रवृत्ति दिखाई देती है. समय-समय पर होने वाले दंगों और धार्मिक स्थलों पर हमलों से लेकर भीड़ द्वारा हत्या (माॅब लिंचिंग) और अब बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने तक – सांप्रदायिक फासीवाद वास्तव में एक स्थायी चुनावी वर्चस्व का खाका (डिजाइन) तैयार कर रहा है.

किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि में, 2023 में कर्नाटक में कांग्रेस की जीत ने विपक्षी एकता को नयी ताकत दी थी. यह विपक्षी एकता ‘इंडिया’ गठबंधन के रूप में सामने आई, जिसने 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को 240 सीटों तक सीमित कर दिया. हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और अब पश्चिम बंगाल में जीतों की श्रृंखला के जरिए भाजपा ने विपक्षी एकता को नष्ट का प्रयास किया है. विपक्ष को आगामी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब चुनावों से पहले फिर से एकजुट होना होगा. साथ ही, आम जनता के रोजमर्रा के मुद्दों – रोजी-रोटी – पर ध्यान केंद्रित करना होगा और बढ़ते आर्थिक संकट तथा राजनीतिक अधिकार विहीनता के बीच उनके अस्तित्व की लड़ाई को मजबूत करना होगा.

दिलचस्प रूप से, अमित शाह ने पश्चिम बंगाल चुनावों के लिए अभूतपूर्व 2.4 लाख केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को तैनात किया, जिनमें से 70,000 को चुनाव के बाद भी दो महीने तक वहीं रहने के निर्देश दिए गए. 4 मई को मतगणना के दौरान ही कई केंद्रों से तृणमूल कांग्रेस और अन्य गैर-भाजपा दलों के चुनाव अभिकर्ताओं पर हमलों की खबरें आने लगीं. पार्टी कार्यकर्ताओं, दफ्तरों, मुस्लिम दुकानों और बस्तियों पर हमलों, बुलडोजर कार्रवाई और भीड़ हिंसा की खबरें भी सामने आई हैं, जबकि केंद्रीय बल मूकदर्शक बने रहे. प्रगतिशील शक्तियों को इस आतंक को रोकने, शांति और सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आगे आना होगा. बंगाल विभाजन के कठिन दौर में स्वतंत्रता सेनानियों, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं और मजदूरों, किसानों, छात्रों तथा महिलाओं के संघर्षों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. आज जब भाजपा विभाजन के घाव को फिर से कुरेदने की कोशिश कर रही है, तब जरूरत है कि लोकतांत्रिक और प्रगतिशील ताकतें फिर से एकजुट होकर सांप्रदायिक सद्भाव और राजनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा करें – ताकि, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के शब्दों में, “मन भयमुक्त रहे और सिर ऊंचा उठा रहे.”


09 May, 2026