वर्ष 35 / अंक - 38 / फासीवाद आगे: हिंदू राष्ट्रवाद के साथ अंधेरे में

फासीवाद आगे: हिंदू राष्ट्रवाद के साथ अंधेरे में

फासीवाद आगे: हिंदू राष्ट्रवाद के साथ अंधेरे में

-- अंगना पी. चटर्जी

( हिंदुत्व जिसे देशभक्ति का नाम देता है, वह फासीवाद की ओर बढ़ता राष्ट्रवाद भारत को एक हिंदू राष्ट्र के रूप में देखने की उस कल्पना की तरफ ले जा रहा है, जो हकीकत से ज्यादा एक राजनीतिक परियोजना है. इसे आगे बढ़ाने के लिए एक ऐसी ‘गहरी सत्ता’ खड़ी की गई है, जो पर्दे के पीछे से काम करती है और समाज और राजनीति को धर्म के नाम पर बांटने और ध्रुवीकृत करने में लगी है.)

पिछले सौ सालों में हिंदू राष्ट्रवादियों ने भारत पर अति-राष्ट्रवादी और बहुसंख्यकवादी राज्य की सोच और उसका ढांचा थोपने के लिए दक्षिणपंथी ताकतों का शायद दुनिया का सबसे बड़ा तंत्र खड़ा किया है.

समाज और संस्कृति, रिश्तेदारी, सामाजिक भेद, इतिहास को नए ढंग से पेश करने, विचारधारा, नैतिकता, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय पहचान जैसे तमाम क्षेत्रों के जरिए हिंदू राष्ट्रवाद ने अपना विशाल कैडर तैयार किया है. जाति व्यवस्था को बढ़ावा देने, हर चीज को धार्मिक चश्मे से देखने, सीमाओं को सुरक्षा के नाम पर सख्ती करने और अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की राजनीति ने इसे मजबूत किया है.

सामाजिक नियंत्रण कायम करने के लिए हाशिये पर धकेलने, लोगों को एक खास राजनीति के नाम पर लामबंद करने और दूसरों को बाहर करने के तरीके अपनाए गए. जिन दशकों में हिंदू राष्ट्रवादी सत्ता में नहीं थे, उन्हीं दशकों में बहुसंख्यकवाद धीरे-धीरे मजबूत होता गया. राजनीतिक टकराव और अन्यायपूर्ण शासन ने इसमें मदद की. आखिरकार 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हिंदू दक्षिणपंथ ने राज्य की सत्ता पर अपना कब्जा मजबूत कर लिया.

हिंदू राष्ट्रवाद का इतिहास दक्षिण एशिया के ब्रिटिश उपनिवेशवाद से आजाद होने और 1947 में भारत के एक राष्ट्र-राज्य बनने से भी पुराना है. 1915 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा बनाई गई. इसका मकसद अलग-अलग इलाकों, इतिहास, भाषाओं और संस्कृतियों से जुड़े हिंदुओं को एक राजनीतिक पहचान के तहत जोड़ना था. साथ ही मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रति विरोध और नफरत पैदा करना भी इसका उद्देश्य था.

हिंदू राष्ट्रवाद की बुनियादी सोच और विचारधारा ‘हिंदूपन’ या हिंदुत्व की अवधारणा पर टिकी थी. हिंदू महासभा के प्रमुख संस्थापक नेताओं में से एक विनायक दामोदर सावरकर ने 1923 में इसे एक स्पष्ट राजनीतिक विचार के रूप में पेश किया. ‘हिंदुत्व’ नाम की अपनी पुस्तिका में सावरकर ने लिखा था: ‘हिंदुत्व कोई शब्द नहीं, बल्कि एक इतिहास है.’

इस ‘हिंदूपन’ को समाज में फैलाने और लागू करने के लिए पिछले सौ वर्षों में संगठनों का एक बड़ा जाल खड़ा हुआ, जिसे संघ परिवार कहा जाता है. यह हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों का पूरा ‘परिवार’ है. 1940 के दशक तक संघ परिवार उस पूरे भूभाग में तेजी से फैल चुका था, जो आगे चलकर ‘भारत’ बना. उसने अपनी विचारधारा और काम करने के तरीकों के जरिए जगह-जगह केंद्र बनाए और लोगों को अपने साथ जोड़ना शुरू किया. असम जैसे संघर्षग्रस्त इलाकों और कश्मीर के नव-औपनिवेशिक प्रशासन में भी उसका विस्तार हुआ.

संघ परिवार के प्रमुख संगठनों के देशभर में दफ्तर हैं. इनमें से हर संगठन की दर्जनों से लेकर सैकड़ों शाखाएं हैं. इनमें सबसे ऊपर आरएसएस है, जिसके प्रमुख चेहरों में नरेंद्र मोदी भी रहे हैं.

1925 में नागपुर में बना आरएसएस हिंदुत्व की वैचारिक और सांस्कृतिक केंद्र है. इसके साथ 1964 में मुंबई में बना विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) भी इस परियोजना का अहम हिस्सा है. संसद और चुनावी राजनीति में इसका मुख्य आधार भाजपा है, जिसे औपचारिक रूप से 1980 में बनाया गया.

बताया जाता है कि आज संघ परिवार से जुड़े कैडर की संख्या 5 से 7 करोड़ के बीच है. इसके कार्यकर्ता और स्वयंसेवक इसके एक या उससे ज्यादा संगठनों से जुड़े होते हैं. देश के बड़े हिस्से में, गांवों और शहरों से लेकर शहरों के आसपास के इलाकों तक, युवाओं और सदस्यों की बड़े पैमाने पर भर्ती और ट्रेनिंग होती है. विशेष इकाइयों में शामिल किए गए सदस्यों को नेतृत्व, जमीनी स्तर पर लोगों को लामबंद करने, हिंसक आंदोलन और हथियारबंद कार्रवाई तक की ट्रेनिंग दी जाती है.

आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ)

आरएसएस संघ परिवार और हिंदू राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा वास्तुकार है. बताया जाता है कि यह संगठन बतौर चैरिटी के रूप में पंजीकृत नहीं है और ‘व्यक्तियों के एक समूह’ के रूप में काम करता है, जबकि उसे टैक्स से छूट मिली हुई है. संगठन से जुड़े स्वयंसेवकों और सदस्यों की रोजमर्रा की और बड़े पैमाने पर होने वाली हिंसा को अंजाम देने में अहम भूमिका रही है. और 1947 के बाद से धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ हुई हर संगठित राजनीतिक हिंसा में इनकी छाप कथित तौर पर साफ नजर आती है.

आरएसएस के शुरुआती विचारक एम. एस. गोलवलकर ने नाजियों के लिए खुली प्रशंसा जताई थी. उन्होंने लिखा था, ‘नस्ल और उसकी संस्कृति की शुद्धता बनाए रखने के लिए जर्मनी ने यहूदियों जैसी सेमिटिक नस्लों को देश से बाहर करके दुनिया को चौंका दिया. नस्लीय गौरव का सबसे ऊंचा रूप यहां दिखाई दिया.’ उन्होंने आगे कहा, ‘गैर-हिंदू... देश में रह सकते हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह हिंदू राष्ट्र के अधीन रहना होगा. वे किसी चीज का दावा नहीं कर सकते, किसी विशेष अधिकार के हकदार नहीं होंगे... यहां तक कि नागरिक अधिकारों के भी नहीं.’

आरएसएस के दायरे में एक तरफ वे ‘नरमपंथी’ राष्ट्रवादी हैं जो इसके शालीन मूल्यों को जीते हैं, तो दूसरी तरफ वे अतिवादी हैं जो उसके सबसे तानाशाही विचारों को खुलकर साकार करते हैं. ये सभी मिलकर असमानता, फूट, टूटन और बंटवारे के पुराने जख्मों का फायदा उठाते हैं. धर्म और पहचान की दरारों को हथियार बनाकर वे समुदायों, पड़ोसियों और यहां तक कि परिवारों के बीच भी फूट डालते और हिंसा करते हैं.

आज आरएसएस के सदस्यों में छात्र, टेक्नोलाॅजी क्षेत्र के कर्मचारी, शिक्षक, इंजीनियर, बैंककर्मी, राजनेता, किसान, कारोबारी, डाॅक्टर और दूसरे स्वास्थ्यकर्मी, कानून बनाने वाले, गृहिणियां, दिहाड़ी मजदूर और वैज्ञानिक तक शामिल हैं.

आरएसएस के जमीनी कैडर को ऐसे काम और सक्रियता की ट्रेनिंग दी जाती है, जो हिंदुत्व की विचारधारा और उसके एजेंडे को आगे बढ़ाए. इसका मकसद सरकार, नौकरशाही, शिक्षा व्यवस्था, राज्य की सुरक्षा एजेंसियों, कानून और न्याय व्यवस्था पर नियंत्रण कायम करना और इन्हें हिंदुत्व के मुताबिक नए सिरे से गढ़ना है. बड़े पैमाने की हिंसा और जनसंहारों की जवाबदेही से बचने के लिए, आरएसएस कथित तौर पर यह दावा करता रहा है कि वह अपने कैडरों की कोई सूची नहीं रखता. इसके उलट, हिंदू राष्ट्रवादी खुद आरएसएस से अपने जुड़ाव का ऐलान करते रहे हैं, इसे गर्व से जताते हुए.

कहा जाता है कि आरएसएस ने शुरू से ही अर्धसैनिक गतिविधियों और सांस्कृतिक एकरूपता को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों पर खास जोर दिया. उसने ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग का रिश्ता भी बनाया और खुद को उपनिवेश-विरोधी आजादी के आंदोलन से अलग रखा. 1946 में ही आरएसएस के तीन कार्यकर्ता असम पहुंचे थे, ताकि वहां आरएसएस की शाखाएं शुरू की जा सकें. 1983 में असम के नेल्ली में बांग्ला मूल के मुसलमानों को निशाना बनाकर बड़े पैमाने पर हिंसा की गई. 2016 तक असम में आरएसएस के 672 जगहों पर 830 केंद्र होने की खबर थी.

आरएसएस के एक सदस्य नाथूराम गोडसे ने जनवरी 1948 में एम. के. गांधी की हत्या कर दी. गोडसे ने बाद में कहा था कि उसने आरएसएस छोड़ दिया था, लेकिन दस्तावेजों में इसके उलट बात सामने आई.

भारत सरकार ने 1948 में आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया और उसके 20,000 सदस्यों को गिरफ्तार किया. 1949 में यह प्रतिबंध हटा लिया गया. इंदिरा गांधी सरकार द्वारा 1975 से 1977 के बीच लगाए गए राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान आरएसएस पर फिर प्रतिबंध लगाया गया. 1977 में बनी जनता पार्टी के गठबंधन ने चुनाव जीता और उसी साल आपातकाल खत्म किया, साथ ही उसने आरएसएस पर लगा प्रतिबंध भी हटा दिया.

आरएसएस की अगुवाई में हिंदू दक्षिणपंथ ने राष्ट्रीय संस्कृति को गढ़ने में अपनी भूमिका को संगठित और मजबूत किया, और धर्म और राज्य के बीच संवैधानिक अलगाव को बिगाड़ने और कमजोर करने की कोशिश की. इस संगठन ने बहुसंख्यकवाद और बहुसंख्यकवादी राज्य के मकसद और आधार को बनाए रखने के लिए उग्र राष्ट्रवादी उन्माद भड़काया.

आरएसएस ने ‘हिंदूकरण’ को उस प्रक्रिया के जवाब के रूप में पेश किया, जिसके जरिए उसके मुताबिक ब्रिटिश शासन ने भारत से हिंदू पहचान को कमजोर किया था. उसने हिंदुओं को ‘भारत’ का पर्याय बना दिया. इसके साथ ही हिंदू-भारतीय पहचान को स्थापित और पवित्र बनाने के एक जरूरी औजार के तौर पर हिंसा के धार्मिकीकरण को सामान्य बना दिया. जातिवाद, अलगाव और दमन ने संघ परिवार के उस बर्ताव को गढ़ा, जिसके तहत आदिवासियों, दलितों और धार्मिक रूप से ‘दूसरे’ माने जाने वाले लोगों के साथ भेदभाव किया गया. उन्हें नौकरियों से वंचित किया गया. स्कूल-काॅलेज, मंदिरों और सामाजिक आयोजनों में उनके प्रवेश पर रोक लगाई गई.

1984 तक वीएचपी ने अयोध्या में हिंदू देवता राम के मंदिर के निर्माण के लिए एक आंदोलन खड़ा कर दिया था. इसका मकसद बाबरी मस्जिद को हटाकर और ध्वस्त करके उसकी जगह राम मंदिर बनाना था. इसी साल 1984 में हिंदू राष्ट्रवाद के कथित उग्रवादी धड़े बजरंग दल का गठन भी हुआ.

अक्टूबर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में सिख समुदायों को हिंदू राष्ट्रवादी भीड़ ने निशाना बनाया. इस हिंसा में महिलाओं के खिलाफ बड़े पैमाने पर यौन हिंसा हुई, निजी संपत्तियां नष्ट की गईं और 2,733 से ज्यादा सिखों की हत्या कर दी गई.

इन भयावह घटनाओं के बाद संघ परिवार ने और भी बड़े पैमाने पर हिंसा को अंजाम दिया. 1992-93 के दौरान, अनुमानित 2 लाख हिंदुत्व कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद को निशाना बनाकर ढहा दिया, जिसने पूरे देश में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा भड़का दी. 1998-99 में गुजरात और देश के दूसरे हिस्सों में ईसाइयों के खिलाफ हिंसा भड़की.

गुजरात, ओडिशा, मुजफ्फरनगर

मार्च 2002 में गुजरात में मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार सत्ता में थी. गोधरा शहर में एक ट्रेन में आग लगने से हिंदू तीर्थयात्रियों की मौत हुई. इसके बाद गुजरात में बड़े पैमाने पर भयंकर राजनीतिक हिंसा भड़क उठी. हिंदू राष्ट्रवादी हथियारबंद भीड़ ने पूरे गुजरात में मुसलमानों को निशाना बनाया. लोगों पर हमले हुए, संपत्तियां लूटी गईं और तबाह की गईं. लोगों को पीटा गया, महिलाओं के साथ बलात्कार और सामूहिक बलात्कार किए गए. घरों और दुकानों में आग लगाई गई. लोगों को पीट-पीटकर मारा गया और एक-एक करके तथा समूहों में हत्या की गई. मुस्लिम बस्तियों, मोहल्लों और उनकी पूरी सामाजिक दुनिया को तबाह कर दिया गया. बाद की जांचों से सामने आया कि 2002 का यह जनसंहार पहले से सोची-समझी योजना के तहत किया गया था.

2003 तक संघ परिवार ने ओडिशा को ‘अगला गुजरात’ बनाने के लिए कमर कस ली थी. अक्टूबर 2002 में बालासोर जिले की शिवसेना की एक इकाई ने कथित तौर पर ऐलान किया कि उसने युवाओं को ट्रेनिंग देने के लिए पहला हिंदू ‘आत्मघाती दस्ता’ तैयार कर लिया है. 2009 तक आरएसएस के ओडिशा में 6,000 केंद्र और करीब 1,75,000 कार्यकर्ताओं का कैडर होने की बात सामने आई.

2006 तक आरएसएस समेत संघ परिवार के संगठन ओडिशा के 30 में से 25 जिलों में सक्रिय थे.

फरवरी 2006 में वीएचपी ने 13-सूत्री चार्टर का ऐलान किया. इसमें उन मांगों की झलक थी, जिनमें से कई आने वाले सालों में हकीकत बनीं. उसने मांग की कि भारत को हिंदू राज्य घोषित किया जाए और उसकी सीमाओं का विस्तार करके ‘अखंड भारत’ बनाया जाए.

वीएचपी ने पूरे देश में गोहत्या पर रोक लगाने के लिए राष्ट्रीय कानून बनाने, ईसाई धर्म में धर्मांतरण रोकने, बांग्लादेश से मुसलमानों की ‘घुसपैठ’ रोकने और कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म करने के लिए मुहिम चलाई.

2007 और 2008 में ओडिशा के कंधमाल में दलित और आदिवासी ईसाइयों के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा हुई. इसमें मध्यम वर्ग और मध्यम जातियों से आने वाले हिंदुओं की भागीदारी देखी गई, जिसमें महिलाओं के साथ बलात्कार किए गए, लोगों का अंग-भंग, लूटपाट और हत्याएं शामिल थीं. 2014 से 2024 के बीच भारत में ईसाई समुदाय के खिलाफ हिंसा में कथित तौर पर 500 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.

2013 तक भारत के आदिवासी इलाकों के 52,000 गांवों में एकल विद्यालय यानी एक शिक्षक वाले स्कूल चल रहे थे.

इसी 2013 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में संघ परिवार के कार्यकर्ताओं की बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठी. उत्तर प्रदेश देश का सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य है और यहां करीब 3.8 करोड़ मुसलमान रहते हैं. हिंसा में मुसलमानों को निशाना बनाया गया. लोग मारे गए, महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा हुई और बड़ी संख्या में लोग अपने घरों से उजड़ गए.

2014 और उसके बाद से

2014 में भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारी बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता हासिल की, और फिर 2019 और 2024 में भी जीती. 2014 के चुनाव के बाद आरएसएस का विस्तार 1925 में स्थापना के बाद सबसे तेज गति से हुआ, और 2016 तक कथित तौर पर उसकी 56,859 शाखाएं चल रही थीं. 2018 में, आरएसएस नेता मोहन भागवत ने दावा किया कि आरएसएस तीन दिन के भीतर एक सेना खड़ी करने की स्थिति में है.

उत्तर प्रदेश में 2017 में मुख्यमंत्री और प्रमुख हिंदू राष्ट्रवादी नेता योगी आदित्यनाथ के सत्ता संभालने के बाद राज्य सरकार ने मुजफ्फरनगर 2013 हिंसा से जुड़े 131 आपराधिक मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की. इन मामलों में आरोपी हिंदू समुदाय से थे.

आदित्यनाथ ने मुसलमानों के अधिकारों को कुचलने वाले कई राजनीतिक और गैर-कानूनी अभियानों का समर्थन किया है. इससे आरएसएस जैसे धुर-दक्षिणपंथी संगठनों का हौसला बढ़ा. 2017 में आरएसएस की उत्तर प्रदेश में करीब 8,000 शाखाएं होने की खबर थी. 2017 से 2019 के बीच राज्य में संगठित हिंसा की 23,612 घटनाएं दर्ज की गईं.

हिंदू राष्ट्रवादियों की शह पर 2019 से कश्मीर में कानून के शासन का जो निलंबन जारी है, उसे भारतीय नागरिकों के लिए स्थायी निवास की कानूनी पाबंदियां हटाए जाने से और ताकत मिली है. इससे कश्मीर की आबादी का स्वरूप बदलने और कश्मीरी मुसलमानों को अपने ही इलाके में अल्पसंख्यक बनाने की संभावना पैदा हुई है. यह मिटाने और लोगों को उनकी जमीन से बेदखल करने के नए तरीके की ओर इशारा करता है.

पूर्वाेत्तर के असम में भाजपा के नेतृत्व में 2019 में नागरिकता संशोधन कानून लागू किया गया. यह कानून सितंबर 1935 में नाजी जर्मनी में बनाए गए नूरेमबर्ग कानूनों जैसा है. आरएसएस इसे बहुसंख्यक समुदाय को ‘मूल निवासी’ और ‘घिरा हुआ’ दिखाने के औजार के रूप में आगे बढ़ा रहा है.

पूर्वी भारत के पश्चिम बंगाल में हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी ने 2026 में पहली बार विधानसभा चुनाव जीता. चुनाव से पहले मतदाता सूची से 90 लाख नाम हटा दिए गए. इनमें कथित तौर पर 34 फीसदी से ज्यादा लोग मुस्लिम थे. वैध मतदाताओं को सूची से हटाना खुद चुनाव प्रक्रिया पर कब्जा जमाने की एक कड़ी है. बताया जाता है कि इन कार्रवाइयों को आरएसएस और अन्य हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों का समर्थन हासिल था.

एक ‘गहरी सत्ता’

मोदी के नेतृत्व वाली मौजूदा सत्ता ने हिंदू दक्षिणपंथी कैडर और हथियारबंद गिरोहों, सरकारों और राज्य की सुरक्षा एजेंसियों के बीच टिकाऊ गठजोड़ बनाया है. इसी दौर में भारत के हिंदू राष्ट्रवादी नेताओं ने अमेरिका और ब्रिटेन में बसे प्रवासी भारतीयों के पैसे और सत्ता के केंद्रों के साथ भी फायदेमंद रिश्ते बनाए हैं.

फासीवाद को बढ़ावा देने वाला राष्ट्रवाद, जिसे हिंदुत्व देशभक्ति मानता है, भारत को एक ‘हिंदू राष्ट्र’ के रूप में गढ़ने के सपने को एक तय हकीकत की तरह पेश करता है. सरकारी आदेश, भाषणबाजी और सार्वजनिक बयानों के जरिए दबाव, सत्ता के करीबी कारोबारियों को फायदा पहुंचाने वाली क्रोनी पूंजीवाद, आर्थिक हेरफेर, अधिकारों से बेदखली और लगातार जारी हिंसा ने मिलकर एक ‘गहरी सत्ता’ का ढांचा खड़ा किया है, जिसके भीतर अपराध के लिए खुले इलाके और नियंत्रित अराजकता दोनों मौजूद हैं. इसकी लड़ाई उन दुर्भावनापूर्ण अभियानों के जरिए लड़ी जाती है, जो समाज को धार्मिक आधार पर बांटती और ध्रुवीकृत करती है. इसके लिए ‘बुलडोजर न्याय’, ‘लव जिहाद’ और धर्मांतरण विरोधी अभियानों, हिंदुओं को विशेषाधिकार देने वाले पक्षपाती नागरिकता कानूनों के प्रयोग, इस्लाम के प्रति नफरत फैलाने और मुसलमानों के नस्लीकरण कर अलग करने जैसे तरीकों का सहारा लिया जा रहा है.

आज भारतीय राज्यसत्ता और हिंदू दक्षिणपंथ हिंसा के सबसे बड़े अंजामकार हैं. हिंदू राष्ट्रवादी नफरती भाषण और जहरीली मर्दानगी का इस्तेमाल करके जमीनी समर्थकों को उकसाते हैं और उन लोगों को भी अपने साथ खींचने की कोशिश करते हैं जो अभी किसी तरफ नहीं हैं. वे विरोधियों और कमजोरों को दबाने के लिए शत्रुतापूर्ण प्रचार का सहारा लेते हैं. उन्हें कुचलने के लिए राजनीतिक हिंसा का इस्तेमाल करते हैं, और जनसंहार जैसी हिंसा का खुलेआम आह्वान करते हैं. सोशल मीडिया पर लगातार फैलाई जा रही गलत सूचनाओं के बवंडर का सिलसिला, और एक बिके और समझौता कर चुके मीडिया का इसे बढ़ावा देना, डर और नफरत को और गहरा करता है. इससे लोगों के साथ दुर्व्यवहार और समाज में अराजकता को बढ़ावा मिलता है.

खतरे में पड़े लोगों और सामाजिक आंदोलनों का प्रतिरोध, जिसमें आज का उभरता हुआ, जोशीला छात्र-युवा नेतृत्व वाला विरोध भी शामिल है, उम्मीद की एक डोर बनकर बचा है. शायद यही खामोश बहुसंख्यक जनता को गुलामी की इन परिस्थितियों के खिलाफ उठ खड़े होने के लिए ऊर्जा दे सके.

भारत को जोड़े रखने वाले इंसानी रिश्ते बेहद कमजोर पड़ चुके हैं. बहुलता, विविधता और लोकतंत्र के प्रयोगों को तेजी से बिगाड़ा जा रहा है. हिंदू दक्षिणपंथ द्वारा धर्म के सोचे-समझे राजनीतिकरण से अल्पसंख्यक समुदायों के सफाये की प्रक्रिया को बढ़ावा मिल रहा है, उन्हें दबाव, विस्थापन, अदृश्यता और उन ढांचागत ताकतों के जरिए अंधेरे में धकेला जा रहा है, जो अंततः उनके पूरे अस्तित्व को मिटाने की ओर इशारा करती हैं.

ascism-Forward: Into the Shadows with Hindu Nationalism
(साभारः द वायर, 2 सितंबर 2026)

19 September, 2026