पूरे देश में बिखरे हुए प्रवासी मजदूरों को संगठित करते हुए उनकी सुरक्षा, सम्मान व अधिकार के लिए संघर्ष तेज करने के संकल्प के साथ तथा ऐक्टू के महासचिव वी. शंकर, अध्यक्ष राजीव डिमरी व खेग्रामस महासचिव धीरेन्द्र झा समेत कई नेता मौजूदगी में 13 सितंबर 2026 को देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित सुरजीत भवन में प्रवासी मजदूर अधिकार कन्वेंशन आयोजित कर प्रवासी श्रमिक अधिकार मंच की स्थापना की गई.
कन्वेंशन का उद्घाटन करते हुए भाकपा(माले) महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि आज प्रवासी शब्द परेशानी का पर्याय बन चूका है. प्रवासी मजदूरों को संगठित होकर इस स्थिति को बदलने के संघर्ष करना होगा. आज इसकी जो मजबूत शुरुआत हुई है वो अपनी मंजिल जरूर हासिल करेगी – हर प्रवासी मजदूर सुरक्षित, सम्मानित और अधिकार सम्पन्न होगा.
उन्होंने कहा कि प्रवासी मजदूर अधिकार मंच को दोनों सिरे पर मजदूरों को संगठित करना होगा – बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसै राज्यों में जहां से मजदूरों का पलायन होता है और तमिलनाडु, महाराष्ट्र, दिल्ली, कर्नाटक, गुजरात और पंजाब जैसे राज्यों में भी जहां वे पहुंचते हैं.
प्रवासी श्रमिक अधिकार मंच क्यों?
ऐतिहासिक रूप से, औद्योगिक मजदूर वर्ग का एक बड़ा हिस्सा प्रवासी रहा है. हालांकि, मजदूरों के कुछ समूह पीढ़ियों से औद्योगिक केंद्रों, कस्बों और शहरों में बस गए हैं और उन्हें कुछ हद तक स्थिरता मिली है. इस तरह, किसी भी समय और किसी भी जगह, वहां एक स्थानीय मजदूर वर्ग और एक प्रवासी मजदूर वर्ग होता है – जिनमें से प्रवासी मजदूर वर्ग अक्सर ज्यादा कमजोर होता है और उसका ज्यादा शोषण होता है. इन कमजोरियों के कारण प्रवासी मजदूर अक्सर राजनीतिक रूप से संगठित नहीं हो पाए.
हालांकि, ऐसे उदाहरण भी हैं जहां प्रवासी मजदूरों ने बड़े आत्मविश्वास और सफलता के साथ संगठित आंदोलनों का नेतृत्व किया है और इस प्रक्रिया में मजदूर आंदोलन के दायरे को बढ़ाया है. 1960 के दशक में, सीजर शावेज और डोलोरेस ह्यूएर्टा ने यूनाइटेड फार्म वर्कर्स (यूएफडब्ल्यूू) की स्थापना की और अमेरिका में फिलिपिनो और मैक्सिकन खेतिहर मजदूरों के अधिकारों के लिए ऐतिहासिक डेलानो अंगूर हड़ताल और राष्ट्रीय स्तर पर बहिष्कार अभियानों का नेतृत्व किया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, प्रवासी मजदूरों ने नस्लवादी यूनियन ढांचा को चुनौती दी; जैसे कि यूके में ग्रुनविक हड़ताल (1976-1978), जहां एशियाई प्रवासी मजदूरों ने ट्रेड यूनियनों के भीतर वेतन और लोकतंत्र से जुड़े विवादों का नेतृत्व किया.
भारत में, प्रवासी मजदूरों की मांगों को उठाने वाला कोई बड़ा मौजूदा मंच नहीं है. प्रवासी मजदूरों को एक अलग श्रेणी के रूप में संगठित करने का इतिहास बहुत कम रहा है. हालांकि, पलायन के कारण पैदा हुई कमजोरियां हाल के उन आंदोलनों का मुख्य विषय रही हैं जो मजदूर वर्ग के लिए कार्यस्थल, आवास और नागरिकता के अधिकारों की मांग करते हैं. इसलिए, प्रवासी मजदूरों का अपना और उनके लिए एक संगठित मंच बनाने का यह सही समय है. प्रवासी श्रमिक अधिकार मंच सभी प्रवासी श्रमिकों के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकारों के लिए खड़ा है.
प्रवासी श्रमिक अधिकार मंच की मांगें
- सभी प्रवासी श्रमिकों का भर्ती और काम की जगह, दोनों जगहों पर रजिस्ट्रेशन होना चाहिए. इसमें ठेकेदार, प्रधान नियोक्ता, कार्यस्थल, मजदूरी की शर्त, एडवांस पेमेंट, आवास और इमरजेंसी संपर्क की पूरी जानकारी होनी चाहिए.
- धोखाधड़ी, बंधक बनाकर रखने, मजदूरी की चोरी, बंधुआ मजदूरी, बाल मजदूरी, असुरक्षित काम या हिंसा में शामिल ठेकेदारों और लेबर सप्लायरों पर कानूनी कारवाई होनी चाहिए.
- प्रधान नियोग्ता को अपने संस्थान में मजदूरी, सुरक्षा और कल्याण से जुड़े नियमों के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, जिसमे ठेकेदारों और सब-काॅट्रैक्टरों द्वारा किए गए उल्लंघन भी शामिल हैं.
- संविधान का अनुच्छेद 23, बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976, और बाल एवं किशोर श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए. यह उन सभी जगहों पर लागू हो जहां प्रवासी श्रमिकों को आने-जाने पर रोक, मजदूरी की चोरी, धमकी, मारपीट, घर न लौट पाने या बच्चों और किशोरों से खतरनाक काम करवाने जैसी समस्याओं समेत श्रम से जुड़े हमलों का सामना करना पड़ता है.
- प्रवासी श्रमिकों को सुरक्षित आवास, पीने का पानी, साफ-सफाई, स्वास्थ्य सेवा, कैंटीन, आराम की सुविधा, परिवार से संपर्क , पहचान के दस्तावेज अपने पास रखने का अधिकार, कानूनी मदद, घर लौटने में मदद, मजदूरी की वसूली और रेस्क्यू, चोट या मौत के बाद पुनर्वास की गारंटी मिलनी चाहिए.
- जिन शहरों और राज्यों में प्रवासी मजदूर जाते हैं, वहां उनके इलाज की व्यवस्था की जानी चाहिए और उनके घर तथा उन राज्यों के बीच उनकी यात्रा को आसान बनाया जाना चाहिए.
- अपने नियोक्ता के कहने पर यात्रा करने वाले अंतरराज्यीय प्रवासी कामगारों का उचित बीमा होना चाहिए. काम से जुड़ी किसी भी चोट या मौत के मामले में उचित मुआवजा दिया जाना चाहिए.
- भारतीय कानून और प्राकृतिक न्याय के अनुसार, मरने वाले ब्यक्ति के साथ सम्मान से पेश आना चाहिए, भले ही वह अपराधी हो या उसे राज्य ने फांसी दी हो. फिर भी, घर से दूर मरने वाले प्रवासी कामगारों के साथ बहुत बुरा बर्ताव किया जाता है. प्रवासी कामगारों (राज्य के अंदर, एक राज्य से दूसरे राज्य और अंतरराज्यीय स्तर पर) के शवों को उनके परिवारों तक सम्मान के साथ और तय समय में पहुंचाने की व्यवस्था की जानी चाहिए.
- मजदूरों के अधिकारों की सुरक्षा को सख्ती से लागू करके और उनका दायरा बढ़ाकर सभी मजदूरों को गुजारा लायक न्यूनतम मजदूरी, आठ घंटे का काम, साप्ताहिक छुट्टी, ओवरटाइम के लिए दोगुनी मजदूरी, ईएसआइसी, पीएफ, सुरक्षा उपायों और यूनियन बनाने के अधिकार की गारंटी दी जानी चाहिए. मजदूरी की चोरी, काॅट्रैक्टर राज, असुरक्षित काम और सामूहिक संगठन बनाने से रोकने जैसी प्रथाओं को खत्म किया जाना चाहिए.
- प्रवासी मजदूरों के खिलाफ भाषा, क्षेत्रीय पहचान, धर्म और राष्ट्रीयता के आधार पर होने वाले हर तरह के भेदभाव और नफरत को रोका जाना चाहिए. वोटिंग के अधिकार पर असर डालने वाली किसी भी प्रक्रिया में यह पक्का करने के लिए खास इंतजाम किए जाने चाहिए कि प्रवासी श्रमिक प्रक्रिया की कमियों के कारण छूट न जाएं.