2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट की अचानक शुरू की गई समीक्षा अब भारत में वोटरों को बाहर करने के सबसे भयावह अभियान में बदल चुकी है. बिहार में इसे अंजाम देने के महज एक साल के भीतर एसआइआर अभियान ने 2024 के लोकसभा चुनाव में इस्तेमाल हुई वोटर लिस्ट से करीब 13 करोड़ नाम काट दिए हैं. 2024 के नतीजों ने भाजपा के समीकरण बिगाड़ दिए थे, और अब सत्ता ने एक ऐसा तरीका अपनाया है जो हर चुनावी गणना को बेअसर करने के लिए ही बना है. बिहार में सुप्रीम कोर्ट ने पहचान के लिए चुनाव आयोग को आधार को मान्य दस्तावेज मानने पर मजबूर किया, लेकिन जब तक यह अभियान पश्चिम बंगाल पहुंचा, आयोग ने एक नया हथियार खोज लिया, ‘लाॅजिकल डिस्क्रेपेंसी’ यानी तार्किक विसंगति, जिसके नाम पर किसी भी दस्तावेज को चुनौती देकर खारिज किया जा सकता है.
एसआइआर की सबसे बड़ी खामी यह है कि इसमें गलती की कोई गुंजाइश ही नहीं मानी जाती. हर सांख्यिकीय प्रक्रिया में मानवीय भूल की संभावना को स्वीकार किया जाता है और उसे सुधारने की व्यवस्था होती है. लेकिन एसआइआर में जिस वोटर का नाम गलत तरीके से काटा गया है, उसे फाॅर्म 6 भरकर फिर से नए सिरे से आवेदन करना पड़ता है, जबकि यह फाॅर्म तो पहली बार वोटर बनने वालों के लिए बना है. सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पश्चिम बंगाल में अपील सुनने के लिए ट्रिब्यूनल बनाए गए, लेकिन यह प्रक्रिया इतनी अपारदर्शी और धीमी है कि करीब 40 लाख अपीलों में से अब तक मुश्किल से एक लाख का ही निपटारा उन्नीस ट्रिब्यूनलों में हो पाया है. हमें बताया जा रहा है कि अब तक जिन अपीलों पर सुनवाई हुई है, उनमें 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में फैसला वोटरों के पक्ष में आया है. लेकिन यह भी खबर है कि ट्रिब्यूनलों के सामने लंबित करीब 30 लाख अपीलें वास्तव में और नाम काटे जाने की मांग से जुड़ी हैं. यानी जिन लोगों का वोट देने का अधिकार छीना गया है, उसे वापस पाने की अपील का रास्ता लगभग बंद है या अनिश्चित समय तक टल सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने सैद्धांतिक तौर पर यह संभावना स्वीकार की थी कि एसआइआर से चुनाव नतीजे प्रभावित हो सकते हैं और अगर काटे गए नामों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा हो, तो नतीजे पलटे भी जा सकते हैं. अगर अदालत खुद इस गड़बड़ी का संज्ञान लेकर दोबारा चुनाव कराने का आदेश देती, तो अब तक महाराष्ट्र, बिहार और पश्चिम बंगाल में कई सीटों पर दुबारा वोट पड़ चुका होता. यह भी ध्यान देने की बात है कि सिर्फ नाम काटने से ही नहीं, बल्कि फर्जी या गलत तरीके से नाम जोड़ने से भी चुनावी नतीजे प्रभावित हो रहे हैं. वोटर लिस्ट की गहन जांच और चुनाव के बाद की जा रही भौतिक सत्यापन की प्रक्रियाओं में संदिग्ध तरीके से जोड़े गए नामों की बड़ी तादाद सामने आ रही है. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को इस पूरी एसआइआर प्रक्रिया में जो खुली छूट दी है, उसने भारत के चुनावी लोकतंत्र को स्थायी रूप से गहरी अपारदर्शिता और धोखाधड़ी के हवाले बंधक बना लिया है.
2024 के बाद हुआ हर चुनाव इसी व्यवस्थित धांधली का शिकार बना है. एसआइआर की औपचारिक शुरुआत से पहले ही चुनाव आयोग ने फाॅर्म 7 जमा करने के नियमों में एक बड़ा बदलाव कर दिया था. वोटर लिस्ट हर बूथ के हिसाब से बनती है, लेकिन अब किसी विधानसभा क्षेत्र का कोई भी वोटर उस पूरे क्षेत्र के किसी भी बूथ पर, चाहे वह उसके अपने बूथ का हो या न हो, आपत्ति दर्ज कर सकता है. शिकायत का दायरा एक मतदान केंद्र से बढ़ाकर पूरे विधानसभा क्षेत्र तक कर चुनाव आयोग ने फाॅर्म 7 को बड़े पैमाने पर राजनीतिक हथियार में बदलने का रास्ता खोल दिया. भाजपा इसका भरपूर इस्तेमाल विपक्ष के संभावित वोटरों को निशाना बनाने में कर रही है, खासकर मुस्लिम समुदाय और अन्य वंचित तबकों को. कानून की स्थापित व्यवस्था के मुताबिक जिस भी वोटर के खिलाफ नाम काटने की शिकायत या अपील हो, उसे नोटिस देकर अपना पक्ष रखने का मौका देना जरूरी है, लेकिन लाखों नाम इस जरूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना ही काटे जा रहे हैं. अब तक सुप्रीम कोर्ट की ओर से ऐसे उल्लंघनों के खिलाफ कोई प्रभावी राहत नहीं मिली है.
उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में होने वाले महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों से पहले भारत को एसआइआर के इस घोटाले की पूरी तह तक जाना होगा. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी ने एसआइआर के नाम पर वोटर लिस्ट में हो रही धांधली के लिए चुनाव आयोग की आपराधिक जवाबदेही तय करने पर पूरा जोर दिया है. अगर छात्र पेपर लीक के मुद्दे पर सरकार को पीछे हटने पर मजबूर कर सकते हैं, तो जनता का एकजुट और दृढ़ प्रतिरोध एसआइआर के इस अभियान को भी रोक सकता है. वोटर लिस्ट में हो रही धांधली भारत की चुनावी व्यवस्था पर हमेशा के लिए कब्जे का रास्ता खोल देगी और लोकतंत्र का खुलेआम गला घोंट देगी. सुप्रीम कोर्ट को गलत तरीके से काटे गये हर नाम के लिए चुनाव आयोग को जवाबदेह ठहराना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि वोटर लिस्ट में जिन वोटरों के नाम काटे गये हैं, उन सभी को वोटर लिस्ट में वापस नाम जोड़े जाने का निष्पक्ष मौका मिले तथा अपील लंबित रहने के दौरान भी वे अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल कर सकें. वोट देने के अधिकार पर यह सुनियोजित हमला लोकतंत्र की बुनियाद पर ही हमला है. लोकतांत्रिक अधिकारों पर बढ़ते खतरे के माहौल में यह जरूरी है कि पूरे देश के नागरिक एकजुट हों और लोगों को उनके अधिकार से वंचित करने और चुनावी प्रक्रिया पर कब्जा करने की इस सुनियोजित कोशिश का प्रतिरोध करें.