हम अपनी प्रिय पार्टी – भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की 57 वीं वर्षगांठ, उथल-पुथल भरी वैश्विक स्थितियों के बीच मना रहे हैं. ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल का युद्ध, दूसरे महीने में प्रवेश कर चूका है और यह अमेरिकी साम्राज्यवाद के वैश्विक वर्चस्व पर जबरदस्त प्रहार सिद्ध हो रहा है. ट्रंप और नेतान्याहू ने सोचा था कि वे आसानी से कुछ ही दिन में ईरान को परास्त कर देंगे और स्कूली बच्चों व नागरिकों को निशाना बनाने के जघन्य कृत्य के साथ ही, ईरान के सर्वाच्च नेतृत्व की हत्या करके, आसानी से वहां हुकूमत बदल देंगे. पर ईरान ने जबरदस्त जिजीविषा का प्रदर्शन किया, अमेरिका-इजरायल के हमलों में मारे जाने वालों की जगह तुरत ही नए नेताओं और अफसरों को जिम्मेदारियां सौंपी. जिजीविषा के साथ ही ईरान ने उल्लेखनीय सैन्य कुशाग्रता और कौशल का परिचय देते हुए अमेरिका-इजरायल के सैन्य लक्ष्यों को निरंतर भारी नुकसान पहुंचाया और होर्मुज की खाड़ी को एक बेहद प्रभावकारी रणनीतिक औजार में तब्दील कर दिया.
परिणामस्वरुप ट्रंप प्रशासन के खिलाफ अमेरिका में भी जबरदस्त जन विक्षोभ पैदा हुआ. अमेरिका के यूरोपीय सहयोगियों ने भी ट्रंप प्रशासन से दूरी बनाना शुरू कर दिया है, उनमें से बहुतों ने तो अमेरिका के इस युद्ध अभियान में कोई सहयोग देने से भी इंकार कर दिया है. अमेरिका को सैन्य अड्डे उपलब्ध करवाने वाले अरब देश और खाड़ी क्षेत्र से काम करने वाले वैश्विक तकनीकी के महारथी लगातार युद्ध की तपिश को महसूस कर रहे हैं.
भारत को भी उस अमेरिका व इजरायल द्वारा थोपे गए युद्ध की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है, जिनके साथ मोदी सरकार ने भारत को बेहद करीबी रूप से, विनाशकारी हद तक संबद्ध कर दिया है. लगभग एक करोड़ मजदूर और प्रोफेशनल्स हैं, जो पश्चिम एशिया में काम करते हैं, वो जबरदस्त अनिश्चितता और असुरक्षा के साए तले रहने को विवश हैं. युद्ध ने भारत में ईंधन और खाद का भारी संकट पैदा कर दिया है. लाखों प्रवासी मजदूरों के लिए यह कोरोना काल के लौटने जैसे है, जहां महज जिंदा रहना ही बड़ी चुनौती बन जाता है. गहरे आर्थिक संकट और विदेश नीति की गहरी नाकामी का मेल, भारत में हमारे लिए संघर्षों के नए दौर का आगाज कर रहा है और हमें इसका प्रतिरोध, जबरदस्त साम्राज्य विरोधी, फासीवाद विरोधी दिशा के साथ करना चाहिए.
जब हम अपना 57 वां स्थापना दिवस मना रहे हैं, तब हम भारत के लोगों में असंतोष के नए चिन्ह देख सकते हैं. पूरे देश में लाखों भारतीयों को अपने वोट के अधिकार के लिए – जो संविधान के लागू होने के दिन से भारत के लोगों को हासिल सबसे मूलभूत संवैधानिक अधिकार रहा है और जिसका उपभोग पीढियों से देशवासी करते आ रहे हैं – संघर्ष करना पड़ रहा है, मजदूरों में नयी श्रम संहिताओं के खिलाफ, खास तौर पर काम के अधिक घंटे थोपे जाने के खिलाफ, प्रतिरोध खड़ा हो रहा है. अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौते के भारतीय कृषि पर विनाशकारी प्रभाव होंगे और कृषि पर साम्राज्यवादी कब्जे के खिलाफ किसान संघर्षों के एक और निर्णायक दौर की तैयारी कर रहे हैं. मनरेगा कानून को खत्म किये जाने के बाद ग्रामीण रोजगार गारंटी के मसले ने नए सिरे से ध्यान आकर्षित किया है. यूजीसी रेगुलेशन पर रोक लगाए जाने ने, सामाजिक न्याय की चिंगारी को नए सिरे से सुलगा दिया है. 2026-27 भारत के जातिवाद विरोधी आंदोलन के मील का पत्थर बनी दो घटनाओं का शताब्दी वर्ष है – महाड़ सत्याग्रह (20 मार्च 1927) और मनुस्मृति का सार्वजानिक दहन (25 दिसंबर 1927) और यह सामाजिक समता और मुक्ति के सबसे बड़े ध्वजवाहकों में से एक – ज्योतिबा फुले का द्विशताब्दी वर्ष भी होगा.
भाकपा(माले), नक्सलबाड़ी के किसान विद्रोह की ज्वाला से उपजी पार्टी है. एक ऐसी पार्टी जिसने समूचे कम्युनिस्ट आंदोलन की क्रांतिकारी विरासत को गर्व के साथ ग्रहण किया और तमाम मुश्किलों में भी जनता की शक्ति, साहस और पहलकदमी से ऊर्जा ग्रहण करते हुए खुद को निरंतर नवीनीकृत किया. दुनिया भर के शासक वर्ग समय-समय पर कम्युनिस्ट आंदोलन को मर्सिया पढ़ते रहे हैं, परन्तु कम्युनिस्ट आंदोलन – विजय के उन्माद वाली ऐसी तमाम घोषणाओं को धता बताते हुए – बार-बार उठ खड़ा हुआ है.
आज जब फासीवादी हुक्मरान, राष्ट्र और उसकी जनता के साथ साम्राज्यवाद के आशीर्वाद से दमन और छल कर रहे रहे हैं और कम्युनिस्टों को बदनाम कर रहे हैं तो भाकपा(माले) को कम्युनिस्ट परचम उठा कर सही मायनों में संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य के संघर्ष की अगुवाई करनी होगी. आइये, हर संभव तरीके से भाकपा(माले) का विस्तार करें, उसे मजबूत करें ताकि हमारे महान शहीदों के सपनों को साकार किया जा सके और हमारी महान जनता की सेवा की जा सके.
केंद्रीय कमेटी
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) (लिबरेशन)