बस-कि दुश्वार है हर काम का आसां होना
आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसां होना
– मिर्जा गालिब
लोकतंत्र की असली परीक्षा संसद में नहीं होती. उसकी असली परीक्षा पुलिस थानों में होती है. यह इस बात से तय होती है कि राज्य अपने नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है, विशेषकर तब, जब वे नागरिक सत्ता से सवाल पूछ रहे हों. संविधान नागरिक को समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार व्यवहार का अधिकार देता है. लेकिन जब राज्य असहमति को सुरक्षा का प्रश्न मानने लगे और नागरिक को उसके विचारों से पहले उसकी पहचान के आधार पर देखने लगे, तब लोकतंत्र के सामने सबसे गंभीर संकट पैदा होता है.
24 जुलाई 2026 की शाम मेरे जीवन में ऐसा ही एक अनुभव लेकर आई. यह केवल चौबीस घंटे की पुलिस हिरासत नहीं थी. यह उन चौबीस घंटों का अनुभव था जिसमें मैंने देखा कि एक नागरिक का नाम, उसकी राजनीतिक पहचान, उसका सामाजिक परिचय और उसके बारे में बनी पूर्वधारणाएं किस तरह उसके साथ होने वाले व्यवहार को प्रभावित करती हैं. उन चौबीस घंटों ने मुझे पुलिस की ताकत भी दिखाई और उसकी विवशता भी; पूर्वाग्रह भी दिखाए और संवेदनशीलता भी; आदेश की कठोरता भी दिखाई और इंसानियत की धीमी लेकिन जीवित धड़कन भी.
मैं भाकपा(माले) की केंद्रीय कमिटी का सदस्य हूं और मगध क्षेत्र में पार्टी के संगठनात्मक कार्यों की जिम्मेदारी निभाता हूं. जुलाई का यह महीना बिहार में छात्रा आंदोलन के कारण राजनीतिक रूप से बेहद उथल-पुथल वाला था. नीट पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का आंदोलन लगातार तेज हो रहा था. 22 जुलाई को पटना में छात्रों का ऐतिहासिक प्रदर्शन हुआ था. उस प्रदर्शन के बाद सरकार की प्राथमिकता आंदोलन के राजनीतिक नेतृत्व को नियंत्रित करना बन गई थी. राज्य के अलग-अलग हिस्सों में पुलिस लगातार छात्रा नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले रही थी. 25 जुलाई को बिहार बंद का आह्वान किया गया था और प्रशासन हर कीमत पर उसे कमजोर करना चाहता था.
इसी पृष्ठभूमि में 24 जुलाई की शाम मैं एक संगठनात्मक कार्य से भाकपा(माले) विधायक काॅमरेड संदीप सौरभ से मिलने उनके पटना स्थित सरकारी आवास पहुंचा. मैं अभी बैठा भी नहीं था कि अचानक पुलिस ने पूरे परिसर को घेर लिया. किसी प्रकार की पूर्व सूचना, नोटिस या औपचारिक बातचीत के बिना कार्रवाई शुरू हो गई. सबसे पहले आइसा के राज्य अध्यक्ष काॅमरेड धनंजय को हिरासत में लिया गया. मेरा नाम किसी प्राथमिकी में नहीं था, फिर भी मुझे भी पकड़ लिया गया. कुछ ही देर बाद विधायक काॅमरेड संदीप सौरभ को भी पुलिस अपने साथ ले गई. उसी दिन आइसा की राज्य उपाध्यक्ष सबा आफरीन, राज्य सचिव दीपंकर मिश्र और भाकपा(माले) के मीडिया प्रभारी कुमार दिव्यम को भी गिरफ्तार किया जा चुका था. यह स्पष्ट था कि सरकार आंदोलन की आवाज को उसके नेतृत्व से अलग करना चाहती थी.
शुरुआत में मुझे काॅमरेड धनंजय के साथ बैठाया गया, लेकिन थोड़ी देर बाद बिना कोई कारण बताए दूसरी गाड़ी में भेज दिया गया. उस गाड़ी में काॅमरेड नौशाद पहले से मौजूद थे. हमारे साथ विकास नाम का एक युवक भी था. वह लगातार पुलिस से कह रहा था कि उसका एक महत्वपूर्ण इंटरव्यू है और उसे जाने दिया जाए. उसकी बेचैनी स्वाभाविक थी, लेकिन पुलिस के चेहरे पर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं थी. ऐसा लगता था जैसे गाड़ी में बैठे लोग इंसान नहीं, केवल संख्या हों. धीरे-धीरे विकास भी चुप हो गया. गाड़ी के भीतर एक ऐसा मौन फैल गया जिसमें केवल गाड़ी की आवाज और पुलिस के वायरलेस की खड़खड़ाहट सुनाई दे रही थी.
रास्ते में अचानक एक पुलिसकर्मी के मोबाइल पर फोन आया. बातचीत इतनी ऊंची आवाज में हो रही थी कि हम सब सुन सकते थे. फोन पर बताया गया कि गाड़ी में भाकपा(माले) का एक केंद्रीय कमिटी सदस्य है, जो नक्सल प्रभावित इलाके में काम करता है और उसके साथ विशेष तरीके से निपटना है. फोन समाप्त होने के बाद पुलिसकर्मी ने पहले काॅमरेड नौशाद को गौर से देखा. शायद उसने यह मान लिया था कि वही केंद्रीय कमिटी सदस्य हैं. तब मैंने स्वयं बताया कि वह मैं हूं. कुछ क्षणों तक वह मुझे और नौशाद को बारी-बारी से देखता रहा. उस क्षण मुझे पहली बार एहसास हुआ कि राज्य के पास नागरिक की वास्तविक पहचान से अधिक उसकी बनाई हुई छवि होती है.
गाड़ी में मौजूद एक सब-इंस्पेक्टर मुझे पहले से जानते थे. मैंने उनसे सहजता से कहा कि आप तो मुझे पहचानते हैं. उनका उत्तर था – आज मैं किसी को नहीं जानता. यह केवल एक वाक्य नहीं था. यह उस प्रशासनिक संस्कृति का परिचय था जिसमें आदेश व्यक्ति की स्मृति और संवेदना दोनों पर भारी पड़ जाता है. बाद में जानकारी मिली कि मेरे संबंध में विशेष निर्देश वरिष्ठ स्तर से दिए गए थे. इससे यह एहसास और गहरा हुआ कि यह केवल नियमित पुलिस कार्रवाई नहीं थी, बल्कि राजनीतिक संदर्भों से प्रभावित एक कार्रवाई थी.
कोतवाली थाने पहुंचने पर विकास को छोड़ दिया गया. अब केवल मैं और काॅमरेड नौशाद बचे थे. यहीं से हिरासत का दूसरा अध्याय शुरू हुआ – पहचान की इंक्वायरी.
मैंने सोचा था कि पूछताछ आंदोलन, बिहार बंद या किसी मुकदमे के बारे में होगी. लेकिन शुरुआती प्रश्नों ने मुझे चौंका दिया. मेरे पिता का नाम युगल किशोर शर्मा है. मेरा नाम कुमार परवेज है. पुलिस अधिकारियों के लिए यही सबसे बड़ा सवाल था. बार-बार पूछा जा रहा था कि पिता शर्मा और बेटा परवेज कैसे हो सकता है. ऐसा लग रहा था कि उन्हें किसी कानूनी तथ्य से अधिक मेरे नाम में दिलचस्पी है. मैंने समझाया कि नाम व्यक्ति की निजी पसंद और पारिवारिक सोच का विषय भी हो सकता है. उसका धर्म से सीधा संबंध मान लेना उचित नहीं है. लेकिन मेरी बातों से अधिक उन्हें अपने संदेह पर भरोसा था.
मेरे मन में बार-बार एक प्रश्न उठ रहा था कि यदि मेरा नाम कुमार शर्मा होता, तो क्या यही पूछताछ होती? क्या मेरे नाम ने ही मेरे प्रति संदेह को जन्म दिया था? क्या एक नाम किसी नागरिक के अधिकारों से बड़ा हो सकता है? इन प्रश्नों का उत्तर किसी अधिकारी ने नहीं दिया, लेकिन उनके व्यवहार में मुझे इसका संकेत लगातार मिलता रहा.
काॅमरेड नौशाद की पूछताछ और भी लंबी चली. उसके पिता का नाम ठहरा मुन्ना. अब यह भी हिंदू टाइप का नाम. उनसे उनके विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया से संबंध, जेएनयू, उत्तर प्रदेश से बिहार आने का कारण, परिवार, मित्र और राजनीतिक गतिविधियों तक के बारे में लगातार पूछा जाता रहा. ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उनके विचारों या गतिविधियों से अधिक उनकी पहचान जांच के केंद्र में थी. यह केवल राजनीतिक पूछताछ नहीं रह गई थी; इसमें धार्मिक पूर्वाग्रह की परछाईं साफ दिखाई दे रही थी.
रात धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी. अधिकारियों का आना-जाना लगा हुआ था. लेकिन इसी रात पुलिस महकमे का एक दूसरा चेहरा भी सामने आया. ड्यूटी पर मौजूद कुछ जवान धीरे-धीरे सहज होने लगे. उनमें से एक ने अपनी विवशता व्यक्त करते हुए कहा कि ऊपर से आदेश आते हैं और पुलिस को उनका पालन करना पड़ता है, चाहे वे स्वयं उनसे सहमत हों या नहीं. दूसरे पुलिसकर्मी ने चाय मंगवाई और देर तक हमसे बातचीत करता रहा. उसकी बातें सुनकर लगा कि वर्दी के भीतर का इंसान अभी पूरी तरह मरा नहीं है. व्यवस्था कई बार उसे दबा देती है, लेकिन खत्म नहीं कर पाती.
उस रात मैंने पुलिस महकमे के भीतर भी भारतीय समाज की परछाईं देखी. मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह रहा कि जिन लोगों ने हमारे प्रति मानवीय व्यवहार किया, उनमें अधिकांश अपेक्षाकृत साधारण सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले थे. वहीं निर्णय लेने वाले अधिकारियों का व्यवहार अधिक औपचारिक और कठोर था.
अगली सुबह थाने का दृश्य बदल चुका था. अलग-अलग जगहों से छात्रा-युवाओं को लगातार लाया जा रहा था. थाने के कमरे भरते जा रहे थे. साफ महसूस हो रहा था कि आंदोलन को कमजोर करने के लिए व्यापक स्तर पर गिरफ्तारियां की जा रही हैं. हिरासत में बैठे छात्रा एक-दूसरे से समाचार लेने की कोशिश कर रहे थे. किसी को बाहर की पूरी जानकारी नहीं थी.
इसी बीच एक पुलिसकर्मी मुस्कुराते हुए आया और उसने बताया कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है. यह सुनते ही छात्रों के चेहरों पर उम्मीद की चमक दिखाई दी. कुछ छात्रों ने उत्साह में नारे लगाने शुरू किए, लेकिन तुरंत उन्हें शांत रहने की सलाह दी गई. उस क्षण मुझे महसूस हुआ कि उम्मीद कितनी तेजी से फैलती है और डर उससे भी तेजी से उसे घेर लेता है.
शाम होते-होते हमारी रिहाई की प्रक्रिया शुरू हुई. बाहर निकलते समय मेरे मन में कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं थी. बल्कि कई ऐसे प्रश्न थे जो किसी एक पुलिस अधिकारी या एक सरकार से कहीं बड़े थे. क्या लोकतंत्र में असहमति को अपराध की तरह देखा जाएगा? क्या किसी नागरिक का नाम उसके अधिकारों पर भारी पड़ जाएगा? क्या राजनीतिक विचारधारा प्रशासनिक संदेह का आधार बन जाएगी? और क्या किसी मुस्लिम नाम वाले व्यक्ति को पहले अपनी नागरिकता, अपनी निष्ठा और अपनी पहचान साबित करनी पड़ेगी?
हिरासत के वे चौबीस घंटे मेरे लिए केवल एक व्यक्तिगत अनुभव नहीं रहे. वे हमारे समय का एक दस्तावेज बन गए. उन्होंने मुझे सिखाया कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने से मजबूत नहीं होता. लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब थाने में बैठा सबसे कमजोर नागरिक भी यह विश्वास कर सके कि उसके साथ कानून के अनुसार व्यवहार होगा, उसके नाम के अनुसार नहीं; उसके धर्म के अनुसार नहीं; उसके राजनीतिक विचारों के अनुसार नहीं.
किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी पुलिस नहीं होती, बल्कि वह भरोसा होता है जो नागरिक पुलिस पर करता है. और जब यह भरोसा कमजोर पड़ने लगता है, तब लोकतंत्र की नींव भी धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है.
मेरे लिए हिरासत के वे चौबीस घंटे इसी भरोसे की परीक्षा थे. और शायद हमारे लोकतंत्र की भी.
====