चुनाव आयोग और एसआइआर के बारे में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के खुलासों से मोदी सरकार बौखला गई है. इसके बाद, ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, एसआइआर को खत्म करने और 2023 के उस कानून को रद्द करने, जिसके तहत मौजूदा सरकार को अपनी पसंद का चुनाव आयोग पैनल चुनने की पूरी छूट मिल गई है और चुनाव आयुक्तों को किसी भी कानूनी जवाबदेही से आजीवन छूट दे दी गई है, की मांग को लेकर जन-प्रतिरोध भी तेज हो गए. चुनावी धांधली और बड़े पैमाने पर लोगों का मताधिकार छीन लेने के खिलाफ हो रहे इन प्रतिवाद आन्दोलनों को कुचलने के लिए मोदी सरकार ने एक तरह से पूर्ण युद्ध छेड़ दिया है.
यकीनन, लोकतंत्र के खिलाफ इस युद्ध का सबसे स्पष्ट रूप दमन है. वोट चोरी के खिलाफ हो रहे प्रतिवादों को रोकने के लिए मोदी सरकार ने जिस तरह का दमन शुरू किया है, उसकी तुलना केवल औपनिवेशिक शासकों द्वारा भारतीय जनता के प्रति दिखाई गई नफरत और हिकारत से ही की जा सकती है. दसियों हजार सुरक्षा बलों की तैनाती, ट्रेनों को रद्द करना, मेट्रो स्टेशनों को बंद करना, दिल्ली के सबसे अहम प्रतिवाद-स्थल को अमान्य घोषित करना, प्रदर्शनकारियों और यहां तक कि कवरेज कर रहे पत्रकारों को हिंसक तरीके से हिरासत में लेना या उठा ले जाना, महिला प्रदर्शनकारियों का बड़े पैमाने पर यौन उत्पीड़न, और अमान्य घोषित किए गए स्थल पर तिरंगा फहराने के आरोप में कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी – शांतिपूर्ण प्रतिवाद को रोकने के लिए दमनकारी तंत्र का इतना क्रूर इस्तेमाल साफ तौर पर संघी कार्यशैली के उस हिस्से को दर्शाता है जो औपनिवेशिक शासन माॅडल से प्रेरित है.
पुलिस द्वारा अपनाए जा रहे कई खतरनाक हथकंडे – जैसे कि नजरबंदी, एहतियातन हिरासत, कार्यकर्ताओं को ‘शांति बाॅन्ड’ पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर करना और फिर उन बाॅन्ड को विरोध के अधिकार का स्वेच्छा से त्याग मान लेना, पुलिसकर्मियों का अपनी पहचान छिपाकर प्रदर्शनकारियों को पीटना, और प्रदर्शनकारियों पर हमला करने के लिए पुलिस की वर्दी या सादे कपड़ों में गुंडों को तैनात करना – यह सब राज्य के दमन और फासीवादी आतंक के एक नए और भीषण स्तर को दर्शाता है. इस दमनकारी रणनीति के साथ-साथ, संघ-भाजपा खेमे ने इस आंदोलन को बदनाम करने और इसे अवैध ठहराने के लिए बड़े पैमाने पर दुष्प्रचार अभियान भी छेड़ रखा है. इस दुष्प्रचार युद्ध के दो मुख्य शब्द हैं – अराजकता और सत्ता परिवर्तन.
इस आंदोलन पर ‘अराजकता’ का आरोप लगाना सबसे बड़ी विडंबना है. दिल्ली और उसके आसपास ट्रेनों के रद्द होने और मेट्रो स्टेशनों के बंद होने की वजह से लोगों को जो भारी परेशानी और अव्यवस्था झेलनी पड़ी, वह असल में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को रोकने की सरकार की कोशिशों का नतीजा थी. सच तो यह है कि जिस दिन सरकार ने ‘इंडिया’ गठबंधन के मार्च को होने दिया, उस दिन मध्य दिल्ली में प्रदर्शनकारियों की भारी मौजूदगी के बावजूद कोई खास अव्यवस्था या रुकावट नहीं हुई. दुनिया भर में लोकतंत्र की एक अहम पहचान है बड़े पैमाने पर होने वाले जन-प्रदर्शन. मोदी-शाह सरकार के आने से पहले दिल्ली ने खुद ऐसे कई विरोध मार्च और रैलियां देखी हैं, जिनमें हजारों लोग शामिल हुए, लेकिन कभी कोई अराजकता या अव्यवस्था नहीं फैली.
इसके उलट, आज की मोदी सरकार चाहती है कि विरोध प्रदर्शन केवल तय की गई जगहों पर ही हों. और फिर, वह संसद भवन या विभिन्न मंत्रालयों के पास की जगहों को प्रदर्शन के लिए अमान्य घोषित कर देती है तथा प्रदर्शनकारियों के सम्मेलनों व शांतिपूर्ण सभाओं पर तरह-तरह की पाबंदियां लगा देती है. और जब प्रदर्शनकारियों को मजबूरन नई जगहें तलाशनी पड़ती हैं और इधर-उधर जाना पड़ता है, तो सरकार उन्हीं पर अराजकता फैलाने का आरोप मढ़ देती है. कुछ भाजपा नेता और आरएसएस के विचारक अपने इस ‘अराजकता’ वाले आरोप के समर्थन में अंबेडकर का नाम ले रहे हैं. यह भी एक बहुत बड़ी विडंबना है. जिस भाषण में अंबेडकर ने संवैधानिक कानून के शासन को अपनाने और उस नाजुक दौर में – जब गणतंत्र की नींव रखी जा रही थी - अराजकता से बचने की अपील की थी, उसी भाषण में उन्होंने लोकतंत्र के तानाशाही में बदल जाने के खतरे के प्रति भी आगाह किया था. उन्होंने थाॅमस जेफरसन का हवाला देते हुए कहा था कि संविधान को हमेशा नए विचारों को ग्रहण करने वाला होना चाहिए और संस्थाओं को आने वाली पीढ़ियों की जरूरतों और आकांक्षाओं के प्रति जवाबदेह होना चाहिए.
जेफरसन के इस प्रसिद्ध कथन का हवाला देते हुए कि “कौन सा देश अपनी स्वतंत्रता को बचाए रख सकता है, अगर उसके शासकों को समय-समय पर यह चेतावनी न दी जाए कि जनता में अभी भी प्रतिरोध की भावना जीवित है?...” अंबेडकर ने कहा कि जेफरसन का यह कथन “न केवल सच है, बल्कि पूरी तरह से सच है”. अंबेडकर का मुख्य जोर लोकतंत्र और संवैधानिक नैतिकता पर था. आज मोदी सरकार और उनके हथपकड़ू मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा लोकतंत्र को खत्म करने और संस्थागत जवाबदेही का उल्लंघन करने के खिलाफ लोगों को शांतिपूर्ण प्रतिवाद करना पड़ रहा है. और सरकार ‘अराजकता’ का डर दिखाकर इस शांतिपूर्ण संवैधानिक प्रतिवाद को दबाने और बदनाम करने में लगी हुई है!
एक और हौआ जिसका इस्तेमाल सरकार बहुत जोर-शोर से कर रही है, वह है ‘रिजीम चेंज (सत्ता परिवर्तन)’ का. चूंकि अमेरिका का इतिहास ऐसे ‘रिजीम चेंज’ को अंजाम देने से भरा रहा है, जहां उसने संप्रभु देशों की सरकारों को गिराकर अपनी कठपुतली सरकारें बिठाई हैं, इसलिए इस शब्द से विदेशी साजिश और साम्राज्यवादी हस्तक्षेप की बू आती है. इराक युद्ध से लेकर मौजूदा ईरान युद्ध तक, और वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के अपहरण की कोशिश से लेकर क्यूबा के खिलाफ रिजीम चेंज की लगातार धमकियों तक, अमेरिकी विदेश नीति ऐसे ही रिजीम चेंज की साजिशों का इतिहास रही है. लेकिन, अमेरिका भारत में ऐसी किसी ‘रिजीम चेंज’ की योजना भला क्यों बनाएगा? वह भी एक ऐसी सरकार के खिलाफ, जो खुद दुनिया भर में अमेरिका द्वारा किए जाने वाले सत्ता परिवर्तनों का समर्थन करती है, और जो हर तरीके से अमेरिका-इजरायल धुरी के हक में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों को दांव पर लगाने को भी तैयार है?
आज भारत में, यहां के लोगों के अनुभवों और संघर्षों के आधार पर, सरकार बदलने की मांग जोर पकड़ रही है. मोदी सरकार और पूरे भारत में इसके कई डबल इंजन स्वरूपों के साथ अपने कड़वे अनुभवों के चलते लोग यह तार्किक निष्कर्ष निकाल रहे हैं. वे मोदी सरकार की पूर्ण विफलता, लोगों को धोखा देने के उसके रिकाॅर्ड, और संघ-भाजपा तंत्र द्वारा रोजाना परोसे जा रहे नफरत, झूठ और हिंसा के माहौल को देख रहे हैं. ऐसा पहली बार नहीं है जब नौजवानों के नेतृत्व में लोग सरकार बदलने की बात कर रहे हैं. सरकार बदलने से लेकर पूरी व्यवस्था बदलने तक, बदलाव की यह पुकार आधुनिक भारत की लोकतांत्रिक राजनीति की जान रही है. ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा एक सदी से भी ज्यादा समय से पूरे भारत में सबसे लोकप्रिय नारा बना हुआ है. 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण द्वारा दिया गया ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान एक बड़ी राजनीतिक हलचल का कारण बना, जिसके परिणामस्वरूप आपातकाल की हार हुई और केंद्र में भारत की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी.
मोदी सरकार और संघ-भाजपा तंत्र ‘रिजीम चेंज’ का डर दिखाकर और इसे किसी विदेशी साजिश का हिस्सा बताकर लोगों को गुमराह करने और चुनावी भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं. वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें मूलतः आम अवाम से भय हो रहा है और साथ ही, असहमति के प्रति उनके मन में तिरस्कार की भावना भरी हुई है. इसी वजह से वे वेतन बढ़ाने या जलवायु के प्रति न्याय बरतने की बात करने वाले कार्यकर्ताओं को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के लिए खतरा मानकर उन्हें गिरफ्तार कर लेते हैं. लेकिन इस बार भाजपा की ‘विमर्श की लड़ाई’ भी उसी तरह विफल हो रही है, जैसे कि उनकी दमनकारी रणनीति. चाहे वे अराजकता के कितने भी आरोप क्यों न लगाएं या विदेशी साजिश का डर क्यों न दिखाएं, वे लोगों को सार्विक वयस्क मताधिकार पर आधारित निष्पक्ष चुनावों, जवाबदेह सरकार और जिम्मेदार संस्थाओं के लिए लड़ने से नहीं रोक सकते हैं.