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12 अप्रैल 2026 को लखनऊ स्थित राज्य ललित कला अकादमी, लाल बारादरी, लखनऊ में आयोजित “कला प्रदर्शनी : कलादृश्य” ने शहर के सांस्कृतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप दर्ज किया. कलरव, आइसा और जन संस्कृति मंच, लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस प्रदर्शनी ने कला को केवल दृश्य अनुभव के रूप में नहीं, बल्कि अपने समय की स्मृतियों, संघर्षों, संवेदनाओं और जनप्रतिरोध की भाषा के रूप में सामने रखा. बड़ी संख्या में कलाकारों, विद्यार्थियों, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं, शिक्षकों और नागरिकों की उपस्थिति ने इस आयोजन को एक जीवंत जन-सांस्कृतिक संवाद में बदल दिया.
कार्यक्रम का उद्घाटन प्रो. लालजीत अहीर, पूर्व अध्यक्ष, राज्य ललित कला अकादमी ने किया. अपने उद्घाटन वक्तव्य में उन्होंने युवा कलाकारों की सृजनात्मक ऊर्जा की सराहना करते हुए कहा कि कला समाज की चेतना को आकार देती है और आने वाले समय की सांस्कृतिक दिशा तय करती है. सत्र की अध्यक्षता प्रख्यात मूर्तिकार सुशील कन्नौजिया ने की, जबकि वरिष्ठ कला समीक्षक शहंशाह हुसैन विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे.
अपने संबोधन में शहंशाह हुसैन ने कहा, “कलाकार असाधारण होते हैं. वह अपनी कृतियों से अपने समय की कला का इतिहास लिखते हैं.” उन्होंने इस प्रदर्शनी को समकालीन पीढ़ी की वैचारिक और सौंदर्यात्मक बेचैनी का महत्वपूर्ण दस्तावेज बताया.
अध्यक्षीय वक्तव्य में सुशील कन्नौजिया ने कला और बाजार के जटिल संबंधों पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा, “मार्केटवाद से कलाकार को खतरा रहता ही है. जितने संस्थान हैं, वे आपकी कला का प्रदर्शन कर सकते हैं, संरक्षण नहीं. संरक्षण कलाकार को खुद करना होगा.”
इस प्रदर्शनी में चित्रकला, वस्त्रा कला और मूर्तिकला व सहित 78 कलाकृतियां प्रदर्शित की गईं, जिनमें 46 कलाकारों ने भाग लिया. प्रतिभागियों में शामिल रहे :
अविंदा, थिलिनी, रमणन, श्रद्धा, पूर्वी, विवेकानंद, अवंतिका, गोल्डी, रुद्र, निखिल, प्रवेश, असिथा, चनवेरा, कृष्णा, शालू, रुख्मणी, सृष्टि, मरीशा, सुमन कुमारी, खुशी वर्मा (टेक्सटाइल), माही अग्रवाल, वंदना, अनुराग, दिव्यांशी, अंशिका गोयल, हिमांशु गोयल, जान्हवी, खुशी सिंह, नीरज, तुषार गोयल, यश पाल, उमरा, वैशाली, वेदांत, इशिता, राधा, ऋषि, रुपाली गौतम, हिमांशु प्रताप, सबा कौशर, आलोक, अतुल, हेमंत, स्वप्निल मौर्य, अनिकेत पटेल, नेहा सिंह. प्रत्येक कृति अपने भीतर एक स्वतंत्र कथा, अनुभव और समय-साक्ष्य समेटे हुए थी, जिसने दर्शकों को कला के साथ संवाद में शामिल किया.
आयोजन समिति में कलरव की ओर से अतुल, पूर्वी, नीरज, रुख्मणी और जान्हवी, आइसा की ओर से शांतम निधि तथा जन संस्कृति मंच की ओर से सुचित और प्रो. धर्मेंद्र कुमार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. आयोजकों ने कहा कि यह प्रदर्शनी केवल कला प्रदर्शन नहीं, बल्कि जन-संस्कृति, वैकल्पिक सौंदर्यबोध और लोकतांत्रिक सांस्कृतिक हस्तक्षेप की एक पहल है.
यह आयोजन इस बात का सशक्त प्रमाण बना कि कला दीर्घाओं तक सीमित नहीं है; वह जनता की स्मृति, सामाजिक यथार्थ और प्रतिरोध की ऊर्जा से निर्मित होती है. आयोजकों ने घोषणा की कि भविष्य में भी ऐसे सांस्कृतिक मंचों के माध्यम से कलाकारों और जनता के बीच संवाद को और व्यापक किया जाएगा.