तथाकथित भारत-अमेरिका ट्रेड डील (व्यापार समझौता) भारत के राष्ट्रीय हितों और आर्थिक संप्रभुता के समर्पण का एक चौंकाने वाला उदाहरण बन रहा है. जिस सरकार ने भारतीय किसान की आमदनी दोगुनी करने का वादा किया था, वह अमेरिकी फार्म लॉबी को अमीर बनाने में लगी हुई है. जो सरकार ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘विकसित भारत’ जैसे जुमले बोलती रहती है, उसने भारत के हितों को ट्रंप के ‘अमेरिका को फिर से महान बनाने’ के आक्रामक एजेंडे के आगे गिरवी रख दिया है.
आइए, सबसे पहले उन बुनियादी बातों पर नजर डालें जिन्हें मोदी सरकार की प्रचार मशीनरी छिपाने की कोशिश कर रही है. भारत को अमेरिका में अपने निर्यात पर औसतन 18 प्रतिशत टैरिफ देना होगा, जो ट्रंप के टैरिफ युद्ध शुरू करने से पहले तक 3 प्रतिशत था. लेकिन मोदी सरकार इसे 50 प्रतिशत के दंडात्मक टैरिफ वाले स्तर से कमतर आंकती है. लेकिन जैसा कि ट्रंप के एग्जीक्यूटिव ऑर्डर में बताया गया है, यह गिरावट अमेरिका की निगरानी वाले सर्टिफिकेट पर निर्भर है कि भारत रूस से कोई तेल नहीं खरीदेगा!
दूसरी ओर, भारत ज्यादातर अमेरिकी आयात पर 50 प्रतिशत से अधिक टैरिफ लेता था, जो अब घटकर शून्य हो जाएगा. और इसमें अब तक सुरक्षित कृषि क्षेत्र भी शामिल है, जिसे अब अमेरिकी कृषि आयात के लिए नपे-तुले ढंग से खोला जा रहा है. दूसरे शब्दों में, भारत का संकटग्रस्त कृषि क्षेत्र, जो अभी भी ज्यादातर छोटे पैमाने का है और आधी भारतीय आबादी की रोजी-रोटी का जरिया है, उसे बहुत अधिक मशीनीकृत और भारी सब्सिडी वाली विशाल अमेरिकी खेती के साथ एक खतरनाक मुकाबले का सामना करना पड़ेगा, जिसमें अमूमन सिर्फ 1 प्रतिशत अमेरिकी आबादी शामिल है.
फिर गैर-टैरिफ अवरोधों या एनबीटी का भी मुद्दा है. अभी तक भारत 500 से कम एनबीटी लगाता रहा है, जबकि अमेरिका 6000 एनबीटी लगाता है. फिर भी, भारत पर ही एकतरफा तौर पर एनबीटी हटाने का दबाव डाला जा रहा है, जबकि अमेरिका की तरफ से कोई जवाबी छूट नहीं दी जा रही है. भारत के वाणिज्य मंत्री रूस से तेल खरीदने के मुद्दे से बचते हुए इसे विदेश मंत्री की तरफ ठेल दे रहे हैं, जबकि विदेश मंत्री इसका जवाब देने की जिम्मेदारी वापस वाणिज्य मंत्री पर डाल देते हैं. वाणिज्य मंत्री तेल कंपनियों द्वारा तेल खरीद का सारा मामला तय करने की बात कहकर भी इस मुद्दे से बचते हैं. इस बीच, वित्त मंत्री भारत के 18 प्रतिशत टैरिफ स्तर की तुलना बंगलादेश के 19 प्रतिशत टैरिफ स्तर से करके हमें झूठा दिलासा देते हैं – हम जानते हैं कि बंगलादेश को टेक्सटाइल और कपड़ों की कुछ चीजों पर कोई टैरिफ नहीं लगता है, और निर्यात में भारतीय टेक्सटाइल उत्पादकों की हिस्सेदारी पहले ही गिरने लगी है.
मोदी सरकार के ‘किसानों की सुरक्षा के लिए भारत में सोच-समझकर कृषि क्षेत्र को खोलने’ और ‘खेती का कोई भी संवेदनशील क्षेत्र शामिल नहीं’ वाले दावों की भी पोल खुलने लगी है, क्योंकि ट्रंप और व्हाइट हाउस लगातार राज खोल रहे हैं. व्हाइट हाउस की तरफ से जारी ‘फैक्ट शीट’ (तथ्यों की सूची) में अब ‘कुछ खास दालों’ पर शून्य या काफी कम टैरिफ की चर्चा है, यह तथ्य 7 फरवरी को जारी शुरूआती समझौता खाके में लोगों से छिपाई गई थी. हालांकि, अगले ही दिन हंगामे के बाद फैक्ट-शीट में से ‘कुछ खास दालों’ को हटा दिया गया. अब हम जानते हैं कि ‘कम या शून्य टैरिफ वाले अतिरिक्त कृषि उत्पादों’ वाली बात ही असली मुसीबत है जो भारतीय किसानों की रक्षा के लिए दशकों की कोशिशों पर पानी फेर देगी, जिनमें से ज्यादातर छोटे और सीमांत किसान हैं.
इस डील में, भारत को कुछ लाभ तो मिले हैं, लेकिन मोदी ने अमेरिका के सामने पूरी थाली बिछा दी है. इसमें सभी अमेरिकी औद्योगिक सामानों और कई तरह के अमेरिकी खाने-पीने और खेती से जुड़े उत्पादों पर टैरिफ खत्म करने या कम करने का वादा किया गया है, जिसमें सूखे डिस्टिलर्स के अनाज, लाल ज्वार, नट्स, ताजे और प्रोसेस्ड फल, कुछ दालें, सोयाबीन तेल और अन्य सामग्रियां शामिल हैं. इससे घरेलू खेती के बाजारों में अस्थिरता आएगी जो पहले से ही गहरे संकट में हैं. वहीं सरकार जो तिलहन और दालों को बढ़ावा देने का दावा करती है, अमेरिकी दालों और सोया तेल को कम या शून्य टैरिफ पर आने की छूट दे रही है. लाभकारी मूल्यों के लिए जूझ रहे भारतीय कपास किसान भारी सब्सिडी वाले अमेरिकी कपास की बिना रोक-टोक आवक से तबाह हो जाएंगे. कश्मीर और हिमाचल में सेब उगाने वाले, जो पहले से ही मौसम की मार और बाजार के उतार-चढ़ाव का सामना कर रहे हैं, सस्ते अमेरिकी फलों के आने से और मुश्किल में पड़ जाएंगे.
भारतीय डेयरी और पोल्ट्री किसान पारंपरिक रूप से जानवरों के चारे में आयलमील (तेल निकालने के बाद तिलहन का बचा हुआ हिस्सा, खल्ली) और मोटे अनाज (ज्वार) का इस्तेमाल करते रहे हैं. भारत ने ई-20 प्रोग्राम (इथेनॉल-फ्यूल मिक्स) के तहत इथेनॉल उत्पादन और मक्के की खेती में वृद्धि की है, जिससे घरेलू डीडीजीएस उत्पादन बढ़ा है. यह भी उम्मीद है कि पोल्ट्री और डेयरी उद्योग के और बढ़ने के साथ-साथ डीडीजीएस का उत्पादन भी बढ़ेगा. उद्योग जगत के विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा उत्पादन पूरी तरह से घरेलू स्तर पर खपत नहीं हो रहा है. ऐसे में, अमेरिकी डीडीजीएस के लिए बाजार खोलना जानबूझकर खुद को नुकसान पहुंचाने के अलावा और कुछ नहीं है.
इसी तरह, कर-मुक्त लाल ज्वार का आयात (जिस पर पहले 60-65 प्रतिशत आयात शुल्क लगता था) महाराष्ट्र, कर्नाटक और दक्कन पठार के बारिश पर निर्भर इलाकों में लाखों किसानों के लिए सीधा खतरा बन जाएगा. ज्वार के आयात पर मौजूदा टैरिफ ज्यादा हैं क्योंकि यह फसल महाराष्ट्र, कर्नाटक और दक्कन पठार के सूखे या कम सूखे बारिश पर निर्भर खेती वाले इलाकों में लाखों किसानों की रोजी-रोटी का जरिया है, जो पारंपरिक रूप से प्रमुख मोटे अनाज के साथ-साथ जानवरों के चारे के तौर पर भी इस्तेमाल होती है. ज्वार ‘श्री अन्ना बास्केट’ का हिस्सा है जिसे सरकार खुद बढ़ावा देती है. फिर भी वही सरकार इसे सस्ती सब्सिडी वाले आयात के सामने खड़ा कर दे रही है.
मोदी सरकार जीएम (जीनिक रूप से संवर्धित) फसल उत्पादों को लेकर भी चुप है, जबकि अमेरिका के किसान जीएम मक्का और सोयाबीन उगाते हैं, और (जीएम मक्का से बने) डीडीजीएस के साथ-साथ सोया तेल से जेनेटिक प्रदूषण का खतरा है, जिससे देसी फसलों को काफी नुकसान हो सकता है.
अभी अमेरिका भारत को हर साल लगभग 17,000 से 19,000 करोड़ रुपये के कृषि उत्पादों का निर्यात करता है, जिस पर 60 से 65 प्रतिशत का औसत वेटेड टैरिफ लगता है. अगर यह टैरिफ ढांचा शून्य या न्यूनतम टैरिफ में बदल जाता है, तो न सिर्फ भारतीय किसानों को बर्बादी का सामना करना पड़ेगा, बल्कि मौजूदा आयात मात्रा के आधार पर देश को टैरिफ राजस्व में हर साल लगभग 10,000 से 12,000 करोड़ रुपये का नुकसान भी होगा. इसका नतीजा खेती की बर्बादी के साथ-साथ राजकोषीय क्षरण के रूप में सामने आएगा.
भारतीय उद्योग के लिए, कुछ चिन्हित उत्पादों पर चयनशील टैरिफ समायोजन और आपसी व्यवस्था के अस्पष्ट वादों के अलावा ज्यादा कुछ नहीं है. ये भी ट्रंप शासन से पहले के स्तर से बहुत अधिक हैं. इसके उलट, भारत कई तरह के अमेरिकी औद्योगिक सामानों पर शून्य या न्यूनतम टैरिफ की पेशकश कर रहा है.
अब दवाइयों के क्षेत्र पर नजर डालिये. भारतीय जेनेरिक कंपनियां अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली कुल जेनेरिक दवाओं में से लगभग आधी सप्लाई करती हैं. भारतीय जेनेरिक दवा निर्माता दवा बनाने के लिए जिन मुख्य कच्ची सामग्रियों का इस्तेमाल करते हैं, उनका एक बड़ा हिस्सा चीन से आता है. अब अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा अनुसंधान की धारा 232 के तहत भारतीय जेनेरिक दवा उद्योग को अमेरिकी बाजार में अपनी पहुंच बनाए रखने के लिए टैरिफ, कोटा या अमेरिका में ही दवा निर्माण करने जैसा दबाव झेलना पड़ सकता है. इसका असली मकसद भारतीय जेनेरिक दवा निर्माताओं को अमेरिका द्वारा स्वीकृत ज्यादा महंगी सप्लाई चेन की ओर धकेलना ही प्रतीत होता है. इससे न केवल भारत की निर्यात प्रतियोगी क्षमता कमजोर होगी, बल्कि घरेलू स्तर पर दवाओं की कीमतें भी बढ़ेंगी, जिसका सीधा असर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं और सस्ती दवाओं की उपलब्धता पर पड़ेगा.
खास बात यह है कि सेक्शन 232 की जांच के तहत, स्टील और एल्युमीनियम जैसे जरूरी औद्योगिक उत्पादों को तथाकथित आपसी टैरिफ व्यवस्था से बाहर रखा गया है, जिसका मतलब है कि इन जरूरी क्षेत्रों में भारतीय निर्यातकों को ज्यादा अमेरिकी टैरिफ का सामना करना पड़ेगा, जिससे अमेरिकी बाजार में उनकी मांग बहुत कम हो जाएगी. इसके अलावा, मोदी ने पांच साल में 500 अरब डॉलर से ज्यादा का अमेरिकी सामान खरीदने का वादा किया है (जिसे बाद में फैक्ट-शीट में ‘इरादा’ में बदल दिया गया), यानी हर साल लगभग 100 अरब डॉलर (लगभग 9 लाख करोड़ रुपया). इस तरह के वादे से विदेशी मुद्रा भंडार और राजकोष भारी पर दबाव पड़ेगा. अभी, औसत वेटेड टैरिफ दर लगभग 13.5 प्रतिशत है. शून्य टैरिफ सिस्टम के तहत भारत को कस्टम राजस्व में हर साल लगभग 13.5 अरब डॉलर का नुकसान हो सकता है. ऐसे समय में जब स्वास्थ्य, शिक्षा और ग्रामीण विकास पर सरकारी खर्च कम है, तो राजस्व के इस झटके को कौन झेलेगा?
यह समझौता अमेरिका के भू-राजनीतिक हितों के सामने भारत की बढ़ती अधीनता को भी दिखाती है. पिछले एक साल में भारत के तेल आयात में अमेरिका का हिस्सा पहले ही लगभग दोगुना हो चुका है. इसलिए यह चिंता की बात है कि भारत सरकार अमेरिका के कहने पर अमेरिका या वेनेजुएला से तेल खरीदने और रूस या ईरान से तेल न खरीदने का वादा करेगी. वेनेजुएला से तेल खरीदने या दूसरे देशों से न खरीदने का कोई भी फैसला संप्रभु देशों के बीच का आपसी मामला है, न कि डोनाल्ड ट्रंप या अमेरिकी सरकार का अधिकार.
रियायती रूसी कच्चे माल से ज्यादा महंगी अमेरिकी सप्लाई की तरफ जाने से ढुलाई खर्चों के अलावा, भारत को सालाना अनुमानित 25 से 30 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ेगा जिससे खेती, ट्रांसपोर्ट और उद्योगों में लागत बढ़ेगी. महंगाई का दबाव बढ़ेगा और आम लोगों पर इसका बोझ पड़ेगा.
अंतरिम समझौते के खाके में साफ तौर पर “बैद्धिक संपदा, श्रम, पर्यावरण, सरकारी खरीद, और सरकारी कंपनियों के व्यापार बिगाड़ने वाले या अनुचित तरीकों” पर बातचीत शामिल है. आसान भाषा में कहें तो, यह अशुभ वाक्य भारत के पूरे नियामक ढांचे को ट्रंप के हुक्म के मातहत कर देने वाला है. एमएसपी और फर्टिलाइजर सब्सिडी से लेकर श्रम सुरक्षा और राष्ट्रीय असिंरचनात्मक ढांचे को संभालने वाली पब्लिक सेक्टर की कंपनियों तक – घरेलू हितों की रक्षा के लिए बनाए गए हर नीति तंत्र को बातचीत की टेबल पर रखा जा रहा है.
भारत के किसानों, मजदूरों और सभी मेहनतकश लोगों को अमेरिकी साम्राज्यवाद के इस नए औपनिवेशिक खाके का विरोध करने के लिए निश्चय ही एकजुट होना चाहिए, जिसे ट्रंप मोदी सरकार की पूर्ण समर्पणकारी नीति से हिम्मत पाकर भारत पर थोप रहे हैं. हमने देखा है कि कैसे मोदी सरकार तब मूकदर्शक बनी रही, जब ट्रंप ने भारतीयों को हथकड़ियों-बेड़ियों में जकड़ कर वापस भारत भेजा था. अब, वे पूरे देश को ही बेड़ियों में जकड़ने की तैयारी कर रहे हैं.
नहीं, अब उन्हें और आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा! भारत ट्रंप प्रशासन और अमेरिकी साम्राज्यवाद के नव-औपनिवेशिक अभियान का विरोध करेगा और उसे परास्त करेगा.