– मनीष कुमार
जंतर-मंतर पर जारी मेरी भूख हड़ताल के 17वें दिन गोरख के एक गीत की ये पंक्तियां और भी मौजूं लगने लगी हैं –
‘गालिब-मीर की दिल्ली देखी, देख के हम हैरान हुए,
उनका शहर लोहे का बना है, फूलों से कटता जाए है.’
देश में लोकतंत्र पर जब-जब संकट आया है, अलग-अलग समूह अपने हक और अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित होकर आंदोलन करने को मजबूर हुए हैं. देश की खेती-किसानी पर संकट आया तो किसान लगभग डेढ़ वर्ष तक दिल्ली की सड़कों पर आंदोलन करने के लिए बाध्य हुए और अंततः अपनी जीत हासिल की. उससे पहले, जब देश की बड़ी आबादी से कागज मांगकर उन्हें नागरिकता से वंचित करने की कोशिश सरकार द्वारा की जा रही थी, तब महिलाएं डटकर खड़ी हुईं और सरकार को पीछे हटना पड़ा.
इसी तरह अब शिक्षा के सवाल पर छात्रा-युवाओं का एक व्यापक आंदोलन पूरे देश में खड़ा हो चुका है. अपने हक और अधिकार की मांग करने वाले बेरोजगार युवाओं को ‘काॅकरोच’ का तमगा देने के बाद शिक्षा को केंद्र में रखकर जो आंदोलन शुरू हुआ, वह जंतर-मंतर के धरना-प्रदर्शन से आगे बढ़ते हुए पिछले 17 दिनों से जारी भूख हड़ताल में तब्दील हो चुका है.
छात्र एकजुट हैं
काॅकरोच जनता पार्टी और आइसा समेत अन्य छात्र संगठनों की अगुवाई में चल रहा यह आंदोलन आगामी 20 जुलाई को एक माह पूरा कर लेगा. इस आंदोलन में 28 जून से देश के जाने-माने शिक्षाविद, पर्यावरणविद और वैज्ञानिक सोनम वांगचुक के साथ आइसा के छह साथी – आइसा की अखिल भारतीय अध्यक्ष नेहा, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की सह-सचिव दानिश, मैं स्वयं बतौर आइसा उत्तर प्रदेश अध्यक्ष, अंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली के छात्र आमीन, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे ऋृषिकेश तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र और आइसा की डीयू इकाई के उपाध्यक्ष दीपक – ने शिक्षा में सुधार की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की.
इस पूरे आंदोलन के केंद्र में देश की परीक्षाओं में हो रही धांधली, भ्रष्टाचार और पेपर लीक का सवाल रहा है. इसी संकट के कारण नीट परीक्षा से जुड़े 22 छात्रों की मौत हुई. छात्रों की इन मौतों, लाखों परिवारों की मानसिक और आर्थिक पीड़ा तथा देश के करोड़ों छात्र-युवाओं के भविष्य को अधर में लटक जाने के बावजूद सरकार की ओर से कोई जिम्मेदार और लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली.
कभी इसी देश में एक रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. आज उसी देश में, 70 वर्ष बाद, अधिक जिम्मेदार, लोकतांत्रिक और संवेदनशील होने के बजाय हम ऐसी व्यवस्था का हिस्सा बन गए हैं, जहां नैतिक जिम्मेदारी तो दूर, जवाबदेही का लेशमात्र भी शेष नहीं बचा है.
14 जुलाई को यह भूख हड़ताल अपने 17वें दिन में प्रवेश कर गई. हमारे तीन साथी – दानिश, ऋृषिकेश और दीपक – की तबीयत गंभीर होने के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा.
59 वर्ष की आयु में सोनम वांगचुक पिछले 17 दिनों से भूख हड़ताल पर डटे हुए हैं. इन पर चर्चित फिल्म थ्री इडियट्स का चरित्र आधारित माना जाता है और जिनके शिक्षा, पर्यावरण तथा वैज्ञानिक योगदान का लोहा देश ही नहीं, दुनिया भी मानती है.
सोनम वांगचुक लद्दाख जैसे शीत प्रदेश से आते हैं. दिल्ली की भीषण गर्मी में इतने लंबे समय तक बिना भोजन के रहने का उन्हें पहले कभी अनुभव नहीं रहा. इसके बावजूद वे शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर अडिग हैं. इसके अतिरिक्त देश के अलग-अलग हिस्सों से समर्थन देने आए अनेक सामान्य नागरिक भी इस भूख हड़ताल का हिस्सा बन चुके हैं. ऐसे में जंतर-मंतर पर चल रही यह भूख हड़ताल अब एक व्यापक जन-भूख हड़ताल का रूप ले चुकी है.
‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’
एक ओर इस देश को ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ बताने के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं. चुनावों के समय प्रत्येक वोट के महत्व और लोकतांत्रिक भागीदारी बढ़ाने के लिए देशव्यापी अभियान चलाए जाते हैं. दूसरी ओर, जब जंतर-मंतर पर शिक्षा व्यवस्था में मूलभूत सुधार, पेपर लीक पर रोक और जवाबदेही तय करने की मांग को लेकर दर्जनों लोग भूख से बेहाल बैठे हैं तथा हजारों लोग उनके समर्थन में सड़कों पर उतर रहे हैं, तब यही सरकार और व्यवस्था में बैठे लोग लोकतंत्र का ककहरा भी भूल गए हैं.व्यंग्य/उलटबाँसी.
शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी से हाथ खींच रही सरकार
शिक्षा में सुधार की यह लड़ाई केवल नीट तक सीमित नहीं है. दरअसल, इस देश की पूरी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को व्यवस्थित ढंग से कमजोर किया जा रहा है. नई शिक्षा नीति-2020 को लागू करने की प्रक्रिया में लगभग सभी विश्वविद्यालयों में फीस बढ़ाई जा रही है. विश्वविद्यालयों की आधारभूत समस्याओं के समाधान की बजाय सरकार यह कह रही है कि अब वह उच्च शिक्षा पर पर्याप्त सार्वजनिक व्यय नहीं करेगी और विश्वविद्यालय अपने खर्च स्वयं वहन करें. यह स्पष्ट संकेत है कि सरकार धीरे-धीरे शिक्षा व्यवस्था से अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह समाप्त करना चाहती है.
पिछले 12 वर्षों से बीजेपी केंद्र की सत्ता में है और अनेक राज्यों में भी उसकी सरकारें हैं. सरकार की ही संस्था नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले दस वर्षों में 94 हजार से अधिक सार्वजनिक विद्यालय बंद कर दिए गए. इसके परिणामस्वरूप नामांकन दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है. इस मामले में ‘डबल इंजन’ सरकारों वाले उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्य सबसे आगे रहे हैं.
पूरे देश में पिछले पांच वर्षों के दौरान लगभग 65 लाख बच्चों ने स्कूल जाना छोड़ दिया है. शिक्षा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि आज भी लगभग दो करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर हैं. यह स्थिति उस समय की है, जब हम स्वयं को ‘विश्वगुरु’ कहने का दावा करते हैं.
पांच ट्रिलियन डाॅलर की अर्थव्यवस्था और मंगल ग्रह तक पहुंचने की उपलब्धियों का दावा करने वाले इस देश में शिक्षा के साथ किस प्रकार का खिलवाड़ हो रहा है, इसका अनुमान देश में शिक्षा व्यवस्था की इतनी बदतर स्थिति के आंकड़ों से सहज लगाया जा सकता है.
शिक्षा को बचाने की लड़ाई लड़ रहे छात्र
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय समेत देश के अनेक विश्वविद्यालयों के छात्र शिक्षा को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. लेकिन उनकी आवाज सुनने के बजाय मौजूदा सरकार निलंबन, निष्कासन और मुकदमे दर्ज कर जेल भेजने जैसी दमनात्मक कार्रवाइयों का सहारा ले रही है.
पिछले कुछ वर्षों में छात्र आंदोलनों में सक्रिय रहने और छात्रों को संगठित करने की कीमत मुझे भी चुकानी पड़ी है. मुझे लगभग दो वर्षों तक निलंबन झेलना पड़ा, अनेक मुकदमे दर्ज हुए और जेल यात्राएं भी करनी पड़ीं. सरकारी दमन का आलम यह है कि हाल के दिनों में, जब उत्तर प्रदेश में पेपर लीक के खिलाफ बड़े छात्र आंदोलन शुरू हुए, तब पुलिस शुरू से ही मेरी तलाश में लगी रही. लखनऊ में हुए छात्रा महाजुटान को रोकने के लिए पुलिस ने मेरे पैतृक घर को लगभग पुलिस छावनी में बदल दिया और मेरे पिता को लंबे समय तक थाने में बैठाए रखा. लेकिन अब दमन के बल पर आंदोलनों को कुचलने की इस कोशिश के विरुद्ध उत्तर प्रदेश के छात्रों की लड़ाई दिल्ली में इस भूख हड़ताल के रूप में एक नए चरण में प्रवेश कर चुकी है.
यह उन्हीं आंदोलनों की आगे बढ़ी हुई कड़ी है, जिसका हिस्सा आज हम सभी हैं.
हमारे सभी साथियों का छह से आठ किलोग्राम तक वजन कम हो चुका है. लेकिन इसके बावजूद 22 छात्रों की संस्थागत मौतों के खिलाफ हमारी लड़ाई, पेपर लीक रोकने में विफल शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग तथा एनटीए जैसी एजेंसी – जिसके पास पर्याप्त आधारभूत संसाधन नहीं हैं, जो ठेके और संविदा पर कर्मचारियों की नियुक्ति कर परीक्षाएं कराती है और लगभग एक निजी एजेंसी की तरह काम करती है – को भंग किए जाने की मांग को लेकर हमारे साथियों के हौसले में रत्ती भर भी कमी नहीं आई है.
पूरे देश में आंदोलन को समर्थन
अब तक यह आंदोलन मुख्यतः जंतर-मंतर तक सीमित था, लेकिन अब देश के अलग-अलग हिस्सों में भी लोग इसके समर्थन में सड़कों पर उतरने लगे हैं. इलाहाबाद में इसके समर्थन में अब तक चार बड़े मार्च निकाले जा चुके हैं. इसी तरह लखनऊ, बिहार के विभिन्न हिस्सों, झारखंड तथा दक्षिण भारत के कई राज्यों में भी लोग इसके समर्थन में आंदोलन कर रहे हैं.
देश के नागरिक समाज, सामाजिक संगठनों और विभिन्न राजनीतिक दलों की बढ़ती एकजुटता इस संघर्ष को और अधिक मजबूत करेगी. आगामी 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च इस लड़ाई को एक नया आयाम देगा. देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग इसमें शामिल होंगे और शिक्षा, रोजगार तथा जवाबदेही की यह लड़ाई सड़क से लेकर संसद तक पहुंचेगी. शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होने तक हमारा संघर्ष जारी रहेगा.
(सत्य हिन्दी से साभार)
‘मनीष कुमार इलाहाबाद विवि में शोधार्थी व आइसा के यूपी राज्य अध्यक्ष हैं. वे भी सोनम वांगचुक व नेहा के साथ जंतर-मंतर भूख हड़ताल में शामिल हैं.