संसद के मानसून सत्र में जनगणना और परिसीमन की शर्त हटाकर तत्काल महिला आरक्षण कानून को लागू करने की मांग पर ऐपवा ने राष्ट्रव्यापी आंदोलन चलाया.
संसद सत्र की शुरुआत से पहले महिला आरक्षण कानून पर सरकार की मंशा को समझते हुए ऐपवा और अन्य महिला संगठनों ने संयुक्त रूप से सरकार का विरोध करने और महिला आरक्षण कानून को बिना शर्त लागू करने के लिए संयुक्त आंदोलन चलाने का निर्णय लिया और इसके लिए ‘नेशनल कोहलिशन फाॅर वूमेन रिजर्वेशन’ के नाम से साझा मंच का गठन किया गया. इस साझा मंच के जरिए संयुक्त आंदोलन में ऐपवा ने सक्रिय भूमिका निभाई. इसके तहत देश के विभिन्न राज्यों में विपक्षी दलों के अध्यक्ष/ सचिव से मिलकर ज्ञापन दिया गया. विपक्ष और इंडिया गठबंधन के सांसदों को ज्ञापन दिया गया और उनसे भाजपा सरकार की साम्प्रदायिक विभाजन और मनमाने परिसीमन की कोशिशों का विरोध करने की अपील की गई. दिल्ली में ऐपवा की पहल पर ऐपवा, ऐडवा, एनएफआइडब्ल्यू और अन्य संगठनों के प्रतिनिधियों द्वारा भाकपा(माले) के सांसद का. राजाराम सिंह, का. सुदामा प्रसाद, राजद सांसद श्री सुधाकर सिंह, श्री अभय कुशवाहा को ज्ञापन दिया गया.
संसद सत्र की शुरुआत में 21 जुलाई को देश के राज्यों की राजधानियों और जिला स्तर पर इस मांग को लेकर ऐपवा ने प्रदर्शन, धरना, ज्ञापन दिया. यह कार्यक्रम बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, राजस्थान, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश समेत कई राज्यों में लागू हुआ.
21 जुलाई को ही दिल्ली के जंतर-मंतर पर महिला संगठनों का संयुक्त धरना ‘नेशनल कोहलिशन फाॅर वूमेन रिजरवेशन’ के बैनर तले शुरू हुआ. इस धरना में 21 अगस्त को ऐपवा महासचिव मीना तिवारी, राष्ट्रीय सचिव श्वेता राज, सुधा चौधरी, उपाध्यक्ष फरहत बानो और मंजू प्रकाश समेत कई नेता शामिल हुईं. इसी दिन शाम को महिला संगठनों की संयुक्त बैठक कांस्टीट्यूशन क्लब में हुई जिसे महासचिव मीना तिवारी ने संबोधित किया. इस बैठक में आंदोलन को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया और दिल्ली में 21 अगस्त से जारी संयुक्त धरना को संसद के मानसून सत्र के हर कार्य दिवस पर जारी रखने का निर्णय लिया गया. धरना भीषण बारिश के बीच भी जारी रहा. ऐपवा जंतर-मंतर पर जारी छात्रों के आंदोलन के समर्थन में भी उतरी. ऐपवा दिल्ली की साथियों ने महिलाओं के संयुक्त धरना को सफल बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई. आस-पास के राज्यों से भी ऐपवा की महिलाएं दिल्ली पहुंचीं.
इस धरना में 22 जुलाई को कामरेड मंजुलता के नेतृत्व में जयपुर, राजस्थान से महिलाओं का जत्था शामिल हुआ और 23 जुलाई को कामरेड जसवीर कौर के नेतृत्व में पंजाब से बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हुईं. कामरेड श्वेता राज, सोनी यादव, पूजा गुप्ता, सरस्वती देवी के नेतृत्व में हर दिन दिल्ली के मुहल्लों और गरीब बस्तियों की महिलाएं जंतर-मंतर पर जारी धरने में शामिल होती रहीं. मीना तिवारी ने 21 जुलाई से 27 जुलाई तक जंतर मंतर पर जारी धरने में ऐपवा का नेतृत्व किया.
इसी बीच बनारस में जो कि प्रधानमंत्री मोदी का संसदीय क्षेत्र है, 5 अगस्त को देशभर से आई ऐपवा की प्रतिनिधियों ने मार्च निकाला और प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन दिया.
इससे पहले बनारस के रवींद्रपुरी स्थित बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिमा पर महासचिव मीना तिवारी और अध्यक्ष ई रति राव ने माल्यार्पण किया. यहां पहले से ही भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया था. महिलाओं के मार्च को थोड़ी दूर आगे बढ़ने के बाद ही रोक दिया गया और प्रतिनिधि मंडल को प्रधानमंत्री कार्यालय जाने नहीं दिया गया. सहायक पुलिस आयुक्त ने आकर महिला प्रतिनिधियों से बात की और ज्ञापन लिया.
इस अवसर पर ऐपवा की राष्ट्रीय महासचिव मीना तिवारी ने कहा कि यदि मोदी सरकार सच में महिलाओं के आरक्षण के प्रति गंभीर होती तो 2023 में ही पारित हो चुके 33% महिला आरक्षण को बिना किसी बहाने के लागू करती लेकिन सरकार महिला आरक्षण का उपयोग अपने राजनीतिक एजेंडे यानी साम्प्रदायिक आधार पर परिसीमन और अपनी मनमर्जी से लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का अधिकार हासिल करने के लिए चाहती है और इसके लिए ही वह संविधान संशोधन करना चाहती है. इसकी पुष्टि 2026 में फिर से हुई, जब सरकार ने अचानक संसद का एक विशेष सत्र बुलाया, मानो 2029 से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का मार्ग प्रशस्त करने के लिए, लेकिन महिला आरक्षण को राजनीतिक रूप से विवादास्पद परिसीमन के मुद्दे से अलग नहीं किया. भाजपा सरकार महिला आरक्षण बिल को परिसीमन से जोड़कर पूरे देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करना चाहती है. असम और जम्मू-कश्मीर का परिसीमन इसके हालिया उदाहरण हैं. उन्होंने कहा कि यह सरकार साम-दाम-दंड-भेद के जरिए 2 तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने विपक्षी सांसदों से अपील की कि भाजपा के इस लोकतंत्र विरोधी मंशा को विफल करें.
कार्यक्रम में राष्ट्रीय अध्यक्ष ई रति राव ने कहा कि महिला आरक्षण कानून के अंतर्गत सभी एससी, एसटी, पिछड़ा वर्ग एवं ट्रांस महिला समेत अन्य वंचित हिस्से की महिलाओं को आरक्षण मिले.
उत्तर प्रदेश की ऐपवा की सचिव कुसुम वर्मा और अध्यक्ष कृष्णा अधिकारी ने कहा कि महिला आरक्षण अधिनियम, 2023, संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के प्रभावी प्रतिनिधित्व की मांग को लेकर दशकों से चले राष्ट्रव्यापी आंदोलन के फलस्वरूप लाया गया था. यह लंबी विलंबता एक गहरी पितृसत्तात्मक वास्तविकता को उजागर करती है जो व्यवस्थित रूप से महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण को अवरुद्ध करती है.
ज्ञापन कार्यक्रम में दिल्ली, बिहार, कर्नाटक, झारखंड, उत्तर प्रदेश,असम, बंगाल, पंजाब, राजस्थान, आंध्र प्रदेश व अन्य राज्यों से राष्ट्रीय प्रतिनिधि शामिल हुए.
पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 7 अगस्त को दिल्ली में महिला संगठनों का संयुक्त प्रदर्शन हुआ जिसमें ऐपवा का नेतृत्व राष्ट्रीय सचिव श्वेता राज, राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य जसबीर कौर और सोनी यादव ने किया.
इस विरोध प्रदर्शन में दिल्ली के विभिन्न इलाकों और आस पास के राज्यों से महिलाएं बड़ी संख्या में जुटीं और मांग कीं कि महिला आरक्षण कानून बेशर्त लागू किया जाए.
ऐपवा राष्ट्रीय सचिव काॅमरेड श्वेता राज ने प्रदर्शन को संबोधित करते हुए प्रमुखता से बात उठाई कि एक तरफ तो एसआईआर में बड़ी संख्या में महिलाओं के नाम कटे हैं, दूसरी तरफ भाजपा सरकार 33% महिला आरक्षण देने में टाल-मटोल कर रही है. पिछले संसद सत्र में संसद में विपक्ष तथा सड़क पर महिला संगठनों ने इसका पुरजोर विरोध किया और भाजपा सरकार के साम्प्रदायिक एजेंडे को पीछे धकेला. वर्तमान समय में जरूरत है कि पूरे देश में एकजुट होकर महिला आरक्षण बिल को बेशर्त लागू करने की मांग उठाई जाए तथा इसी मानसून सत्र में इसे लागू किया जाए.
ऐपवा राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक के निर्णय के मुताबिक महिला आरक्षण कानून में एससी-एसटी के लिए स्वतः आरक्षण का प्रावधान है जिसका ऐपवा समर्थन करता है साथ ही ऐपवा महिला आरक्षण के तहत पिछड़ा, अति पिछड़ा वर्ग व अन्य वंचित महिलाओं के लिए आरक्षण के पक्ष में है और अगर बिना शर्त महिला आरक्षण कानून लागू नहीं होता है तो संसद के शीतकालीन सत्र से पहले ऐपवा दिल्ली में पुनः प्रदर्शन करेगा. इस बीच वर्तमान सत्र में ऐपवा का आंदोलन जारी रहेगा.
– कुसुम वर्मा