लखनऊ विश्वविद्यालय में आइसा (AISA) के 9वें यूनिट सम्मेलन (26 अप्रैल 2026) को प्रशासन द्वारा अनुमति न दिए जाने के बावजूद छात्र संगठन पीछे नहीं हटा. गेट नंबर एक पर खुले सत्र और विरोध प्रदर्शन के साथ सम्मेलन को जारी रखते हुए संगठन ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई. इसके बाद नई नेतृत्व टीम का चुनाव किया.
यूपी प्रेस क्लब में रविवार को आयोजित संगठनात्मक सत्र में शान्तम निधि को अध्यक्ष और हर्ष को सचिव चुना गया. समर, संविधा और अहमद उपाध्यक्ष बने जबकि सुकीर्ति, सत्यम, अतुल और अंश को संयुक्त सचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई. सम्मेलन में 39 सदस्यीय काउंसिल का भी गठन किया गया. इसे संगठन के विस्तार और राजनीतिक दिशा के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.
कार्यक्रम में जेएनएसयू के पूर्व अध्यक्ष धनंजय, आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा, यूपी सचिव शशांक, प्रदेश अध्यक्ष मनीष कुमार और अन्य पदाधिकारी मौजूद रहे. सत्र की अध्यक्षता प्राची, सीमा और सत्यम ने की. निवर्तमान संयोजक मंडल की ओर से समर ने संगठनात्मक रिपोर्ट पेश की.
सम्मेलन के दौरान वक्ताओं ने प्रशासनिक कार्रवाई को लोकतांत्रिक छात्र राजनीति पर हमला बताते हुए कहा कि पुलिस दबाव और आदेशों के जरिए छात्रों की आवाज को नहीं दबाया जा सकता. नवनिर्वाचित अध्यक्ष शान्तम निधि ने आरोप लगाया कि यह सिर्फ सम्मेलन रद्द करने का मामला नहीं बल्कि यह तय करने की कोशिश है कि परिसर में कौन बोलेगा और कौन नहीं.
सचिव हर्ष ने कहा कि फीस वृद्धि, सेल्फ-फाइनेंस कोर्स का विस्तार, सामाजिक न्याय तंत्र की कमजोरी और प्रशासनिक दमन आपस में जुड़ी प्रक्रियाएं हैं. ये राष्ट्रीय शिक्षा नीति और केंद्रीकृत प्रवेश व्यवस्थाओं के जरिए आगे बढ़ाई जा रही हैं. संगठनात्मक रिपोर्ट में विश्वविद्यालयों में हो रहे संरचनात्मक बदलाव पर चिंता जताते हुए कहा गया कि शिक्षा महंगी, नियंत्रित और बहिष्कारी बनती जा रही है. इससे कमजोर और हाशिये के छात्रा सबसे पहले बाहर हो रहे हैं.
सम्मेलन ने साफ किया कि सार्वजनिक शिक्षा अधिकार है, कोई वस्तु नहीं. प्रशासनिक दबाव के बावजूद आयोजन को राजनीतिक घोषणा बताते हुए आइसा ने परिसर में फीस वृद्धि, निजीकरण, जातिगत भेदभाव और दमन के खिलाफ संघर्ष तेज करने का संकल्प लिया.