(आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा और आशुतोष के बीच बातचीत, सत्य टीवी, 31 जुलाई)
आशुतोष: कल की बात है, या शायद आज की बात है. मैं उतना निश्चित नहीं हूं, लेकिन जो पुलिस वाले थे, उनके परिवार वालों से बाकायदा एक पत्रकार वार्ता हुई, और यह बताने की कोशिश की गई कि किस तरीके से उनके ऊपर हमले किए गए. इसे आप कैसे देखती हैं?
नेहा: इसे मैं बार-बार ऐसे ही देखती हूं और ऐसे ही कहती हूं – कि एक तरफ इस बात पर इतना जोर दिया जा रहा है कि इस प्रदर्शन में हिंसा हुई, तो बार-बार मैं यह रेखांकित करना चाहती हूं कि छात्रों में से जिन्होंने हिंसा की, वे कितने छात्र थे, और क्या वह एक सुनियोजित तरीके से हुई हिंसा थी. दूसरा, जो राज्य की तरफ से हिंसा हुई – एक पूरा तंत्र खड़ा किया गया, 20 तारीख के प्रदर्शन की तैयारी में, जिसके तहत पैलेट बंदूकें, रैपिड एक्शन फोर्स और सुरक्षा बलों को तैनात करने के आदेश दिए गए. इसके बाद गोली चलने की बातें समाचार माध्यमों की रिपोर्टों में सामने आ रही हैं. जिस तरीके से लाठियों में कीलें ठोककर लाठीचार्ज किया गया, आंसू गैस के गोले जिस बेतरतीब तरीके से इस्तेमाल हुए – अगर लोगों को हिंसा के बारे में बात करनी है, तो हिंसा के इन दोनों रूपों में फर्क है. एक तरफ वह हिंसा है जो कुछ चंद प्रदर्शनकारियों ने की हो, और दूसरी तरफ वह हिंसा है जो राज्य के दमन का हिस्सा है.
तो बार-बार हम यह कहते हैं कि अगर प्रदर्शनकारियों की तरफ से पुलिसकर्मियों को धक्का दिया गया, या अगर कुछ वीडियो सामने आ रहे हैं जिनमें वे लात मार रहे हैं – जाहिर है हम उस हिंसा का समर्थन नहीं करेंगे. लेकिन फर्क है. प्रदर्शनकारियों ने जो किया – क्या उनके हाथ में पैलेट बंदूकें थीं? क्या उनके हाथ में ऐसी लाठियां थीं जिनमें कीलें ठोंकी हुई थीं? क्या उनके हाथ में पिस्तौलें थीं, बंदूकें थीं? क्या उनके पास आंसू गैस के गोले थे? अगर नहीं थे, तो वे लोग जो इतनी भावुकता से पुलिस के ऊपर हुई हिंसा की बात कर रहे हैं, वे लोग उतनी ही भावुकता और उतनी ही संवेदना के साथ प्रदर्शनकारियों के साथ जो हुआ उसके बारे में क्यों नहीं बात कर रहे हैं? क्यों नहीं बात हो रही कि महिलाओं के साथ वर्दीधारी लोगों ने यौन उत्पीड़न किया? क्यों नहीं बात हो रही कि इतनी सारी वीडियो इंटरनेट पर घूम रही हैं जहां महिलाओं के निजी अंगों में डंडा घुसाने की कोशिश की जा रही है? क्यों नहीं बात हो रही कि 20 तारीख को जो हिंसा हुई, वह एक लैंगिक हिंसा थी?
हिंसा की मात्रा और उसके स्तर में फर्क है – जो राज्य की तरफ से व्यवस्थित तरीके से की जाती है, जिसका एक पूरा आदेश-तंत्र होता है, जिसके आदेश सबसे ऊंचे अधिकारी से आते हैं, और जिन लोगों ने वह हिंसा की होती है, उन्हें वर्दी बचाती है. ऊंचे पदों पर बैठे लोग उन्हें बचाते हैं, उन्हें सजा से बचाते हैं. इसी वजह से ऐसा होता है कि तीन-चार दिन तक दिल्ली पुलिस और यहां की भाजपा सरकार इतनी बेशर्म रही कि वह यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थी कि हमने पैलेट बंदूकों का इस्तेमाल किया है. बहुत लंबे समय तक उन्होंने कहा कि ऐसा कोई इस्तेमाल नहीं हुआ है. आपको शर्म नहीं आती? किस तरह का दहशतगर्द राज्य आप चला रहे हैं, जहां आप अपने ही देश के नागरिकों पर पैलेट बंदूकों का इस्तेमाल कर रहे हैं?
प्रदर्शनकारियों ने पुलिसकर्मियों को धक्का दिया हो – हम समर्थन नहीं करते. लात मारी हो – हम समर्थन नहीं करते. लेकिन क्या इस तथ्य को कि प्रदर्शनकारियों ने पुलिसकर्मियों को धक्का दिया, इस बात के बराबर रखा जा सकता है कि पैलेट बंदूकों ने जिंदगी भर के लिए लोगों की आंखों की रोशनी छीन ली, उनकी सुनने की क्षमता खत्म कर दी, छात्र जीवन-मृत्यु से लड़ते हुए यंत्रों के सहारे पड़े हैं? क्या इन दोनों हिंसाओं की तुलना भी की जा सकती है? अगर नहीं की जा सकती, तो जो हिंसा प्रदर्शनकारियों ने की, हम कहते हैं कि वह नहीं होनी चाहिए – बार-बार हम कहते हैं कि इस तरह की हिंसा नहीं होनी चाहिए.
आशुतोष: आपने अपनी बात बहुत जुनून के साथ रखी है. मेरा प्रश्न यह है कि क्या अमित शाह जी को, या गृह मंत्री को, इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए?
नेहा: बिल्कुल, बिल्कुल. और अमित शाह और दिल्ली के पुलिस आयुक्त की जिम्मेदारी तय होने से कम कोई भी चीज स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए. अगर अमित शाह स्वयं केंद्रीय दिल्ली में पैलेट बंदूक लेकर नहीं खड़े थे और उन्होंने खुद गोली नहीं चलाई, तब भी वे इस पूरे तंत्र के लिए जिम्मेदार हैं – जिस तंत्र में 20 तारीख को पैलेट बंदूकें बांटी गईं, रैपिड एक्शन फोर्स को भेजा गया, और सुरक्षा बलों को व्यवस्थित तरीके से पैलेट बंदूकें दी गईं. और अमित शाह उस पूरे तंत्र के सबसे ऊपर हैं – जिस तंत्र में 20 तारीख की ये तैयारियां हुईं, जिसमें कोई भी निचले दर्जे का पुलिस अधिकारी अपनी मर्जी से गोलियां नहीं चलाता, अपनी मर्जी से लाठियों में कीलें ठोककर हिंसा नहीं करता.
और इसके बाद भी, प्रदर्शन उठने के बाद जिस तरह का विच हंट छात्रों के खिलाफ चल रहा है – खास तौर पर – और उसमें भी समाज के जो विभाजन मौजूद हैं, चाहे वे जाति के आधार पर हों, लैंगिक आधार पर हों, धर्म के आधार पर हों, उन तमाम विभाजनों को पुलिस अपने दमन में दोहरा रही है. यह कहना कि आप किसी रुचिका पर मुकदमा दर्ज करेंगे क्योंकि उन्होंने शब्दों में ऐसी बातें कह दीं जो शोभा नहीं देतीं – कि प्रधानमंत्री के खिलाफ कैसे बोला जा सकता है – और पूरे सोशल मीडिया पर उन्हें बलात्कार की धमकियां मिल रही हैं, यह एक लैंगिक दमन है, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाना है. यह करना कि बंगाल में जो 14 छात्र गिरफ्तार होंगे, उनमें से 13 मुस्लिम छात्र होंगे – शुभेंदु अधिकारी का यह कहना कि जुम्मे वाले वही लोग थे जिन्होंने प्रदर्शन में यह सब किया – यह खास तौर पर निशाना बनाकर छात्रों के खिलाफ अभियान चलाना है.
तो यह जो दमन का नया चेहरा हम अलग-अलग स्तरों पर देख रहे हैं – क्या आप कह रहे हैं कि यह सब अमित शाह की जानकारी के बिना हो रहा है, या अलग-अलग जगहों पर भाजपा के गृह मंत्रालयों की जानकारी के बिना हो रहा है? ऐसा नहीं हो सकता. इसलिए आप सिवान में जिस पुलिस अधिकारी ने एके-47 चलाई, उसे निलंबित करके यह नहीं कह सकते कि आपका काम पूरा हो गया. जवाबदेही और जिम्मेदारी अमित शाह की होगी. उनके सिर पर इसकी जिम्मेदारी है. दिल्ली के पुलिस आयुक्त को बदला गया, और उसके बाद दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के प्रति अपना पूरा रवैया बदल लिया – उन्हें बर्खास्त करना होगा. अमित शाह को बर्खास्त करना होगा. तभी यह बात स्थापित होगी कि आगे आने वाले किसी भी प्रदर्शन में राज्य का प्रदर्शनकारियों के साथ पैलेट बंदूकों और इतनी बेतरतीब लैंगिक हिंसा के जरिए व्यवहार करना नाकाबिले-बर्दाश्त है – बल्कि गैरकानूनी है. यह बात स्थापित करने के लिए अमित शाह को बर्खास्त होना होगा. पुलिस कमिश्नर को जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ना होगा.
आशुतोष: क्या आपको लगता है कि यह संभव हो पाएगा? आखिरी सवाल.
नेहा: यह सवाल धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बारे में भी हमसे पूछा जा रहा था. तो उसी असंभव लगने वाली हिम्मत के साथ हम कहते हैं – क्यों नहीं? वह व्यक्ति जो जिम्मेदार है, जिंदगी भर के लिए इतने सारे प्रदर्शनकारियों की जिंदगी और उनके शरीर की बनावट तक बदल देने के लिए – उस व्यक्ति का इस्तीफा, उस व्यक्ति की जवाबदेही, क्यों संभव नहीं होगी? बिल्कुल संभव होगी.
आशुतोष: आपकी इस उम्मीद को मैं सलाम करता हूं – इस उम्मीद के साथ कि इस देश के भीतर जो जवाबदेही राजनीतिक नेतृत्व की, राजनीतिक व्यवस्था की स्थापित हुई है, छात्रों के ऊपर जो बर्बरता हुई है उसकी भी जवाबदेही तय हो, और यह बात मौजूदा सरकार स्थापित करे कि बच्चा किसी का भी हो, किसी भी विचारधारा का हो, उसके साथ बर्बरता नहीं होनी चाहिए, और जिन लोगों ने ऐसा किया है उनके खिलाफ कार्रवाई हो. बहुत-बहुत शुक्रिया हमसे बातचीत करने के लिए.