वर्ष 34 / अंक-24 / माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के दवाब में एक और आत्महत्य...

माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के दवाब में एक और आत्महत्या

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14 अगस्त, 79वें  स्वतंत्रता दिवस से ठीक एक दिन पहले, सियाराम साव ने अपने एक कमरे के घर में पंखे से फांसी लगाकर जान दे दी. यही वह कमरा था जहां वह अपनी पत्नी, दो बच्चों, मां और एक बकरी के साथ रहते थे. आत्महत्या का कारण – फ्यूजन प्राइवेट माइक्रो-फाइनेंस कंपनी द्वारा प्रताड़ना और अपमान बताया जा रहा है. सियाराम बम्बई में एक छोटे से होटल में काम करते थे. इस बेहद मामूली कमाई से परिवार का किसी तरह गुजारा चलता था. छह महीने पहले एक हाथ से लकवाग्रस्त हो जाने के बाद उनकी नौकरी भी छिन गई. खाली हाथ वह अपने गांव लौट आए ,जहां हालात पहले से ही बेहद कठिन थे. परिवार के पास जमीन नहीं है और न ही कोई उत्पादक संपत्ति. पत्नी और मां दोनों खेतों में मजदूरी करती हैं, जिसकी थोड़ी-सी आमदनी से बमुश्किल रोजमर्रा का खर्च निकल पाता है.

पिछले साल उसकी पत्नी तेतरी देवी को बेटी की शादी के लिए 2 लाख रुपये का कर्ज लेना पड़ा था.  यह कर्ज चार अगल-अलग कंपनियों से ली गयी थी. जिसकी कुल मासिक किश्त 6665 रु. बनता है.

1.  एल एंड टी फाइनेंसियल सर्विसेज से 42,499 रु. 30 प्रतिशत ब्याज दर पर जिसकी किश्त 2300 प्रति महीना पड़ता था.
2. एसवी क्रेडिट लाइन लिमिटेड से 50000 रुपये 28 प्रतिशत ब्याज दर पर जिसकी किस्त 1265 प्रति महीना पड़ता था.
3. फ्यूजन माइक्रो फाइनेंस से 50000 रुपये 26.24 प्रतिशत ब्याज दर पर जिसकी किस्त 1265  प्रति महीना पड़ता था.
4. बंधन बैंक से 50000 रुपये  जिसकी किस्त 750 प्रति महीना पड़ता था. लोन पासबुक पर ब्याज दर नहीं लिखी हुई है.

सियाराम के घर लौटने के बाद किश्त की राशि चुका पाना बेहद मुश्किल हो गया था. जब  वो नौकरी  कर रहे थे तब बॉम्बे से ऑनलाइन किश्त की राशि एजेंटो को भेज दिया करते थे. ऐसा लग रहा था कि समय के साथ कर्ज चुका दिया जायेगा, लेकिन नौकरी छूटते ही परिस्थिति बिलकुल विपरीत हो गयी. इलाज तो दूर, घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया था. सियाराम की मृत्यु से एक दिन पहले, फ्यूजन कंपनी के एजेंट ने देर रात दस बजे घर आ कर काफी गाली-गलौज और अपमानजनक बातें बोल कर गए. इतना ही नहीं तेतरी देवी को बारिश में देर रात कही से मांग कर पैसा लाने को कहा. पैसा का इंतेजाम नहीं हुआ तो दूसरे दिन सुबह आने को कह कर गया. दूसरे दिन सुबह ठीक 9 बजे एजेंट फिर आ धमका और फिर गाली-गलौज करने लगा. तेतरी देवी फिर से घर से निकल पड़ी यह कह कर कि किसी से मांग कर लाती हूं. मगर जब वो आधे घंटे बाद खाली हाथ लौटी तो पति की मृत्यु हो चुकी थी. सियाराम ने अपमान से आहत हो कर फांसी लगा ली थी. तेतरी देवी और स्थानीय लोगो ने बताया कि जब सियाराम फांसी से झूल रहे थे तब एजेंट उन्हें तड़पता देख वहां से भाग गया. अगर उस एजेंट ने थोड़ी भी मानवता दिखाई होती और सियाराम को सहारा दिया होता तो आज वो जिंदा होते.

मगर परिवार की हताशा यहीं खत्म नहीं होती. पालीगंज के भाकपा-माले विधायक संदीप सौरभ को जब घटना की जानकारी मिली तो वो साथियों के साथ वहां पहुंचे. उनकी पहल पर पुलिस तो आई लेकिन  मामले को पति पत्नी के बीच आपसी विवाद कह कर टालना चाहा. लेकिन 20 अगस्त को पार्टी ने अनुमण्डल स्तर पर धरना-प्रदर्शन कर जब दवाब बनाया तो एस.डी.एम ने एफआईआर रजिस्टर करने का निर्देश दिया. साथ ही परिवार को दस लाख रुपये की सहायता राशि प्रदान करने का आश्वासन दिया. इस रिपोर्ट को लिखने तक एफआईआर दर्ज करने की पुष्टि नहीं हो पाई है. बिहार के गांवों में ऐसी घटनाएं अब आम हो चुकी हैं.

बिहार जाति सर्वेक्षण 2023 के आंकड़े दिखाते हैं कि राज्य के गरीब किस प्रकार आर्थिक संकट में रोजमर्रा के खर्च पूरे करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. संरचनात्मक सहयोग के अभाव, सार्वजनिक संस्थाओं की निम्न गुणवत्ता और सामाजिक सुरक्षा की कमी ने गरीब महिलाओं को घरेलू खर्च चलाने के लिए माइक्रोफाइनेंस कंपनियों पर भारी निर्भर बना दिया है. बढ़ती महंगाई, घटती आमदनी, बेरोजगारी और शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण ने अधिकांश महिलाओं को अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए कर्ज लेने पर मजबूर कर दिया है. घर में बीमारी, मजदूरी का ठप हो जाना या अचानक कोई आर्थिक संकट आने पर महिलाओं के पास कर्ज लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता. लेकिन कर्ज लेने के बाद ब्याज और किश्तों का ऐसा सिलसिला शुरू होता है, जो परिवार को कई सालों तक जकड़े रखता है.

महिलाओं ने लगातार शिकायत की है कि रिकवरी एजेंट उन्हें तरह-तरह से परेशान और अपमानित करते हैं. माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की यह जबरन वसूली न केवल व्यापक है बल्कि महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा का गंभीर उल्लंघन भी करती है. कई महिलाओं ने बताया कि एजेंट घर तक पहुंचकर देर रात तक बाहर डटे रहते हैं, गैस सिलेंडर और पंखे जैसे घरेलू सामान जब्त कर लेते हैं, परिवार को घर से बाहर बंद कर देते हैं और उन्हें आवश्यक सुविधाओं से वंचित कर देते हैं. परिवार के सदस्यों को डराया-धमकाया जाता है और आधार कार्ड या सरकारी योजनाओं से वंचित करने की धमकी दी जाती है. इन एजेंटों द्वारा महिलाओं के साथ गाली-गलौज, मानसिक प्रताड़ना और सामाजिक अपमान जैसी घटनाएं रोजमर्रा की हकीकत बन चुकी हैं.

प्रताड़ना इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई परिवार आत्महत्या करने या गांव-घर छोड़कर भागने जैसे कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं. किस्त चुकाने के दबाव में कई बार महिलाएं महाजनों से 60 से 120 प्रतिशत तक की ब्याज दर पर कर्ज लेने को विवश हो जाती हैं. ऋण का अधिकतर उपयोग इलाज, बच्चों की पढ़ाई या शादी-ब्याह जैसे दैनिक जरूरी खर्चों को पूरा करने में होता है. अगर उन्हें स्थायी रोजगार मुहैया करवाई जाए तो उन्हें कर्ज लेने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी. आरबीआई के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हुए माइक्रोफाइनेंस कंपनियां मनमाने ब्याज दरों पर कर्ज देती हैं और किश्त वसूली के लिए किसी भी हद तक चली जाती हैं. गरीब महिलाओं के जीवन में माइक्रोफाइनेंस ‘सशक्तीकरण’ के नाम पर आया था, लेकिन ऊंचे ब्याज की मार ने इसे एक दमनकारी और शोषणकारी जाल में बदल दिया है. जिससे बिहार में नयी तरह की महाजनी प्रथा – ‘कंपनी महाजनी’ बढ़ रही है.

– वंदना प्रभा




23 August, 2025