‘साझी शहादत-साझी विरासत’ को जिंदा रखने का संकल्प
अशफाकुल्लाह खां और रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के शहादत दिवस के अवसर पर आरवाईए ने देश भर में ‘एक शाम साझी शहादत-साझी विरासत के नाम’ कार्यक्रम का आयोजन किया. कैंडल मार्चों के माध्यम से आजादी आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई और उनकी जिंदगी, उनके विचारों और प्रेरणा देने वाले किस्सों को याद किया गया. साथ ही, आजादी की लड़ाई में सांप्रदायिक नफरत के खिलाफ साझे सपनों, साझे संघर्षों और साझी कुर्बानियों पर चर्चा हुई. नौजवानों ने शहीदों के ‘सपनों के भारत’ के लिए संघर्ष को तेज करने का पुरजोर संकल्प लिया.
झारखंड के देवघर में कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आरवाईए के राष्ट्रीय महासचिव नीरज कुमार ने कहा कि आज जब देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंक दिया गया है तब हमें अशफाक-बिस्मिल और भी ज्यादा याद आते हैं, जिन्होंने अपनी सरजमीं, अपने मुल्क को ब्रिटिश हुकूमत से आजाद कराने के लिए शहादत दी. अशफाक-बिस्मिल की दोस्ती की मिसाल का एक किस्सा आज भी बहुत मशहूर है, जब ब्रिटिश हुकूमत के दौरान तस्खुक हुसैन दिल्ली के पुलिस आयुक्त हुआ करते थे. उन्होंने अशफाक और बिस्मिल की दोस्ती को हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेलकर तोड़ने की भरसक कोशिश की. अशफाक को बिस्मिल के खिलाफ भड़काकर वो ब्रिटिश राज के मुताबिक बयान दिलवाना चाहते थे, पर अशफाक भारतीय क्रांतिकारी जत्थे के खिलाफ कुछ भी बोलने को राजी नहीं थे. ऐसे में उन्होंने एक रोज अशफाक का बिस्मिल पर से विश्वास तोड़ने के लिए कहा कि बिस्मिल ने सच बोल दिया है और सरकारी गवाह बन गया है. इस पर अशफाक ने उनको हंसते हुए जवाब दिया – खान साहब! पहली बात, मैं पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को आपसे कहीं बेहतर तरीके से जानता हूं और जैसा आप कह रहे हैं, वो ऐसे इंसान तो बिल्कुल भी नहीं हैं, इसलिए ऐसे पैंतरे आजमाने का कोई फायदा नहीं.
उन्होंने कहा कि आज भाजपा की सरकार देश को बांटने के लिए संगठित होकर सत्ता का इस्तेमाल कर रही है. देश में सांप्रदायिक नफरत का जहर घोला जा रहा है. नौजवानों को उन्मादी बना कर समाज में नफरत फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. सरकार सांप्रदायिक नफरत की आड़ में नौजवानों से रोजी-रोटी के अवसरों को छीन कर, अपने कारपोरेट यारों के मुनाफे के लिए सस्ता लेबर मुहैया करा रही है.
डीकोलोनाइजेशन (उपनिवेश राज से मुक्ति) के नाम पर देश ने संघर्ष के दम पर जो भी अधिकार हासिल किए थे आज उसे सोची समझी साजिश के तहत छीना जा रहा है. अभी सरकार द्वारा ‘चार नए लेबर कोड’ लाकर पुराने श्रमिक अधिकार को छीना जाना इसका उदाहरण है. ऐसे समय में नौजवानों के कन्धों पर यह जिम्मेदारी है कि आपने शहीदों से प्रेरणा लेकर देश की आजादी, संविधान, लोकतंत्र, भाईचारे व अपने अधिकारों को बचाने के लिए संगठित हो कर इस दौर का मुकाबला करें.
नेताओं ने कहा कि अशफाकुल्ला खां और रामप्रसाद बिस्मिल की शहादत इस बात का जीवंत प्रमाण है कि भारत की आजादी की लड़ाई किसी एक धर्म, जाति या समुदाय की नहीं थी. यह लड़ाई थी शोषण के खिलाफ, साम्राज्यवाद के खिलाफ और इंसान की बराबरी व हक के लिए सबकी साझी लड़ाई. अंग्रेजी हुकूमत के फांसीघर में भी अशफाक और बिस्मिल ने नफरत नहीं, मोहब्बत और इंकलाब की विरासत कायम की. आज जब सत्ता समर्थित ताकतें इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रही हैं, तब उनकी साझी शहादत को याद करना अपने आप में एक प्रतिरोध है.
नेताओं ने कहा कि आज देश जिस दौर से गुजर रहा है, वह केवल आर्थिक या प्रशासनिक संकट नहीं है, बल्कि यह देश की लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और जनपक्षधर विरासत पर एक सुनियोजित फासीवादी हमला है. आज की हुकूमत हमारे शहीदों के सपनों के ठीक उलट रास्ते पर देश को धकेल रही है. आजादी का मतलब रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और सम्मान था; लेकिन आज करोड़ों नौजवान बेरोजगारी की आग में झोंके जा रहे हैं, मजदूरों के अधिकार छीने जा रहे हैं और किसानों को कॉरपोरेट गुलामी में धकेला जा रहा है. मनरेगा जैसी योजनाओं को खत्म करने की कोशिशें, नए लेबर कोड के जरिए मजदूरों को मालिकों के रहम-ओ-करम पर छोड़ देना, न्यूनतम मजदूरी और स्थायी रोजगार पर हमला ये सब उसी नीति का हिस्सा है जिसका उद्देश्य मेहनतकश जनता को कमजोर करना और कॉरपोरेट घरानों को और ताकतवर बनाना है. जल, जंगल और जमीन को अडानी जैसे पूंजीपतियों को सौंपने का अभियान खुलेआम चल रहा है. आदिवासी इलाकों से लेकर किसानों की उपजाऊ जमीन तक, हर जगह मुनाफे की भूख इंसानी हकों को रौंद रही है. दूसरी तरफ, भाजपा-आरएसएस की राजनीति जनता के असली सवालों से ध्यान हटाने के लिए ‘फूट डालो और राज करो’ की पुरानी औपनिवेशिक अंग्रेजपरस्त नीति को नए रंग में लागू कर रही है. सांप्रदायिक जहर फैलाकर हिंदू-मुसलमान के नाम पर नफरत पैदा की जा रही है, ताकि बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सवाल पीछे धकेल दिए जाएं. अशफाक और बिस्मिल की साझी शहादत इस सांप्रदायिक राजनीति के मुंह पर करारा तमाचा है, क्योंकि वे बताते हैं कि इंकलाब की राह साझी होती है, मजहब की दीवारों से परे.
नेताओं ने कहा कि आज जरूरत है कि नौजवान इतिहास को केवल किताबों में बंद न रखें, बल्कि उसे अपने संघर्षों का हथियार बनाएं. अशफाकुल्ला खां और रामप्रसाद बिस्मिल का सपना ऐसा भारत था जहां शोषण न हो, जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने वालों को जेलों में न ठूंसा जाए, और मेहनत करने वाले इंसान को उसकी मेहनत का पूरा हक मिले. उस सपने को साकार करना आज की नौजवान पीढ़ी की तमाम जिम्मेदारियों में से सबसे जरूरी जिम्मेदारी है.
हमारे शहीद क्रांतिकारी नौजवानों ने बहुत पहले ही सत्ता को ये चेतावनी दे दी थी कि डर, दमन और झूठ के सहारे जनता को हमेशा चुप नहीं रखा जा सकता. ये उन निडर नौजवानों का ऐलान था कि जब तक शोषण रहेगा, तब तक इंक्लाब की मशाल जलती रहेगी. अशफाक और बिस्मिल की शहादत की रोशनी में आज का नौजवान भी ये संकल्प ले रहा है कि वो नफरत नहीं, एकता का रास्ता चुनेगा. खामोशी नहीं, संघर्ष का रास्ता चुनेगा. आज फिर से जरूरत है कि हम उस साझी विरासत को मजबूती से थामें, जिसे हमारे शहीदों ने अपने खून से सींचा है. यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी – एक ऐसा भारत बनाना, जो बराबरी, इंसाफ और इंसानियत पर खड़ा हो.
– वतन कुमार