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अशोक खराट: सड़ी हुई पूंजीवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था का एक विकृत रूप!

अशोक खराट: सड़ी हुई पूंजीवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था का एक विकृत रूप!

-- उदय भट्ट

अशोक खराट, महाराष्ट्र के नासिक का रहने वाला एक स्वयंभू ‘गॉडमैन’ (धर्मगुरु) है, जिस पर महिलाओं का यौन शोषण करने, उन अपराधों की रिकॉर्डिंग करने और उन रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल पीड़ितों को ब्लैकमेल करने तथा उनके परिवारों से पैसे ऐंठने का आरोप है.

ये अपराध उसके अपने ही एक कर्मचारी, जाधव के जरिए सामने आए, जिसने खराट के यौन शोषण की रिकॉर्डिंग करने और उन वीडियो का इस्तेमाल ब्लैकमेल के हथियार के तौर पर करने के घिनौने काम का पर्दाफाश किया. जो बात एक व्हिसलब्लोअर के खुलासे के तौर पर शुरू हुई थी, वह जल्द ही धोखाधड़ी, जबरन वसूली और गहरी राजनीतिक मिलीभगत के एक बड़े खुलासे में बदल गई. उसके अपराधों के पैमाने और प्रकृति को देखते हुए मीडिया ने उसे ‘महाराष्ट्र का एपस्टीन’ कहना शुरू कर दिया; यह अमेरिकी फाइनेंसर जेफरी एपस्टीन के संदर्भ में कहा गया था, जिसने शक्तिशाली राजनीतिक और व्यावसायिक अभिजात वर्ग के फायदे के लिए युवा महिलाओं का यौन शोषण किया था और उनकी तस्करी की थी.

अशोक खराट का यह खुलासा उस ढांचागत सड़न को दिखाता है, जिसे पितृसत्ता, वर्ग-विशेषाधिकार और धर्म के कुटिल इस्तेमाल से बढ़ावा मिलता है. खराट, जो एक मर्चेंट सेलर (व्यापारी नाविक) था और खुद को झूठा ‘कैप्टन’ कहता था, लगभग पंद्रह साल पहले नासिक जिले के सिन्नर स्थित मिरगांव में आकर बस गया. उसने वहां एक महादेव मंदिर बनवाया, ‘शिवनिका संस्थान’ की स्थापना की और खुद को एक अंकशास्त्री तथा आध्यात्मिक चिकित्सक के रूप में पेश करना शुरू कर दिया. जिन महिलाओं को संतान सुख नहीं मिल पा रहा था, जो परिवार गरीबी से जूझ रहे थे, जिन मजदूरों के पास रोजगार नहीं था – यानी वे सभी हताश, बेबस और वंचित लोग – अपनी मुसीबतों से छुटकारा पाने की आस में उसके पास आते थे, और वह उनका शोषण करता था.

खराट अपने अपराधों के बावजूद इसलिए आजाद घूमता रहा, क्योंकि उसे बड़े और ताकतवर लोगों का संरक्षण हासिल था. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, मंत्री दीपक केसरकर और चंद्रकांत दादा पाटिल जैसे राजनेता, महाराष्ट्र महिला आयोग की अध्यक्ष रूपाली चाकणकर और दर्जनों अन्य लोग उसके साथ जुड़े हुए माने जाते हैं. वर्ष 2014 में भाजपा नेता अमित शाह की उसके साथ एक तस्वीर भी सामने आई थी. केसरकर ने खुद यह स्वीकार किया था कि कम से कम चालीस विधायक खराट के संपर्क में थे.

खराट ने अपने राजनीतिक संपर्कों का फायदा उठाया और अपने संगठन को आगे बढ़ाने के लिए कई कानूनों का उल्लंघन किया. खराट धीरे-धीरे एक ‘फिक्सर’’(काम निकलवाने वाला दलाल) बन गया – उसने जमीन के बड़े-बड़े टुकड़े हथिया लिए, एक आलीशान फार्महाउस बनवाया और पानी की पाइपलाइन का रुख अपनी संपत्ति की ओर मोड़ दिया, जबकि उसके आस-पास का सूखा-ग्रस्त इलाका पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसता रहा. एसआइटी की शुरुआती जांच से पहले ही यह संकेत मिल चुका है कि नेफेड से जुड़ी कंपनियों के साथ कथित तौर पर खराट के पारिवारिक फर्मों द्वारा 1,300 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की गई थी. जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, ऐसे और भी लेन-देन सामने आने की उम्मीद है.

लोगों के बीच बढ़ते अवैज्ञानिक विचारों और अंधविश्वासों को उस राजनीतिक संरक्षण से बढ़ावा मिलता है, जो ऐसे ‘बाबाओं’ को हासिल होता है. यौन शोषण को एक ऐसी व्यवस्था ने संभव बनाया, जो बच्चे पैदा न करने वाली महिलाओं का मजाक उड़ाती थी. उन लोगों के साथ धोखाधड़ी की गई, जो उचित आवास, रोजगार की सुरक्षा आदि चाहते थे. ये ‘बाबा’ कमजोर और बेबस लोगों को अपना शिकार बनाते हैं.

आरएसएस-भाजपा की वैचारिक परियोजना मूल रूप से तर्कवाद, वैज्ञानिक सोच और समतावादी सामाजिक सुधार के प्रति विरोधी है. जब से भाजपा सत्ता में आई है, धोखाधड़ी करने वाले बाबाओं को राजनीतिक वैधता देने का काम तेजी से बढ़ा है. यह कोई संयोग नहीं है. आसाराम बापू, राम रहीम, रामदेव – इस शासनकाल में जिन अपराधियों और धोखेबाजों को सरकारी संरक्षण दिया गया, उनकी सूची लंबी और शर्मनाक है. इसमें महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आरोपियों का सम्मान करना, महिला पहलवानों के आरोपों का सामना कर रहे बृजभूषण सिंह या कुलदीप सिंह सेंगर का बचाव करना, मनुस्मृति का महिमामंडन करना, और कुंभ मेले को राजनीतिक मंच के तौर पर इस्तेमाल करना – इन सबको जोड़ दें, तो एक पूरी तस्वीर उभरकर सामने आती है. यह महज पाखंड नहीं है. यह एक सोची-समझी वैचारिक संरचना है, जिसे जातिगत ऊंच-नीच, पितृसत्तात्मक नियंत्रण और धार्मिक कट्टरता को मजबूत करने के लिए तैयार किया गया है; क्योंकि ये तीनों ही पूंजी और सत्ताधारी वर्ग के हितों को साधते हैं. इस संरचना के शिकार, हमेशा की तरह, दलित महिलाएं, आदिवासी महिलाएं, मजदूर वर्ग की महिलाएं और पिछड़े समुदायों की महिलाएं ही होती हैं. उनका शोषण इस व्यवस्था का कोई इत्तेफाक नहीं है. बल्कि, यही इस व्यवस्था का असली स्वरूप है.

भले ही रूपाली चाकणकर ने इस्तीफा दे दिया हो और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दिखावटी तौर पर ही सही, लेकिन चिंता जाहिर की हो; मगर असली जवाबदेही तब तय होगी, जब खराट को संरक्षण देने वाले हर राजनेता और सरकारी अधिकारी पर मुकदमा चलाया जाएगा. इसका मतलब है – हर पीड़ित को पूर्ण पुनर्वास और न्याय मिलना. इसका मतलब है – बिना किसी राजनीतिक अपवाद के ‘अंधविश्वास विरोधी कानून’ को सख्ती से लागू करना. और इसका मतलब है – उन ढांचागत स्थितियों को ही खत्म कर देना, जिनकी वजह से खराट जैसे लोग पनप पाते हैं. महाराष्ट्र की छत्रपति शिवाजी महाराज, ज्ञानेश्वर-तुकाराम, शाहू महाराज, महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले, फातिमा शेख, बाबासाहेब अंबेडकर और संत गाडगे महाराज वाली क्रांतिकारी परंपरा, ठीक इसी तरह के संघर्ष की परंपरा है. एक ऐसा संघर्ष जो दमन को उसकी संरचनात्मक जड़ों के साथ पहचानता है; जो स्त्री-प्रश्न को जाति-प्रश्न और वर्ग-प्रश्न से अलग करने से इनकार करता है. इस परंपरा को पुनः प्राप्त किया जाना चाहिए – अत्यंत तत्परता और जुझारूपन के साथ.

02 May, 2026