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किताबबंदी : कश्मीरी जनता के हक, पहचान, और इतिहास पर एक और हमला

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5 अगस्त 2025 को आर्टिकल 370 को हटाने, कश्मीर का खास दर्जा छीनने और उसे यूनियन टेरिटरी में बदलने के 6 साल पूरे हो गए. यह दिन कश्मीर के बाशिंदों के लिए एक दर्दनाक याद बन चुका है कि कैसे भाजपा की मोदी सरकार ने उनके और हिन्दुस्तान के रिश्ते को एकतरफा फरमान जारी कर तोड़ दिया, कश्मीरियों की राय के खिलाफ संवैधानिक तौर पर बदलाव किया गया. और इस साल, इसी दिन इस किताबबंदी का ऐलान किया गया. किताबों को बैन करना फासिस्ट सत्ता की पहचान है, जो सच से और जनता के सवाल करने की ताकत से डरता है.

राज्य के गृह विभाग की तरफ से जारी नोटिफिकेशन में कहा गया – “तहकीकात और भरोसेमंद खुफिया रिपोर्टों से पता चला है कि चिन्हित किताबों ने नौजवानों को गुमराह करने, आतंकवाद की महिमा गाने और भारतीय राज्य के खिलाफ हिंसा भड़काने में अहम भूमिका निभाई है.”

मगर नोटिफिकेशन में यह नहीं बताया गया कि इन किताबों का मूल्यांकन कैसे या कब किया गया, जो दुनिया भर की यूनिवर्सिटियों के सिलेबस में शामिल हैं और अकादमिक व पॉलिसी हलकों में खूब पढ़ीं और कोट की जाती हैं. यह भी स्पष्ट नहीं है कि लेखकों या प्रकाशकों को जवाब देने का मौका दिया गया या नहीं.

बैन 25 किताबों की सूची हैः

1. ह्यूमन राइट्स वायोलेशंस इन कश्मीर – पियोत्र बाल्सेरोविच और अग्निजका कुजेव्स्का (राउटलज/मनोहर)
2. कश्मीर’स फाइट फॉर फ्रीडम – मोहम्मद यूसुफ सराफ (फिरोज संस, पाकिस्तान)
3. कोलोनाइजिंग कश्मीर – हफसा कंजवाल
4. कश्मीर पॉलिटिक्स एंड प्लेबिसाइट – डॉक्टर अब्दुल जब्बार (गुलशन बुक्स, कश्मीर)
5. डू यू रिमेंबर कुनन पोशपोरा? – इस्सार बतूल व दूसरे (जुबान बुक्स)
6. मुजाहिद की अजान – सम्पादक मौलाना मोहम्मद इनायतुल्लाह सुबहानी (मरकजी मकतबा इस्लामी, दिल्ली)
7. अल जिहादुल फिल इस्लाम – मौलाना मौदूदी (दारुल मुसन्निफीन, दिल्ली)
8. इंडिपेंडेंट कश्मीर – क्रिस्टोफर स्नेडन (मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी प्रेस/सैंक्टम बुक्स, दिल्ली)
9. रेजिस्टिंग ऑक्युपेशन इन कश्मीर – हेली दुशिन्स्की, आथर जिया, मोना भान और सिंथिया महमूद (यू-पेन प्रेस)
10. बिटवीन डेमोक्रेसी एंड नेशनः जेंडर एंड मिलिटराइजेशन इन कश्मीर – सीमा काजी (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस)
11. कॉन्टेस्टेड लैंड्स – सुमंत्र बोस
12. इन सर्च ऑफ अ फ्यूचरः द स्टोरी ऑफ कश्मीर – डेविड देवदास
13. कश्मीर इन कॉन्फ्लिक्ट – विक्टोरिया स्कोफील्ड
14. द कश्मीर डिस्प्यूट (1947–2012) – ए. जी. नूरानी
15. कश्मीर ऐट द क्रॉसरोड्स – सुमंत्र बोस
16. अ डिस्मेंटल्ड स्टेट – अनुराधा भसीन (हार्पर कॉलिन्स इंडिया)
17. रेजिस्टिंग डिसअपीयरेंस – आथर जिया (जुबान बुक्स)
18. कॉनफ्रंटिंग टेररिज्म – सम्पादक मारूफ रजा और स्टीफन कोहेन (पेंगुइन इंडिया)
19. फ्रीडम इन कैप्टिविटी – राधिका गुप्ता (कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस)
20. कश्मीरः द केस फॉर फ्रीडम – तारिक अली, हिलाल भट्ट, अंगना पी. चटर्जी, पंकज मिश्रा और अरुंधति रॉय (वर्सा बुक्स)
21. आजादी – अरुंधति रॉय (पेंगुइन इंडिया)
22. यूएसए एंड कश्मीर – डॉक्टर शमशाद शान (गुलशन बुक्स)
23. लॉ एंड कॉन्फ्लिक्ट रेजोल्यूशन इन कश्मीर – पियोत्र बाल्सेरोविच और अग्निजका कुजेव्स्का (राउटलज/मनोहर)
24. तारीख-ए-सियासत कश्मीर – डॉक्टर अफाक (कारवां-ए-तहकीक-ओ-सकाफत कश्मीर)
25. कश्मीर एंड द फ्यूचर ऑफ साउथ एशिया – सम्पादक सुगत बोस और आयशा जलाल (राउटलज/मनोहर)

किताबों को बैन करने का ये ताजा कदम, कश्मीरी पहचान और उसके इतिहास पर एक और हमला है. यह दर्शाता है कि 1947 से भारत ने कश्मीर पर जिस बेलगाम तरीके से नियंत्रण हासिल किया है, उसमें गहरी असुरक्षा है. सरकार का मकसद साफ है – हर खबर और सूचनाओं पर पूरा नियंत्रण.

इस किताबबंदी में जिस कानून का इस्तेमाल हुआ है, वो बीएनएसएस की दफा 98 है जो असल में पुराने सीआरपीसी की दफा 95 की नकल है. इस कानून के तहत सरकार भारत में कहीं भी ऐसी किताबों की प्रतियां जब्त कर सकती है, जिन्हें वह गैरकानूनी या आपत्तिजनक मानती है. बीएनएसएस की दफा 98 तब लग सकती है जब सरकार को लगे कि इसमें पुराने कानून के वो हिस्से लागू होते हैं जो आज भी वैसे के वैसे हैं – सिवाय बीएनएसएस की दफा 152 के, जो इस वक्त सबसे ज्यादा अहम है. दफा 152 बीएनएसएस एक नया सेक्शन है, जिसके तहत कोई भी ऐसा कार्य, जैसे लिखे या बोले गए शब्द, जो देश से अलग होने की बात को बढ़ावा दें, सशस्त्र विद्रोह या गैरकानूनी गतिविधियों को उकसाएं, और भारत की एकता, अखंडता या संप्रभुता को खतरे में डालें, वह अपराध है. यह दफा पुराने देशद्रोह कानून (आईपीसी 124-ए) से मिलती-जुलती है, लेकिन और कठोर है. यह यूएपीए कानून की दफा 2(ओ) से भी जुड़ी है, जो गैरकानूनी गतिविधियों को परिभाषित करती है. यूएपीए के तहत ऐसी गतिविधियों के लिए सात साल तक की सजा हो सकती है, लेकिन बीएनएसएस की दफा 152 के तहत उम्रकैद तक की सजा हो सकती है.

यह साफ तौर से जाहिर है कि अब शब्दों को अपराध करार दिया गया है. इन किताबों को बैन करने के लिए किसी खास वाक्य, पैरा, पेज, या चैप्टर को आधार नहीं बनाया गया है. इसका मतलब है कि किताबों को, उनके शब्दों और मायने सहित, बैन कर दिया गया है. सिर्फ किताब रखना, बेचना, पब्लिश करना वगैरह ही नहीं, बल्कि आने वाले वक्त में अगर कोई तकरीर, प्रोग्राम, किताब, आर्टिकल, बहस या ह्यूमन राइट्स रिपोर्ट इन किताबों के शब्दों, घटनाओं, दलीलों या विवरण से मिलती-जुलती हुई, तो वो भी अपराध मानी जाएगी, यानि हमें पहले से ही चेतावनी दे दी गयी है.

दुनिया भर के विशेषज्ञों का कहना है कि ये किताबें, जो कश्मीरी, भारतीय, और अंतरराष्ट्रीय लेहकों द्वारा लिही गई हैं, पिछले सात दशकों से चले आ रहे कश्मीरियों के संघर्ष से उपजे कैसे, क्या, कहाँ, क्यों, और कब जैसे सवालों के संतुलित जवाब देती हैं. राज्य के गृह विभाग द्वारा जारी आदेश में किए गए दावों का कोई ठोस सबूत नहीं है जो इन 25 किताबों और हिंसा की कार्रवाइयों के बीच कोई संबंध दिखाए. आदेश में दावा किया गया है कि यह “जांच और खुफिया जानकारी” पर आधारित है, लेकिन कोई विवरण नहीं दिया गया है. इसके अलावा, “सुरक्षा बलों की निंदा” जैसे अस्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल किया गया है. यह आदेश पूरी तरह से मनमाना, गैरकानूनी, और असंवैधानिक है.

यह प्रतिबंध असल में कश्मीर से जुड़ी रिसर्च और पढ़ाई-लिखाई को अपराध बना देता है, खासकर उन विषयों का जो प्रतिरोध और आत्मनिर्णय की बात करते हैं. यह  कश्मीर में असहमति और आलोचना को कुचलने की 2019 से चल रही बड़ी साजिश का हिस्सा है. जब मोदी सरकार ने आर्टिकल 370 हटाया था, तब से अब तक 12 संगठनों पर पाबंदी लग चुकी है –जिनमें जमात-ए-इस्लामी और मीरवाइज उमर फारूक की अगुवाई वाली अवामी एक्शन कमेटी भी शामिल हैं. ये संगठन दशकों तक खुलेआम काम करते रहे, लेकिन अब इन्हें यूएपीए कानून के तहत बैन कर दिया गया है, इनके कई नेताओं-कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर दिल्ली, जम्मू और जम्मू-कश्मीर की यूएपीए विशेष अदालतों में मुकदमे चलाए जा रहे हैं. जम्मू-कश्मीर में देश में सबसे ज्यादा यूएपीए मामले हैं – 2020 से 2022 के बीच 947 केस दर्ज हुए.

कश्मीर बार एसोसिएशन को खत्म कर दिया गया और उसके सदस्यों को गिरफ्तार कर मुकदमे चलाए गए. मानवाधिकार संगठनों जैसे ‘एसोसिएशन ऑफ पेरेंट्स ऑफ डिसएपियरड पर्सन्स’ और ‘जम्मू-कश्मीर कोएलिशन ऑफ सिविल सोसाइटी’ को भी निशाना बनाया गया, उनके कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया, मुकदमे थोपे गए और उनके काम को – जैसे मानवाधिकार रिपोर्ट तैयार करना, अंतरराष्ट्रीय कानून का इस्तेमाल करना, और सिविल सोसाइटी की पहलकदमियां – सबको अपराध घोषित कर दिया गया. स्वतंत्र पत्रकारों और अखबारों को डराया-धमकाया गया, गिरफ्तार किया गया, और कई को बंद करने पर मजबूर किया गया. बैन संगठनों या गैर-सरकारी हथियारबंद समूहों के परिवारजनों से किसी भी तरह का रिश्ता रहने वालों को अपराधी ठहराया गया, और उनकी नौकरियों व संपत्तियों पर कार्रवाई की गई.

अनुराधा भसीन, जिनकी किताब “ए डिसमैंटल्ड स्टेटः द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ कश्मीर आफ्टर आर्टिकल 370” अब बैन है और जो ‘कश्मीर टाइम्स’ की संपादक हैं, के मुताबिक ये सरकार की घबराहट का नतीजा है. बैन की गई किताबों की लिस्ट का हवाला देते हुए वे अपने फेसबुक पोस्ट में लिखती हैंः “ये किताबें अच्छी तरह रिसर्च की गई हैं और इनमें से एक भी किताब आतंकवाद की तारीफ नहीं करती, जबकि यही सरकार दावा करती है कि उसने आतंकवाद खत्म कर दिया है. इन्हें सच्चाई को चुनौती देने वाले शब्दों से डर लगता है. मैं इस प्रतिबंध को, जो एक गिर चुकी सोच की बेहूदा निशानी है, चुनौती देती हूं – साबित करो कि इनमें एक भी ऐसा शब्द है जो आतंकवाद की तारीफ करता हो. जो लोग सच्चाई की कद्र करते हैं, वो इन्हें पढ़ें और खुद फैसला करें.”

प्रतिबंधित किताबों की सूची में भारतीय संवैधानिक विशेषज्ञ और जाने-माने बुद्धिजीवी ए.जी. नूरानी की मशहूर किताब “द कश्मीर डिस्प्यूट” भी शामिल है. वे आजादी के बाद कश्मीर के इतिहास के सबसे भरोसेमंद स्कॉलर और जानकार माने जाते हैं. उनका किया गया काम किसी भी देश के लिए फख्र की बात होनी चाहिए, लेकिन उनकी किताब तक पहुंच रोककर हमारी नौजवान पीढ़ी को ऐसे रास्ते पर धकेला जा रहा है जहां कनूनी तर्क और सभ्य बहस की कोई अहमियत नहीं रह जाती.

हफ्सा कंजवाल की अब बैन की गई किताब “कोलोनाइजिंग कश्मीरः स्टेट बिल्डिंग अंडर इंडियन ऑक्यूपेशन” कश्मीर के संघर्ष की जड़ों की पड़ताल करती है. कंजवाल ने विभाजन के बाद के कश्मीर के इतिहास को खंगाला है, यह देखते हुए कि रोजमर्रा की जिंदगी, सांस्कृतिक औजार, और आर्थिक निर्भरता का इस्तेमाल इस इलाके पर नियंत्रण मजबूत करने के लिए किया गया. उनकी किताब ये सवाल उठाती है कि राज्य कैसे बनाए  जाते हैं – सिर्फ जबरदस्ती से नहीं – और कैसे संप्रभुता को सहमति के बजाय गढ़ा भी जा सकता है.

एक और लेखिका, आतिर जिया, की किताब “रेजिस्टिंग डिसएपियरेंस” भी अब कश्मीर में बैन है. यह किताब कश्मीर में एसोसिएशन ऑफ द पेरेंट्स ऑफ डिसएपियर्ड पर्सन्स (एपीडीपी) के साथ जिया के दस साल के जुड़ाव पर आधारित एक अध्ययन है जो उन माताओं, जिनके बेटे और वैसी विधवाओं, जिनके पति लापता हैं, की कहानी बताती है, जो अपने गायब हुए प्रियजनों को तलाशती हैं और सरकार की जबरन  गुमशुदगी की नीतियों को चुनौती देती हैं.

किताबों, विचारों, नैरेटिव और दस्तावेजी कोशिशों पर पाबंदी की मुखालफत होनी चाहिए, और अदालतों के पास ये ताकत है कि अब तक के संविधानिक फैसलों के आधार पर ऐसे आदेश रद्द कर दें – चाहे बात किताबों की हो या अभिव्यक्ति की. यह सरकारी कार्रवाई पूरी तरह से गैरकानूनी है, और  इसकी अहमियत सिर्फ किताबों पर पाबंदी तक सीमित नहीं. यह न केवल जम्मू-कश्मीर के लोगों की रोजमर्रा की आजादियों पर राज्य के नियंत्रण को जारी रहती है, बल्कि यह और आगे बढ़कर इस कोशिश का हिस्सा है कि वहां के अच्छी तरह दर्ज दस्तावेजी इतिहास, आत्मनिर्णय के लिए राजनीतिक आंदोलन, हिंसा और सैन्यीकरण और इससे उपजे सवालों पर किसी तरह की चर्चा करने, दस्तावेजीकरण करने, समर्थन करने और विश्लेषण करने को अपराध करार कर दिया जाए. यह सरकार की एक और कोशिश है यह सुनिश्चित करने के लिए कि हथियारबंद संघर्ष के इलाकों को किसी भी किस्म की जांच-पड़ताल से दूर रखा जाए, और सच को छुपाने के लिए हमेशा राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद का नाम लिया जाए.

यह सिर्फ कश्मीरी जनता के अधिकारों का लगातार छीना जाना नहीं बल्कि हर हिन्दुस्तानी के हकों और बोलने की आजादी पर हमला है, क्योंकि आज कश्मीर सबसे दमनकारी नीतियों और कठोर कानूनों के लिए एक प्रयोगशाला बना हुआ है, जहां पहले इन्हें आजमाया जाता है और फिर देश के बाकी हिस्सों में लागू किया जाता है. इसका हम सबको एकजुट होकर विरोध करना होगा.

– मनमोहन

16 June, 2025