अगस्त 2024 में, बांग्लादेश में एक बड़ा राजनीतिक बदलाव हुआ था, जब वहां एक बड़े उथल-पुथल के बाद – जिसे अब जुलाई विद्रोह के नाम से जाना जाता है – शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार को हटा दिया गया था. राजनीतिक प्रक्रिया में दो साल पहले की उस दरार के बाद हुए पहले आम चुनाव में अब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेतृत्व में एक नई सरकार बनी है. चुनाव काफी हद तक शांतिपूर्ण रहे, भले ही चुनाव से पहले राजनीतिक हिंसा की बड़ी घटनाएं हुईं, जिनका निशाना ज्यादातर अपदस्थ अवामी लीग ही बनी. दिसंबर 2025 में जुलाई विद्रोह के एक जाने-माने चेहरे उस्मान हादी की हत्या के बाद हिंसा और तोड़-फोड़ की लहर दौड़ गई, जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय के एक कार्यकर्ता की बेरहमी से हत्या कर दी गई और जाने-माने मीडिया घरानों और प्रगतिशील सांस्कृतिक केंद्रों पर हमले किए गए.
बांग्लादेश में पिछले दो संसदीय चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली होने का आरोप लगे थे और धांधली उजागर भी हो गई थी. 12 फरवरी के चुनावों में ऐसे आरोप नहीं लगे हैं. लेकिन यह देखते हुए कि पूर्व की सत्ताधारी पार्टी अवामी लीग को अब चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया है, चुनाव निश्चित रूप से काफी निष्पक्ष नहीं थे. अवामी लीग के न होने के चलते ही संभवतः वोटर टर्नआउट में कमी भी दिखाई पड़ी. बांग्लादेश में मतदान बैलेट के जरिये हुए, जिसकी मांग भारत में अधिकाधिक लोग काफी समय से कर रहे हैं. चुनाव के नतीजे एक ही दिन में घोषित कर दिए गए. इस तरह चुनाव काफी विश्वसनीय और कुशलतापूर्ण ढंग से करा लिए गए.
अवामी लीग के चुनावी परिदृश्य से बाहर होने की वजह से चुनावी मुकाबला मुख्य रूप से बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11-पार्टी गठबंधन के बीच था. लोकप्रिय जुलाई विद्रोह ‘जेन-जी’ मंच के बतौर उभरी नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) ने जमात की अगुवाई वाले गठबंधन में शामिल होने का फैसला किया, जिससे पार्टी में फूट पड़ गई और उसके कुछ नेताओं ने अकेले चुनाव लड़ा. बांग्लादेश में वामपंथ ने दो अलग-अलग तरीके अपनाए, एक धड़े ने बीएनपी के साथ आंशिक समझौता किया, जबकि दूसरे धड़े ने एक स्वतंत्र ब्लॉक के रूप में चुनाव लड़ा. 300 में से 297 सीटों के लिए घोषित अंतिम नतीजों के अनुसार, बीएनपी ने 212 सीटों के साथ जबरदस्त बहुमत हासिल किया है, जबकि जमात के नेतृत्व वाला गठबंधन 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्ष के रूप में उभरा है जिसमें जमात ने 68 सीटें और एनसीपी ने छह सीटें जीती हैं. वामपंथ ने बीएनपी के साथ गठबंधन में एक सीट जीती.
बांग्लादेश के वोटरों ने न केवल अपनी नई संसद चुनी, बल्कि उन्होंने जुलाई चार्टर पर एक जनमत संग्रह में भी हिस्सा लिया, जो बांग्लादेश में प्रस्तावित संस्थागत सुधारों का एक चार्टर है. जुलाई चार्टर, जिसमें 80 से ज्यादा सुधार-प्रस्ताव थे, पर चौबीस राजनीतिक पार्टियों और अंतरिम सरकार ने 17 अक्टूबर 2025 को हस्ताक्षर किए थे और जनमत संग्रह में इसे 60 प्रतिशत समर्थन के साथ पारित किया गया था. अन्य बातों के अलावा, चार्टर में प्रधान मंत्री के लिए अधिकतम दो पारी का अवसर, एक ऊपरी लेजिस्लेटिव चैंबर बनाने और केयरटेकर सरकार की देखरेख में चुनाव कराने का प्रस्ताव है. इसमें महिलाओं को ज्यादा प्रतिनिधित्व देने और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को बढ़ाने का भी प्रावधान है. अब यह देखना बाकी है कि क्या चार्टर अगले कुछ सालों में तय समय पर लागू होता है.
बांग्लादेश में ‘जमात’ का मुख्य विपक्षी पार्टी के तौर पर उभरना यकीनन एक परेशान करने वाला राजनीतिक संकेत है. यह एक ऐसा संगठन है जिसने पाकिस्तान का साथ दिया था और बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का विरोध किया था. यह औरतों से नफरत करने वाला नजरिया रखता है जो महिलाओं को राजनीतिक व प्रशासकीय भूमिकाओं के लायक नहीं मानता, और इसने एक भी महिला उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा. कई मायनों में यह भारत में संघ ब्रिगेड के उभार जैसा है, भले ही भारत के उपनिवेशवाद-विरोधी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान आरएसएस ने धोखा दिया हो. लेकिन बंगलादेश इस खतरे को साफ तौर पर जानता है और अगर बीएनपी को भारी बहुमत मिला है, तो इसे ‘जमात’ के खिलाफ वोट के तौर पर भी देखा जाना चाहिए, कम से कम उसे सत्ता से बाहर रखने के लिए ही सही. हालांकि, एनसीपी के ‘जमात’ के साथ गठबंधन ने आज के बांग्लादेश में ‘जमात’ को ज्यादा वैधता और राजनीतिक हैसियत हासिल करने में मदद की है. जल्द ही, बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक ताकतों को ‘जमात’ कैंप के सामने एक मजबूत विभाजन रेखा खींचनी होगी और 1971 के मुक्ति संग्राम के लोकतांत्रिक नजरिए के हिसाब से बांग्लादेश को आगे बढ़ाने के असरदार तरीके खोजने होंगे.
भारत के साथ संबंध बांग्लादेश के लिए चिंता का प्रमुख विषय बना हुआ है. जुलाई विद्रोह से पहले लगातार अलोकप्रिय होती हसीना सरकार को समर्थन देना, 5 अगस्त 2024 को उनके हटाए जाने के बाद उन्हें शरण देना और साथ ही, अदानी प्रोजेक्ट्स और भारत के आर्थिक हितों को थोपना भी भारत द्वारा बांग्लादेश में असंतोष बढ़ाने वाले कदम रहे हैं. भारत और बंगलादेश में अल्पसंख्यक अधिकारों की नाजुक स्थिति के अलावा, मोदी सरकार और भाजपा द्वारा लगातार ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए’ का हौआ खड़ा करना हालात को और बिगाड़ रहा है. हाल के दिनों में भाजपा ने बांग्लादेश से कथित घुसपैठ को अपनी चुनावी रणनीति का मुख्य मुद्दा बना दिया है – सिर्फ पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय और त्रिपुरा जैसे सीमावर्ती राज्यों में ही नहीं, बल्कि झारखंड और बिहार में भी, जो बांग्लादेश से सटे नहीं हैं. पूरे भारत में बंगाली-भाषी प्रवासी मजदूरों को बांग्लादेशी घुसपैठिया कहकर उन्हें प्रणालीगत ढंग से उत्पीड़ित करने और उन्हें हिंसा का शिकार बनाने की संभावना हमेशा बनी रहती है.
भारत-बांग्लादेश संबंधों के मुद्दे से आगे, अंतरराष्ट्रीय स्थिति और ट्रंप युग में अमेरिकी प्रभुत्व की बढ़ती आक्रामक रणनीति भी एक बड़ा सवाल बना हुआ है. हर गुजरते दिन के साथ भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के खुलासे यह साफ कर रहे हैं कि अमेरिका केवल भारतीय बाजार पर ही कब्जा करना नहीं चाहता, बल्कि वह भारत को पूरी तरह से अमेरिकी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति’ और वैश्विक प्रभुत्व की नीतियों के साथ कर लेना चाहता है. साथ ही, ट्रंप प्रशासन दक्षिण एशिया में ‘बांटो और राज करो’ की रणनीति पर अमल कर रहा है और भारत-बंगलादेश या पाकिस्तान-भारत के बीच प्रतिद्वंद्वी व्यापार समझौतों के बहाने तनाव बढ़ा रहा है.
ऐसे परिप्रेक्ष्य में, भारत की धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक ताकतें बांग्लादेश में शांतिपूर्ण चुनावों से निश्चिय ही संतोष महसूस कर सकती हैं. अपने देश में न्याय और लोकतंत्र की लड़ाई लड़ते और दक्षिण एशिया में शांति, सहयोग और मित्रता की कामना करते हुए, हम बांग्लादेश के लोगों के लिए यह कामना करते हैं कि वे एक स्थिर लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में अपने भविष्य को संवारने में सशक्त बनें और सफल हों.