वर्ष 35 / अंक - 10-11 / परिवर्तन के दौर में बांग्लादेश : जुलाई जनविद्रोह क...

परिवर्तन के दौर में बांग्लादेश : जुलाई जनविद्रोह के बाद चुनाव

परिवर्तन के दौर में बांग्लादेश : जुलाई जनविद्रोह के बाद चुनाव

-- सोहुल अहमद

जुलाई के जनविद्रोह के बाद बांग्लादेश अपने राजनीतिक परिवर्तन के एक अत्यंत निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. देश ने शेख हसीना के तानाशाही शासन के उखाड़ फेंके जाने के करीब डेढ़ साल बाद अपना राष्ट्रीय चुनावों का सामना किया – एक ऐसा चुनाव जिसे देश के राजनीतिक इतिहास के सबसे अहम पलों में से एक माना जा रहा है. इस चुनाव को “अहम” या यहां तक कि “ऐतिहासिक” कहने की वजहें बांग्लादेश के हालिया चुनावी अनुभवों में गहराई से जुड़ी हैं.

यह 2008 के बाद पहला ऐसा चुनाव है जिसे सच मायनों में मुकाबले वाला कहा जा सकता है. हालांकि हसीना के शासन में तीन राष्ट्रीय चुनाव हुए, लेकिन तीनों ही भारी विवादों और गंभीर खामियों से घिरे रहे. 2014 के चुनाव से पहले सत्तारूढ़ आवामी लीग ने संविधान में संशोधन कर के केयरटेकर सरकार की व्यवस्था को खत्म कर दिया, जिससे चुनावी प्रक्रिया की बुनियाद ही बदल गई. नतीजतन, 2014 के चुनाव का बड़े विपक्षी दलों ने बहिष्कार किया. 2018 के चुनाव में भले ही ज्यादातर राजनीतिक दलों ने हिस्सा लिया, लेकिन उस चुनाव पर भी भारी अनियमितताओं के आरोप लगे. यहां तक कहा गया कि बड़ी संख्या में वोट मतदान के दिन से एक रात पहले ही डाल दिए गए थे. इन अनुभवों के चलते विपक्षी दलों ने 2024 के चुनाव का भी बहिष्कार किया. इस पूरी प्रक्रिया का नतीजा यह हुआ कि 1990 के बाद पैदा हुई एक पूरी पीढ़ी को लगातार तीन चुनावों में अपने वोट के अधिकार से वंचित रखा गया. बहुत से युवा नागरिकों के लिए 2026 का चुनाव पहली बार ऐसा मौका था, जब वे सच में अपने वोट का इस्तेमाल कर पाए.

आवामी लीग की सरकार को कई विद्वानों ने तानाशाही या मिली-जुली शासन के बतौर चिन्हित किया है. बांग्लादेश में इस लोकतांत्रिक गिरावट की एक खास निशानी चुनावी विश्वसनीयता का खत्म होना था, जिससे आम नागरिक वोट के अधिकार से वंचित हो गए. सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण के लिए भरोसेमंद तंत्रा के अभाव ने आखिरकार ऐसे हालात पैदा कर दिए जिनकी परिणति जुलाई विद्रोह में हुई, जहां शासक को वोट के जरिए नहीं, बल्कि ताकत के बल पर हटाया गया. हालांकि सत्ता हस्तांतरण का यह संकट बिल्कुल नया नहीं है. 1971 में आजादी के बाद से ही बांग्लादेश एक ऐसे स्थायी और संस्थागत लोकतांत्रिक ढांचे को खड़ा करने में जूझता रहा है, जिसमें सत्ता का शांतिपूर्ण और नियमित बदलाव संभव हो. सत्ता में आने के बाद, शासक दलों को केवल चुनावी रास्ते से हटाना हमेशा मुश्किल साबित हुआ है. हकीकत यह है कि बांग्लादेश की जनता आज तक चुनावों के जरिये सत्ता के दो लगातार, शांतिपूर्ण और भरोसेमंद हस्तांतरणों में हिस्सा नहीं ले पाई है. यही राजनीतिक पृष्ठभूमि  ने 2026 के चुनाव को दोनों तरह से निर्णायक और गहराई से ऐतिहासिक बना दिया.

जनमत संग्रहः क्यों और कैसे?

शेख हसीना के शासनकाल में राजनीतिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और नागरिक समाज संगठनों ने बार-बार सरकार की आलोचना की और बांग्लादेश में लोकतांत्रिक संकट की गहरी, संरचनात्मक वजहों को समझने की कोशिश की. इस पूरी बहस के केंद्र में एक बुनियादी सवाल था : 1990 में सैन्य शासक हुसैन मुहम्मद इरशाद को जन आंदोलन के जरिये सत्ता से हटाने के बाद भी बांग्लादेश में लोकतंत्र फिर संकट में क्यों फंस गया?

यह पड़ताल धीरे-धीरे राज्य के ढांचे के संकट, खासकर ‘संविधान’ की ओर मुड़ गई. 1972 में अपनाया गया संविधान भले ही एक लोकतांत्रिक गणराज्य का वादा करता हो, लेकिन उसकी वास्तविक संरचना को अत्यधिक केंद्रीकृत और कार्यपालिका-प्रधान माना गया. इसमें प्रधानमंत्री के हाथों बहुत ज्यादा ताकत केंद्रित है. इसी वजह से तानाशाही-विरोधी और हसीना-विरोधी संघर्ष के दौरान ‘संवैधानिक और संस्थागत सुधार’ एक बड़ी मांग बनकर उभरी. तर्क साफ था कि अगर ढांचे में बुनियादी सुधार नहीं हुए, तो चुनाव बार-बार उसी पुराने तानाशाही के चक्र को दोहराते रहेंगे.

हसीना के पतन के बाद सुधार की यह बहस तेजी से आम जनता के बीच फैल गई. चूंकि बार-बार पैदा होने वाला संकट बुनियादी तौर से सत्ता के शांतिपूर्ण और भरोसेमंद हस्तांतरण के तंत्र की कमी से जुड़ा था, इसलिए ऐसे तंत्र को संस्थागत रूप देने की मांग विद्रोह के बाद की राजनीति का मुख्य एजेंडा बन गई. नारे अब सीधे-सीधे व्यवस्था में बदलाव पर जोर देने लगे. जुलाई से पहले की राजनीतिक सक्रियता और जुलाई के बाद उभरी जनता की मांगों को ध्यान में रखते हुए अंतरिम सरकार ने कई सुधार आयोग बनाए. इन आयोगों ने सार्वजनिक प्रशासन, भ्रष्टाचार-निरोध, न्यायपालिका, पुलिस, संविधान, चुनाव प्रणाली, स्थानीय सरकार, महिला मुद्दों, श्रम अधिकारों, जनसंचार और स्वास्थ्य जैसे अहम क्षेत्रों की समीक्षा की. हर आयोग ने मौजूदा ढांचे की सीमाओं को चिन्हित किया और सुधार के ठोस सुझाव पेश किए. इनमें से संवैधानिक, सार्वजनिक प्रशासन, पुलिस, चुनाव प्रणाली, न्यायिक और भ्रष्टाचार-निरोध सुधार आयोगों की रिपोर्टों के आधार पर एक राष्ट्रीय सहमति आयोग गठित किया गया. इस आयोग ने सभी सुझावों की समीक्षा कर उन्हें एक साथ जोड़ने का काम किया. इसके बाद तीन चरणों में लंबी संवाद प्रक्रिया शुरू की गई, जिसमें राजनीतिक दलों के साथ-साथ दूसरे व्यापक हितधारकों को भी शामिल किया गया, ताकि राजनीतिक और प्रशासनिक सुधारों के लिए एक साझा, सहमति-आधारित ढांचा तैयार किया जा सके.

व्यापक संवाद और लंबी बहस के बाद मुख्य मुद्दों पर सहमति बन गई, हालांकि कुछ क्षेत्रों में असहमति के नोट भी दर्ज किए गए. इसी सहमति-आधारित ढांचे के आधार पर जुलाई चार्टर तैयार किया गया, जिस पर 33 राजनीतिक दलों ने हस्ताक्षर किए. चार्टर पर दस्तखत कर इन दलों ने यह प्रतिबद्धता जताई कि संसद में प्रतिनिधित्व मिलने पर वे सहमत सुधारों को लागू करेंगे. यह पहल इसलिए भी खास है क्योंकि बांग्लादेश के इतिहास में पहली बार राजनीतिक ताकतों ने किसी बाहरी या विदेशी मध्यस्थ के बिना, गहरे संरचनात्मक संकट को सुलझाने के लिए आपसी संवाद और बातचीत का रास्ता अपनाया. प्रस्तावित जनमत संग्रह मूल रूप से इसी सहमति-निर्माण की प्रक्रिया से जुड़ा है. इसके जरिये राजनीतिक दलों द्वारा तय किए गए सुधार ढांचे को जनता की मंजूरी के लिए रखा जा रहा है. नागरिकों से पूछा जा रहा है कि क्या वे इस सहमति का समर्थन करते हैं और चुने गए प्रतिनिधियों को सुधार लागू करने का अधिकार देते हैं. इस व्यवस्था के तहत अगली संसद की भूमिका दोहरी होगी. एक ओर वह सामान्य विधायी निकाय के रूप में काम करेगी. दूसरी ओर वही संसद एक संवैधानिक सुधार परिषद की तरह भी काम करेगी, जिसे 180 दिनों के भीतर जरूरी संवैधानिक सुधार लागू करने का अधिकार होगा.

मौजूदा चुनाव न केवल वर्षों के चुनावी बहिष्कार और विवादों के बाद बांग्लादेश में एक प्रतिस्पर्धी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बहाली है, बल्कि यह संरचनात्मक सुधारों के माध्यम से एक स्थायी राजनीतिक समाधान खोजने का गंभीर प्रयास भी है. जनमत संग्रह का तंत्रा संविधान और संस्थागत ढांचे में बदलाव की मांग करता है, ताकि राजनीतिक व्यवस्था ज्यादा जवाबदेह, संतुलित और जनता-केंद्रित बन सके.

बदला हुआ राजनीतिक परिदृश्य

इसी वजह से यह चुनाव जुलाई के जनविद्रोह के बाद पूरी तरह बदले हुए राजनीतिक माहौल में हो रहा है. दशकों तक बांग्लादेश की राजनीति अवामी लीग (एएल) और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के आपसी टकराव के इर्द-गिर्द घूमती रही. 1990 के दशक में संसदीय लोकतंत्र की बहाली से लेकर 2008 तक ये दोनों दल बारी-बारी से सत्ता में आते रहे. जातीय पार्टी (जापा) और बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी (जीआई) भी अहम राजनीतिक खिलाड़ी रहे, जो आम तौर पर इनमें से किसी एक खेमे के साथ खड़े होते थे.

आवामी लीग के नेतृत्व वाला खेमा आम तौर पर मध्य-वाम माना जाता था, जबकि बीएनपी के नेतृत्व वाला खेमा मध्य-दक्षिणपंथी समझा जाता था. 1971 में जमात-ए-इस्लामी की विवादास्पद भूमिका ने सार्वजनिक जीवन को गहरे तौर पर ध्रुवीकृत और नैतिक रूप से विवादित बना दिया था. इन दो पहचाने जाने वाले खेमों के बीच बना यह स्थापित ध्रुवीकरण लगभग दो दशकों तक बांग्लादेश की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की दिशा तय करता रहा. लेकिन 2008 के बाद यह द्वंद्वात्मक संतुलन धीरे-धीरे टूटने लगा. आवामी लीग ने विपक्षी ताकतों को योजनाबद्ध तरीके से कुचला, बीएनपी और अन्य दलों को हाशिये पर धकेला और करीब पंद्रह वर्षों तक एक वर्चस्ववादी पार्टी व्यवस्था कायम कर दी. जुलाई का जनविद्रोह इसी पृष्ठभूमि में फूटा.

सरकारी नौकरियों में कोटा सुधार की मांग से शुरू हुआ आंदोलन, राज्य-प्रायोजित हिंसा के चलते – जिसमें एक हजार से ज्यादा लोगों की जान गई – तेजी से एक स्वतःस्फूर्त जनविद्रोह में बदल गया. इस उथल-पुथल के बीच शेख हसीना देश छोड़कर भाग गईं और अवामी लीग के कई शीर्ष नेता भी बाहर चले गए. इसके बाद संयुक्त राष्ट्र की एक तथ्य-खोज मिशन ने जुलाई की हिंसा में मानवता के खिलाफ अपराधों के सबूत पाए और सत्तारूढ़ पार्टी की भूमिका की ओर साफ इशारा किया. शासन के पतन के बाद जबरन लापता किए गए कई लोगों को रिहा किया गया, जिससे जनता की न्याय की मांग और तेज हो गई.

इस तनावपूर्ण माहौल में पूर्व सत्तारूढ़ पार्टी से जवाबदेही की मांग को लेकर एक मजबूत जनभावना उभरी. बहुत से लोग मानते हैं कि सामूहिक हत्याओं में शामिल होने के आरोप झेल रहे किसी दल को बिना मुकदमे का सामना किए सामान्य राजनीतिक गतिविधियां शुरू करने देना अन्याय होगा. नतीजतन, सुधार संवाद और चुनावी राजनीति – दोनों में – आवामी लीग की भागीदारी बेहद विवादास्पद बन गई और उसे मौजूदा राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया.

इस अनुपस्थिति ने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को ही बदल दिया है. पुराने समीकरण टूट चुके हैं और पहले के सहयोगी भी अब उसी ढांचे में नहीं रहे. बीएनपी आज भी सबसे बड़ी और संगठनात्मक रूप से सबसे मजबूत पार्टी बनी हुई है. वहीं जुलाई उभार से उभरे छात्र नेताओं ने एक नया राजनीतिक मंच – नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) – खड़ा किया है, जो खुद को संभावित ‘तीसरी ताकत’ बताता है और राजनीति में एक ‘नए समझौते’ की बात करता है. हालांकि एनसीपी खुद को मध्यपंथी कहती है, लेकिन जमात-ए-इस्लामी और अन्य इस्लामवादी दलों के साथ उसका रणनीतिक चुनावी गठबंधन उसे व्यवहार में मध्य-दक्षिणपंथ के करीब ले आता है.

उसी दौरान बीएनपी अपनी राजनीतिक स्थिति को मध्य-वाम की ओर सरकाती दिख रही है – कम से कम अपनी भाषा और सार्वजनिक रुख में. भीड़ हिंसा के खिलाफ उसका खुला रुख और संस्थागत स्थिरता पर जोर उसे शहरी मध्यवर्ग और नागरिक समाज के कुछ हिस्सों में ज्यादा स्वीकार्य बनाता है. अवामी लीग की अनुपस्थिति में बांग्लादेश इस समय राजनीतिक गठजोड़ों के नए सिरे से बनने का गवाह है. एक तरफ पुनर्गठित बीएनपी है, जो धीरे-धीरे मध्य-वाम राजनीतिक जगह पर कब्जा करती जा रही है. दूसरी तरफ जमात-ए-इस्लामी और एनसीपी के इर्द-गिर्द आकार लेता हुआ मध्य-दक्षिणपंथी खेमा है. इन बदलावों के बावजूद मौजूदा परिदृश्य में बीएनपी अब भी सबसे लोकप्रिय और संगठनात्मक रूप से सबसे प्रभावी पार्टी बनी हुई है.

बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में ‘परिणाम’

चुनाव में बीएनपी को बड़ी जीत हासिल हुई और जनता ने जनमत संग्रह को साफ तौर पर ‘हां’ कह दिया. बीएनपी और उसके सहयोगियों ने 212 सीटें जीतीं, जमात-ए-इस्लामी और उसके सहयोगियों ने 77 सीटें, इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश ने 1 सीट हासिल की, जबकि अन्य दलों को 7 सीटें मिलीं. जमात-ए-इस्लामी और उसके सहयोगियों की 77 सीटों में से एनसीपी ने 6 सीटें जीतीं. वहीं करीब 68.1 प्रतिशत मतदाताओं ने जनमत संग्रह का समर्थन किया, जो जुलाई चार्टर में प्रस्तावित सुधारों के पक्ष में व्यापक जन समर्थन को दर्शाता है.

बीएनपी की यह भारी जीत पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं थी. मौजूदा राजनीतिक माहौल को देखते हुए पिछले एक साल में आए बड़े सर्वेक्षण पहले ही उसे जीत का मजबूत दावेदार बता चुके थे. इस बीच कुछ कट्टरपंथी समूहों में दक्षिणपंथी रुझानों का उभार – धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाने, प्रथम आलो और द डेली स्टार जैसे मीडिया संस्थानों पर हमलों – और भीड़ हिंसा में बढ़ोतरी ने मतदाताओं की सोच को गहराई से प्रभावित किया. ऐसे माहौल में बीएनपी की अपेक्षाकृत संयमित भाषा और भीड़ हिंसा के खिलाफ उसका रुख शहरी मध्यवर्ग और नागरिक समाज के कुछ हिस्सों के लिए उसे ज्यादा भरोसेमंद विकल्प बना गया.

हालांकि बीएनपी की भारी जीत से भी ज्यादा ध्यान जमात-ए-इस्लामी के उभार ने खींचा – अकेले 68 और सहयोगियों समेत कुल 77 सीटें. इस उभार को समझने के पीछे कई कारण हैं. पहला, राजनीतिक मैदान से आवामी लीग के हटने से जमात-ए-इस्लामी को चुनावी जगह मिली. बांग्लादेश में बड़ी संख्या में दुविधा में रहने वाले मतदाता हैं, और एक बड़े ध्रुव के हटते ही वोटों का पुनर्वितरण तय था. दूसरा, जमात-ए-इस्लामी ने खुलना और खासकर रंगपुर डिवीजन में शानदार प्रदर्शन किया. रंगपुर लंबे समय तक जापा का गढ़ रहा था, लेकिन जापा के संगठनात्मक पतन के बाद जीआई ने उस खाली जगह को भर दिया. चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण पहले ही संकेत दे चुके थे कि रंगपुर बेल्ट में जीआई मजबूत रहेगी. तीसरा, जमात-ए-इस्लामी को अन्य इस्लामवादी दलों के साथ गठबंधन, एनसीपी से जुड़े युवा मतदाताओं के समर्थन और बीएनपी के अंदरूनी विवादों का फायदा मिला. कई सीटों पर विद्रोही बीएनपी उम्मीदवारों ने वोट बांटे, जिससे जमात-ए-इस्लामी को अप्रत्यक्ष लाभ हुआ. चौथा, 5 अगस्त के बाद बीएनपी के कई जमीनी कार्यकर्ता हत्या, वसूली और स्थानीय स्तर के भ्रष्टाचार जैसे आरोपों में फंसते गए. कई हिंसक घटनाओं में बीएनपी से जुड़े लोगों के नाम आने से कुछ मतदाता उससे दूर हो गए और विकल्प न दिखने पर जमात-ए-इस्लामी की ओर मुड़ गए. पांचवां, जमात-ए-इस्लामी द्वारा जीती गई कई सीटें सीमा इलाकों में थीं. कहा जा सकता है कि सीमा पर हत्याओं और भारत-विरोधी भावनाओं – जिन्हें जमात-ए-इस्लामी  ने सक्रिय रूप से भुनाया – ने इन इलाकों में गहरी गूंज पैदा की.

हालांकि जमात-ए-इस्लामी सिलहट और चटगांव जैसे प्रमुख धार्मिक मंदिरों वाले क्षेत्रों में ज्यादा आगे नहीं बढ़ सका. पिछले डेढ़ साल में दक्षिणपंथी इस्लामवादी समूहों द्वारा मंदिरों को तोड़ने की घटनाओं ने उसकी स्वीकार्यता सीमित कर दी. इसके अलावा, चुनाव अभियान में महिलाओं से जुड़े कुछ मुद्दों पर जमात-ए-इस्लामी की सार्वजनिक रुख ने महिला मतदाताओं के कुछ हिस्सों को अलग कर दिया, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से बीएनपी को लाभ हुआ. कुल मिलाकर, बीएनपी की भारी जीत और जमात-ए-इस्लामी के उभार को केवल वैचारिक नजरिए से नहीं देखना चाहिए. यह परिणाम वर्तमान राजनीतिक गतिशीलता और बांग्लादेश में परंपरागत रूप से अस्थिर मतदाताओं की व्यवहारिक गणनाओं को भी दर्शाते हैं.

दो अतिरिक्त पहलू ध्यान देने योग्य हैं. पहला, ऑनलाइन क्षेत्र लगभग पूरी तरह जमात-ए-इस्लामी समर्थकों और कार्यकर्ताओं के नियंत्रण में था. विदेश से संचालित यूट्यूब प्रभावक खुलकर जमात-ए-इस्लामी का समर्थन कर रहे थे और समन्वित प्रचार के जरिये उसकी कथा को बढ़ावा दे रहे थे. उनका डिजिटल सक्रियता और विश्वविद्यालय परिसरों में जमात-ए-इस्लामी छात्र विंग की पिछली सफलता ने यह धारणा बनाई कि जमात-ए-इस्लामी संसद में बड़ी उपस्थिति बनाएगा. लेकिन वास्तविक चुनाव परिणाम बताते हैं कि ऑनलाइन प्रचार का वास्तविक चुनावी प्रभाव सीमित रहा.

दूसरा, आवामी लीग खेमे से निरंतर प्रचार चलता रहा कि अगर वह सत्ता में नहीं रही तो इस्लामवादी ताकतें – खासकर जमात-ए-इस्लामी – सत्ता में आ जाएंगी. यह प्रचार जुलाई उभार को इस्लामवादी समर्थक बताने से जुड़ा था. सत्ता में रहते हुए आवामी लीग बार-बार दावा करती रही कि केवल वही इस्लामवादी कब्जे को रोक सकती है. यही उसका तानाशाही सत्ता को बनाए रखने का औचित्य था. चुनाव परिणाम ने इस दावे और जुलाई उभार को इस्लामवादी बताने वाले नैरेटिव दोनों को चुनौती दी. परिणाम एक अधिक जटिल राजनीतिक वास्तविकता को दिखाता है.

एनसीपी की बात करें तो छात्र नेतृत्व वाली यह पार्टी मुख्यतः जमात-ए-इस्लामी के सक्रिय समर्थन से 6 सीटें जीत सकी. लेकिन पार्टी के भीतर आंतरिक मतभेद – खासकर जमात-ए-इस्लामी गठबंधन में शामिल होने के फैसले को लेकर – ने उसकी ताकत को कमजोर किया. इसके अलावा एनसीपी के पास मजबूत संगठन बनाने और अपने समर्थकों को वोटर में बदलने का पर्याप्त समय नहीं था. भीड़ हिंसा पर उसकी अस्पष्ट स्थिति, धार्मिक मंदिरों के तोड़ने पर अपेक्षाकृत चुप्पी और महिला-विरोधी माने जाने वाले रैलियों में भागीदारी ने उसके सार्वजनिक चित्रा को नकारात्मक बना दिया. हालांकि जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन ने उसे छह सीटें दिलाईं, लेकिन इसने उसके मध्यपंथी दावे को कमजोर कर दिया और धारणा बनी कि वह दक्षिणपंथ की ओर झुक रही है. कई वर्षों के बाद बांग्लादेश ने ऐसा चुनाव देखा जिसमे लगभग शून्य मौतें हुई – पहले के चुनावों के बिल्कुल उलट, जहां मतदान के दिन हिंसा आम थी. वोटिंग के बाद अल्पसंख्यक समुदायों पर कोई हमला नहीं हुआ. यह एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व क्षण था.

वामपंथः विरोध में मुखर, मतपत्र में हाशिए पर

बांग्लादेश का वामपंथी या वाम-समर्थक क्षेत्र मुख्यतः दो समूहों में बंटा है : औपचारिक वाम दलों से जुड़े कार्यकर्ता और गैर-पक्षीय/स्वतंत्र वाम झुकाव वाले कार्यकर्ता. रणनीति, स्थिति और जन धारणा के मामले में इन दोनों समूहों में अंतर है. कुछ वाम दलों ने पिछले शासन में आवामी लीग के प्रमुख नैरेटिव से खुद को जोड़ लिया. नतीजतन उन्हें आवामी लीग  के शासन और ऐतिहासिक ढांचे को जायज ठहराने वाला माना गया. वहीं दूसरे वाम दल और गैर-दलीय कार्यकर्ता पिछले शासन के दौरान लगातार विरोधी राजनीति में सक्रिय रहे. उन्होंने सेव द सनडरबन आंदोलन, कोटा सुधार आंदोलन, सड़क सुरक्षा आंदोलन और जुलाई विद्रोह जैसे बड़े आंदोलनों में भूमिका निभाई. श्रम अधिकार विरोध प्रदर्शन भी उनकी नियमित सक्रियता का हिस्सा रहे. खासकर वाम दलों के छात्रा विंग लंबे समय से हसीना-विरोधी विरोधों में सक्रिय रहे. कुछ मामलों में उन्होंने अपने मातृ संगठनों से अलग रुख अपनाया.

हालांकि वाम दलों ने संस्थागत और संवैधानिक सुधार के दीर्घकालिक एजेंडे से पर्याप्त जुड़ाव नहीं बनाया, जो बाद में जुलाई के बाद की राजनीति का केंद्र बना. जुलाई के बाद वाम के कुछ हिस्सों को दक्षिणपंथी समूहों से प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ा, मुख्यतः कुछ वाम दलों के आवामी लीग  के साथ पुराने जुड़ाव के कारण. फिर भी दलीय और गैर-दलीय वाम कार्यकर्ता भीड़ हिंसा, धार्मिक मंदिरों के तोड़ने और अन्य अन्याय के खिलाफ मजबूत सार्वजनिक रुख अपनाते रहे. वे सड़क राजनीति में दृश्यमान और मुखर बने रहे.

चुनाव के दौरान कई प्रसिद्ध वाम नेताओं ने अलग-अलग क्षेत्रों से चुनाव लड़ा. कुछ वाम-समर्थक बीएनपी के साथ जुड़े, जबकि अन्य स्वतंत्र रूप से लड़े. लेकिन वाम दल व्यापक चुनावी गठबंधन बनाने में असफल रहे. कई क्षेत्रों में एक से ज्यादा वाम उम्मीदवार आमने-सामने रहे, जिससे वोट बंट गए. संगठनात्मक कमजोरी और चुनावी तैयारी की कमी के कारण वे सभी हार गए.

जुलाई के बाद छात्र नेतृत्व वाली एनसीपी उभरी, और शुरू में उसने सभी विचारधाराओं के कार्यकर्ताओं को आकर्षित किया, जिनमें वाम कार्यकर्ता भी शामिल थे. लेकिन धीरे-धीरे कई वामपंथी उससे अलग होते गए. “नियो-लेफ्ट” कहलाने वाले युवा कार्यकर्ता पारंपरिक वाम दलों से अक्सर अलगाव महसूस करते हैं, जिन्हें वे पुराने और बयानबाजी-प्रधान मानते हैं. इस संदर्भ में नई पहल आकार ले रही हैं, जैसे नेटवर्क फॉर पीपुल्स एक्शन (एनपीए), जो लोकतांत्रिक और समाजवादी राजनीतिक विकल्प विकसित करना चाहता है.

फिलहाल बांग्लादेश की वाम राजनीति निर्णायक मोड़ पर है. पारंपरिक वाम दल फीके पड़ते दिख रहे हैं और युवा पीढ़ी की आकांक्षाओं और भाषा से जुड़ने में संघर्ष कर रहे हैं. एंटोनियो ग्राम्शी के शब्दों में कहें तो, पुराना मर रहा है और नया अभी जन्म लेना बाकी है. वामपंथी सड़क आंदोलनों और नागरिक समाज में सक्रिय बने हुए हैं, लेकिन चुनावी राजनीति में उनकी उपस्थिति कमजोर और बंटी हुई है.

आगे का रास्ता

2026 का चुनाव जुलाई विद्रोह के बाद शुरू हुए लोकतांत्रिक बदलाव की प्रक्रिया में निर्णायक कदम है. लेकिन जुलाई चार्टर के क्रियान्वयन जैसी बड़ी चुनौतियां अभी बाकी हैं. राजनीतिक दलों के बीच प्रमुख प्रावधानों और क्रियान्वयन के तरीकों पर व्यापक सहमति के बावजूद इसे ठोस कार्रवाई में बदलना अभी अनिश्चित है. चार्टर सुधार पर संघर्ष संसद से आगे सार्वजनिक स्थानों तक फैल सकता है. विपक्षी समूह उल्लंघनों का आरोप लगा सकते हैं, जबकि सरकार अपनी लोकप्रिय जनादेश का हवाला देकर अपने तरीके को जायज ठहरा सकती है. आगामी 180 दिनों का क्रियान्वयन काल लिटमस टेस्ट साबित होगा – यह तय करेगा कि बांग्लादेश का लोकतांत्रिक बदलाव सुचारू रूप से आगे बढ़ेगा या फिर संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता के चक्र में लौट जाएगा.

आगे का रास्ता लंबा और जटिल है. बांग्लादेश का लोकतंत्र मुश्किल चुनौतियों का सामना करता रहेगा, जिसमें आवामी लीग  की राजनीतिक भूमिका का अनसुलझा सवाल भी शामिल है – जो भविष्य के संघर्ष का संभावित फ्लैशपॉइंट है. प्रस्तावित संस्थागत सुधार अभी लागू नहीं हुए हैं. फिर भी सतर्क आशावाद की वजह है : अगर बांग्लादेश शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण को मजबूत कर सके और मतदाता के अधिकार का सम्मान और इस्तेमाल सुनिश्चित कर सके, तो यह देश की राजनीतिक दिशा को मौलिक रूप से बदल देगा.

(लेखक ढाका, बांग्लादेश में स्थित एक शोधकर्ता, लेखक और कार्यकर्ता हैं.)

07 March, 2026