वर्ष 35 / अंक - 07 / बांग्लादेश का नया राजनीतिक अध्याय

बांग्लादेश का नया राजनीतिक अध्याय

बांग्लादेश का नया राजनीतिक अध्याय

कहते हैं कि सभी “जीत” एक जैसी नहीं होतीं और सभी “हार” भी एक जैसी नहीं होतीं. बांग्लादेश के ताजा संसदीय चुनाव ने देश के इतिहास में एक नया राजनीतिक अध्याय जोड़ दिया है. तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के गठबंधन ने 299 सीटों में से 212 सीटें जीतकर निर्णायक बढ़त हासिल की है.

इस चुनाव की खासियत यह भी रही कि पहले सहयोगी रहे बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी अब एक-दूसरे के सामने थे. शेख हसीना की अवामी लीग चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकी, क्योंकि अंतरिम सरकार ने देश में उसकी गतिविधियों – ऑनलाइन मौजूदगी सहित – पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.  इस बीच, जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाला गठबंधन 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्ष के रूप में उभरा है. प्रतिबंध हटने के बाद उसने 11-पार्टी गठबंधन के भीतर व्यापक प्रचार किया और कई इलाकों में आक्रामक ढंग से अपनी मौजूदगी दर्ज कराई – जो लोकतांत्रिक भविष्य के लिहाज से चिंता का एक पहलू भी है.

चुनावी राजनीति की एक और कड़वी सच्चाई महिलाओं की कम भागीदारी है. 1,900 से ज्यादा उम्मीदवारों में केवल 78 महिलाएं थीं. इनमें भी कई महिलाएं स्वतंत्र राजनीतिक पहचान के साथ मैदान में नहीं उतरीं, बल्कि प्रभावशाली पुरुष नेताओं की रिश्तेदार के रूप में चुनाव लड़ीं.

फिर भी, यह कहा जा सकता है कि बांग्लादेश के लोगों ने दो साल के भीतर दो-दो फासीवादी पार्टियों को रोक दिया – एक अवामी लीग और दूसरा उसका पर्दे के पीछे का साथी जमात-ए-इस्लामी. इस परिणाम को एक व्यापक राजनीतिक संदेश की तरह भी पढ़ा जा सकता है. बीते वर्षों में “अगर लीग नहीं, तो जमात आ जाएगा” वाला नैरेटिव बार-बार दोहराया गया – मानो अवामी लीग का विकल्प अनिवार्यतः कट्टरपंथ ही हो. लेकिन इस चुनाव ने दिखाया कि जनता एक साथ कई स्तरों पर सत्ता और विपक्ष, दोनों से जवाबदेही मांग सकती है, और धर्म व सत्ता के गठजोड़ की राजनीति को पहचानती भी है.

यह पृष्ठभूमि अचानक नहीं बनी. फरवरी 2025 में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया कि 2024 के आंदोलनों के दौरान प्रदर्शनकारियों पर दमन और हत्याओं के पीछे शेख हसीना सरकार की भूमिका थी और यह कार्रवाई “मानवता के खिलाफ अपराध” की श्रेणी में आ सकती है. रिपोर्ट में बताया गया कि आंदोलन के दौरान हसीना सरकार, देश की सुरक्षा एजेंसियों और अवामी लीग से जुड़े हिंसक तत्वों ने मिलकर गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन किए. 1 जुलाई 2024 से 15 अगस्त 2024 के बीच करीब 1,400 लोग मारे गए और हजारों घायल हुए, जिनमें अधिकांश को सुरक्षा बलों ने गोली मारी. मारे गए लोगों में 12-13 प्रतिशत बच्चे भी शामिल थे.

इसके बाद न्यायिक कारवाई में एक और बड़ा मोड़ आया. 17 नवंबर 2025 को बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT) ने शेख हसीना को उनकी अनुपस्थिति में मानवता के खिलाफ अपराधों का दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई.  हालांकि, मानवाधिकार संगठनों ने इस मुकदमे में निष्पक्ष सुनवाई के मानकों और मृत्युदंड पर आपत्तियां दर्ज कीं. इधर शेख हसीना को आंदोलन के दबाव में सत्ता छोड़ने और भारत में शरण लेने के तीन दिन बाद, 5 अगस्त 2024 को अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस ने अंतरिम सरकार के ‘मुख्य सलाहकार’ का पद संभाला. यूनुस ने वादा किया कि चुनी हुई सरकार बनने के बाद वह यह पद छोड़ देंगे.

ऐसे में बीएनपी की जीत तारिक रहमान के लिए सिर्फ चुनावी सफलता नहीं, बल्कि लंबे निर्वासन के बाद राजनीतिक वापसी का प्रतीक भी है. बीएनपी संस्थापक जियाउर रहमान और खालिदा जिया के पुत्र के रूप में उनका कैरियर विवादों और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा रहा, जिसके कारण उन्हें लगभग 17 वर्ष लंदन में निर्वासन में बिताने पड़े.

2024 के जनआंदोलन और बदलते राजनीतिक परिदृश्य के बीच तारिक रहमान 2025 में स्वदेश लौटे. उन्होंने युवाओं और आर्थिक सुधारों पर केंद्रित चुनावी घोषणापत्र के साथ बीएनपी के अभियान का नेतृत्व किया, देशभर में रैलियां कीं और युवाओं से सीधे संवाद किया. बीएनपी का 2026 का घोषणापत्र आर्थिक पुनरुत्थान, रोजगार सृजन (विशेषकर युवाओं के लिए), भ्रष्टाचार विरोधी कदम, मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं, छोटे और मध्यम उद्यमों को समर्थन, और शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार का वादा करता है. घोषणापत्र में स्पष्ट ऐलान किया गया है – “13 फरवरी से जनता का दिन शुरू होगा, इंशाअल्लाह.” अब चुनौती यह है कि घोषणापत्र के वादों को महंगाई, बेरोजगारी और सामाजिक ध्रुवीकरण जैसी कठोर वास्तविकताओं के बीच कैसे उतारा जाए.

हालांकि अब इन वादों का सामना आर्थिक वास्तविकताओं से होगा. बांग्लादेश महंगाई और बेरोजगारी जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है.  2024 की घटनाओं ने राजनीति में नई आवाजें जोड़ीं और जनता की अपेक्षाएं बदल दीं. तारिक रहमान अब उस बांग्लादेश का नेतृत्व कर रहे हैं जो लगभग दो दशक पहले छोड़े गए देश से बिल्कुल अलग है. 

बांग्लादेश की जनता के लिए यह क्षण संभावनाओं से भरा है – पर शर्तें स्पष्ट हैं : लोकतंत्र मजबूत हो, धर्मनिरपेक्षता और नागरिक अधिकार सुरक्षित रहें, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की आजादी सुनिश्चित हो, और राज्य की प्राथमिकताएं शिक्षा, स्वास्थ्य व बुनियादी सुविधाओं तक समान पहुंच पर टिकें. दक्षिण एशिया बदल रहा है; बांग्लादेश का यह जनादेश कट्टरपंथ और तानाशाही – दोनों के लिए चेतावनी है.

– मनमोहन

14 February, 2026