इस वर्ष संसद का शीतकालीन सत्र भाजपा की शातिर ‘इतिहास की राजनीति’ की मिसाल के रूप में याद किया जाएगा. यह सत्र भारत के सबसे गहरे उड्डयन संकट के बीच चल रहा था, जब सैकड़ों उड़ानें रद्द की जा रही थीं और हजारों यात्रा हवाई अड्डे पर फंसे रहे थे. अगर कॉरपोरेट और सरकारी प्रशासन जरा भी जवाबदेह और प्रयासरत होते तो इस संकट से पूरी तरह बचा जा सकता था, और, यह सब भारत की राजधानी में हो रहा था जहां ठीक तीन सप्ताह पहले प्रसिद्ध लाल किला के निकट भयानक कार विस्फोट हुआ था जिसमें दर्जनों जानें गई थीं, और जो सबसे खतरनाक एक्यूआई स्तरों के साथ दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी मानी जाती है. फिर भी मोदी सरकार के लिए ‘वंदे मातरम’ की 150वीं जयंती के मौके पर इस गीत को लेकर दस घटे की बहस चलाना ही सर्वोपरि प्राथमिकता बन गई.
अगर मंशा यही थी कि इस गीत की 150वीं जयंती मनाई जाए, जिसे संविधान सभा ने भारत गणतंत्र की घोषणा के अवसर पर राष्ट्र-गान ‘जन गण मन’ के साथ -साथ ‘राष्ट्रीय गीत’ के बतौर अंगीकार किया था, तो सरकार कोई स्टांप जारी कर सकती थी अथवा इसके सम्मान में कोई अच्छा कार्यक्रम आयोजित कर सकती थी. लेकिन सरकार का मकसद तो बिल्कुल भिन्न था – वह इतिहास की तोड़-मरोड़ करने और हिंदुत्ववादी एजेंडा को आगे बढ़ाने की खातिर इस गीत को केंद्र कर एक मनगढ़ंत विमर्श गढ़ना चाहती है. संघ-भाजपा प्रतिष्ठान अपनी मिथ्या कहानी के जरिये हमें यकीन दिलाना चाहता है कि गांधी वंदे मातरम के वृहत्तर संस्करण को राष्ट्र-गान के बतौर अपनाना चाहते थे, किंतु जिन्ना इस गीत को पसंद नहीं करते थे और कांग्रेस ने जिन्ना को संतुष्ट करने के लिए इस गीत में काट-छांट कर दी और वंदे मातरम में यही काट-छांट भारत विभाजन की पूर्वपीठिका बन गई!
वंदे मातरम के मामले में इससे बड़ा झूठ तो कोई हो ही नहीं सकता है. मूल गीत में सिर्फ दो अंतरा थे जो बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा प्रकाशित बंगाली पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में छपी थी. टैगोर ने इसमें संगीत दिया और सबसे पहले बंकिम चंद्र के सामने और फिर 1886 में कोलकाता में कांग्रेस के अधिवेशन में इसे गाया. बंकिम चंद्र ने अपने उपन्यास आनंदमठ में वंदे मातरम के विस्तारित संस्करण को शामिल किया, जो उस उपन्यास के विषय-वस्तु के अनुकूल था.
यह भी गौरतलब है कि इस गीत में वर्णित ‘मातृभूमि’ का तात्पर्य अविभाजित भारत के अविभाजित बंगाल प्रांत से था, और विशेष रूप से यह गीत तथा ‘वंदे मातरम’ का नारा 1905 में बंगभंग के खिलाफ आन्दोलन का युद्धघोष बन गया था. बाद में इसने अखिल-भारतीय व्याख्या और अपील अपना ली जो इस गीत के ऐतिहासिक प्रभाव का भी प्रमाण है, और इसी के चलते टैगोर, सुभाष चंद्र बोस, गांधी, नेहरू, पटेल और मौलाना आजाद समेत भारत के राष्ट्रीय व सांस्कृतिक आगरण के पुरोधाओं ने मूल गीत के दो अंतराओं को राष्ट्रीय गीत के बतौर अनुशंसित किया.
आनंदमठ में इस गीत को हिंदू धार्मिक अपील से लैस किया गया था, किंतु गीत का वास्तविक ऐतिहासिक प्रभाव मातृभूमि के उत्साहवर्धक उपनिवेश-विरोधी देशभक्तिपूर्ण आह्वान के रूप में सामने आ रहा था. भारत के समावेशी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद ने सही तौर पर बंगदर्शन संस्करण के पहले दो अंतराओं को ही स्वीकृति दी. इसका विस्तारित संस्करण उपन्यास के संदर्भ के अनुकूल हो सकता है, लेकिन वह राष्ट्रीय गीत की जरूरतों के लिहाज से उपयुक्त नहीं था. इस प्रकार, गीत की ‘कांट-छांट’ का सवाल पूरी तरह भ्रामक और शातिराना है. ऐतिहासिक रूप से राष्ट्रवादी भावना समाये हुए मूल संस्करण को स्वीकार किया गया, जबकि उपन्यास में इस्तेमाल किए गए विस्तारित संस्करण को बहु-धार्मिक भारत के राष्ट्रीय गीत के उपयुक्त नहीं माना गया. आरएसएस और हिंदुत्ववादी विचारधारा को भारत की उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रीय जागरण तथा स्वतंत्रता आन्दोलन से कोई लेना-देना नहीं था, और इसीलिए आज की भाजपा के पूर्ववर्ती लोगों को इस राष्ट्रवादी भावना और वंदे मातरम के इस्तेमाल से भी कोई सरोकार नहीं था. आज वे लोग भारत की उपनिवेशवाद-विरोधी विरासत को दूषित करने तथा अपने हिंदुत्ववादी एजेंडा को आगे बढ़ाने की खातिर शातिराना ढंग से वंदे मातरम के आनंदमठ संस्करण का राग अलाप रहे हैं. इसके अलावा, भाजपा के दावे के उलट आनंदमठ संस्करण को नहीं, बल्कि दो मूल अंतराओं को अपनाने का सबसे प्रबल सुझाव रवींद्रनाथ टैगोर की तरफ से आया था, जवाहरलाल नेहरू की तरफ से नहीं
मोदी सरकार जहां वंदे मातरम की 150वीं जयंती मनाने के नाम पर जनता का ध्यान उनके ज्वलंत मुद्दों से परे हटाकर उन्हें इस गीत को लेकर भ्रामक और विभाजनकारी बहस में फंसा देने की कोशिश कर रही है, वहीं वह एक बार फिर संसद सत्र को छोटा भी कर दे रही है ताकि काले कानूनों को आनन-फानन में पारित करवा दिया जाए. सरकार बीमा क्षेत्र में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश और सामरिक नाभिकीय ऊर्जा क्षेत्र में निजी भागीदारी को सुनिश्चित करना चाहती है. भारतीय उच्च शिक्षा आयोग का गठन कर उच्च शिक्षा के क्षेत्र को केंद्रीय नियंत्रण के तहत लाने की कोशिश की जा रही है ताकि संघवाद को कमजोर किया जा सके, शिक्षा के वाणिज्यीकरण को बढ़ावा दिया जा सके और आरएसएस की विचारधारा व प्रभाव को लागों के जेहन में और ज्यादा भरा जा सके.
और अंततः, मजदूरों को ‘हायर एंड फायर’ के कॉरपोरेट जंगल राज में धकेलने के साथ-साथ सरकार भारत के सबसे बड़े कल्याणकारी कानून ‘मनरेगा’ को भी खत्म कर देना चाहती है. इसकी जगह पर प्रस्तावित ‘वीबी-ग्राम’ (विकसित भारत – गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन, ग्रामीण) बिल 2015 के जरिये राज्यों पर वित्त प्रबंध का आनुपातिक ढंग से ज्यादा बोझ डाला जाएगा और कृषि के व्यस्त मौसम में इस कानून को निष्प्रभावी बना दिया जाएगा. जहां किसान समुदाय कृषि के साथ मनरेगा के वृहत्तर जुड़ाव की मांग कर रहे हैं, वहीं यह नया कानून खेती के व्यस्त मौसम में मजदूरों की सस्ती और पर्याप्त आपूर्ति के नाम पर खुद को निलंबित कर देगा. अगर मनगढ़ंत इतिहास पर बहसों को भटका देने तथा जनता के अधिकारों की कटौती करने व संविधान को तहस-नहस करने के मकसद से संसद सत्रों का इस्तेमाल करने की कोशिश की जाएगी, तो भारत के लोगों को संड़कों पर लंबे व संकल्पबद्ध संघर्ष चलाकर सरकार की इस रणनीति को शिकस्त देनी होगी.