वर्ष 35 / अंक - 15 / भविष्य के संघर्ष की दिशा हैं का. चंद्रशेखर

भविष्य के संघर्ष की दिशा हैं का. चंद्रशेखर

भविष्य के संघर्ष की दिशा हैं का. चंद्रशेखर

दौर आते हैं और गुजर जाते हैं. पर, कुछ लोग अपने समय की सीमाओं को लांघकर आने वाले कल की आहट सुन लेते हैं और इतिहास के पन्नों पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं. ऐसे लोग अपने समय से आगे खड़े दिखते हैं - और वक्त गुजरने के साथ उनके विचारों की प्रासंगिकता और गहरी हो उठती है. आज जब सत्ता के गलियारों में दक्षिणपंथी वर्चस्व और फासीवाद के हमले चौतरफा तेज हुए हैं, तब डा. भीमराव अंबेडकर वैसी ही श्रेणी में आ खड़े हुए हैं. उनके विचार पहले से कहीं अधिक जरूरी प्रतीत होते हैं. यही बात का. चंद्रशेखर पर भी सटीक बैठती है. हर बीतते वर्ष के साथ उनकी वैचारिक दृष्टि और चमकदार होती जा रही है. फासीवादी मंसूबों के खिलाफ प्रतिरोध के प्र्रतीक, एक दूरदर्शी चिंतक, एक जुझारू योद्धा और सामाजिक न्याय के सशक्त प्रवक्ता के रूप में का. चंदू आज पिछले किसी भी समय से ज्यादा याद किए जा रहे हैं.

90 का दशक देश में कई बदलावों का दशक था. एक ओर मंडल आयोग की सिफारिशों ने सामाजिक न्याय की नई इबारत लिखनी शुरू की थी, तो ठीक इसी समय सांप्रदायिक उन्माद की ताकतें देश में अपना पैर पसार रही थीं. बाबरी मस्जिद विध्वंस ने भारतीय राजनीति की दिशा में मूलगामी बदलाव किए. इसी समय देश में उदारीकरण और निजीकरण के द्वार खुले और वैश्विक स्तर पर सोवियत संघ के विघटन ने वामपंथी राजनीति को एक गहरी वैचारिक चुनौती दी.

ऐसे उलझे हुए समय में, का. चंद्रशेखर प्रतिरोध के एक स्पष्ट और मजबूत स्वर बनकर उभरे. सांप्रदायिक फासीवाद की वे ताकतें आज सत्ता के शिखर पर विराजमान हैं. का. चंद्रशेखर उन विरल लोगों में थे जिन्होंने इस उभरते खतरे को समय रहते पहचाना था. उन्होंने जेएनयू परिसर में फासीवादी प्रवृत्तियों के खिलाफ न केवल प्रतिरोध खड़ा किया, बल्कि एक नई वैचारिक जमीन भी तैयार की. उनके हस्तक्षेप ने कैंपस राजनीति को नई ऊर्जा दी – देशभर के विश्वविद्यालयों में छात्र-युवा एक नए तेवर के साथ उभरे. 1993-94 का दौर प्रतिरोध के वैचारिक उभार का साक्षी बना, जब आइसा ने जेएनयू में ऐतिहासिक जीत दर्ज की और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बनारस) और इलाहाबाद विश्वविद्यालय (प्रयागराज) तथा कुमाऊं विश्वविद्यालय (नैनीताल) समेत कई विश्वविद्यालय छात्रा संघों में भी जीतें हासिल की. यह जीतें सांप्रदायिकता और फासीवाद के खिलाफ उभरती छात्रा-युवा चेतना की प्रतीक थीं और इसके शिल्पकारों में का. चंदू का नाम सबसे आगे था. मानो, एक बार फिर भगत सिंह जाग उठे हों, उनके विचार आसमान पर छा गए हों और बदलाव का संघर्ष एक नई दिशा ग्रहण कर रहा हो.

का. चंदू की शहादत के लगभग तीस वर्ष होने को हैं. इन तीन दशकों में भारतीय समाज और राजनीति ने गहरे और निर्णायक परिवर्तन देखे हैं. आज फासीवाद की वे ताकतें सत्ता में है और आजादी आंदोलन की तमाम उपलब्धियों को नेस्तनाबूद कर देना चाहती है. चौतरफा ‘हिंदू राष्ट्र’ का उन्माद सुनाई देता है. कॉरपोरेट-ब्राह्मणवादी लॉबी ने पूरे देश को ग्रस-सा लिया है. वह खतरा जिसे का. चंदू ने ’90 के दौर में पहचाना था, आज वास्तविकता बन चुका है. इसी कारण संघर्षकारी ताकतों को का. चंद्रशेखर की विचार प्रक्रिया अपनी ओर आज कहीं ज्यादा खींच रही है. क्योंकि, का. चंदू का जीवन इस बात का ज्वलंत दस्तावेज है कि विचार केवल किताबों में नहीं रहते, बल्कि संघर्षों में ढलते हैं, आंदोलनों में जीवित रहते हैं और नई पीढ़ी को रास्ता दिखाते हैं. उनकी शहादत केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि एक निरंतर आह्वान है – अन्याय के खिलाफ खड़े होने का, सच के पक्ष में बोलने का, लोकतंत्र व संविधान को बचाने का और आज की लड़ाई को नई ऊंचाई पर ले जाने का. का. चंद्रशेखर केवल अतीत का नाम नहीं, वे वर्तमान की जरूरत और भविष्य की दिशा हैं.

चंद्रशेखर जब बिहार आए, तो यह उनका सिर्फ सियासी दौरा नहीं था. बल्कि एक गहरा जुड़ाव था उन लोगों के साथ, जो सदियों से हाशिये पर खड़े थे. ’80 के दशक में बिहार के ग्रामांचल इन्हीं लोगों के सशक्त प्रतिरोध की एक नई इबारत लिख रहे थे. भूमिहीन किसान, दलित और मेहनतकश तबका जुल्म सहने को अब तैयार न था. उनके संघर्ष की जड़ें बहुत गहरी थीं, जिसमें जमीन पर अधिकार से लेकर इज्जत, बराबरी और इंसाफ के सवाल थे. वे एक राजनीतिक-सामाजिक ताकत में खुद को संगठित कर रहे थे. चंद्रशेखर को यही संघर्ष जेएनयू से सिवान खींच लाया था. वे समझते थे कि असली तब्दीली ऊपर से नहीं बल्कि नीचे से उठने वाली आवाजों को मजबूत करके लाई जा सकती है. इसलिए उनका पूरा जोर गांवों में चल रहे संघर्षों को बड़े आंदोलन में तब्दील करने पर था. चंदू के लिए सियासत समाज बदलने का जरिया थी.

’90 के दशक में बिहार में दलितों-पिछड़ों के राजनीतिक उभार की दो धाराएं स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आईं. एक आइपीएफ और भाकपा(माले) के नेतृत्व में सामाजिक बदलाव की रैडिकल धारा थी तो दूसरी ओर समाजवादी खेमे की सामाजिक न्याय वाली धारा. संपूर्णता में इसकी अभिव्यक्ति यह हुई कि बिहार में 40 वर्षों से जारी अगड़ी जाति समुदाय की राजनीति पीछे गई और दलित-बहुजन एजेंडा सामने आया. सच में, यह एक बड़ा बदलाव था, बिहार की राजनीति में, बिहार के समाज में. सत्ता से पदच्युत सामंती-ब्राह्मणवादी ताकतों ने प्रतिक्रिया में दलितों-पिछड़ों पर एक से बढ़कर एक हमले किए, कई जनसंहारों को अंजाम दिया और इस बदलाव को रोक देने की कोशिश की. विडंबना यह कि सामाजिक न्याय के नाम पर सत्ता में आई सरकार से दलितों-गरीबां का जल्दी ही मोहभंग होने लगा. उनके नारे एक बंद गली में जा उलझे. दलितों-पिछड़ों के बदलाव की इन दो धाराओं के बीच सामंजस्य की बजाए एक टकराव-सा बनता गया. बात तो सामाजिक न्याय की होती थी लेकिन उन ताकतों को भी संरक्षण मिला, जो गरीबों के उभार को कुचल देना चाहती थीं.

इसी टकराव का एक अहम केन्द्र सिवान बन रहा था. जब भाकपा(माले) के नेतृत्व में चल रहे दलितों-गरीबों के संघर्षों को रोकने के लिए वहां की ब्राह्मणवादी-सामंती ताकतों ने शहाबुद्दीन को अपना ढाल बना लिया. का. चंद्रशेखर की शहादत इस टकराव का सबसे दर्दनाक पहलू थी. लेकिन हम इस घटनाक्रम को उस दौर की पूरी जटिलता के परिप्रेक्ष्य में नहीं समझते तो कभी भी सही निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाएंगे. भाकपा(माले) के पूर्व महासचिव का. विनोद मिश्र ने उसी समय लिखा था – ‘.... शहाबुद्दीन से हमारी सीधी लड़ाई नहीं थी, और न ही उससे लड़ना हमारी प्राथमिकता थी. सीवान में हम सवर्ण-सामंती ताकतों से लड़ रहे थे, ये ताकतें जब पस्त हो गईं तो शहाबुद्दीन को सामने ले आई.’

इस परिप्रेक्ष्य को इसलिए समझना जरूरी है कि आज हमारे सामने एक बिल्कुल नया दौर है, नई जरूरते हैं और समय इसकी नई व्याख्या की भी मांग करता है. समाज अतीत में डूबकर आगे नहीं बढ़ सकता. फासीवादी हमलों के खिलाफ जब भाकपा(माले) ने एक व्यापक एकता का आह्वान किया तब हमारे ऊपर आरोप लगाए गए कि हमने का. चंदू के हत्यारों से हाथ मिला लिया, जबकि विगत 20 वर्षों में समय बहुत ही बदल चुका है. सांप्रदायिक-फासीवादी ताकतें आज सिवान में खुलकर मैदान में हैं, उन्हें किसी ओट की जरूरत नहीं है. इसका यह मतलब नहीं कि चंद्रशेखर की हत्या की कोई माफी हो सकती है. वह बिहार के बेहतर भविष्य पर एक बड़ा हमला था.

हमें आज का. चंद्रशेखर के उस छोर को पकड़ना होगा जो आज की गंभीर होती समस्याओं का माकूल जवाब है. मुल्क में फासीवादी ताकतें लोकतांत्रिक ढांचे, सामाजिक ताने-बाने और इंसाफ की बुनियाद को कमजोर करने में जब जी-जान से लगी हुई हों तो हमें का. चंदू के उस आह्वान को पकड़ना होगा जिसमें वे इन ताकतों के खिलाफ एक व्यापक एकता की वकालत करते हैं. चंद्रशेखर बुनियादी तौर पर फासीवादी उभार के खिलाफ प्रतिरोध के प्रतीक हैं. वे एक बड़े नजरिए के साथ लड़ रहे थे – एक ऐसे समाज के लिए – जहां इंसाफ, बराबरी और आजादी हकीकत बने. आज उनकी वही सोच एकजुट होकर बड़े दुश्मन का मुकाबला करना सीखा सकती है.

इसीलिए, पिछले वर्षों की तुलना में इस साल का. चंदू अलग-अलग और नए संदर्भों में याद किए गए. उन्हें याद करने वालों में उनके पुराने संगी-साथियों से लेकर नई पीढ़ी के लोग शामिल हैं. उन्हें इस बार सामाजिक न्याय की विभिन्न धाराओं ने भी याद किया. सत्ता में हिस्सेदारी और आरक्षण के दायरे के इर्द-गिर्द सिमट चुकी सामाजिक न्याय की लड़ाई आज जब अपने उस दायरे को तोड़कर भूमि, शिक्षा व आरक्षण के बड़े दायरे पर बात करने की जरूरत महसूस कर रहा है तब का. चंदू के विचार और उनकी विरासत उन्हें प्रेरणा दे रहे हैं. सामाजिक न्याय पर फासीवादी निजाम द्वारा लगातार बढ़ते हमले का जवाब हैं – का. चंद्रशेखर. देश को अमेरिका के सामने गिरवी रखने की शर्मनाक कार्रवाइयों के जवाब हैं – का. चंद्रशेखर. उनके साथी राशिद अली लिखते हैं – अगर चंद्रशेखर आज जीवित होते, तो वे क्या करते? मुझे लगता है, वे सड़कों पर होते – लोगों को संगठित करते, बोलते, एकजुटता दिखलाते. वे कभी हिचकते नहीं. और शायद वे वही साफ बाते कहते, जो हमेशा कहते थे – अगर आज ईरान गिरता है, तो दुनिया भर में निर्भरता और बढ़ेगी.

चंद्रशेखर भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं है. लेकिन अपनी शहादत के 30 वर्ष बाद वे कहीं ज्यादा प्रासंगिक होकर हमारे बीच मौजूद हैं. हमले जब-जब बढ़ेंगे, तब-तब कोई चंद्रशेखर खड़े दिखेंगे. भगत सिंह की विरासत नई राह रौशन करती रहेगी.


बिंदुसार में का. चंद्रशेखर स्मृति स्थल का लोकार्पण

31 मार्च 2026 को सिवान जिले के बिंदुसार में का. चंद्रशेखर और का. श्याम नारायण यादव के शहादत दिवस के अवसर पर एक व्यापक, प्रेरणादायी और संघर्षशील कार्यक्रम का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की शुरुआत दोनों शहीद नेताओं की स्मृति में आयोजित श्रद्धांजलि सभा से हुई, जिसमें उनके संघर्षपूर्ण जीवन, सामाजिक न्याय के प्रति अटूट प्रतिबद्धता और जनपक्षधर राजनीति को याद करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई.

इस अवसर पर बिंदुसार में का. चंद्रशेखर के स्मृति स्थल का विधिवत लोकार्पण किया गया. यह स्मृति स्थल न केवल शहादत की याद को संजोने का प्रतीक है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए संघर्ष, साहस और जनपक्षीय राजनीति की प्रेरणा का केंद्र भी बनेगा. लोकार्पण कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिकों, छात्रों, युवाओं और विभिन्न जनसंगठनों के प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी रही, जिसने इसे एक जनोत्सव का रूप दे दिया.

स्मृति स्थल का लोकार्पण भाकपा(माले) पोलित ब्यूरो सदस्य का. धीरेंद्र झा, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ की अध्यक्ष अदिति मिश्रा और पटना विश्वविद्यालय की छात्र नेता सबा आफरीन ने संयुक्त रूप से किया. इसके साथ ही पार्टी के वरिष्ठ नेता अमरनाथ यादव ने झंडोत्तोलन किया. इस अवसर पर पूर्व विधायक सत्यदेव राम, केन्द्रीय कमेटी सदस्य – नईमुद्दीन अंसारी, अभ्युदय, कुमार परवेज, पूर्व विधायक अमरजीत कुशवाहा, सोहिला गुप्ता, इंद्रजीत चौरसिया, हंसनाथ राम, विकास यादव, जयशंकर पंडित सहित अनेक वरिष्ठ पार्टी नेता उपस्थित रहे.

इसके बाद, बिंदुसार से चंद्रशेखर गोलंबर तक एक विशाल युद्ध-विरोधी शांति मार्च निकला जिसमें सैकड़ों की संख्या में शामिल लोगों ने विश्व स्तर पर बढ़ते युद्ध, साम्राज्यवादी हस्तक्षेप और मानवता पर मंडराते खतरों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की. ‘युद्ध नहीं, शांति चाहिए’, ‘साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’ और ‘लोकतंत्र बचाओ’ जैसे नारों से पूरा इलाका गूंज उठा. यह मार्च न केवल अंतरराष्ट्रीय शांति का संदेश था, बल्कि देश और बिहार में लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा का भी आह्वान था.

11 April, 2026